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  • जयपुर महाराजा को विश्वास था कि कम्पनी उसके राज्य की रक्षा करेगी

     02.07.2017
    जयपुर महाराजा को विश्वास था कि कम्पनी उसके राज्य की रक्षा करेगी

    आम्बेर राज्य के 34वें कच्छवाहा राजा जगतसिंह (ई.1803-1818) ने 12 दिसम्बर 1803 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ संधि की किंतु ई.1805 में अंग्रेजों द्वारा संधि को भंग कर दिया गया। ई.1816 में भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा जयपुर राज्य के बीच पुनः संधि हुई किंतु यह संधि भी अंग्रेजों द्वारा खिराज की भारी रकम मांगे जाने के कारण भंग हो गयी थी।

    कुछ समय के उपरांत ही परिस्थितियों ने जयपुर महाराजा जगतसिंह और ईस्ट इण्डिया कम्पनी को पुनः संधि करने के लिये बाध्य कर दिया। मराठा सरदार सिंधिया और होलकर निर्भय होकर सारे राजस्थान में तथा जयपुर रियासत में लूटमार करने लगे। रियासत को पिंडारियों की लूटमार का भी शिकार होना पड़ा। यही नहीं, रियासत के सामन्त भी महाराजा के विरुद्ध विद्रोह करने लगे।

    मराठों एवं पिण्डारियों के बढ़ते हुए हस्तक्षेप तथा अपने जागीरदारों की विद्रोही गतिविधियों से परेशान होकर महाराजा जगतसिंह ने राज्य की सुरक्षा के लिये अंग्रेजों से संधि करने का प्रयास किया। अंग्रेजों के साथ संधिवार्ता करने के लिये सामोद के रावल बैरीसाल नाथावात के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मण्डल फरवरी 1818 में दिल्ली भेजा गया। ब्रिटिश सरकार भी अब अपने साम्राज्य विस्तार में मराठों एवं पिण्डारियों को बाधक समझ कर उनकी शक्ति का दमन करना चाहती थी। काफी चर्चा के उपरांत 2 अप्रेल 1818 को ईस्ट इण्डया कम्पनी और जयपुर रियासत के मध्य संधि हुई। इस संधि की प्रमुख धाराएं इस प्रकार से थीं -

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महाराजा जगतसिंह तथा उसके उत्तराधिकारियों में मित्रता, लाभ और एकता के सम्बंध बने रहेंगे। महाराजा के उत्तराधिकारी संधि की पालना के लिये बाध्य होंगे। एक पक्ष के शत्रु और मित्र दूसरे पक्ष के शत्रु और मित्र होंगे। अर्थात् यदि किसी एक पक्ष पर शत्रु आक्रमण करते हैं तो उसे दोनों पक्षों पर आक्रमण माना जायेगा।

    ब्रिटिश सरकार जयपुर रियासत की सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेती है। अंग्रेज जयपुर के शत्रुओं को खदेड़ने में जयपुर की सहायता करेंगे। महाराजा जगतसिंह और उसके उत्तराधिकारी ब्रिटिश सरकार के साथ अधीनस्थ सहयोगी की हैसियत से काम करेंगे तथा उसकी प्रभुता स्वीकार करेंगे और अन्य राज्यों अथवा अन्य राज्य प्रमुखों से किसी प्रकार के सम्बंध नहीं रखेंगे।

    महाराजा और उसके उत्तराधिकारी किसी भी राज्य अथवा राज्य प्रमुख से किसी भी प्रकार की संधि या पत्र व्यवहार ब्रिटिश सरकार की जानकारी और अनुमोदन के बिना नहीं करेंगे। सामान्य पत्र व्यवहार मित्रों तथा सम्बंधियों के साथ करते रहेंगे। बिना अंग्रेजों की अनुमति के महाराजा और उसके उत्तराधिकारी किसी अन्य राज्य पर आक्रमण नहीं करेंगे। यदि किसी अन्य राज्य के साथ विवाद हो जाता है तो उसे मध्यस्थता तथा निर्णय के लिये ब्रिटिश सरकार को सौंप देंगे।

    जयपुर नरेश नियमित रूप से खिराज की राशि ब्रिटिश सरकार के दिल्ली कोषागार में जमा करवाते रहेंगे। पहले वर्ष के लिये खिराज की राशि जयपुर में निरंतर हुए विनाश को देखते हुए माफ कर दी गयी। दूसरे वर्ष से यह राशि इस प्रकार तय की गयी- दूसरे वर्ष के लिये 4 लाख, तीसरे वर्ष 5 लाख, चौथे वर्ष 6 लाख, पाँचवे वर्ष 7 लाख तथा छठे वर्ष 8 लाख रुपये। इसके साथ ही यह भी तय हुआ कि जब राज्य की राजस्व आय 40 लाख वार्षिक से अधिक हो जायेगी तो उसका 5/16 भाग 8 लाख की खिराज राशि के अतिरिक्त और देय होगा।

    ब्रिटिश सरकार की मांग पर जयपुर रियासत अपने साधनों के अनुसार अपनी सेवाएं प्रदान करेगी। महाराजा और उसके उत्तराधिकारी अपने राज्य के स्वतंत्र शासक बने रहेंगे। ब्रिटिश सरकार के दीवानी और फौजदारी कानून को वहाँ पर लागू नहीं किया जायेगा। जब तक महाराजा ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी सच्ची मित्रता का इजहार करता रहेगा, तब तक कम्पनी उसे सुरक्षा और उसके विकास में मदद देती रहेगी। यह संधि कम्पनी सरकार की ओर से सर चार्ल्स मेटकाफ तथा महाराजाधिराज जगतसिंह की ओर से उनके प्रतिनिधि ठाकुर बेरीसाल नाथावत के मध्य 2 अप्रेल 1818 के दिन सम्पन्न हुई। गवर्नर जनरल के सचिव टी. जे. एडम ने 15 अप्रेल 1818 को इस संधि का अनुमोदन कर दिया।

    ई.1803 की संधि में जयपुर राज्य के प्रति कम्पनी की ओर से जिस मित्रता और आदर का भाव था वह इस संधि में अनुपस्थित था। अब रियासत बराबरी की स्थिति में न रहकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीनस्थ हो गयी थी। इस संधि के उपरांत महाराजा जगतसिंह की स्थिति अपने जागीरदारों के बीच काफी मजबूत हो गयी तथा रियासत को मराठों और पिण्डारियों से मुक्ति मिल गयी।

    इस संधि में सर्वाधिक उल्लेखनीय बात यह थी कि खिराज की जो राशि तय की गयी वह बहुत भारी थी। इतनी बड़ी धनराशि जयपुर के शासकों ने न तो कभी मुगलों को दी थी और न मराठों को। मुगलों या मराठों को जो राशि देय होती थी वह पूर्ण रूप से कभी भी नहीं चुकायी जायी जाती थी। सदैव ही कुछ न कुछ बाकी रहा करती थी किंतु ईस्ट इण्डिया कम्पनी तो खिराज की राशि निश्चत तारीख से पहले ही वसूल कर लेती थी। खिराज की यह रकम राज्य की आय को देखते हुए बहुत अधिक थी।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करने के कुछ माह बाद 21 दिसम्बर 1818 को महाराजा जगतसिंह की मृत्यु हो गयी। कहा जाता है कि इस संधि के हो जाने से जगतसिंह अपनी मृत्यु के समय अत्यंत आश्वस्त था कि उसका राज्य मराठों एवं पिण्डारियों की लूटमार से मुक्त हो गया है और भविष्य में ब्रिटिश कम्पनी उसकी बाह्य आक्रमणों से रक्षा करेगी।

    जगतसिंह के कोई संतान नहीं थी इसलिये प्रधानमंत्री मोहनराम तिवाड़ी ने नरवर के पूर्व राजा के पुत्र मोहनसिंह को जयपुर का महाराजा घोषित कर दिया किंतु अन्य सामंतों ने इसका विरोध किया किंतु जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी को यह ज्ञात हुआ कि स्व. महाराजा की एक पत्नी गर्भवती है तो उसने मोहनसिंह को जयपुर का राजा नहीं बनने दिया। 25 अप्रेल 1819 को भटियानी रानी के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इसी बालक को जयसिंह तृतीय के नाम से जयपुर का महाराज बना दिया। दिल्ली के रेजीडेण्ट सर डेविड ऑक्टरलोनी ने जयपुर में रीजेंसी की सरकार बनायी तथा राजमाता (भटियानी रानी) राज्य की रीजेण्ट बनायी गयी।

    जयपुर का प्रधानमंत्री मोहनराम तिवाड़ी रेजीडेंट ऑक्टरलोनी का आदमी था किंतु राजमाता ने रावल बेरीसाल को राज्य का मुख्तार (प्रधानमंत्री) बना दिया। इस बात पर राजमाता तथा ऑक्टरलोनी में मनमुटाव हो गया। ऑक्टरलोनी ने राजमाता के प्रभाव को कम करने के लिये राजमाता के विरोधी गुट को बढ़ावा दिया जिससे जयपुर राज्य में षड़यंत्र, कलह तथा गुटबाजी ने जोर पकड़ लिया। रावल बेरीसाल राजमाता का पक्ष छोड़कर ऑक्टरलोनी से मिल गया। इस पर राजमाता ने फौजीराम को अपना सलाहकार बनाया। 14 दिसम्बर 1820 को महल की चारदीवारी में फौजीराम तथा कुछ और लोगों की हत्या कर दी गयी। राजमाता ने बैरीसाल के प्रतिद्वंद्वी झूथाराम को अपना प्रमुख सलाहकार बनाया।

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