• ढूंढाड़ देस राच्छस धरा, दई वास नह दीजिये

     02.06.2020
    ढूंढाड़ देस राच्छस धरा, दई वास नह दीजिये

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    ग्यारहवीं शती के प्रारंभ में नरवर से आये कच्छवाहों (कछुओं) ने मत्स्य क्षेत्र के मीनों (मछलियों) से ढूंढाड़ प्रदेश छीनकर आम्बेर के प्रबल कच्छवाहा राज्य की स्थापना की थी। प्राचीन काल में तथा मध्यकाल में भी ढूंढाड़ प्रदेश को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। एक कवि ने ढूंढाड़ प्रदेश की निंदा करते हुए लिखा है-


    गाजर मेवो कांस खड़ मरद जपून उघाड़।

    ऊंधै ओझर अस्तरी, अेहो धर ढूंढाड़।।

    ढूंढाड़ देस राच्छस धरा, दई वास नह दीजिये।।


    इस देश की सीमा का वर्ण करते हुए किसी कवि ने लिखा है-

    सोता, साबी, कांटली, चम्बल और बनास।

    इन सब नदियन के बीच बसै देस ढूंढाड़।।

    उत्तर टौंक-टोडा सैं, सैंथल सै अथूणों धरा।

    इसड़ा मिनख बसै ढूंढाड़ में परवतसर से उरा उरा।।


    जयपुर नगर राज्य की राजधानी था और राज्य का सबसे बड़ा नगर भी। इसकी स्थापना 18 नवम्बर 1727 को आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह द्वितीय ने की थी जो स्वयं ज्योतिष, ज्यामिति, गणित तथा नक्षत्र विद्या का ज्ञाता था। जयपुर नगर की स्थापना के लिये जयसिंह ने बंगाली विद्वान, ब्राह्मण विद्याधर भट्टाचार्य की सेवाएं प्राप्त कीं। नगर का निर्माण पूर्णतः भारतीय नगर निर्माण पद्धति पर किया गया था तथा इस नगर को पूर्व से पश्चिम तक जाने वाली दो मील लम्बी एवं 110 फुट चौड़ी सड़क के दोनों ओर बसाया गया था।

    इस नगर की स्थापना के बाद आम्बेर राज्य को जयपुर राज्य कहा जाने लगा। ई.1734 में पादरी जोस टाइफेन्थेलर ने जयपुर को भारत का सबसे सुंदर शहर बताया। ई.1832 में एक फ्रैंच यात्री ने इसे दिल्ली से भी अच्छा शहर बताया। बिशप हीबर ने जयपुर नगर के परकोटे की तुलना मास्को के क्रेमलिन की दीवारों से की। जयपुर नरेश महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय (ई.1835-1880) ने इस नगर की समस्त भवनों को गुलाबी रंग से पुतवा दिया जिससे नगर बहुत सुंदर दिखायी देने लगा और तब से ही इसे गुलाबी नगर भी कहा जाने लगा। ई.1901 तक यह राज्य राजपूताने के सर्वाधिक महत्वपूर्ण नगर की स्थिति प्राप्त कर चुका था। इतना ही नहीं भारत वर्ष के प्रमुख नगरों में इसकी गिनती होने लगी थी।

    जयपुर राज्य ने पहले मुगल शासकों से और बाद में अंग्रेजों से पक्का राजनैतिक गठबंधन किया तथा इस गठबंधन को मजबूत बनाये रखने के लिये सतत प्रयत्न किये थे जिससे राज्य के आकार में भी वृद्धि होती रही थी तथा राज्य की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत होती चली गयी थी। ई.1901 में जयपुर राज्य का क्षेत्रफल 15,579 वर्गमील था। क्षेत्रफल के आधार पर राजपूताना में यह तीसरे स्थान पर था जबकि जनसंख्या के आधार पर यह पहले स्थान पर आता था। अलवर का राज्य वंश भी जयपुर के कच्छवाहा शासकों में से निकला था।

    जयपुर राज्य की जनसंख्या वर्ष 1881 में 25,27,142, वर्ष 1891 में 28,23,966, वर्ष 1901 में 26,58,666, वर्ष 1931 में 26,32,000, वर्ष 1941 में 30,40,876 थी। कुल जनसंख्या में लगभग 90 प्रतिशत हिंदू, 7 प्रतिशत मुस्लिम, 1.5 प्रतिशत जैन तथा 1.5 प्रतिशत अन्य मतों एवं सम्प्रदायों को मानने वाले लोग रहते हैं। 1901 में जयपुर राज्य में ईसाई धर्म को मानने वाले मात्र 364 व्यक्ति थे। राज्य की जनसंख्या में प्रमुख जातियों का प्रतिशत इस प्रकार से था- ब्राह्मण 13 प्रतिशत, जाट 10 प्रतिशत, मीणा 9 प्रतिशत, चर्मकार 8 प्रतिशत, महाजन 8 प्रतिशत, गूजर 7 प्रतिशत, राजपूत 4.5 प्रतिशत तथा माली 4 प्रतिशत।

    राज्य में शिक्षा की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। ई.1901 में राज्य में कुल 2.52 प्रतिशत व्यक्ति साक्षर थे। इनमें भी स्त्रियों की साक्षरता मात्र 0.1 प्रतिशत थी। ई.1921 में राज्य की साक्षरता मात्र 4.2 प्रतिशत, ई.1931 में 4.2 प्रतिशत तथा ई.1941 में 5.3 प्रतिशत ही हो पायी थी। जिस समय देश को आजादी मिली उस समय जयपुर राज्य में मात्र 0.8 प्रतिशत स्त्रियां ही अक्षरों से परिचित थीं।

    राज्य के औसत वार्षिक राजस्व की स्थिति इस प्रकार से थी- वर्ष 1901 में 65 लाख रुपये, वर्ष 1936 में 125 लाख रुपये, वर्ष 1945-46 में 280.5 लाख रुपये। राज्य की विभिन्न मदों से आय वर्ष 1901 में इस प्रकार से थी- भू राजस्व- 42.0 लाख रुपये, कस्टम- 9.0 लाख रुपये, नमक संधि से राजस्व प्राप्ति- 7.5 लाख रुपयेे तथा जागीरदारों से करों की प्राप्तियां- 4.0 लाख रुपये थी। राज्य का कुल वार्षिक व्यय 59 लाख रुपये था जिसका मदवार विवरण इस प्रकार था- सिविल एवं ज्यूडिशियरी स्टाफ, सेना, इम्पीरियल सर्विस ट्रांसपोर्ट कोर- 10.0, सार्वजनिक कार्यों पर व्यय- 7.0 लाख रुपये, केन्द्र सरकार को कर- 4.0 लाख रुपये, पुलिस पर व्यय- 2.4 लाख रुपये, प्रिवीपर्स, महलों, दान एवं शिक्षा आदि पर व्यय 84 हजार रुपये, चिकित्सा संस्थान एवं टीकाकरण पर व्यय 70 हजार रुपये। राज्य पर किसी तरह का कर्ज नहीं था।

    जयपुर नरेश सवाई माधोसिंह (ई.1880-1922) अशिक्षित तथा अत्यंत पुरातन विचारों का स्वामी था फिर भी अंग्रेजी अधिकारियों के नेतृत्व में उसके शासन काल में जयपुर राज्य में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज हुई। ई.1905 तक जयपुर राज्य में राजपूताना मालवा रेलवे की लम्बाई 243 किलोमीटर हो गयी थी। सवाई माधोसिंह द्वारा जयपुर से सवाईमाधोपुर तक 73 मील की लम्बाई में राज्य की अपनी रेल लाइन बनावाई गयी थी। उसके समय में राज्य में स्थानीय पोस्ट ऑफिसों की संख्या 86 तथा ब्रिटिश पोस्ट ऑफिसों की संख्या 34 थी। रेलवे स्टेशनों के अलावा राज्य में 14 तारघर भी बन गये थे। डाक लाने ले जाने के लिये ऊँटों तथा धावकों की सेवाएं भी ली जाती थीं।

    सवाई माधोसिंह ने प्रथम विश्व युद्ध के लिये राज्य तथा राजा की ओर से पंद्रह लाख रुपये युद्ध कोष में भिजवाये। इतनी ही राशि उसने अपने सरदारों और अधिकारियों से जुटा कर भिजवायी। अंग्रेज अधिकारी उसे बहुत पसंद करते थे क्योंकि उसने अपनी ओर से अंग्रेजों के लिये कोई कठिनाई पैदा नहीं की। माधोसिंह के कोई संतान नहीं था। इसलिये उसने एक पुत्र को गोद लिया जो मानसिंह द्वितीय के नाम से जयपुर की गद्दी पर बैठा।

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