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  • उच्च अंग्रेज जाति को भारत में प्रशिक्षण लेना स्वीकार नहीं था

     02.06.2020
    उच्च अंग्रेज जाति को भारत में प्रशिक्षण लेना स्वीकार नहीं था

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    गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस (ई.1786-1797) ने भारतीय युवकों को सार्वजनिक दायित्वों एवं प्रशासनिक अधिकारों वाली नौकरी से वंचित करने के लिये नियम बनाया कि 50 पौण्ड या उससे अधिक वार्षिक वेतन वाली सेवाओं पर भारतीयों को नहीं रखा जायेगा। इससे भारतीयों के लिये उच्च पदों वाली नौकरियों के मार्ग बंद हो गये। कार्नवालिस द्वारा बनाये गये नियम के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी में भारतीय युवक, सैनिक सेवा में जमादार या सूबेदार के पद तक पहुंच सकता था किंतु उससे ऊपर नहीं।

    असैनिक सेवाओं में भारतीय युवकों की नियुक्ति सदर, अमीन, मुंसिफ या दरोगा से अधिक उच्च पद पर नहीं हो सकती थी। अधिकांश भारतीय युवक कम्पनी में लिपिक बन सकते थे जिन्हें 5 पौण्ड सालाना का अत्यंत निम्न वेतन दिया जाता था।

    गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली ने ई.1800 में अनुभव किया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नागरिक सेवाओं में इंगलैण्ड से 18 वर्ष की अपरिपक्व आयु के लड़के आते हैं जो विशाल भारतीय क्षेत्र पर शासन करते हैं किंतु उन्हें अपना काम आरंभ करने से पहले किसी तरह का प्रशक्षिण नहीं दिया जाता। उन्हें भारतीय भाषाओं का ज्ञान भी नहीं होता। उसने कलकत्ता में विलियम फोर्ट में भारतीय सिविल सेवा में आने वाले अंग्रेजी लड़कों के लिये एक प्रशिक्षण कॉलेज खोला।

    अंग्रेज अधिकारियों को यह गवारा नहीं हुआ कि उच्च ब्रिटिश जाति के लड़के निम्न भारतीयों की धरती पर प्रशिक्षण ग्रहण करें। ई.1806 में उन्होंने इंग्लैण्ड में हेलीवरी के अपने ईस्ट इण्डियन कॉलेज में प्रशिक्षण का कार्य आरंभ किया। भारतीयों को बड़ी सख्ती से इन सेवाओं से दूर रखा गया था। गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक (1828-1835) एक दूरदर्शी प्रशासक था। वह महान गुणों से युक्त और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति था। उसमें मानवता कूट-कूट कर भरी हुई थी। उसने अनुभव किया कि सिविल सेवा में नियुक्त अंग्रेज अधिकारी संसार भर में किसी भी सेवा से अधिक वेतन पाते हैं। यह वेतन इतना अधिक है कि इससे ईस्ट इण्डिया कम्पनी की आर्थिक स्थिति को बड़ा भारी धक्का पहुँचा है।

    इस स्थिति को देखकर बैंटिक ने असैनिक अंग्रेज अधिकारियों के वेतन एवं भत्तों में भारी कटौती की ताकि कम्पनी की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सके। उसने कई उच्च पद भी समाप्त कर दिये। उसने कुछ उच्च पदों पर नियुक्त अंग्रेजों को हटाकर उनके स्थान पर भारतीय युवकों को नियुक्त किया जो कम वेतन पर काम करने को तैयार थे। उसने डिप्टी मजिस्ट्रेट, डिप्टी कलैक्टर जैसे पदों पर भारतीयों की नियुक्ति की।

    उसके समय से भारतीयों को न्यायिक सेवाओं में मुंसिफ तथा सदर अमीन तक के पदों पर नियुक्त किया जाने लगा जिन्हें पहले 500 तथा बाद में 750 रुपये अधिकतम मासिक वेतन दिया गया। इस प्रकार बैंटिक के समय से भारतीयों के लिये भी मध्यम श्रेणी के प्रशासनिक एवं न्यायिक पदों पर पहुंचने का मार्ग खुल गया। बैंटिक ने न्यायालयों में हो रहे भ्रष्टाचार को देखते हुए उनकी संख्या को भी घटा दिया।

    विलियम बैंटिक ने मध्यम श्रेणी की सेवाओं के द्वार भले ही भारतीय युवकों के लिये खोल दिये थे किंतु इसके उपरांत भी ई.1842 में स्थिति यह थी कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी की इण्डियन सिविल सर्विस में में 836 अधिकारी नियुक्त थे जिनमें से 785 कर्मचारी संपूर्ण भारत में नियुक्त थे किंतु इनमें से एक भी अधिकारी भारतीय नहीं था।

    1853 के चार्टर एक्ट के द्वारा यह व्यवस्था की गयी कि भारतीय नागरिक सेवाओं में भर्ती प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से होगी। अब तक यह भर्ती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के निदेशक अपनी मनमर्जी से करते आ रहे थे। 1853 के चार्टर के अनुसार इस सेवा में भर्ती होने के इच्छुक भारतीय युवकों को अंग्रेजी भाषा में ही इस परीक्षा को उत्तीर्ण करना अनिवार्य किया गया। उन्हें इंग्लैण्ड जाकर इस परीक्षा को देना होता था। इस प्रकार इस सेवा के दरवाजे सैद्धांतिक रूप से भले ही भारतीयों के लिये खोल दिये गये थे किंतु व्यवहार रूप में भारतीय युवक इन सेवाओं में नहीं आ सकते थे।

    जब 1857 में रानी विक्टोरिया ने घोषणा की कि योग्यता के आधार पर नौकरियां दी जायेंगी तो भारतीय युवकों के मन में आशा का संचार हुआ किंतु यह घोषणा नितांत थोथी साबित हुई। ई.1879 में लॉर्ड लिटन ने भारतीयों के लिये स्टेट्च्युरी सिविल सेवाओं का गठन किया किंतु यह योजना आठ वर्ष बाद निरस्त कर दी गयी।

    लॉर्ड रिपन (1880-1884) ने भारतीयों को इण्डियन सिविल सर्विस में अधिक संख्या में लेने के लिये इण्डियन सिविल सर्विस परीक्षाएं इंग्लैण्ड और भारत में साथ-साथ आयोजित करने की अनुशंसा की। ब्रिटिश सरकार ने इस अनुशंसा को तो स्वीकार नहीं किया किंतु इस परीक्षा में बैठने वाले युवकों की अधिकतम आयु सीमा को 18 वर्ष से 21 वर्ष कर दिया जिससे भारतीयों को भी इस सेवा में चयनित हो सकने का अवसर मिल सके।

    भारत के शासन संचालन के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय सिविल सेवा की भांति भारतीय सेना का भी गठन किया। कम्पनी की अधिकांश सेना भारतीय सिपाहियों की थी। ये सिपाही वर्तमान बिहार तथा उत्तर प्रदेश प्रांतों से आते थे। ई.1857 में भारत में कम्पनी की फौज में 3,11,400 सैनिक थे जिनमें से 2,65,900 सैनिक भारतीय थे। सेना में भारतीयों की नियुक्ति के दो कारण थे। पहला तो यह कि ब्रिटेन की इतनी आबादी नहीं थी कि वहाँ से सिपाहियों की भर्ती की जा सके। दूसरा कारण यह कि अंग्रेज सैनिक बहुत वेतन मांगते थे।

    हिन्दुस्तानी सैनिकों की अत्यधिक संख्या पर नियंत्रण रखने वाले अंग्रेज अधिकारियों की संख्या बहुत थोड़ी थी। ई.1750 में सैनिक अधिकारियों की संख्या मात्र 87 थी। ई.1775 में इनकी संख्या 412 तथा ई.1800 में 652 हो गयी। ये सभी अंग्रेज थे। भारतीय सेना में अधिकारी बनने वाले युवक को यह प्रमाण पत्र देना होता था कि वह किसी भारतीय की संतान नहीं है। इन पदों पर केवल वही युवक भर्ती हो पाते थे जो इंगलैण्ड के किसी सुप्रसिद्ध कुल से सम्बन्धित होते थे।

    ई.1784 में कर्नल को 456 पौण्ड, लेफ्टीनेंट को 364 पौण्ड, मेजर को 272 पौण्ड वार्षिक दिया जाता था। वेतन के अतिरिक्त उन्हें युद्ध के दिनों में बड़े-बड़े भत्ते मिलते थे। इसके विपरीत भारतीय सैनिक का वेतन बहुत कम था। उसे 9 रुपये मासिक वेतन मिलता था तथा किसी प्रकार का भत्ता नहीं मिलता था। भारतीय सैनिकों का जीवन कष्ट में था। उन्हें कहीं भी, कभी भी, किसी भी, युद्ध में झौंक दिया जाता था। 1856 में भारतीय सेना में केवल तीन ऐसे अधिकारी थे जिन्हें 300 रुपये प्रतिमाह का वेतन मिलता था। पुलिस में नियुक्त भारतीय व्यक्ति दरोगा के पद तक पहुँच सकता था जिसे 25 रुपये प्रतिमाह मिलते थे।

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