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  • 54 रुपये में खरीदी जा सकती थी 11 वर्ष की लड़की

     19.05.2020
    54 रुपये में खरीदी जा सकती थी 11 वर्ष की लड़की

    यह कहना एक पक्षीय होगा कि अंग्रेजों ने राजपूताना की रियासतों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप करके रियासतों के आर्थिक, प्रशासनिक एवं सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का ही काम किया। इसके विपरीत अनेक अंग्रेज अधिकारियों ने रियासती जनता के मध्य व्याप्त अमानवीय प्रथाओं को पहचाना और उनके उन्मूलन का प्रयास किया। जनवरी 1832 में अजमेर दरबार के दौरान विलियम बैंटिक (1828-1835) ने राजस्थान के शासकों एवं ब्रिटिश अधिकारियों को प्रेरित किया कि वे अपने राज्यों में नयी सामाजिक नीति अपनायें। उस समय राजपूताने में बंजारा जाति अनाज तथा नमक के साथ-साथ बच्चों को खरीदने एवं बेचने का काम किया करती थी। राजपूताने में बच्चों को खरीदने वाले लोगों की संख्या काफी थी। कुछ लोग इन बच्चों को दास-दासी के रूप में अपनी कन्या के दहेज में दिया करते थे। कुछ जोगी जोगड़े अपने चेलों की संख्या बढ़ाने के लिये बच्चे खरीदते थे। कुछ लोग वेश्यावृत्ति करवाने के लिये लड़कियों को खरीदते थे। कुछ सम्पन्न सामंत इन्हें अपनी रखैल के रूप में रखते थे। ए

    क बार मेवाड़ राज्य के भैरजी नामक आदमी ने ब्रिटिश प्रशासित क्षेत्र से 54 रुपये में 11 वर्ष की लड़की खरीदी। जब अंग्रेजों को उसका पता लगा तो उन्होंने महाराणा को लिखा कि वह भैरजी से लड़की छुड़वा कर वापिस उसके घर वालों को सौंपे। इस पर महाराणा ने जवाब दिया कि भैरजी ने कोई गलत काम नहीं किया है। राज्य में यह प्रथा प्रचलित है। ई.1838 में कोटा के रामचंद्र ने अपना पुत्र 15 रुपये में बेचा। बच्चों के बेचने से जो रकम प्राप्त होती थी उसका 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य कोष में कर के रूप में जमा करवाया जाता था। रामचंद्र ने 6 रुपये राजकोष में जमा करवाये। अंग्रेजों को इस घृणित कार्य का पता चल गया। उन्होंने इस प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया। ई.1839 में जयपुर राज्य की संरक्षक परिषद के अध्यक्ष ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट ने जयपुर राज्य में दास व्यापार को न केवल प्रतिबंधित किया बल्कि दासों के लिये प्रयुक्त होने वाले गोला-गोली जैसे अपमानजनक सम्बोधन पर ही रोक लगा दी।

    1 दिसम्बर 1840 को जोधपुर राज्य में दास व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया गया। ई.1847 में राजस्थान के सभी राज्यों ने लड़के-लड़कियों की खरीद बेच को गैर कानूनी घोषित कर दिया था। 5 फरवरी 1847 को जयपुर संरक्षण परिषद ने जयपुर राज्य में नागाओं, दादूपंथियों, सादों इत्यादि द्वारा चेला बनाने के लिये की जाने वाली बच्चों की खरीद को गैरकानूनी करार दे दिया। ई.1847 में यह नियम समस्त राज्यों में लागू हो गया किंतु कोटा राज्य में ई.1862 तक बच्चों को खरीदना बेचना जारी रहा।

    लड़के लड़कियों की खरीद बेच पर भले ही रोक लगा दी गयी किंतु घरेलू दास-दासियों की प्रथा उन्नीसवीं सदी के अंत तक तथा उसके बाद में आजादी मिलने तक चलती रही। घरेलू दास-दासी राजपूतों एवं अमीर लोगों के घरों में वंशानुगत सेवक के रूप में कार्य करते थे। इन्हें गोला, गोली, दावड़ी, वड़ारन, दरोगा, चाकर हजूरिया, दास, खानजादा, चेला आदि नामों से सम्बोधित किया जाता था। इनका जीवन बड़ा कठिन होता था। उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी स्वामी तथा उसके परिवार की सेवा करनी पड़ती थी तथा स्वामी की लड़कियों के दहेज में जाना होता था। इस सब के बदले में उन्हें साधारण भोजन एवं वस्त्र प्राप्त होते थे।

    उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में इन दास-दासियों में असंतोष के स्वर उभरे। पुष्कर में गौरीशंकर ओझा के सभापतित्व में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें गोला कहे जाने वाले समुदाय के लगभग 200 व्यक्ति उपस्थित हुए। सम्मेलन में उपस्थित लोगों में अपने स्वामियों का इतना अधिक भय था कि उन्होंने इस सम्मेलन में केवल एक ही प्रस्ताव पारित किया कि उन्हें गोला न कहकर रावणा राजपूत कहा जाये। अंग्रेज अधिकारी दास प्रथा को समाप्त करने में विशेष सफलता अर्जित नहीं कर पाये क्योंकि राजपूताना के शासक एवं सामंत हर हालत में इस प्रथा को बनाये रखना चाहते थे। ई.1916 में जोधपुर राज्य की ओर से एक अधिसूचना जारी की गयी कि घरेलू दासों के स्वामी उन्हें खाना, कपड़ा और विवाह, जन्म तथा मृत्यु का व्यय प्रदान करते हैं इसलिये स्वामियों को दासों से काम लेने का पूरा अधिकार है तथा राजपूत मालिकों को पूरा अधिकार है कि वे अपनी पुत्रियों की शादी में दासों की पुत्रियों को दहेज में दें।

    ई.1921 की जनगणना के अनुसार राजपूताने में घरेलू दास-दासियों की संख्या 1,60,755 थी। इनमें से आधे दास ऐसे थे जिनका जन्म अपने मालिक के घर में हुआ था। अंत में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते ई.1926 में जोधपुर राज्य ने दास प्रथा पर रोक लगायी किंतु यह प्रथा अघोषित रूप से तब तक चलती रही जब तक कि 15 अगस्त 1947 को देश आजाद नहीं हो गया। उन्नीसवीं सदी में राजपूताने में कन्यावध की प्रथा प्रचलित थी। केवल मारवाड़ राज्य (जोधपुर राज्य) में प्रतिवर्ष तीन सौ से चार सौ तक कन्यावध की घटनायें होती थीं। यह कुप्रथा विशेषतः राजपूतों के साथ जुड़ी हुई थी किंतु जहाजपुर के मीणों, मेरों और भरतपुर के मेवों तथा जाटों में भी इस प्रथा का प्रचलन था। यह एक विडम्बना ही कही जा सकती है कि जिन जातियों में यह प्रथा प्रचलित थी उन जातियों के शासक परिवारों एवं सामंत परिवारों में यह प्रथा प्रचलित नहीं थी।

    ई.1834 में सर्वप्रथम कोटा राज्य में कन्या वध का निषेध किया गया। उसी वर्ष मेवाड़ राज्य ने भी कन्या वध को प्रतिबंधित कर दिया। ई.1837 में बीकानेर राज्य में एवं 1839 में जोधपुर राज्य में इस प्रथा को रोकने के लिये कुछ नियम बने। ई.1844 में राजपूताना के ए.जी.जी. सदरलैण्ड, जयपुर में पॉलिटिकल एजेण्ट लुडलो तथा नीमच के पॉलिटिकल एजेण्ट रॉबिन्सन के संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप राजस्थान के सभी राज्यों में कन्यावध को प्रतिबंधित कर गैर कानूनी घोषित किया गया।

    इस काल में कन्यावध का कारण दहेज प्रथा नहीं अपितु त्याग प्रथा थी। कन्या के पिता को अपनी कन्या का विवाह करवाने के लिये चारण तथा भाटों को बड़ी रकम समर्पित करनी होती थी जिसे त्याग कहते थे। इस त्याग की राशि से बचने के लिये राजपूत अपनी कन्याओं को मार डालते थे। ई.1843 में अंग्रेजों ने राजपूताने के राज्यों में यह आज्ञा प्रचारित करवायी कि जिस जागीरदार राजपूत की वार्षिक आय 1000 रुपये या उससे अधिक होगी वह अपनी कन्या के विवाह पर त्याग के रूप में चारण को 25 रुपये तथा भाट को 9 रुपये देगा। भोमिये राजपूत चारण को 10 रुपये तथा भाट को 5 रुपये देंगे। सामान्य राजपूत चारण को 5 रुपये तथा भाट को 4 रुपये देंगे। इस आदेश को पत्थरों पर खुदवाकर राज्यों की परगना कचहरियों के समक्ष प्रदर्शित किया गया।

    ई.1877 में हितैषिणी सभा उदयपुर ने तय किया कि केवल वही राजपूत त्याग की रकम देंगे जिनकी वार्षिक आय 500 रुपये से अधिक हो। यह रकम उस राजपूत की वार्षिक आय की 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। पुत्र व पुत्री के विवाह के उपलक्ष्य में कोई भी राजपूत अपनी वार्षिक आय का 25 प्रतिशत तक व्यय कर सकता है। मेवाड़ राज्य में बाहर से आये चारणों को त्याग नहीं दिया जायेगा। ब्राह्मणों एवं महाजनों को भी सूचित किया गया कि वे भी अपनी पुत्री के विवाह में अपनी वार्षिक आय का 25 प्रतिशत ही व्यय करें।

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