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  • एडविना ने माउंटबेटन को भारत विभाजन के लिये तैयार किया!

     26.11.2017
    एडविना ने माउंटबेटन को भारत विभाजन के लिये तैयार किया!

    माउंटबेटन ने एटली सरकार को 2 अप्रेल 1947 को अपनी पहली रिपोर्ट भेजी जिसमें उन्होंने लिखा कि भारत का आंतरिक तनाव सीमा से बाहर जा चुका है। चाहे कितनी भी शीघ्रता से काम किया जाये, गृहयुद्ध आरंभ हो जाने का पूरा खतरा है।

    अधिकतर कांग्रेसी नेता भारत विभाजन के विरुद्ध थे किंतु वे मुस्लिम लीग के कठोर रवैये से तंग आ चुके थे। कांग्रेस इस बात के लिये उत्सुक थी कि देश शीघ्र स्वाधीन हो। गांधीजी 1942 से लगातार मांग करते आ रहे थे कि भारत को भगवान के भरोसे छोड़ दो। जबकि मुस्लिम लीग देश की स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन भी चाहती थी। राजाजी राजगोपालाचारी जैसे कुछ लोग बेकार के पचड़े में पड़कर भारत की आजादी के मामले को उलझाये जाने से अच्छा यह समझते थे कि भारत का युक्तियुक्त आधार पर विभाजन कर दिया जाये।

    घनश्यामदास बिड़ला भी राजाजी के विचारों से सहमत थे। उन्होंने नेहरूजी को पत्र लिख कर अनुरोध किया कि साझे के व्यापार में अगर कोई साझेदार संतुष्ट नहीं हो तो उसे अलग होने का अधिकार मिलना ही चाहिये। विभाजन युक्तियुक्त अवश्य होना चाहिये लेकिन विभाजन का विरोध कैसे किया जा सकता है........। अगर मैं मुसलमान होता तो पाकिस्तान न कभी मांगता न कभी लेता। क्योंकि विभाजन के बाद इस्लामी भारत (अर्थात् पाकिस्तान) बहुत ही गरीब राज्य होगा जिसके पास न लोहा होगा, न कोयला। यह तो मुसलमानों के सोचने की बात है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर आप पाकिस्तान देने को तैयार हो जायें तो मुसलमान उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उनका स्वीकार करना या न करना बाद की बात है फिलहाल हमारा पाकिस्तान की मांग का विरोध करना मुसलमानों के मन में पाकिस्तान की प्यास ही बढ़ायेगा।

    लैरी कांलिंस व दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है कि वल्लभभाई पटेल तो माउंटबेटन के आगमन से पहले ही विभाजन स्वीकारने के लिये तैयार बैठे थे। ........उनका सीधा सा तर्क था, जिन्ना को दे दो पाकिस्तान! फर्क क्या पड़ेगा? पाँच साल से ज्यादा यह पाकिस्तान टिकने वाला नहीं। मुस्लिमलीग खुद ब खुद भारत के दरवाजे पर आ कर खटखटाहट करेगी कि शासन की डोर आप लोग ही संभालिये।

    पटेल के बारे में वायसराय माउंटबेटन की धारणा थी कि केवल वही एक व्यक्ति था जिसे ठीक-ठीक पता था कि वह (पटेल) क्या कर रहा है! पटेल ने मार्च 1947 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी में एक प्रस्ताव पारित करवाया था कि पंजाब को दो टुकड़ों में बांट दिया जाये। एक टुकड़ा हिंदुओं का, दूसरा मुसलमानों का। सिखों को आजादी रहेगी कि वे कहाँ रहेंगे? वायसराय ने इस फैसले में छिपे उद्देश्य को समझ लिया। बिल्कुल साफ था कि पटेल, पाकिस्तान चाहने वाले मुसलमानों से मुक्ति चाहते थे। पटेल महसूस करते थे कि आजाद हिंदुस्तान में विरोधी दल के रूप में मुस्लिम लीग का मतलब है मुसीबत, उसकी योजनाओं का अंत, कानूनों पर रोकथाम।

    पटेल ने किंचित चतुराई से काम लिया। उन्होंने एक ओर तो भारत विभाजन के लिये कार्य करना आरंभ कर दिया और दूसरी ओर वर्किंग कमेटी के एक सदस्य को लिखकर कहा कि जिन्ना इस घुन लगे पाकिस्तान को कभी नहीं मानेगा जिसमें पंजाब और बंगाल का बंटवारा होता हो। अतः अंग्रेज पूरा देश सबसे बड़ी पार्टी के हवाले कर देंगे। इस प्रकार देश बंटवारे से बच जायेगा। नेहरू, पटेल की इस चाल में फंस गये। मोसले ने लिखा है कि यह दलील पं. नेहरू को खास तौर पर पसंद आयी।

    माईकल एडवर्ड्स ने लिखा है कि पटेल ने पहले तो पंजाब और बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव कांग्रेस कार्यकारिणी में पारित करवाया और उसके बाद वे भारत विभाजन के लिये आगे आये, इसलिये नहीं कि जिन्ना को संतुष्ट करें अपितु इसलिये कि कांग्रेस को नष्ट होने से बचाया जा सके। पटेल ने मेनन के माध्यम से वायसराय को संदेश भिजवाया कि पटेल विभाजन पर बात करने के लिये तैयार हैं।

    मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी आत्मकथा में पटेल और नेहरू के रवैये पर खेद जताया है। वे लिखते हैं- जिस कांग्रेसी नेता ने माउंटबेटन के प्रस्ताव को सबसे पहले स्वीकार किया, वे थे पटेल। मंत्रिमंडल में मुस्लिम लीगी मंत्रियों के नकारात्मक एवं अड़ियल रुख से परेशान होकर सरदार पटेल ने देश के विभाजन की बात मान ली। उन्होंने खुले आम कहा कि मुस्लिम लीग से पीछा छुड़ाने के लिये उसे भारत का एक हिस्सा दे देना चाहिये। इसके बाद माउंटबेटन ने नेहरू को मनाने का प्रयास किया। पहले तो नेहरू ने देश के विभाजन का घोर विरोध किया किंतु माउंटबेटन के लगातार प्रयास से वे ढीले पड़ गये। जब समाचार पत्रों में पंजाब बंटवारे के सम्बन्ध में पटेल के विचारों पर आधारित कांग्रेस कमेटी के प्रस्ताव के समाचार छपे तो गांधी ने पटेल को फटकार भरा पत्र लिखकर अपना विरोध जताया।

    इसी बीच लेडी एडविना माउंटबेटन ने पंजाब के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का व्यापक दौरा किया। उसने इतने बड़े पैमाने पर घायल एवं अंग-भंग लोगों को एक साथ देखकर मन बनाया कि हिन्दुओं और मुसलमानों का बंटवारा हो ही जाना चाहिये। उसने अपने पति को इस कार्य के लिये सहमत किया। वायसराय ने कांग्रेस कार्यकारिणी में पंजाब बंटवारे को लेकर पारित किये गये प्रस्ताव को आधार बना कर तर्क दिया कि जब पंजाब के दो टुकड़े किये जा सकते हैं तो भारत के क्यों नहीं? नेहरू और पटेल की सहमति पाने के बाद कांग्रेस हाई कमान को अपनी ओर मिलाने में माउंटबेटन को भला क्या दिक्कत होनी थी! कार्यकारिणी द्वारा नेहरू को यह अधिकार सौंपा गया कि वह वायसराय को सूचित करें कि कांग्रेस देश के विभाजन को स्वीकार कर लेगी बशर्ते पंजाब और बंगाल के गौरवमय प्रांत किसी एक देश को समूचे न मिलकर दोनों देशों को आधे-आधे मिलें।

    जिन्ना इस खबर को सुनकर प्रसन्नता के मारे उछल पड़ा कि कांग्रेस तथा अंग्रेज किसी भी तरह सही, पाकिस्तान देने को तैयार हैं जबकि इस समय तक भी नेहरू को विश्वास था कि जिन्ना इस घुन लगे पाकिस्तान को नहीं मानेगा। क्योंकि वह पूरा पंजाब और पूरा बंगाल पाकिस्तान में देखना चाहता था। इस स्थिति का लाभ उठाकर माउण्टबेटन ने देश के विभाजन की बात मनवाने का प्रयास किया। मोसले ने लिखा है कि सार्वजनिक रूप से जिन्ना ने शांत और संयत रुख अख्तियार किया लेकिन दोस्तों के बीच वह खुशी से फटा पड़ता था। उसने कभी यह उम्मीद नहीं की थी कि कांग्रेस इतनी जल्दी पाकिस्तान मान लेगी।

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