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  • 60 जोंकें खून चूसती रहीं और कर्नल टॉड राजपूताने का इतिहास सुनता रहा

     20.06.2017
    60 जोंकें खून चूसती रहीं और कर्नल टॉड  राजपूताने का इतिहास सुनता रहा

    1805 से लेकर 1817 तक पूरे 12 वर्ष की अवधि में कर्नल टॉड ने लगभग पूरा राजपूताना देख लिया था। उस काल में राजपूताने के भूगोल, इतिहास तथा राजपूताने की राजनीतिक परिस्थितियों की जितनी जानकारी कर्नल टॉड को थी, उतनी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में किसी अन्य अधिकारी को नहीं थी।

    ई.1807 तक 1813 तक लॉर्ड मिण्टो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल था, उसने देशी राज्यों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनायी जिससे मराठों और पिण्डारियों को राजपूताना में नंगा नाच करने की छूट मिल गयी। राजपूताना लुटेरों का घर बन गया।

    कर्नल टॉड को महान राजपूताने की दुर्दशा पर बड़ा तरस आया जब उसने देखा कि राजपूत राजाओं में महान गुणों का वास होते हुए भी तनिक भी एकता नहीं है। जैसे ही किसी राजा या राजकुमार में विवाद हुआ, वे सीधे मराठों की शरण में जा पहुँचते थे या फिर पिण्डारियों की सेवाएं प्राप्त करते थे। इस कारण राजा, प्रजा, राज्य एवं राजवंश जर्जर होते चले जा रहे थे। टॉड ने निश्चय किया कि इस महान प्रदेश को मराठों और पिण्डारियों के उत्पात से बचाना चाहिये तथा राजपूताने को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवाएं प्रदान की जानी चाहिये।

    कर्नल टॉड ने 1814-15 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के उच्च अधिकारियों को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि इन पिण्डारियों को कुचला जाये अन्यथा राजपूताना नष्ट हो जायेगा। कम्पनी सरकार ने टॉड से पिण्डारियों के विरुद्ध की जाने वाली लड़ाई की पूरी योजना बनवाई। टॉड ने पिण्डारियों की सामरिक शक्ति, उनके दबदबे वाले क्षेत्र तथा राजपूताने की स्थिति को ध्यान में रखकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की और उसे सरकार को भेज दिया। इस योजना को बनाने में कर्नल टॉड द्वारा निर्मित नक्शों ने बड़ी सहायता की। सरकार ने कर्नल साहब का बड़ा आभार व्यक्त किया।

    ई.1817 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनलर मार्कीस ऑफ हेस्टिंग्स ने पिण्डारों को नष्ट करने का निर्णय लिया। मेजर जनरल सर ऑक्टरलोनी, जनरल डॉनकिन, जनरल मार्शल, जनरल ऐडम्स और जनरल ब्राउन को राजपूताना एवं मध्य भारत में पिण्डारियों को घेर कर मारने का काम सौंपा गया। इन जनरलों ने पूरा राजपूताना और मध्यभारत घेर लिया। जब कर्नल टॉड को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने कम्पनी सरकार को लिखा कि मुझे भी पिण्डारियों को कुचलने के कार्य पर लगाया जाये। गवर्नर जनरल ने टॉड का अनुरोध स्वीकार कर लिया। पहले तो गवर्नर जनरल ने टॉड साहब को मेजर जनरल ऑक्टरलोनी के अधीन नियुक्त करने का विचार किया किंतु टॉड साहब की महत्ता को देखते हुए उन्हें स्वतंत्र प्रभार देकर हाड़ौती क्षेत्र में रांवटा नामक स्थान पर नियुक्त किया गया।

    कर्नल साहब का काम था राजपूताना तथा मध्य भारत को घेर कर खड़े जनरलों के बीच समन्वय स्थापित करना, उन्हें आगे की कार्यवाही के बारे में सुझाव देना तथा पिण्डारियों एवं मराठों की गतिविधियों की जानकारी उन तक पहुँचाना। कर्नल साहब की सम्मति से ही अंग्रेज जनरलों ने अपनी सेनाओं का प्रयाण नियत किया। टॉड ने व्यवस्था की कि प्रतिदिन उसे कम से कम 20 स्थानों से पिण्डारियों की हलचल के सम्बन्ध में उसे सूचनाएं प्राप्त हों। टॉड इन सूचनाओं का सार निकालकर कर विभिन्न जनरलों को भेज देता था।

    एक बार टॉड को सूचना मिली कि करीम खां पिण्डारी का बेटा 1500 पिण्डारियों के साथ रांवटा से 30 मील दूरी पर कालीसिंध के निकट आ पहुँचा है। उस समय टॉड के पास मात्र 32 सैनिक ही थे। उन दिनों कोटा राज्य का फौजदार झाला जालिमसिंह रावटा में मुकाम कर रहा था। टॉड तुरंत ही जालिमसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ तथा पिण्डारियों के विरुद्ध कोटा राज्य से सहायता मांगी। उस समय जालिमसिंह 70 साल का हो चुका था तथा उसकी दोनों आँखों ने काम करना बंद कर दिया था किंतु उसका विवेक पूरी तरह जाग्रत था। जालिमसिंह ने उसी समय 250 सिपाही टॉड के साथ कर दिये। कर्नल टॉड ने कुल 182 सिपाहियों के साथ 1500 पिण्डारियों पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में 150 पिण्डारी मारे गये तथा शेष जान बचाकर भाग खड़े हुए। टॉड ने पिण्डारियों के डेरे लूट लिये तथा उनके बहुत से हाथी, घोड़े तथा ऊंट छीन लिये। टॉड को यहाँ से काफी धन भी प्राप्त हुआ जिससे टॉड ने कोटा से 6 मील दूर में स्थित चंद्रभागा नदी पर एक पुल बनवा दिया जिसका नाम हेस्टिंग्स ब्रिज रखा।

    जब पिण्डारियों से युद्ध समाप्त हो गया तब कर्नल टॉड ने कम्पनी सरकार को लिखा कि कोटा के झाला जालिमसिंह ने इस युद्ध में अंग्रेजों की बड़ी सहायता की है इसलिये उसे डीग, पंचपहाड़, आहोर और गंगरार की जागीरें दी जायें। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने ये चारों परगने जालिमसिंह को दिये जाने की सिफारिश की किंतु जालिमसिंह ने ये परगने कोटा के महाराव उम्मेदसिंह को सौंप दिये। पिण्डारियों और मरहठों का उपद्रव मिटने पर कम्पनी सरकार ने राजपूताना के राज्यों से संधि करने का काम आरंभ किया। टॉड साहब को उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी तथा जैसलमेर राज्यों का पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया गया तथा उनका मुख्यालय उदयपुर में स्थापित किया गया।

    फरवरी 1818 में कर्नल टॉड उदयपुर के लिये रवाना हुआ। टॉड ने लिखा है कि इस बार तो मेवाड़ की दशा 1806 ई.की दशा से भी अधिक बुरी थी। भीलवाड़ा में जहाँ पहले 6000 घरों की बस्ती थी, अब वहाँ एक भी मनुष्य नहीं रहता था। बहुत से लोग मराठों के भय से मेवाड़ छोड़कर मालवा तथा हाड़ौती आदि स्थानों को चले गये थे। राज्य की आय बहुत घट गयी थी, सरदारों ने खालसे के बहुत से गाँव दबा लिये थे।

    अपने प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ कर्नल टॉड राजपूताना के राज्यों एवं प्राचीन राजवंशों के इतिहास को संकलित करने में संलग्न रहता था। ई.1819 में टॉड उदयपुर से नाथद्वारा, कुंभलगढ़, घाणेराव तथा नाडोल होते हुए जोधपुर आया। नाडोल में उसने लाखण सी के समय के दो शिलालेख वि. संवत 1024 तथा 1039 के तलाश किये जिनसे अजमेर व नाडोल के चौहान, जालोर के सोनगरा चौहान तथा सिरोही के देवड़ा चौहानों का इतिहास संकलन करने में बड़ी सहायता मिली। टॉड ने वि. सं. 1218 का आल्हणदेव के समय का एक ताम्रपत्र तथा एक अन्य ताम्रपत्र भी खोज निकाले। इस यात्रा में उसने कई सिक्के, प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकें तथा शिलालेख संकलित किये। जोधपुर नरेश मानसिंह ने टॉड को विजयविलास, सूर्यविलास तथा मारवाड़ की ख्यात आदि कई पुस्तकें भेंट कीं। जोधपुर प्रवास के दौरान टॉड प्रतिहारों की प्राचीन राजधानी मण्डोर को देखने के लिये गया। अजमेर एवं पुष्कर में भी उसने कई सिक्के एकत्रित किये।

    कहते हैं कि एक बार कर्नल टॉड ने जहाजपुर में मक्का की रोटी खायी जिसे खाते ही उसका सिर घूमने लगा, जीभ भारी हो गयी और कंठ रुंध गया। किसी देशी वैद्य ने टॉड को सलाह दी कि उसकी तिल्ली बढ़ी हुई है यदि वह तिल्ली पर जोंक लगवा लें तो इस रोग से मुक्ति मिल जायेगी। टॉड ने उसीसमय 60 जोंकें मंगवाकर तिल्ली पर लगा दीं तथा चारपाई पर लेट गया। उसने अपने साथ चल रहे ब्राह्मणों एवं पटेलों से कहा कि वे इतिहास सुनाना जारी रखें।

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