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  • कर्नल टॉड की पुस्तक ने राजपूताने का नाम बदलकर राजस्थान कर दिया

     18.06.2017
    कर्नल टॉड की पुस्तक ने राजपूताने का  नाम बदलकर राजस्थान कर दिया

    कर्नल जेम्स टॉड का जन्म 20 मार्च 1782 को इंगलैण्ड के इंग्लिस्टन नामक स्थान पर हुआ था। उसके किसी पूर्वज ने स्कॉटलैण्ड के राजा रॉबर्ट दी ब्रूस के बच्चों को इंगलैण्ड के राजा की कैद से छुड़ाया था इस कारण टॉड परिवार को नाइटबैरोनेट की उपाधि तथ लोमड़ी का चिह्न धारण करने का अधिकार मिला हुआ था।

    जब जेम्स टॉड 17 वर्ष का हुआ तो ई.1799 में वह ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सैनिक अधिकारी के रूप में बंगाल भेज दिया गया। वहाँ कुछ दिनों के लिये उसे नौसैनिक के रूप में भी काम करने का अनुभव प्राप्त हुआ। अगले ही वर्ष वह पैदल सेना में लैफ्टीनेंट के पद पर नियुक्त किया गया। वहाँ से उसकी नियुक्ति पहले कलकत्ता, फिर बंगाल तथा फिर दिल्ली में हुई। ई.1801 में उसे दिल्ली के पास एक पुरानी नहर की पैमाइश करने का काम दिया गया।

    ई.1805 में मिस्टर ग्रीम मर्सर को कम्पनी सरकार की तरफ से दौलतराव सिंधिया के दरबार में भेजा गया। कर्नल टॉड भी भारतीय राजाओं के ठाठ बाट देखने की लालसा में मर्सर के साथ हो लिया। यह वह समय था जब यूरोपीय अधिकारियों को राजपूताना एवं उसके आसपास के प्रदेश के भूगोल का बहुत ही कम ज्ञान था। उन्होंने जो नक्शे बना रखे थे उनमें भी केवल अनुमान से नाम लिखे गये थे। उन नक्शों की स्थिति यह थी कि उनमें चित्तौड़गढ़ को उदयपुर के पश्चिम में दर्शाया गया था जो कि वास्तव में पूर्व में है। अंग्रेजों का अनुमान था कि राजपूताना की नदियां दक्षिण की तरफ बहती हुई नर्मदा से मिल जाती हैं। इस भूल को तो हिन्दुस्तान के भूगोल के प्रथम शोधकर्ता रेलन साहब ने शुद्ध किया किंतु शेष अपूर्णतायें ज्यों की त्यों बनी रहीं।

    जिस समय मर्सर दिल्ली से चला उस समय सिंधिया उदयपुर में था। इसलिये मर्सर को दिल्ली से आगरा तथा जयपुर होते हुए उदयपुर पहुँचना था। ई.1791 में कम्पनी सरकार का गवर्नर कर्नल पामर जिस मार्ग से उदयपुर गया था उस मार्ग का एक नक्शा डॉक्टर हंटर ने बनाया था। मर्सर के पास वही नक्शा था। जब मर्सर के साथ जेम्स टॉड को भी अनुमति मिली तो टॉड ने उस नक्शे की जांच करने का मानस बनाया। जिस दिन वह दिल्ली से रवाना हुआ उसी दिन से वह अपने मार्ग को नाप-नाप कर नक्शें में अंकित करने लगा। जून 1806 में टॉड मर्सर के साथ उदयपुर पहुँचा। जब दिल्ली से उदयपुर तक का नक्शा तैयार हो गया तो टॉड की इच्छा हुई कि वह उदयपुर के आसपास के क्षेत्र को भी देखे और नापे।

    सिंधिया की सेना उदयपुर से चलकर चित्तौड़ गढ़ के मार्ग से होती हुई मालवा पार करके बुंदेलखड पहुंची। टॉड भी इसी सेना के साथ लग लिया। इस पूरी यात्रा में टॉड न केवल नक्शे तैयार करता रहा अपितु उसने मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक स्थान का इतिहास, जनश्रुति तथा शिलालेख आदि का संग्रह करना भी आरंभ कर दिया। इसके बाद तो टॉड ने इन कामों को करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। वह अपनी प्रत्येक यात्रा में यही करता रहता था जिससे उसके पास राजपूताने के इतिहास की विपुल सामग्री एकत्रित हो गयी जिसका उपायोग उसने ''राजस्थान" नामक पुस्तक लिखने में किया। आगे चलकर इसी पुस्तक के नाम पर इस प्रदेश का नाम राजस्थान पड़ा। इस प्रकार राजस्थान का नामकरण करने का श्रेय भी कर्नल टॉड को जाता है। उससे पहले इस क्षेत्र को राजपूताना कहा जाता था।

    जब सिंधिया की सेना ने राहटगढ़ पर घेरा डाला तब टॉड अपने थोड़े से सिपाहियों को लेकर बेतवा नदी के किनारों के पास से होता हुआ चंबल तक के अज्ञात स्थानों तक पहुंचा तथा वहाँ से पश्चिम की ओर चलकर कोटा पहुँच गया। उसने चंबल, कालीसिंध, पार्वती, बनास आदि मुख्य नदियों के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र तथा उनके संगम स्थलों का पता लगाया। उन दिनों इस पूरे क्षेत्र में लूटमार का बाजार गर्म था। ठग, पिण्डारी, डाकू तथा सैनिक लोग राहगीरों को लूटते फिरते थे। टॉड भी कई बार लूटा गया।अनेक बार उसे अपने डेरे छोड़कर रात्रि में ही भागना पड़ा।

    कोटा से चलकर टॉड भरतपुर, कठूंमर और सेंतरी होता हुआ जयपुर पहुँचा। वहाँ से टोंक, इन्दरगढ़, गूगल, छपरा, राघूगढ़, अरोन, कुरवा और भोरासा के मार्ग से सागर जा पहुंचा तथा राहटगढ़ आकर सिंधिया की सेना से मिल गया। टॉड ने इस पूरे मार्ग के नक्शे तैयार कर लिये। जब सिंधिया ग्वालियर पहुँचा तब भी टॉड उसके पीछे लगा रहा और नक्शे बनाता रहा। ई.1810 में उसने नक्शे बनाने वाले दो दल तैयार किये।

    एक दल को सिंध की ओर तथा दूसरे दल को सतलुज नदी के दक्षिणी रेगिस्तान में भेजा गया। पहला दल शेख अब्दुल बरकत के नेतृत्व में उदयपुर से गुजरात, सौराष्ट्र, कच्छ, लखपत और सिंध हैदराबाद होती हुई पश्चिम की ओर सिंधु नदी पारकर ठठ्ठा में पहुंचा तथा नदी के किनारे-किनारे सीवान् तक चली गयी फिर सिंधु नदी से उतर कर बांये किनारे होते हुए खैरपुर पहुंचा। वहाँ से बेखर के टापू में होकर उमरसुमरा के रेगिस्तान से जैसलमेर, मारवाड़ और जयपुर के क्षेत्रों को नापता हुआ नरवर में टॉड साहब से आ मिला।

    दूसरा दल मदारीलाल के नेतृत्व में सतलज के दक्षिणी रेतीले प्रदेश तथा लगभग संपूर्ण राजपूताना के राज्यों में भेजा गया। मदारीलाल अत्यंत योग्य, विश्वसनीय एवं परिश्रमी व्यक्ति था। टॉड उसके द्वारा किये गये कार्य की जांच नहीं करता था किंतु अन्य आदमियों द्वारा किये गये कार्य पर विश्वास नहीं करता था और उनके द्वारा किये गये कार्य की स्वयं जांच करता था। कर्नल टॉड जिस क्षेत्र से भी निकलता, उस क्षेत्र की जानकारी रखने वाले लोगों को अपने पास बुला लेता और उनसे पूछ-पूछ कर जानकारियां लिखता रहता था। इस कारण जब वह अपने घोड़े पर बैठकर यात्रा कर रहा होता था तब उसके दोनों और ओर तथा आगे पीछे उन लोगों के घोड़े चला करते थे जो टॉड को राजपूताने के राज्यों के इतिहास की बातें बताते रहते थे।

    टॉड इतना योग्य पुरुष था कि स्वयं अपने द्वारा किये गये कार्य की सत्यता की जांच करने के लिये भी उसने एक तरीका ढूंढ निकाला था। वह जिस किसी भी क्षेत्र में जाता उस क्षेत्र में डाक लाने ले जाने वाले लोगों से अवश्य सम्पर्क किया तथा अपने काम की सत्यता जांचने के लिये उन डाकियों के विवरण को काम में लिया। 1813 में टॉड को कर्नल बनाया गया। 1815 तक 10 वर्ष के असाधारण परिश्रम में कर्नल टॉड के पास नक्शों की 11 जिल्दें तैयार हो गयीं। ई.1815 में उसने अपने नक्शों की एक प्रति गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज को भेंट की। हेस्टिंग्ज ने उसके महान परिश्रम की बड़ी प्रशंसा की तथा नक्शों की एक नकल पर अपने हस्ताक्षर करके टॉड को इस आशय के साथ सौंप दी कि यदि भविष्य में इन नक्शों पर कोई अन्य व्यक्ति स्वयं के द्वारा निर्मित होने का दावा प्रस्तुत करे तो उसके खंडन के प्रमाण के रूप में हेस्टिंग्ज के हस्ताक्षर दिखा दिये जायें।

    ये नक्शे यूरोप भी पहुँचे तथा यूरोप को राजपूताने की रहस्यमयी रियासतों की वास्तविक जानकारी हुई। बाद में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने पेशवा के राज्य का बंटवारा किया तथा राजपूताने में पिण्डारियों के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया तब इन नक्शों ने बड़ी मदद की।

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