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  • उदयपुर राज्य में कप्तान टॉड के शासन ने अंग्रेजों की धाक जमा दी

     12.07.2017
    उदयपुर राज्य में कप्तान टॉड के शासन ने  अंग्रेजों की धाक जमा दी

    बीकानेर के महाराजा तथा जैसलमेर के महारावल में सुलह करवाने वाला सेठ जोरावरमल मूलतः जैसलमेर का ही रहने वाला ओसवाल बनिया था किंतु वह होलकर के इंदौर राज्य में जाकर व्यापार करने से खूब उन्नति कर गया था। उसने बड़े-बड़े शहरों में अपनी दूकानें स्थापित कर ली थीं। इंदौर का राजा उसे कई राजकीय दायित्व भी सौंपता रहता था। उसी ने होलकर तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य समझौता करवाया था। इससे प्रसन्न होकर कम्पनी सरकार तथा होलकर ने उसे कई सम्मान दिये थे।

    जब ई.1818 में कप्तान टॉड मेवाड़ का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त हुआ तो उसने मेवाड़ की आर्थिक दशा सुधारने के लिये सेठ जोरावरमल को इंदौर से उदयपुर बुलाया। महाराणा ने जोरावरमल से आग्रह किया कि वह उदयपुर में अपनी दूकान स्थापित करे तथा राज्य के कामों में जो रुपये खर्च हों वे तुम्हारी दुकान से दिये जायें और राज्य की सारी आय तुम्हारे यहाँ जमा रहे। जोरावरमल ने टॉड तथा महाराणा का आग्रह स्वीकार करके अपनी दूकान उदयपुर में स्थापित कर ली। उसने नये खेड़े बसाये, किसानों को सहायता दी और चोरों एवं लुटेरों को दण्ड दिलवाकर मेवाड़ राज्य में शांति स्थापित करने में सहायता की। उसका कुशल प्रबंधन देखकर पोलिटिकल एजेण्ट ने अंग्रेजी कोष का प्रबंध भी उसी को सौंप दिया। महाराणा ने उसे पालकी तथा छड़ी का सम्मान, बदनोर परगने का पारसोली गाँव तथा सेठ की उपाधि प्रदान की।

    इसके बाद कर्नल टॉड ने अपना ध्यान मेरवाड़ा क्षेत्र की ओर लगाया। राजपूताने के ठीक मध्य में स्थित इस पहाड़ी प्रदेश में मेर जाति बड़ी संख्या में रहती थी जो जंगली, युद्धप्रिय और बहुत उपद्रवी थी। इस प्रदेश का कुछ भूभाग मेवाड़ रियासत में, कुछ भूभाग मारवाड़ रियासत में तथा कुछ भाग अजमेर जिले के अंग्रेजी शासन वाले क्षेत्र में आता था। 25 जून 1818 को सिंधिया ने अजमेर अंग्रेजों को सौंप दिया था। इसलिये अंग्रेजी सरकार ने इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिये उसी साल नसीराबाद में सैन्य छावनी स्थापित की। अक्टूबर 1818 में टॉड ने मेरों को दबाने के लिये रूपाहेली के ठाकुर सालिमसिंह की अध्यक्षता में मेवाड़ के बदनोर, देवगढ़, आमेट तथा बनेड़ा ठिकानों की सेनायें भेजीं। टॉड ने मेवाड़ के पूर्वोत्तर भाग के समस्त छोटे-बड़े सरदारों, जागीरदारों, भोमियों तथा आसियों आदि को भी मेरवाड़े पर भेजा। मेरों ने पहाड़ों के संकरे रास्तों पर नाकाबंदी करली जिससे घबराकर रूपाहेली के ठाकुर ने पहाड़ों पर आक्रमण करने का निश्चय त्याग दिया तथा मैदानी क्षेत्रों में अपने थाने बैठा दिये।

    मार्च 1919 में अंग्रेजी सेना भी सालिमसिंह से आ मिली। इन दोनों सेनाओं ने मिलकर मेरों के मुख्य स्थान बोरवा, झाक और लुलुवा पर अधिकार कर लिया तथा अपने थाने बैठा दिये। इस पर मेरों ने जोधपुर राज्य की तरफ से अंग्रेजी थानों पर हमले करने आरंभ कर दिये। नवम्बर 1819 में टॉड जोधपुर आया तथा उधर से भी थानों का प्रबंध करवा दिया। इस प्रकार मेरवाड़ा चारों ओर से घिर गया। जब सालिमसिंह रूपाहेली को लौट गया तो मेरों ने थानों पर हमला करके अंग्रेजी थानेदारों को मार डाला तथा कई थाने उठा दिये। इस पर सालिमसिंह फिर लौट कर आया। उसने सैंकड़ों मेरों को मार डाला तथा टॉड के निर्देश पर फिर से थाने स्थापित करके उनमें 100-100 सिपाही तैनात कर दिये।

    कर्नल टॉड ने मेरवाड़ा में अंग्रेजी सेनाएं रखने के लिये दो नये दुर्ग बनवाये। एक का नाम टॉडगढ़ तथा दूसरे का नाम महाराणा के नाम पर भीमगढ़ रखा। मेरों को लुटेरों से किसान बनाने के लिये मेवाड़ राज्य की ओर से जमीनें प्रदान की गयीं तथा कुछ मेरों को सेना में भर्ती करने के लिये मेर बटालियन का गठन किया गया। मेरों को दबाने में सफल रहने पर सालिमसिंह को कप्तॉन टॉड की ओर से प्रशंसा पत्र तथा महाराणा की ओर से अमर बेलणा घोड़ा, बाड़ी तथा सीख का सिरोपाव दिया गया। अमर बेलणा घोड़ा उस घोड़े को कहते थे जिसके बूढ़ा होने पर या मरने पर उसके स्थान पर दूसरा घोड़ा भेजा जाता था। सीख का सिरोपाव प्रतिवर्ष दशहरे पर नौकरी समाप्त कर अपने ठिकाने में लौटने वाले सरदार को दिया जाता था।

    मेरवाड़ा पर तीन राज्यों का अधिकार होना ठीक न समझ कर दिल्ली के रेजीडेण्ट जनरल ऑक्रलोनी ने मारवाड़ तथा मेवाड़ के शासकों को लिखा कि वे अपने राज्य में आने वाले मेरवाड़ा प्रदेश के गाँव 10 वर्ष के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सौंप दे। मारवाड़ तो इस बात को मान गया किंतु मेवाड़ ने इन्कार कर दिया। इस पर कम्पनी ने बलपूर्वक मेवाड़ के हिस्से वाला मेरवाड़ा अपने अधीन कर लिया। इस घटना से महाराणा भीमसिंह बड़ा दुखी हुआ। महाराणा ने इसकी शिकायत गवर्नर जनरल से की। गवर्नर जनरल ने चार्ल्स मेटकाफ के माध्यम से महाराणा को पत्र लिखवाकर इस घटना के लिये खेद व्यक्त किया किंतु मेरवाड़ा के क्षेत्र पर अंग्रजों का अधिकार बना रहा। ई.1847 में यह क्षेत्र सदा के लिये अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

    टॉड ने मेवाड़ की आय बढ़ाने के लिये कई उपाय किये। उसने ई.1819 में झाला जालिमसिंह से जहाजपुरा का परगना फिर से प्राप्त कर मेवाड़ में मिला दिया तथा महाराणा का दैनिक व्यय 1000 रुपये स्थिर किया। ई.1818 में मेवाड़ राज्य की वार्षिक आय 1 लाख 20 हजार रुपये थी किंतु टॉड की व्यवस्था से ई.1821 में यह आय बढ़कर 8 लाख 77 हजार 634 रुपये हो गयी। ई.1822 में यह 11 से 12 लाख रुपये के बीच में अनुमानित की गयी। राज्य की आय में जबर्दस्त वृद्धि के उपरांत भी अंगेजी सरकार का खिराज था महाराणा को 1000 रुपये प्रतिदिन जेबखर्च दिया जाना सरल कार्य नहीं था। इस कारण टॉड ने एक साहूकार से 18 रुपये सैंकड़ा सूद की दर से कर्ज लिया।

    ई.1821 में कप्तान टॉड बीमार पड़ गया और अपने सहायक एजेंट कप्तान वॉग को कार्यभार सौंप कर इंगलैण्ड चला गया। इस पर राज्य का शासन प्रबंध फिर से महाराणा के हाथ में आ गया। वॉग ने महाराणा को 1000 रुपये रोज दिलवाने की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया जिससे महाराणा को निजी व्यय का प्रबंध स्वयं की करना पड़ा। मार्च 1823 में कप्तान स्पीयर्स मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट होकर आया किंतु एक माह बाद ही उसके स्थान पर कप्तान कॉव आ गया। कॉव को ज्ञात हुआ कि महाराणा ने एक वर्ष के भीतर 83 गाँव विभिन्न लोगों को दे दिये हैं जिससे राज्य की आय घट गयी है तथा महाजन का कर्ज 2 लाख रुपये एवं अंग्रेज सरकार का खिराज 8 लाख रुपये चढ़ गया है। कॉव ने महाराणा को एक हजार रुपया प्रतिदिन देकर शासन कार्य अपने हाथ में ले लिया।

    इस समय मेवाड़ में शासन प्रबंध महाराणा तथा अंग्रेज सरकार दोनों की ओर से होता था। महाराणा की तरफ से प्रत्येक जिले में कामदार और एजेंट की ओर से चपरासी नियुक्त था। दोनों मिलकर आय वसूल करते थे। इस द्वैध शासन से तंग आकर जनता ने अंग्रेज सरकार से शिकायत की। इस पर कॉव ने कुछ सुधार किये। कॉव के प्रबंध से राज्य की आय फिर से सुधर गयी तथा महाराणा का खर्च, अंग्रेजी सरकार का खिराज एवं महासन का सूद एवं असल सभी कुछ चुका दिये गये। ई.1826 में कॉव के स्थान पर कप्तान सदरलैण्ड मेवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट बना। उसने पहले के एजेंटों द्वारा नियुक्त चपरासियों को थानों और परगनों में से बाहर निकाल दिया


    इस प्रकार कप्तान टॉड तथा कप्तान कॉव ने मेवाड़ राज्य में जो शासन व्यवस्था एवं आर्थिक पबंध लागू किये उनसे मेवाड़ राज्य की आय में तो वृद्धि हुई ही, साथ ही राजपूताना की रियासतों में अंग्रेजी शासन की धाक जम गयी।

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