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  • राजाओं को दबाने के लिये अंग्रेजों ने जागीरदारों से दोस्ती गांठ ली

     02.06.2020
    राजाओं को दबाने के लिये अंग्रेजों ने जागीरदारों से दोस्ती गांठ ली

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    1857 के विद्रोह में देशी राज्यों के जागीरदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख भूमिका निभायी थी इसलिये अंग्र्रेज उनकी वास्तविक शक्ति को समझ गये थे। अब उन्होंने जागीरदारों से उस उपकरण के रूप में काम लेने का निर्णय किया जिसके द्वारा वे देशी राजाओं पर नकेल कस सकते थे। यही कारण है कि ई.1858 के बाद से देशी राज्यों के जमींदारों के प्रति अंग्रेज शासकों का रवैया मैत्रीपूर्ण रहा। उन्हें प्रसन्न रखने के लिये अंग्रेजों ने उनके हितों और विशेषाधिकारों की रक्षा की। उन्हें सम्मानित किया तथा उपाधियां प्रदान कीं। अनेक स्थानों पर उनसे छीनी गयी भूमि उन्हें वापिस दे दी। जमींदारों के बेटों और रिश्तेदारों को उच्च पदों पर नियुक्त किया जिसके कारण एक ओर तो वे अंग्रेजों के स्वामिभक्त हो गये और दूसरी ओर राजाओं का भय भुलाकर जनता के दोहरे शोषण पर उतर आये।

    जागीरदारों पर भी अंग्रेज अधिकारियों ने स्वयं अपना शिकंजा कस लिया था। जागीरदारों को राज्य से बाहर जाने के लिये पोलिटिकल एजेंटों से अनुमति लेनी पड़ती थी। यदि राजा किसी जागीरदार को राज्य से बाहर जाने के लिये रोकना चाहता तो वह भी जागीरदार को सीधे आदेश देने के बजाय पोलिटिकल एजेंट के माध्यम से ही कह सकता था। दिसम्बर 1899 में महाराजा गंगासिंह ने अपने जागीरदार भैंरूसिंह को राज्य से बाहर जाने से रोकने के लिये पोलिटिकल एजेंट को पत्र लिखा कि चूंकि जागीरदार के विरुद्ध जांच चल रही है इसलिये उसे राज्य से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जाये।

    यदि राजा लोग अपने जागीरदारों के विरुद्ध कार्यवाही करने का प्रयास करते तो ये जागीरदार वायसराय की शरण में चले जाते और राजा उन जागीरदारों के विरुद्ध कुछ नहीं कर पाता था। ई.1904 में जब बीकानेर नरेश गंगासिंह ने अपने जागीरदारों बीदासर के हुकुमसिंह, अजीतपुरा के भैरूंसिंह तथा गोपालपुरा के ठाकुर रामसिंह को गैर कानूनी रूप से सभायें आयोजित करने का दोषी पाया और उनके विरुद्ध प्रशासनिक कार्यवाही करनी चाही तो ये लोग, लॉर्ड कर्जन की शरण में चले गये। कर्जन ने ए.जी.जी. से रिपोर्ट मांगी तथा महाराजा को आदेश दिया कि वे अपने निर्देश बदल दें।

    राजपूताने के देशी राज्यों में भूमि का काफी बड़ा हिस्सा जागीरों के अधीन था। जागीर क्षेत्र के किसानों को खालसा क्षेत्र के किसानों की भांति न तो वंशानुगत और न ही स्थायी अधिकार प्राप्त थे। उन्हें किसी भी समय भूमि से बेदखल किया जा सकता था। किसी भी जागीर में भूमि बंदोबस्त जैसी व्यवस्था लागू नहीं की गयी थी। बड़े जागीरदार किसानों से कुल पैदावार का एक तिहाई हिस्सा और प्रति परिवार से दस रुपये से बीस रुपये तक वार्षिक नगद वसूल करते थे। छोटे जागीरदार किसानों से सामान्यतः आधा हिस्सा और अपनी सेवा में नियुक्त तथा बेगार में काम करने वालों से चौथाई हिस्सा भूमि कर लेते थे। ब्राह्मण और राजपूत जाति के लोग बेगार से मुक्त थे।

    जागीरदार लोग किसानों से विभिन्न प्रकार की लाग-बाग वसूलते थे। खालसा क्षेत्र में भूमि बंदोबस्त के बाद लाग-बाग बंद कर दी गयी थी किंतु जागीरदार लोग इन्हें लागू किये हुए थे। अंग्रेजी संरक्षण के प्रभावस्वरूप जब जागीरदारों के आर्थिक क्षेत्र के अधिकार कुछ विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया तो वे उसकी पूर्ति भूमिकर बढ़ाकर तथा मनचाही लाग-बाग वसूल कर किसानों का शोषण करने लगे। इससे जागीर क्षेत्र के किसानों की हालत खालसा क्षेत्र के किसानों की अपेक्षा गिरती चली गयी।

    इस काल में सामंती प्रणाली के स्वरूप में परिवर्तन भी कृषकों की खराब स्थिति का कारण बना। यह परिवर्तन जीगरदारों और ठिकानेदारों की धातु मुद्रा की बढ़ती हुई आवश्यकता के फलस्वरूप हुआ था। राजा द्वारा सामंत चाकरी को नगद राशि में बदल दिये जाने और वकील कोर्ट्स द्वारा जागीरदारों पर जुर्माना निर्धारित करने से इन सामंतों में मुद्रा की मांग और अधिक बढ़ गयी।

    सामंतों में बढ़ती अकर्मण्यता और विलासिता के कारण उनके खर्चे भी बढ़ गये थे जिन्हें केवल नगद मुद्रा से ही पूरा किया जा सकता था। विदेशी शराब तथा पश्चिमी शैली के फर्नीचर नगद मुद्रा से ही क्रय किये जा सकते थे। अनेक सामंतों ने राज्यों की राजधानियों में अपनी हवेलियां बना ली थीं जिनके निर्माण एवं रख-रखाव के लिये विपुल मुद्रा व्यय की गयी थी। यही कारण था कि किसानों का पर्याप्त शोषण करने के बावजूद इस काल में अधिकांश जागीरदार कर्जदार हो गये थे।

    अंग्रेजी शासन काल में करों की भयावह स्थिति का चित्र खींचते हुए अंबेडकर ने लिखा है- मुसलमान शासक भी जमीन पर भारी कर लगाते थे किंतु उनमें और अंग्रेजों में अंतर यह था कि मुसलमान शासक जितना कर लगाते थे, उतना कभी वसूल नहीं कर पाते थे। इसके विपरीत अंग्रेज जितना टैक्स लगाते थे, उसे कड़ाई के साथ वसूल कर लेते थे।

    बीसवीं सदी के आरंभ होने तक स्थिति यह हो गयी थी कि प्रत्येक ठिकाने में लाग-बाग की संख्या अलग-अलग हो गयी थी और उनके नाम भी अलग-अलग थे। कोई भी ठिकानेदार कभी भी अपने किसानों पर किसी भी तरह की लाग-बाग आरंभ कर सकता था। लाग-बाग न मिलने पर जागीरदारों द्वारा किसानों को पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर उनका सामाना बाहर फिंकवा देना आम बात थी। एक ओर तो किसान के लगान और लागत भी पूरे नहीं चुक पाते थे और दूसरी ओर उसके पास वर्ष भर खाने के लिये भी कुछ नहीं बचता था। ऐसी स्थिति में किसानों का आंदोलन की राह पकड़ लेना स्वाभाविक ही था।

    जागीरदारों ने निरीह जनता के शोषण के लिये बेगार और गुलामी की कई प्रथायें प्रचलित कर रखी थीं। जागीरदारों के अधीन आने वाले किसानों के नागरिक अधिकारों का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। किसान तथा अन्य ग्रामीण, ठाकुर के मकान के सामने से जूते पहनकर नहीं निकल सकते थे। उन्हें पैरों में स्वर्ण पहनने का अधिकार नहीं था। वे घोड़े पर नहीं बैठ सकते थे। अब जागीरदार राजा को बताये बिना विभिन्न प्रकार के कर लगाने लगे थे। बहुत से जागीरदार जब अपनी जागीर में लौटते थे तो ढोल नगाड़े बजाकर जनता को सूचित किया जाता था कि जागीरदार साहब अपने ठिकाणे में आ गये हैं।

    देशी राज्यों का व्यापारी वर्ग भी सामंती जुल्मों से मुक्त नहीं रह सका था इस कारण उन्हें बड़ी संख्या में अंग्रेजी भारत के प्रांतों में चले जाना पड़ा था। अंग्रेजों ने व्यापारियों को अनेक रियायतों की घोषणा की थी। अनेक व्यापारी विदेशी सामान के ऐजेण्ट बन गये थे। रेल सुविधा के आरंभ हो जाने तथा अंग्रेजों द्वारा संरक्षण दिये जाने से राजपूताने के देशी राज्यों के अनेक व्यापारियों ने कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास आदि महानगरों में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान कायम कर लिये थे।

    जब किसी व्यापारी को जागीरदार के प्रतिबंधों के कारण देशी राज्य से निकलने में कठिनाई आती थी तो अंग्रेज पोलिटिकल अधिकारी व्यापारी को वहाँ से निकलने में मदद करते थे। राज्य से बाहर चले जाने वाले व्यापारी जागीरदारों और सामंती जुल्मों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे थे। पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने तथा अंग्रेजों का संरक्षण मिल जाने के फलस्वरूप व्यापारी वर्ग शक्तिशाली होता जा रहा था।

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