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     01.07.2017
    पिण्डारियों एवं मराठों से  कई गुना अधिक राशि वसूल की अंग्रेजों ने

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूत राज्यों के साथ की गयी संधियों के आरंभ होने से राजपूताने में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। राज्यों को मराठों और पिण्डारियों से छुटकारा मिला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी देशी राज्यों में रेजीडेण्ट एवं पोलिटिकल एजेण्ट बन कर आये जिससे मराठों और पिण्डारियों की लूट खसोट बंद हुई किंतु अंग्रेजों की लूटखसोट आरंभ हो गयी।

    राजपूताने से जितनी लूट पिण्डारियों ने तथा जितनी चौथ मराठों ने वसूल की थी उससे कई गुना अधिक खिराज अंग्रेजों ने वसूल की जिससे देशी राज्यों की आर्थिक स्थिति चरमरा गयी और वे पहले से भी अधिक कर्जे में डूब गये। अंग्रेजी संरक्षण में चले जाने के पश्चात् राजपूताने के प्रायः समस्त राज्यों ने अंग्रेज अधिकारियों की सलाह से अपनी राज्य की आय बढ़ाने के लिये भूमि बंदोबस्त को अपनाया। अंग्रेजों का खिराज चुकाने के लिये पुराने करों में वृद्धि की गयी तथा नये कर भी लगा दिये गये। करों की वसूली में पहले की अपेक्षा काफी कड़ाई बरती जाने लगी जिससे जनता में असंतोष पनपा।

    राज्यों में नियुक्त अंग्रेजी एजेण्टों ने राजदूत का व्यवहार न करके अधिनायकों जैसा व्यवहार किया। उन्होंने रियासतों के निजी मामलों में हस्तक्षेप किया। ब्रिटिश रेजिडेंटों ने तानाशाहों के अधिकार प्राप्त कर लिये। उन्होंने राज्यों की सेवा में अपने मन पसंद अधिकारियों की नियुक्ति करके एक तरह से सहायक संधि के स्थान पर हस्तक्षेप की नीति अपना ली। इससे राज्यों में अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष पनपा।

    अंग्रेज अधिकारियों ने राज्यों के शासक एवं उसके उत्तराधिकारी नियुक्त करने में भी हस्तक्षेप किया। अल्प वयस्क शासक सम्बन्धी समस्याएं और ब्रिटिश हस्तक्षेप, देशी राज्यों में उत्तराधिकारियों और शासकों की आयु निर्धारण से जुड़ा हुआ एक विवादग्रस्त क्षेत्र बन गया जिसमें ब्रिटिश हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। राजा पद के कई दावेदार राजमहलों से निकलकर सड़क पर आ गये और सड़क पर बैठने को विवश हुए कई राजकुमार महलों में जा बैठे।

    भारत में वयस्कता की आयु सम्बन्धी सीमाएं सुनिश्चित नहीं थीं। विभिन्न अवसरों और आवश्यकतानुसार इसका निर्धारण होता था। अंग्रेजी सत्ता के पूर्व इस निर्धारण में कोई विशेष आपत्ति और व्यवधान नहीं हुआ। यह स्थिति किसी न किसी प्रकार चलती रही किंतु ब्रिटिश सरकार ने देशी राज्यों की उत्तराधिकार की समस्या के दौरान इसमें सुनिश्चित व्यवस्था करना उपयुक्त व आवश्यक समझा।

    इस नीति के अनुसार वयस्कता की आयु 18 वर्ष सुनिश्चित की गयी और यह व्यवस्था की गयी कि 18 वर्ष से पूर्व शासक अल्पवयस्क माना जायेगा। ऐसी स्थिति में राज्य के शासन का संचालन होने तक अर्थात् 18 वर्ष की आयु पूरी करने तक राज्य शासन ब्रिटिश नियंत्रण में संचालित किया जायेगा अथवा उनके द्वारा नियुक्त शासक का संरक्षक (रीजेण्ट) कम्पनी सरकार की सहमति और स्वीकृति के आधार पर प्रशासन चलायेगा। बड़े राज्यों में यह प्रशासन रीजैंसी कौंसिल’ द्वारा और छोटे राज्यों में 'पॉलिटिकल ऐजेण्टों’ द्वारा नियंत्रित और संचालित होना था। वयस्कता प्राप्त होने पर ब्रिटिश सरकार द्वारा राज्य के समस्त प्रशासनिक अधिकार वयस्क नरेश को सौंप दिये जाने थे।

    इस प्रकार इन संधियों से राजाओं के राज्यों को स्थिरता तो मिली किंतु राजाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित हुई। राज्य के सरदारों के स्थान पर अंग्रेज अधिकारी राजाओं के लिये सिर दर्द बन गये। इन संधियों से राज्यों के सरदारों तथा जनता को कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। कई मामलों में राज्य के सामंत तथा सरदार लोग राजाओं के निर्देशों का पालन करने की अपेक्षा अंग्रेज अधिकारियों से मिलकर राज्य की जनता को लूटने खसोटने में लग गये। यदि राजा इन सामंतों के विरुद्ध किसी तरह की कार्यवाही करने का विचार करता तो ये सामंत अंग्रेज अधिकारी की सेवा में उपस्थित होकर मन चाही सुविधा प्राप्त कर लेते थे।

    1818 तक पंजाब और सिंध को छोड़कर लगभग सारा भारतीय उपमहाद्वीप अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया था। इसके एक हिस्से पर अंग्रेज सीधे शासन करते थे और बाकी पर अनेक भारतीय शासकों का शासन था किंतु राजाओं पर अंग्रेजों की सर्वोपरि सत्ता थी। धीरे-धीरे राज्यों के पास अपनी वस्तुतः कोई फौज नहीं रह जानी थी। अपने ही जैसे दूसरे राज्यों से सम्बन्ध कायम करने के लिये भी वे स्वतंत्र नहीं रह गये थे।

    राजाओं के अपने क्षेत्रों में उन्हीं पर नियंत्रण रखने के लिये जो अंग्रेजी फौजें रखी जाती थीं, उनके लिये भी राजाओं को भारी रकम चुकानी पड़ती थी। संधि की शर्तों के अनुसार राजा अपने आंतरिक मामलों में स्वायत्त थे किंतु व्यवहार रूप में उन्हें ब्रिटिश सत्ता स्वीकार करनी पड़ती थी। इस सत्ता का प्रयोग रेजिडेंट करता था। इस कारण ये राज्य हमेशा परीक्षा काल में ही रहते थे।

    इन संधियों के होने के कई वर्षों बाद थामसन ने लिखा- राज्यों द्वारा की गयी संधियों के शब्दों को ध्यान में रखते हुए यह मानना होगा कि राजाओं द्वारा व्यापक रूप से अनुभूत कष्ट आज प्रमाणित हैं। सर्व स्थानों में आंतरिक कार्यों में प्रचुर मात्रा में हस्तक्षेप हुआ है। राजनैतिक अधिकारियों के प्राधिकार तथा उनकी उपस्थिति नाराजी से देखी जाती है।

    ई.1830 में बिशप हेबर ने लिखा था, कोई भी देशी राजा उतना कर नहीं लगाता जितना हम लगाते हैं। ऐसे बहुत कम लोग हैं जो यह न मानते हों कि कर आवश्यकता से अधिक लगाया जाता है और जनता निर्धन होती जा रही है। बंगाल से भिन्न हिंदुस्तान में देशी राजाओं के राज्य में रहने वाले किसान कम्पनीराज में रहने वाले किसानों से कहीं अधिक गरीब और पस्त दिखाई देते हैं। उनका व्यापार चौपट हो गया है।

    इन संधियों के हो जाने से राज्यों के सैनिक अभियानों तथा आक्रामक प्रवृत्ति का प्रायः अंत हो गया। अब राजपूताने के राज्यों पर बाह्य सैनिक क्रियाओं तथा संघर्ष की समाप्ति हो गयी और उन्हें संधि के अंतर्गत पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो गयी। कहा जाता है कि इस संधि के हो जाने से जयपुर नरेश जगतसिंह अपनी मृत्यु के समय अत्यंत आश्वस्त था कि उसका राज्य मराठों एवं पिण्डारियों की लूटमार से मुक्त हो गया है और भविष्य में ब्रिटिश कम्पनी उसकी बाह्य आक्रमणों से रक्षा करेगी।

    इन संधियों के बाद देशी राज्यों के शासकों को बिना कोई अधिकार दिये केवल दायित्व सौंप दिये गये वहीं अंग्रेजों को बिना कोई दायित्व निभाये असीमित अधिकार प्राप्त हो गये।

    इन संधियों के आरंभ होने से देशी राज्यों के सामंतों को पूरी तरह दबा दिया गया तथा राजाओं की स्थिति अपने सामंतों के ऊपर दृढ़ हो गयी। इससे राजाओं को सामंतों के आतंक से छुटकारा मिला किंतु अब वे अंग्रेजी सत्ता के अधीन हो गये। अंग्रेज अधिकारी निरंकुश बर्ताव करने लगे तथा शासन के प्रत्येक आंतरिक मामले में उनका हस्तक्षेप हो गया।

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