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  • अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं, हिंदुओं से प्राप्त किया

     30.06.2017
    अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं, हिंदुओं से प्राप्त किया

    लॉर्ड वेलेजली के समय में अलवर, भरतपुर तथा धौलपुर राज्यों के साथ की गयी संधियां अब तक चली आ रही थीं। लॉर्ड हेस्टिंग्स (ई.1813 से 1823) द्वारा पद संभालने के समय अलवर, भरतपुर और धौलपुर को छोड़कर प्रायः समस्त राजपूताना अंग्रेजी नियन्त्रिण से बाहर था।

    लॉर्ड हेस्टिंग्स के समय में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताना के 14 राज्यों के साथ सहायक संधियां की गयीं तथा उनको अंग्रेजों के अधीन कर लिया गया। इनमें से करौली, टोंक तथा कोटा राज्यों के साथ वर्ष 1817 में, जोधपुर, उदयपुर, बूंदी, बीकानेर, किशनगढ़, बांसवाड़ा, जयपुर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर तथा जैसलमेर के साथ वर्ष 1818 में तथा सिरोही राज्य के साथ वर्ष 1823 में संधि की गयी। इस प्रकार लॉर्ड हेस्टिंग्स ने राजपूताना में ब्रिटिश प्रभुसत्ता स्थापित की। बाद में जब झालावाड़ राज्य अस्तित्व में आया तब 1838 में झालावाड़ राज्य के साथ संधि की गयी।

    अंग्रेजों से संधि करने वाले राज्यों के शासकों को अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र आचरण करने का अधिकार था किंतु उन्हें अपने खर्चे पर ब्रिटिश फौजों को अपने राज्य में रखना पड़ता था। इन संधियों के तहत एक राज्य को दूसरे राज्य से संधि करने के लिये पूरी तरह ब्रिटिश राज्य पर निर्भर रहना पड़ता था। इस सब के बदले में अंग्रेजों ने राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा आंतरिक विद्रोह के समय राज्य में शांति स्थापित करने का जिम्मा लिया।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूताने के प्रत्येक राज्य के साथ अलग-अलग संधि की गयी। अंग्रेजों द्वारा भारतीय रियासतों के राजाओं के साथ किये गये मित्रता के समझौतों को अलग-अलग करके और राज्यानुसार नहीं लिया जा सकता क्योंकि बहुत से मामलो में परिस्थितियाँ समान थीं। राजाओं को अपनी आंतरिक समस्याओं को सुलझाने के लिये एक अधिक शक्तिशाली सत्ता की सहायता और संरक्षण आवश्यक था।

    ली वारनर ने लिखा है- सन् 1818 से भारतीय रियासतों के प्रति अंग्रेजों का दृष्टिकोण अधीन समझौते का बन गया।

    राजपूताना के कई राज्यों पर कई दशकों से सिंधिया और होलकर का आधिपत्य चला आ रहा था। मराठों के पतन के बाद राजपूत राज्यों में इतनी ताकत नहीं रह गयी थी कि वे अपनी स्वतंत्रता को फिर से स्थापित करें। उन्होंने तुरंत ही ब्रिटिश आधिपत्य मान लिया।

    इस प्रकार भारत की राजनैतिक दुर्बलता का लाभ उठा कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में शासन का अधिकार प्राप्त किया। देश में केवल 40 रियासतें ऐसी थीं जिनकी ब्रिटिश सरकार के साथ वास्तविक संधियां हुईं थीं। शेष पाँच सौ से अधिक रियासतें अंग्रेजी शासन काल में ब्रिटिश परमोच्च सत्ता की सनदों और जागीरों के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थीं।

    राजपूत शासकों ने इससे पूर्व इतने प्रभावकारी और निश्चित रूप से अपनी स्वाधीनता किसी अन्य शक्ति (मुगलों अथवा मराठा सत्ता) को इस सीमा तक समर्पित नहीं की थी जैसी कि उन्होंने 1818 ई.में अंग्रेजों के समक्ष की। अंग्रेजों ने देशी रियासतों के साथ संधियां सोच समझ कर सम्पन्न की थीं। उन के उद्देश्य भी निश्चित थे। वे 'झण्डे के पीछे व्यापार है' के सिद्धांत में विश्वास रखते थे।

    इस प्रकार ब्रिटिश भारत का राजनैतिक ढांचा बनाने का जो काम ई.1799 में टीपू सुल्तान की मृत्यु के साथ आरंभ हुआ था वह ई.1819 (पेशवा को हटाये जाने) के बीच की 20 वर्षों की अवधि में तैयार हुआ। इस अवधि के आरंभ में मैसूर के मुस्लिम राज्य का विनाश हो गया और इस अवधि के अंत में मराठों का संघ राज्य अनेक सरदारों में बिखर गया। इन दोनों विजयों ने अंग्रेजों को भारत का स्वामी बना दिया।

    डब्लू. डब्लू हंटर ने स्वीकार किया है कि अंग्रेजों ने भारत मुगलों से नहीं बल्कि हिंदुओं, मराठों और सिक्खों से प्राप्त किया। वह लिखता है- मुस्लिम राजकुमार हम से बंगाल, कर्नाटक तथा मैसूर में लड़े परंतु सर्वाधिक विरोध हिंदुओं की ओर से हुआ।

    कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूताना के राज्यों ने मराठों और पिण्डारियों से सुरक्षा पाने के लिये अंग्रेजों से संधि नहीं की थी अपितु कम्पनी सरकार ने पिण्डारियों को नष्ट करने तथा मराठा शक्ति के विस्तार को रोकने के लिए राजपूत राज्यों से संधि की। सच्चाई यह है कि न केवल देशी रियासतें अपितु अंग्रेज भी मराठों तथा पिण्डारियों से त्रस्त थे तथा उनसे मुक्ति चाहते थे। मराठे तथा पिण्डारी देशी राज्यों तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी दोनों के साथ शत्रुवत् व्यवहार कर रहे थे। इस प्रकार ''शत्रु का शत्रु मित्र" के सिद्धांत को आधार बनाकर दोनों पक्षें में मित्रता हो गयी। अंग्रेजों और देशी राज्यों की यह मित्रता आगे चलकर भारत के लिये बहुत ही खतरनाक सिद्ध हुई।

    राजपूताना के देशी राज्यों के साथ हुई संधि के पश्चात् ई.1819 में पेशवा को हटा दिया गया। इसी तरह पिण्डारी अमीरखां को भी टोंक में स्थापित करके उसकी गतिविधियों को समाप्त कर दिया गया किंतु पिण्डारियों के अन्य गिरोह विशेषकर करीमखां, वसील मुहम्मद और चीतू का सफाया किया जाना अभी शेष था। इन गिरोहों के राजपूताना में शरण लेने की पूरी आशंका थी।

    राजपूताने के राज्यों ने भले ही अपने कुछ अन्य कारणों से भी संधि की हो किंतु अंग्रेजों के लिये इन संधियों को करने का उद्देश्य राजपूताना को मराठों और पिण्डारियों के लिये शरणस्थली बनने देने से रोकना ही था। यही कारण था कि संधि के समय अंग्रेजों ने देशी राज्यों के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप से स्वयं को दूर ही रखा था। देशी राज्यों को केवल बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा का ही वचन दिया गया था।

    इन संधियों के आरंभ होने से देशी राज्यों के सामंतों को पूरी तरह दबा दिया गया तथा राजाओं की स्थिति अपने सामंतों के ऊपर दृढ़ हो गयी। इससे राजाओं को सामंतों के आतंक से छुटकारा मिला किंतु अब वे अंग्रेजी सत्ता के अधीन हो गये। अंग्रेज अधिकारी निरंकुश बर्ताव करने लगे तथा शासन के आंतरिक मामलों में भी उनका हस्तक्षेप हो गया। इन संधियों के तहत जहाँ देशी राज्यों को बिना कोई अधिकार दिये केवल दायित्व सौंप दिये गये वहीं अंग्रेजों को बिना कोई दायित्व निभाये असीमित अधिकार प्राप्त हो गये। राजाओं को सुरक्षा तो मिली किंतु उनकी स्वतंत्रता नष्ट हो गयी। यहाँ तक कि अंग्रेज अधिकारी देशी राज्य के उत्तराधिकारी के मनोनयन में भी हस्तक्षेप करने लगे।

    इन संधियों के हो जाने से राजपूताना में मराठों, अंग्रेजों, फ्रांसिसियों तथा पिण्डारियों के आक्रमण बंद हो गये। राज्यों के सैनिक अभियानों तथा आक्रामक प्रवृत्ति का प्रायः अंत हो गया। राज्यों को भीतर तथा बाहर दोनों ही मोर्चों पर पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो गयी।

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