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  • राष्ट्र के प्रत्येक अंग पर ब्रिटिश शिकंजा कस गया

     02.06.2020
    राष्ट्र के प्रत्येक अंग पर ब्रिटिश शिकंजा कस गया

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    1857 की क्रांति के विफल हो जाने के बाद अंग्रजों ने भारत के प्रत्येक अंग पर कब्जा कसना आरंभ किया। देशी राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के लिये गवर्नर जनरल के सीधे नियंत्रण में एक राजनीतिक विभाग का गठन किया गया। इस विभाग में नियुक्ति के लिये इण्डियन पोलिटिकल सर्विस का गठन किया गया। इस सेवा में इण्डियन सिविल सर्विस तथा सेना के अधिकारी लिये जाते थे। राजनीतिक अधिकारियों के पास अलिखित अधिकार थे। राजनीतिक विभाग की अपनी पुलिस थी जिसका व्यय केन्द्र सरकार के राजस्व तथा देशी राज्यों के आर्थिक अंशदान से चलाया जाता था।

    राजनीतिक विभाग के अधीन समस्त प्रमुख रियासतों एवं रियासतों के समूहों के लिये रेजीडेंट्स एवं पोलिटिकल एजेण्ट रखे गये।

    देशी राज्यों को शेष भारत से उसी तरह अलग कर दिया गया जिस प्रकार भारत को शेष एशिया से अलग कर दिया गया था। ई.1862 में वायसराय लॉर्ड केनिंग (ई.1856-1862) ने घोषणा की कि इंग्लैण्ड के शासक समस्त भारत के असंदिग्ध शासक हैं तथा उनमें सर्वोच्च सत्ता निहित है। वायसराय लॉर्ड एलगिन (ई.1862-1863) ने भारतीय रियासतों एवं ब्रिटिश राज्य को निकट लाने के उद्देश्य से वाराणसी, कानपुर, आगरा तथा अम्बाला में अनेक दरबार आयोजित किये।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी 1853 में भारत में रेल संचालन का शुभारंभ कर चुकी थी। अब ब्रिटिश सरकार ने अपनी सैनिक टुकड़ियों के तीव्र आवागमन के लिये तथा व्यापारिक माल को देश के सुदूर कोनों से लेकर बंदरगाहों तक ढोने के लिये रेलवे के विस्तार का व्यापक कार्यक्रम बनाया। रेल ने अंग्रेजों का काम आसान बना दिया। राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक अंग पर तथा देश के प्रत्येक भूभाग पर अंग्रेजी पकड़ दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़ती ही चली गयी। रेल के साथ ही प्रशासनिक, सैनिक तथा व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये पूरे देश में सड़कों और डाकघरों का जाल बिछाया जाने लगा। यह कार्य उस दिन तक चलता रहा जब तक अंग्रेज भारत छोड़कर चले नहीं गये।

    वायसराय लॉर्ड मेयो (ई.1869-ई.1872) ने राजपूताने के शासकों के समक्ष घोषणा की कि- अंग्रेजी सरकार भारतीय शासकों के कुशासन के कारण उनके राज्यों में हस्तक्षेप करने तथा राज्यों में विद्रोह को दबाने का अधिकार रखती है। अंग्रेज सरकार राज्य में गृहयुद्ध नहीं होने देगी। ई.1876 में वायसराय लॉर्ड लिटन ने घोषणा की कि इंग्लैण्ड की राजशाही को अब से एक शक्तिशाली देशी अभिजाततंत्र की आशाओं, आकांक्षाओं, सहानुभूतियों और हितों के साथ अपना घनिष्ठ संबंध स्थापित करना होगा। राजाओं, जागीरदारों और जमींदारों ने इस घोषणा का अर्थ यह लगाया कि वे तब तक बने रहेंगे जब तक कि ब्रिटिश शासन बना रहेगा। अंग्रेज अधिकारियों ने राजाओं को और अधिक स्वामिभक्त बनाने के क्रम में राजाओं, राजकुमारों तथा अन्य लोगों को अंग्रेजी उपाधियों से सम्मानित करने का सिलसिला आरंभ किया।

    ई.1877 में रानी विक्टोरिया ने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश प्रभुसत्ता जताने के लिये भारत की साम्राज्ञी (कैसरे हिन्द) की उपाधि धारण की। उसके सम्मान में ई.1877 में इम्पीरियल सर्विस ट्रूप्स तथा भारतीय राजाओं के लिये इम्पीरियल कैडेट कोर की स्थापना की गयी। राजाओं को सेना में ऑनरेरी कमीशन दिये गये ताकि वे अधीनस्थ स्थिति को प्राप्त कर सकें।

    19वीं सदी के अंत में और 20वीं सदी के प्रारंभ में देशी राज्यों में ब्रिटिश हस्तक्षेप बढ़ता गया जिससे ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के बीच बराबरी की बात समाप्त हो गयी। राज्यों के बाहरी मामलों पर भारत सरकार का पूरा नियंत्रण था। रेल, संचार सड़कें, डाकघर आदि के निर्माण के बहाने से इन राज्यों में ब्रिटिश हस्तक्षेप होता रहा। ब्रिटिश अधिकारी इन राज्यों में प्रशासन का नियंत्रण तो ई.1818 से करते ही आ रहे थे।

    देशी रियासतों के शासक, अंग्रेजों का कर चुकाने के लिये प्रजा के हितों की चिन्ता न करते हुए मनमानी करते थे। कर वसूलने के लिये अब वे ज्यादा अत्याचार करते थे। राज्य की कानून व्यवस्था पहले राजाओं और राजपरिवार के सदस्यों की मर्जी से चलती थी किंतु अब अंग्रेजों तथा उनके प्रतिनिधियों की मर्जी के अनुसार चलने लगी। यदि राजा लोग अपने राज्यों में अंग्रेज अधिकारियों को कानून के अनुसार आचरण करने के लिये कहते तो अंग्रेज अधिकारी उनका मजाक बनाने से नहीं चूकते थे। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं।

    माइकल ब्रीचर ने लिखा है कि भारत के देशी राज्यों में यदि कोई साम्य था तो केवल यह कि वे अधीनस्थ संधि के द्वारा ब्रिटिश सरकार से जुड़े हुए थे। उनके रक्षा, वैदेशिक सम्बन्ध तथा संचार के लिये भारत सरकार उत्तररदायी थी। अपनी आंतरिक स्वयत्तता को देशी राज्यों ने बनाये रखा था। ब्रीचर का यह कथन नितांत असत्य है। बीसवीं सदी के आगमन तक देशी रियासतों के हर अंग पर अंग्रेजी शासन की पकड़ अत्यंत गहरी हो चुकी थी तथा देशी राज्यों में ब्रिटिश हस्तक्षेप अपने चरम पर पहुंच चुका था। ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के बीच बराबरी की बात पूरी तरह समाप्त हो गयी थी। देशी राज्यों के बाहरी मामलों में भारत सरकार का पूरा नियंत्रण हो चुका था।

    29 नवम्बर 1899 को लॉर्ड कर्जन (ई.1899-1905) ने घोषित किया कि भारतीय नरेशों को अपनी सत्ता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिये। उसका राजस्व उसकी व्यक्तिगत सनक को पूरा करने के लिये नहीं है अपितु राज्य की जनता की भलाई के लिये है। उसकी गद्दी अय्याशी के लिये नहीं अपितु सेवा और कर्तव्य के लिये है। नरेशों को अधिक समय यूरोप की होटलों में नहीं अपने राज्य की सीमा में व्यतीत करना चाहिये। कर्जन उन वायसरायों में से था जो राजाओं पर अंग्रेजियत का मुलम्मा चढ़ते हुए नहीं देखना चाहता था। उसके समय में भारतीय राजा अपने राज्यों के नाम मात्र के शासक रह गये थे। ई.1903 में कर्जन ने स्पष्ट किया कि राजा अपने राज्यों पर ब्रिटिश शासक के मात्र एजेंट के रूप में शासन कर रहे हैं। ब्रिटिश क्राउन की परमोच्चता हर स्थान पर चुनौती रहित है, इसने अपने निर्बाध अधिकारों को स्वयं सीमित कर रखा है। लार्ड कर्जन ने लिखा है कि एक देशी राजा ने कर्जन के पैर छुए।

    अंग्रेज अधिकारी भारतीयों को आधे गोरिल्ला, आधे हब्शी, निम्न कोटि के पशु, मूर्तिपूजक, काले भारतीय आदि कहकर उनका मखौल उड़ाया करते थे। आम आदमी के साथ अंग्रेज अधिकारियों का बर्ताव बहुत बुरा था। भारतीयों को रेलवे की उच्च श्रेणी के डिब्बों में यात्रा करने का अधिकार नहीं था। शासक वर्ग के राजा आदि लोगों को ऊंचे दर्जे के डिब्बे में यात्रा के समय शिकार से लौटे साहब लोगों के जूतों के फीते खोलने और उनकी थकी टांगों पर तेल लगाने के लिये मजबूर किया जाता था। किसी भी भारतीय जज को अंग्रेज के मुकदमे सुनने का अधिकार नहीं था।

    भारत में अंग्रेजों की शासन पद्धति शुरू से कुछ ऐसी रही जैसे कोई बूढ़ा स्कूल मास्टर कक्षा के उज्जड विद्यार्थियों को बेंत के जोर पर सही करने निकला हो। इस स्कूल मास्टर को पूरा विश्वास था कि विद्यार्थियों को जो शिक्षा वह दे रहा है, वही उनके लिये सही और सर्वश्रेष्ठ है। यदि अपवादों को छोड़ दें तो अंग्रेज अधिकारी अपनी योग्यता का परिचय देते थे किंतु उनमें धैर्य तथा शिष्टाचार का अभाव था और उनमें सिर से लेकर पांव तक भ्रष्टाचार व्याप्त था।

    नीच और मूर्ख भारतीयों पर शासन करने की दैवी जिम्मेदारी का वहन करने के लिये अंग्रेजों ने भारतीय सिविल सर्विस की स्थापना की जिसमें 2,000 अंग्रेज अधिकारी नियुक्त हुए। 10,000 अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय सेना सौंप दी गयी। तीस करोड़ लोगों को अनुशासन में रखने के लिये 60,000 अंग्रेज सिपाही आ धमके। उनके अतिरिक्त दो लाख भारतीय सिपाही भारतीय सेनाओं में थे ही।

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