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  • अंग्रेजों ने डूंगरपुर के महारावल को वृंदावन भेज दिया

     16.07.2017
    अंग्रेजों ने डूंगरपुर के महारावल को वृंदावन भेज दिया

    ई.1808 में जसवंतसिंह डूंगरपुर राज्य का महारावल हुआ। वह एक अयोग्य शासक था। ई.1812 में खुदादाद नाम के एक पिण्डारी ने अपने आप को सिंध का शहजादा घोषित करके डूंगरपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया। महारावल अपनी रानियों सहित डूंगरपुर छोड़कर भाग गया। सिंधियों ने डूंगरपुर पर अधिकार कर लिया तथा उसे नष्ट भ्रष्ट कर दिया। सरकारी कार्यालय जलाकर राख कर दिये। जब महारावल किसी तरह सेना एकत्र करके सिंधियों से युद्ध करने के लिये आया तो सिंधियों ने उसे कैद कर लिया। महारावल के अनेक सरदार मारे गये। बाद में बड़ी कठिनाई से सूरजमल ने खुदादाद खां को मार कर महारावल को मुक्त करवाया।

    महारावल ने मराठों, भीलों तथा अपने सरदारों से तंग आकर ई.1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से अधीनस्थ संधि की। इस संधि की शर्तें लगभग वही थीं जो अन्य राज्यों के साथ हुई संधि में रखी गयी थीं। इस संधि के तुरंत बाद भीलों ने बहुत लूटमार मचाई जिसे महारावल जसवंतसिंह काबू न कर सका। इस पर कम्पनी सरकार ने अपनी सेना भेजी। इस सेना को देखकर भीलों ने लड़ना बंद करके कम्पनी की अधीनता स्वीकार कर ली।

    ईस्वी 1825 में कम्पनी ने भीलों से एक लिखित समझौता किया जिसमें भीलों ने लिखकर दिया कि वे अपने समस्त तीन कमान और अन्य हथियार कम्पनी बहादुर को सौंप देंगे तथा हाल ही के दंगों में जो कुछ लूट में प्राप्त हुआ है, उसका भी एवज देंगे। भविष्य में कभी कसबों, गाँवों अथवा सड़कों पर लूट मार न करेंगे तथा सदैव कम्पनी की आज्ञा का पालन करेंगे। इस संधि पर 22 भील मुखियाओं ने हस्ताक्षर किये।

    भीलों की समस्या पर काबू न पा सकने के कारण कम्पनी द्वारा महारावल जसवंतसिंह को अयोग्य शासक माना गया तथा उससे राज्य कार्य छीन लिये गये। पोलिटिकल एजेण्ट ने पण्डित नारायण को डूंगरपुर का प्रबंधक नियुक्त किया तथा दो सामंतों को उसका सहायक नियुक्त किया। पण्डित तो दो साल बाद ही मर गया जिससे सामंतों की बन आयी और उन्होंने महारावल को आतंकित करके राज्य में पूरी तरह धांधली मचा दी। उन दोनों सामंतों के भी मर जाने पर जो नये सामंत राज्यकार्य के लिये नियुक्त किये गये वे भी पूरे बेईमान थे जिनसे तंग आकर अंग्रेजों ने प्रतापगढ़ देवलिया के महारावल सावंतसिंह के छोटे पौत्र दलपतसिंह को जसवंतसिंह का उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

    दलपतसिंह का न तो डूंगरपुर न बांसवाड़ तथा न रावल शाखा से कोई सम्बन्ध था। इसलिये सरदारों ने उसे गोद लिये जाने पर आपत्ति की किंतु अंग्रेजों ने दलपतसिंह को बलपूर्वक महारावल का दत्तक पुत्र घोषित कर उसे समस्त राज्यकार्य सौंप दिये। जब महारावल तथा सरदारों ने अंग्रेज सरकार से विरोध जताया तो अंग्रेज सरकार ने जवाब दिया कि अंग्रेज सरकार प्रत्येक रईस को अपना शासन बनाये रखने के लिये और अपने राज्य में शांति स्थापित कर देश को आपत्तियों से बचाने का उत्तरदायित्व समझती है। उधर जब कुछ साल बाद प्रतापगढ़ का कोई वारिस जीवित न रहा तो दलपतसिंह ने प्रतापगढ़ का भी शासन अधिकार संभाल लिया तथा उसने प्रतापगढ़ तथा डूंगरपुर को एक ही राज्य में सम्मिलित करने की योजना बनायी।

    डूंगरपुर के महारावल के यहाँ गोद चले जाने के कारण दलपतसिंह का प्रतापगढ़ पर कोई अधिकार नहीं रहा था तथा उधर डूंगरपुर का वास्तविक शासक जसवंतसिंह अंग्रेजों से अपना राज्य वापस मांग रहा था इसलिये ई.1845 में उसने एक चाल चली। महारावल जसवंतसिंह ने नांदली के ठाकुर हिम्मतसिंह के पुत्र मोहकमसिंह को गोद लेने के लिये मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह से लिखा पढ़त की। अंग्रेज सरकार से स्वीकृति लिये बिना इस प्रकार की कार्यवाही किया जाना पोलिटिकल एजेण्ट कप्तान हंटर को उचित नहीं जान पड़ा। जब कुछ लोगों को मालूम हुआ कि महारावल हिम्मतसिंह को गोद लेने के लिये सिरोपाव भेज चुका है तो उन्होंने धन्नामाता की डूंगरी पर चढ़कर राजमहल पर गोलियां दागी। महारावल जसवंतसिंह उन गोलियों की चपेट में आने से बाल-बाल बचा। कुंवर दलपतसिंह ने प्रतापगढ़ से आकर हिम्मतसिंह को गिरफ्तार कर लिया।

    अंग्रेजों ने महारावल जसवंतसिंह को इस सारे बखेड़े का जिम्मेदार ठहराया तथा उसे पदच्युत करके वृंदावन भेज दिया। दलपतसिंह को डूंगरपुर का शासक बना दिया। महारावल जसवंतसिंह को 1000 रुपये की मासिक पेंशन दी गयी। कुछ दिन बाद वृंदावन में ही उसकी मृत्यु हुई। दलपतसिंह डूंगरपुर राज्य का महारावल बन गया।

    राज्य के वास्तविक स्वामि की इस प्रकार दुर्गति होने से महारावल की रानियों ने दलपतसिंह के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया तथा वे बार-बार अंग्रेज सरकार को लिखने लगीं कि दलपत सिंह की जगह किसी अन्य व्यक्ति को डूंगरपुर का राजा बनाया जाये। इस समस्या का कोई अंत आता न देखकर अंग्रेजों ने दलपतसिंह को फिर से प्रतापगढ़ भेज दिया तथा साबली के ठाकुर जसवंतसिंह के चार पुत्रों में से किसी को डूंगरपुर का महारावल बनाने का विचार किया। साबली का राजपरिवार डूंगरपुर के राजपरिवार की ही एक शाखा से था।

    जसवंतसिंह के चार बालकों में से किसे डूंगरपुर का राजा बनाया जाये इस प्रश्न को हल करने के लिये डूंगरपुर के सरदारों ने उन बालकों की एक परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने मिठाई मंगवाकर उन बालकों में बंटवा दी। पहले, दूसरे तथा चौथे नम्बर के बालकों ने तो मिठाई अपने हाथ में ले ली तथा तीसरे नम्बर के बालक उदयसिंह ने हाथ में मिठाई नहीं ली तथा थाली में लाकर देने को कहा। आठ वर्ष के बालक की इस बुद्धि को देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद कुछ रुपये मंगवाकर उन चारों लड़कों को दिये गये। तीन बालकों ने तो रुपये अपने पास रख लिये किंतु उदयसिंह ने कुछ रुपये तो ब्राह्मणों को दे दिये तथा शेष रुपयों से शस्त्र मंगवाने की इच्छा व्यक्त की।

    सरदारों ने इसी बालक को डूंगरपुर का स्वामी स्वीकार कर लिया। उनके निर्णय को रानियों ने भी स्वीकार कर लिया तथा दलपतसिंह भी राजी हो गया। इस प्रकार 28 सितम्बर 1846 को उदयसिंह डूंगरपुर का शासक बन गया। उसकी शिक्षा दीक्षा का अच्छा प्रबंध किया गया। कुछ समय बाद उदयसिंह ने राजपूताने की विभिन्न रियासतों का दौरा किया। दिसम्बर 1855 में वह मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह से मिलने के लिये उदयपुर गया। महाराणा ने उदयपुर नगर से बाहर दक्षिण दिशा में स्थित नागों के अखाड़े तक आकर उसका स्वागत किया। युवक उदयसिंह ने भी महाराणा के गौरव के अनुसार शिष्टाचार प्रकट किया।

    महारावल उदयसिंह नाबालिग था इसलिये डूंगरपुर राज्य का शासन अब भी महारावल दलपतसिंह ही चलाता था। इस प्रकार महारावल उदयसिंह धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था ई.1858 में उसे शासन के पूर्ण अधिकार सौंपे जाने थे किंतु उससे पूर्व ही भारत में 1857 का प्रसिद्ध गदर प्रारंभ हो गया और महारावल को अपनी वफादारी दिखाने का अवसर प्राप्त हुआ।

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