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  • अंग्रेजों ने नरेशों की सलामियाँ कई बार घटाई बढ़ाईं

     02.06.2020
    अंग्रेजों ने नरेशों की सलामियाँ कई बार घटाई बढ़ाईं

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    1857 के सैनिक विद्रोह के समय जोधपुर पर महाराजा तखतसिंह शासन कर रहा था। स्वर्गीय राजा मानसिंह की इच्छा के अनुसार तखतसिंह को अहमदनगर से लाकर जोधपुर का राजा बनाया गया था। वह जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह के आठवें पुत्र महाराजा आनन्द सिंह का पोता था। 1 दिसम्बर 1843 को तखतसिंह बड़ी धूमधाम से जोधपुर की गद्दी पर बैठा था। जोधपुर का राजा बनते समय उसकी आयु 24 वर्ष थी। तखतसिंह को जोधपुर का राज्य मिल जाना कोई सरल बात नहीं थी। स्वर्गीय राजा की इच्छा, राज परिवार के सदस्यों का लगातार अनुरोध और जोधपुर के पोलिटिकल एजेण्ट की सिफारिश पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उसे जोधपुर का राज्य सौंपा। कर्नल सदरलैण्ड ने भी मानसिंह की विधवा रानियों का मान रखने में प्रमुख भूमिका निभाई।

    महाराजा तखतसिंह ने जोधपुर से नाथों तथा राज्य के सामंतों का उपद्रव समाप्त करने के लिये कई कदम उठाये। नाथों को तो दबा दिया गया किंतु राज्य के सामंतों के मामले में उसे अधिक सफलता नहीं मिली। ई.1782 से उमरकोट जोधपुर राज्य के अधिकार में चला आता था किंतु ई.1813 में उसे सिंध के टालपुरा अमीरों ने दबा लिया। जब ई.1843 में ब्रिटिश सरकार ने सिंध क्षेत्र पर विजय प्राप्त की तो तखतसिंह ने अंग्रेजों से उमरकोट वापस मांगा लेकिन अंग्रेजों ने उमरकोट जोधपुर राज्य को नहीं लौटाया। उसके बदले में जोधपुर राज्य को प्रतिवर्ष दस हजार रुपये देना निश्चित किया। इससे उमरकोट का क्षेत्र सदैव के लिये जोधपुर के अधिकार से बाहर चला गया जिसकी परिणति आगे चलकर इतनी भयावह हुई कि यह क्षेत्र सदा के लिये पाकिस्तान में चला गया।

    तखतसिंह ने जोधपुर राज्य के व्यापारियों से लिया जाने वाला ''डंड किराड़" नामक कर समाप्त कर दिया। यद्यपि तखतसिंह जोधपुर राज्य की विधवा रानियों की अनुशंसा पर ही जोधपुर के राजा बने थे किंतु कुछ असंतुष्ट जागीरदारों ने राजमाताओं को भड़काकर उन्हें तखतसिंह के विरुद्ध कर दिया। इससे राजमाताओं ने कर्नल सदरलैण्ड से महाराजा तखतसिंह की शिकायत की। सदरलैण्ड ने राज्य में उभर रहे संतोष की सूचना महाराजा को दी। महाराजा ने सदरलैण्ड की सलाह से उन जागीरदारों को कैद कर लिया जो राजमाताओं को भड़का रहे थे।

    ई.1846 में शेखावत डूंगसिंह और जवाहरसिंह ने आगरे के किले का जेलखाना तोड़कर अन्य कैदियों के साथ बाहर निकल गये तथा उन्होंने नसीराबाद छावनी को लूट लिया। इसके बाद जवाहसिंह तो बीकानेर की तरफ चला गया और डूंगसिंह को मारवाड़ की सेना ने शेखावाटी और तूरांवाटी के बीच में पकड़ लिया। डूंगजी को मारवाड़ राज्य की ओर से आश्वासन दिया गया कि उसे अंग्रेजी सेना के हवाले नहीं किया जायेगा। उसे जोधपुर में बिना बेड़ी-हथकड़ी के ही रखा गया।

    9 अगस्त 1857 को जोधपुर किले के बारूद के गोदाम पर बिजली गिर गई जिसमें किले की दीवार और चामुण्डा माता का मंदिर उड़कर शहर में आ पड़े। उनके पत्थरों से लगभग 400 मनुष्य घरों में दब कर मर गये। यह दुर्घटना मारवाड़ में विनाश की सूचना लेकर आई। 16 अगस्त 1857 को मारवाड़ की सरहद पर एरनपुरा में स्थित अंग्रेज सरकार की छावनी में विद्रोह हो गया। यह सेना जोधपुर लीजियन कहलाती थी। इस छावनी का सारा खर्चा जोधपुर राज्य द्वारा दिया जाता था। तखतसिंह ने इस विद्रोह को सख्ती से कुचला और अजमेर तथा नसीराबाद से अंग्रेज अफसरों व परिवारों को अपने यहाँ लाकर सुरक्षित रखा। लार्ड केनिंग ने तखतसिंह को इन सेवाओं के बदले पुरस्कृत किया किन्तु अंग्रेजों की तरफ से यह सद्भाव बहुत कम समय तक रहा।

    ईस्वी 1870 में अंग्रेजों ने राजा को दबाकर उससे सांभर, नांवा और गुढ़ा की नमक की झीलें छीन लीं। इससे राज्य की आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ा। उसी वर्ष 22 अक्टूबर को लार्ड मेयो ने अजमेर में एक दरबार किया जिसमें राजपूताने के सब नरेश सम्मिलित हुए। तखतसिंह भी इस दरबार में भाग लेने के लिये अजमेर गया किन्तु वहां जयपुर और उदयपुर नरेशों की कुर्सी अपनी कुर्सी से आगे लगी हुई देखकर वह दरबार में शामिल हुए बिना लौट आया। अंग्रेज सरकार जोधपुर नरेश के आगमन पर 17 तोपों की सलामी देती थी किन्तु इस घटना से नाराज होकर मेयो ने तखतसिंह को दी जाने वाली सलामी तोपों की संख्या 15 कर दी। इस सम्मेलन में ही अजमेर के सुप्रसिद्ध मेयो कॉलेज के निर्माण का निर्णय लिया गया। महाराजा तखतसिंह ने इस कॉलेज के निर्माण हेतु 1 लाख रूपया चन्दा भिजवाया।

    तखतसिंह स्त्री, शिकार और शराब में बहुत रुचि रखता था। वह अपना अधिक समय या तो रनिवास में बिताता था या फिर शिकार में। वह अपनी रानियों को भी शिकार पर ले जाता था। उसकी कई रानियां बन्दूक चलाने में प्रवीण थीं। तखतसिंह ने राजपूत जाति में कन्याओं को जन्मते ही मारने की प्रथा पर सख्ती से रोक लगाई तथा इस आशय के शिलालेख खुदवाकर राज्य के मुख्य शहरों तथा किलों के दरवाजों पर लगवाये। स्त्रियों के सती होने तथा साधुओं द्वारा जीवित समाधि लेकर मरने की प्रथा को भी उसने बन्द करवाया।

    मारवाड़ में सबसे पहला अंग्रेजी स्कूल, छापाखाना और रेल तखतसिंह के समय में ही आरंभ हुए। जब राजपूताना मालवा रेल्वे की रेल मारवाड़ राज्य से होकर निकली तो महाराजा ने रेल्वे कम्पनी को दो सौ फुट चौड़ी और 114 मील लम्बी भूमि निःशुल्क प्रदान की । सबसे पहला अंग्रेजी स्कूल दरबार स्कूल के नाम से जोधपुर में ई.1867 में तथा सबसे पहला छापाखाना 'मारवाड़ स्टेट प्रेस’ के नाम से खुला था। स्वास्थ्य खराब होने के कारण 16 नवम्बर 1872 को महाराजा ने राजकार्य महाराजकुमार जसवंतसिंह को सौंप दिया। तखतसिंह की 30 रानियां, 10 पड़दायतें तथा 11 तालीम की डावड़ियां थी। महाराजा के 10 पुत्र थे। इनके अतिरिक्त 10 रावराजा भी थे।12 फरवरी 1873 को राजयक्ष्मा से महाराजा तखतसिंह का देहांत हो गया।

    तख्तसिंह की मृत्यु के बाद ई.1873 में जसवन्तसिंह द्वितीय जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठा। उसने जोधपुर में महकमा खास तथा दीवानी, फौजदारी और अपील की अदालतें स्थापित कीं तथा फैजुल्ला खां को अपना दीवान बनाया जिसने सभी उच्च पदों पर मुसलमानों को रख लिया जो राज्य के विश्वसनीय नहीं निकले और रियासत कर्ज में डूब गई। इस पर राजा ने हिन्दू सरदारों को राज्य का प्रबन्ध सौंपा। कुछ ही वर्षों में रियासत का कर्जा उतर गया और उसकी आर्थिक स्थिति सुधर गई।

    ई.1875 में वाइसराय नार्थब्रुक मारवाड़ आया। उसके स्वागत हेतु जसवन्तसिंह ने अपने सब सरदारों को दलबल सहित जोधपुर बुलाया। इन जागीरदारों और सशस्त्र सेना की कतार चार मील तक फैली हुई थी। लाखों रूपये खर्च करके बड़े-बड़े जलसों और रोशनी का प्रबन्ध किया गया। यह समारोह मारवाड़ में लाट की दीवाली के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महारानी विक्टोरिया के भारत की राज राजेश्वरी की पदवी धारण करने के उपलक्ष्य में लार्ड लिटन ने दिल्ली में 1 जनवरी 1877 को केसरी दरबार किया। महारानी ने इस अवसर पर केसरे हिन्द की पदवी भी धारण की। इस कारण यह दरबार केसरी दरबार कहलाया। इसमें भारत भर के बड़े-बड़े राजा और नवाब शामिल हुए।

    जोधपुर का राजा जसवन्तसिंह द्वितीय इस दरबार में उपस्थित हुआ। इस अवसर पर जसवंतसिंह को दी जाने वाली तोपों की सलामी की संख्या 17 से बढ़ाकर 19 कर दी गई जो अगले ही वर्ष 21 हो गयी।

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