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  • ब्रिटिश सरकार राजाओं के साथ प्रिय बालकों जैसा व्यवहार करने लगी

     02.06.2020
    ब्रिटिश सरकार राजाओं के साथ  प्रिय बालकों जैसा व्यवहार करने लगी

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    1857 के सैनिक विद्रोह को अगस्त 1858 तक अंग्रेजों और राजपूताने के देशी राज्यों की सम्मिलित ताकत ने कुचल दिया। कर्नल स्लीमैन की वह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई थी कि राजा लोग एक दिन संकट में सहायक स्वरूप प्रमाणित होंगे। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत के शासन पर अपना सीधा नियंत्रण स्थापित किया। देश के एक तिहाई क्षेत्र में देशी राज्य स्थित थे जिन्हें ब्रिटिश क्षेत्र में सरलता से मिलाया जा सकता था किंतु 1857 के विद्रोह में राजाओं के द्वारा प्रदर्शित ब्रिटिश भक्ति के कारण उन्हें ब्रिटिश राज्य में नहीं मिलाया गया अपितु भविष्य के किसी संकट में ब्रिटिश राज्य को बचाने के लिये अवरोध (बांध) माना गया। 140 देशी नरेशों को सनद (अधिकार पत्र) दिये गये।

    1 नवम्बर 1858 को ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया ने एक घोषणा की जिसे भारत के प्रत्येक शहर में पढ़कर सुनाया गया। इस घोषणा में ब्रिटिश सरकार ने उन मुख्य सिद्धान्तों का विवरण दिया जिनके आधार पर भारत का भविष्य का शासन निर्भन करता था। इस घोषणा का कोई कानूनी आधार नहीं था क्योंकि इसे ब्रिटिश संसद ने स्वीकार नहीं किया था परन्तु ब्रिटिश मंत्रिमंडल की सहमति होने के कारण इस घोषणा में दिये गये सिद्धांत कानून के समकक्ष स्थान रखते थे।

    रानी विक्टोरिया की घोषणा में कहा गया कि भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा प्रशासित क्षेत्रों का शासन अब प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश क्राउन द्वारा किया जायेगा। कम्पनी के सभी असैनिक और सैनिक पदाधिकारियों को ब्रिटिश क्राउन की सेवा में ले लिया गया तथा उनके सम्बन्ध में बने हुए सभी नियमों को स्वीकार कर लिया गया।

    भारतीय नरेशों के साथ कम्पनी द्वारा की गयी समस्त संधियों और समझौतों को ब्रिटिश क्राउन द्वारा यथावत् स्वीकार कर लिया गया। ''डॉक्टराइन ऑफ लैप्स" को त्याग दिया गया। भारतीय नरेशों को बच्चा गोद लेने का अधिकार दिया गया तथा साथ ही व्यवस्था की गयी कि 'राजगद्दी’ देशी राजा का अधिकार न होकर परमोच्च शक्ति से मिला हुआ उपहार होगी। यह आश्वासन भी दिया गया कि ब्रिटिश क्राउन अब भारत में राज्य विस्तार की आकांक्षा नहीं करता और भारतीय नरेशों के अधिकारों, गौरव एवं सम्मान का उतना ही आदर करेगा जितना वह स्वयं का करता है।

    गोरी रानी ने अपनी भारतीय प्रजा को आश्वासन दिया कि प्रजा के धार्मिक विश्वासों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा। भारतीयों को जाति या धर्म के भेदभाव के बिना उनकी योग्यता, शिक्षा, निष्ठा और क्षमता के आधार पर सरकारी पदों पर नियुक्त करने हेतु समान अवसर प्रदान किये जायेंगे।

    रानी की सरकार सार्वजनिक भलाई, लाभ और उन्नति के प्रयत्न करेगी तथा शासन इस प्रकार चलायेगी जिससे उसकी समस्त प्रजा का हित साधन हो। ब्रिटिश सरकार ने मेवाड़, मारवाड़, जयपुर एवं बीकानेर रियासतों के राजाओं को 17 तोपों की सलामी देने की स्वीकृति प्रदान की। बाद में अन्य राजाओं को भी तोपों की सलामियां लेने की अनुमति दी गयी। इन सलामियों की संख्या अंग्रेज शासकों के अप्रसन्न अथवा प्रसन्न होने पर घटती-बढ़ती रहती थी।

    रानी विक्टोरिया की घोषणा का मूल लक्ष्य भारत में स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षा प्रदान करना था। इस उद्देश्य को लेकर भारतीय नरेशों के सम्मान और अधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया। भविष्य में ब्रिटिश सरकार की नीति भारतीय नरेशों, जागीरदारों और प्रतिक्रियावादी तत्वों के संरक्षण की रही जिनका प्रयोग वह भारत के प्रगतिशील तत्वों के विरोध में करती रही।

    रानी की घोषणा में योग्यतानुसार पद की प्राप्ति का आश्वासन भारतीय शिक्षित वर्ग का समर्थन प्राप्त करने के लिए दिया गया था, इस आश्वासन की पूर्ति ब्रिटिश सरकार ने कभी नहीं की। भारतीयों को उनके धर्म, परम्पराओं आदि में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन भारतीय जन साधारण को संतुष्ट करने के लिए दिया गया था क्योंकि इस प्रकार के हस्तक्षेप को विद्रोह के कारणों में से प्रमुख कारण समझा गया था जबकि इस घोषणा के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने भारत में धर्मान्धता, अंधविश्वास, जातीयता, क्षेत्रीयता आदि बुराईयों को खूब बढ़ावा दिया जिससे भारतीय आपस में बंटे रहें और प्रगतिशील विचारों के सम्पर्क में न आयें। यद्यपि इस घोषणा में देशी राज्यों को कई लुभावने आश्वासन दिये गये तथापि उनमें से बहुत से आश्वासन कभी भी लागू नहीं हुए। फिर भी भारत की सरल हृदय जनता पर इस घोषणा का अच्छा प्रभाव पड़ा और इसे भारतीय स्वतंत्रता का मैग्नाकार्टा कहा गया। ई.1919 तक यह घोषणा भारतीय शासन की आधारशिला बनी रही। गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग को वायसराय का पद भी दिया गया। उसे ब्रिटिश भारत के लिये गवर्नर जनरल तथा देशी राज्यों के लिये वायसराय कहा गया।

    ब्रिटिश साम्राज्य पर मुसीबत के क्षणों में देशी राजाओं के सहयोग और समर्थन पर टिप्प्णी करते हुए वायसराय लॉर्ड केनिंग ने कहा कि देशी राज्यों के शासकों ने तूफान के लिये तरंगरोध का काम किया। ई.1860 में उसने लिखा- बहुत समय पहले सर जान मैल्कम ने कहा था कि अगर हम सारे भारत को जिलों में बांट दें तो स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि हमारा साम्राज्य 50 साल तक भी चले किंतु यदि हम कई देशी रियासतें, उन्हें बिना कोई राजनीतिक सत्ता दिये शाही उपकरणों के रूप में रखें तो हम भारत में तब तक के लिये रहेंगे जब तक हमारी नौसैनिक शक्ति बनी रहेगी। इस राय में निहित ठोस सत्य के बारे में मुझे कोई संदेह नहीं है और हाल की घटनाओं ने उसे पहले की अपेक्षा अधिक ध्यान देने योग्य बना दिया है।

    ब्रिटिश इतिहासकार पी. ई.राबर्टस ने माना है कि उन्हें साम्राज्य के तंरगरोध के रूप में इस्तेमाल करना सदा से ब्रिटिश नीति रही है। रश्बु्रक विलियम्स ने लिखा है- देशी राज्यों के शासक अंग्रेजी सम्बन्ध के प्रति बहुत अधिक राजभक्त सिद्ध हुए हैं। इनमें से बहुतों का अस्तित्व अंग्रेजी न्याय और सेनाओं पर निर्भर था। 1857 के विद्रोह के बाद से ब्रिटिश सरकार राज्यों के नरेशों के साथ प्रिय बालकों जैसा व्यवहार करती थी।

    जोधपुर महाराजा तखतसिंह ने सैनिक विद्रोह के समय ब्रिटिश साम्राज्य की जो सेवा की उसके लिये उसे ई.1862 में उत्तराधिकारी गोद लेने की सनद प्राप्त हुई। जयपुर महाराजा रामसिंह (1835-1880) द्वारा सैनिक विद्रोह के समय ब्रिटिश साम्राज्य को दी गयी सेवा के लिये कोट कासिम का परगना दिया गया तथा ई.1859 में आयोजित आगरा दरबार में उसकी प्रषंसा की गयी। ई.1861 में उसे इंडियन लेजिस्लेटिव कौंसिल का सदस्य नामित किया गया। 1857 के सैनिक विद्रोह के समय मेवाड़ महाराणा स्वरूपसिंह द्वारा दी गयी सेवा के लिये उसे 20 हजार रूपये का नगद पुरस्कार दिया गया। सैनिक विद्रोह के समय बीकानेर महाराजा सरदारसिंह द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को दी गयी सेवाओं को ए. जी. जी. ने राजपूताना के समस्त शासकों में सबसे बढ़कर बताया। गवर्नर जनरल ने उसे खिलअतें प्रदान कीं तथा महाराजा को हिसार जिले में 41 गांव प्रदान किये गये।

    ई.1858 से 1947 तक ब्रिटिश शासन ने भारत के देशी राज्यों के साथ अधीनस्थ संघ की नीति अपनाई। इस काल में अंग्रेजों ने भारत में सार्वभौम सत्ता स्थापित करने के प्रयास किये तथा इसकी अभिव्यक्ति के लिये अनेक उपाय किये। देशी राज्यों में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों ने देशी राज्यों में अंग्रेजी ढंग की प्रशासनिक व्यवस्था लागू की ताकि अंग्रेजों के राजनैतिक प्रभुत्व को बल मिल सके।

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