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  • ब्रिटिश राजमुकुट ने देशी राज्यों पर अपनी परमोच्चता थोपी

     02.06.2020
    ब्रिटिश राजमुकुट ने देशी राज्यों पर  अपनी परमोच्चता थोपी

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    सन् 1858 की असफल सैनिक क्रांति के पश्चात् अंग्रेजों की समझ में अच्छी तरह आ गया कि वे भारत से निष्कासित किये जाने से बाल-बाल बचे हैं। उन्हें केवल देशी रजवाड़ों के राजाओं ने बचाया है। इसलिये अब उन्होंने भारत में शासन करने का ऐसा तरीका अपनाया कि जो रजवाड़े नष्ट होने से बच गये हैं उन रजवाड़ों को हर हालत में बनाये रखा जा सके ताकि जो भारतीय क्षेत्र अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन में हैं यदि उन क्षेत्रों में अंग्रेजों को कोई चुनौती मिलती है तो उस चुनौती का सामना करने के लिये इन रजवाड़ों को काम में लिया जा सके।

    ई.1857 की क्रांति के समय लॉर्ड केनिंग भारत का गवर्नर जनरल था। वह 1862 तक इस पद पर बना रहा। ई.1862 में राजपूताना के राजाओं को सनदें प्रदान कर उन्हें बच्चा गोद लेने का अधिकार प्रदान किया गया। इन सनदों ने राजाओं को विश्वास दिलाया कि जब तक भारत में अंग्रेज रहेंगे, राजाओं के राज्य भी बने रहेंगे। ई.1858 तक राजाओं का मानना था कि उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ बराबरी के आधार पर सम्बन्ध बनाये हैं। यद्यपि यह एक मिथ्या भ्रम ही था जो किसी तरह चला आ रहा था किंतु अब अंग्रेजों ने भारतीय रजवाड़ों को ब्रिटिश क्राउन के विश्वस्त सेवक के रूप में आकार देना आरंभ किया। भारतीय राजाओं को भी यह विश्वास हो गया कि अंग्रेज राज्य में अराजकता फैलने पर अथवा राजा द्वारा ब्रिटिश राजमुकुट से विद्रोह करने पर ही राज्य का प्रशासन अपने हाथ में लेंगे। इसलिये राजाओं ने अब ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति स्वामिभक्ति प्रदर्शित करने का मार्ग अपनाया।

    अंग्रेजों ने अपने द्वारा प्रत्यक्षतः शासित होने वाले क्षेत्रों को ब्रिटिश भारत अथवा ब्रिटिश इण्डिया कहा जबकि देशी राज्यों के माध्यम से शासित होने वाले क्षेत्रों को रियासती भारत अथवा इण्डियन इण्डिया कहकर सम्बोधित किया। इस प्रकार किसी भी तरह की भौगोलिक, सामाजिक या आर्थिक विभिन्नताओं के न होते हुए भी भारत के दो टुकड़े हो गये। ब्रिटिश राजमुकुट ने इन दोनों भागों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने के लिये दो भिन्न प्रारूप अपनाये। उसने ब्रिटिश भारत पर सम्प्रभुता (सोवरेनिटी) तथा रियासती भारत पर परमोच्चता (पैरामउंट्सी)) स्थापित की। इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश भारत पर स्थापित की गयी सम्प्रभुता के कारण ही ब्रिटिश शक्ति को भारत के देशी राज्यों पर परमोच्चता लादने का अवसर प्राप्त हुआ था।

    ई.1862 में आयोजित एक दरबार में लॉर्ड केनिंग ने ब्रिटिश क्राउन की परमोच्चता की व्याख्या करते हुए कहा कि ब्रिटेन का राजमुकुट सम्पूर्ण भारत में परमोच्च सत्ता है। भारत में इंग्लैण्ड का एकछत्र शासन है। ब्रिटिश राजमुकुट निर्विरोध शासक के रूप में हमारे समक्ष है और अपने अधीन भारतीय राजाओं तथा सामंतों के साथ प्रथम बार उसका सीधा सम्बन्ध स्थापित हुआ है। भारतीय नरेश इंग्लैण्ड के राजमुकुट के आधिपत्य को सहर्ष स्वीकार करते हैं। सरदार के. एम. पन्निकर ने लॉर्ड केनिंग की इस घोषणा पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- शांतिपूर्ण ढंग से एक संवैधानिक क्रांति हुई जिससे ब्रिटिश सत्ता भारत में सार्वभौम बन गयी। ब्रिटिश सरकार की ओर से घोषित इस परमोच्चता की कभी अन्य व्याख्या नहीं की गयी, उसकी सर्वव्यापकता की घोषणाएं बराबर की जाती रहीं। ई.1903 से पहले यह कभी परिभाषित नहीं किया गया कि परमोच्चता का अर्थ क्या है अथवा इसके कारण ब्रिटिश राजमुकुट तथा देशी नरेशों के परस्पर सम्बन्धों की वास्तविक स्थिति क्या है? देशी नरेश ब्रिटिश राजमुकुट के चाकर हैं या मित्र!

    परमोच्चता को परिभाषित भले ही नहीं किया गया हो किंतु ई.1858 से लेकर 1947 तक के काल में अंग्रेज अधिकारियों ने देशी राज्यों पर जिस अधिकार भाव से शासन किया उससे परमोच्चता की वास्तविक शक्ति का अनुमान लगाया जाना सहज है। परमोच्चता वास्तव में परमोच्च थी। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया परमोच्चता स्वतः स्पष्ट होती गयी। समस्त देशी राजाओं का अपने राज्य का शासक बने रहना तभी तक संभव था जब तक कि ब्रिटिश राजमुकुट उसे शासक के पद पर देखना चाहता था। ब्रिटिश ताज की परमोच्चता के अधिकार से अंग्रेजों ने देशी राज्यों की आंतरिक सरकार की देखरेख के अधिकार का दावा किया। उन्होंने पोलिटिकल एजेंटों तथा रेजीडेंटों के माध्यम से न केवल दिन प्रतिदिन के प्रशासन में ही हस्तक्षेप किया बल्कि मंत्रियों और अन्य उच्च अधिकारियों की नियुक्ति और बर्खास्तगी करने पर भी जोर दिया। कभी-कभी स्वयं राजाओं को भी हटा दिया गया या उन्हें अपने अधिकारों से वंचित कर दिया गया।

    12 नवम्बर 1903 को लॉर्ड कर्जन ने पहली बार स्पष्ट घोषणा की कि राजा अपने राज्यों पर ब्रिटिश शासक के मात्र एजेंट के रूप में शासन कर रहे हैं। ब्रिटिश क्राउन की परमोच्चता हर स्थान पर चुनौती रहित है। इसने अपने निर्बाध अधिकारों को स्वयं सीमित कर रखा है। कर्जन के समय में देशी राज्यों के शासकों पर ब्रिटिश अधिकारियों का इतना प्रभाव हो चुका था कि एक राज्य के शासक ने लार्ड कर्जन के पैर छुए। वायसराय लॉर्ड रीडिंग ने 27 मार्च 1926 को हैदराबाद निजाम को लिखे एक पत्र में ब्रिटिश क्राउन की परमोच्चता को दोहराया। रीडिंग ने हैदराबाद के निजाम को सूचित किया कि किसी भी भारतीय राज्य का शासक ब्रिटिश सरकार से बराबरी के स्तर पर बात करने का दावा नहीं कर सकता।

    परमोच्चता के चलते अंग्रेजों के लिये किसी भी राजा-महाराजा को गद्दी से उतारना असंभव नहीं था। इसके लिये उन्हें मात्र इतना करना होता कि उस राजा महाराजा पर आरोप लगाते कि आप में शासन करने की योग्यता नहीं है किंतु जब तक कोई खास बात न हो, अंग्रेज उन्हें छेड़ते नहीं थे। जब तक किसी राजा की सेना अंग्रेजों की सहायता के लिये उपलब्ध रहती, तब तक अंग्रेज उसे योग्य शासक मानते रहते थे। ये योग्य शासक अपने राज्य में पूरी मनमानी कर सकते थे। पूछने वाला कोई नहीं था। यहाँ तक कि अगर वे चार-छह कत्ल कर डालते तो भी योग्य शासक ही माने जाते। राजा लोग भी जानते थे कि जिस क्षण उन्होंने अंग्रेजों को सैनिक सहायता देने में हील-हवाला किया, उसी क्षण अपनी योग्यता से हाथ धोया।

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