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  • अंग्रेज मानते थे कि काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं!

     17.07.2017
    अंग्रेज मानते थे कि काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं!

    1825 में सर जॉन स्टुअर्ट मिल ने इस बात की वकालात की कि देशी राज्यों को समाप्त कर दिया जाना चाहिये किंतु कम्पनी के पुराने प्रशासक इस बात से सहमति नहीं रखते थे। सर जॉन मैल्कम ने इस विचार का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि देशी राज्य हमारी दया पर निर्भर हैं तथा वे ही भारत में हमारी वास्तविक शक्ति हैं। इस शक्ति का अनुमान हमें तब तक नहीं होगा जब तक कि हम उसे खो न देंगे।

    1818 से 1857 के बीच ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इन राज्यों को अपने अधीन रखा। इस काल में कम्पनी के अधिकारियों ने देशी राज्यों पर अपनी प्रभुसत्ता जताने के लिये कई उपाय किये। ईस्वी 1831 में गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक अजमेर आया।

    उसने पोलिटिकल एजेण्ट से कहलवाया कि उदयपुर का महाराणा जवानसिंह अजमेर आकर गवर्नर जनरल से मिले। इस पर महाराणा ने ऐजेण्ट से कहा कि मुसलमान बादशाहों के समय में भी हमारा कोई पूर्वज मुलाकात करने के लिये नहीं गया तब मैं कैसे अजमेर जा सकता हूँ? इस पर एजेण्ट ने जवाब दिया कि मुगल बादशाह आपके दुश्मन थे, हम आपके मित्र हैं। मित्र से मिलने जाने में कोई बुराई नहीं है। इस पर महाराणा जवानसिंह, विलियम बैंटिक से मिलने के लिये अजमेर गया।

    ई.1832 में रियासतों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने के लिये ''एजेंट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना" का पद बनाया गया। राजाओं से कहा गया कि वे अपने वकीलों की नियुक्ति करें जो अजमेर में रहकर ए. जी. जी. के सम्पर्क में रहें ताकि ए. जी. जी. उन्हें राज्य के सम्बन्ध में दिशा निर्देश दे सके।

    अंग्रेज व्यापारिक उद्देश्यों से भारत आये थे किंतु व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये उन्हें भारत की राजनीति में प्रवेश करना पड़ा था। इस कार्य में उन्हें जबर्दस्त ऊर्जा लगानी पड़ी। उनकी सफलतायें भी अद्वितीय थीं। धीरे-धीरे वे भारत में शासक शक्ति बन गये। ई.1833 में चार्टर एक्ट के माध्यम से कम्पनी की व्यापारिक गतिविधियां समाप्त कर दी गयीं तथा उसने भारत सरकार के रूप में कार्य करना आरंभ कर दिया।

    जब ई.1848 में लार्ड डलहौजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल बनकर आया तब उसने घोषणा की कि भारत के समस्त देशी राज्यों के अस्तित्व की समाप्ति सिर्फ कुछ समय की बात है क्योंकि देशी शासकों के भ्रष्ट और अत्याचारी प्रशासन की अपेक्षा ब्रिटिश प्रशासन काफी बेहतर है। इस नीति का आधारभूत उद्देश्य भारत में ब्रिटिश माल का निर्यात बढ़ाना था। डलहौजी का विश्वास था कि भारत के देशी राज्यों में ब्रिटिश माल का निर्यात कम होने का मूल कारण उन राज्यों में भारतीय शासकों का कुप्रशासन है। उसका विचार था कि देशी राजाओं से भारत में ब्रिटिश विजय को सरल बनाने का काम लिया जा चुका है और अब उनसे पिण्ड छुड़ा लेना लाभप्रद होगा। इसके लिये उसने ''डॉक्टराइन ऑफ लैप्स" का अविष्कार किया और देशी राज्यों को हड़पना आरंभ किया।

    यहाँ यह समझ लेना समीचीन होगा कि सरंक्षित देशी राज्य, ब्रिटिश साम्राज्य के उतने ही अभिन्न हिस्से थे जितने कि कम्पनी द्वारा प्रत्यक्षतः प्रशासित क्षेत्र। इसलिये देशी राज्यों को बनाए रखना या अंग्रेजी राज्य में मिला लेने का प्रश्न उस समय कोई अधिक प्रासंगिक नहीं रह गया था। भाग्यवश राजपूताने का कोई भी राज्य ''डॉक्टराइन ऑफ लैप्स" की भेंट नहीं चढ़ा जिसका लाभ आगे चलकर बीसवीं शताब्दी में राजपूताना के राज्यों, ब्रिटिश सरकार तथा मुस्लिम लीग को मिला और आधी शताब्दी तक वे भारत की राजनीति में छाये रहे।

    ई.1857 के आने तक राजपूताना की सभी देशी रियासतों पर अंग्रेजों ने अपना अधिकार जमा लिया था। अब राज्यों के पास अपनी सैन्य शक्ति कुछ भी शेष नहीं बची थी। देशी राजाओं की स्थिति यह हो चुकी थी कि एक तरफ तो वे अंग्रेज अधिकारियों के शिकंजे में कसे जाकर छटपटा रहे थे तो दूसरी ओर उन्हें यह भी स्पष्ट भान था कि यदि देशी राज्यों को बने रहना है तो अंग्रेजी शासन को मजबूत बनाये रखने के लिये उन्हें हर संभव उपाय करना होगा।

    कॉलिंस एवं लैपियरे ने लिखा है- जैसे जैसे भारत में अंग्रेजों का राज्य फैलता गया वैसे-वैसे अंग्रेजों के मन में यह विश्वास जड़ जमाता गया कि गोरी जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी 'ईश्वर’ नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने और शासन करने के लिये पैदा हुई है।

    सर थामसन मुनरो ने लॉर्ड हेस्टिंग्स को 11 अगस्त 1857 को लिखे पत्र में लिखा है कि घरेलू अत्याचार तथा पारदेशिक आक्रमण से सुरक्षा भारतीय नरेशों के लिये महंगी पड़ी है। उनको अपनी स्वतंत्रता, राष्ट्रीय आचरण तथा जो कुछ मनुष्य को आदरणीय बनाता है, इत्यादि का बलिदान करना पड़ा था।

    इस स्थिति से राज्यों में द्वैध शासन जैसी समस्याएं उत्पन्न होने लगीं जिसका परिणाम यह हुआ कि राज्यों में अराजकता फैलने लगी और ई.1857 में लगभग पूरे देश के देशी राज्यों में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति विद्रोह हो गया। राजपूताने में भी विद्रोह की चिन्गारी बड़ी तेजी से फैली किंतु देशी राजाओं के सहयोग से इस विद्रोह को शीघ्र ही कुचल दिया गया। वस्तुतः राजपूताना ने ही अंग्रेजी शासन को जीवन दान दिया।

    1857 में देश में जिस प्रकार की परिस्थितियां बनीं उनके लिये राष्ट्रीय स्तर पर भले ही लॉर्ड डलहौजी द्वारा भारतीय राज्यों को हड़पने के लिये आविष्कृत की गयी डॉक्टराइन ऑफ लैप्स की नीति, भारत में ईसाई धर्म के प्रचार की चेष्टायें तथा अपने ही भारतीय सैनिकों के प्रति भेदभाव युक्त कार्यवाहियाँ जिम्मेदार थीं किंतु राजपूताने में उत्पन्न स्थितियों के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी नहीं अपितु भारतीय रजवाड़ों तथा उनके अधीन आने वाले ठिकाणों का आपसी संघर्ष जिम्मेदार था।

    यही कारण था कि जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अत्याचारों के कारण ई.1857 में पूरे देश में सैनिक विद्रोह हुआ तो उसे स्थानीय जागीरदारों तथा गिने-चुने असंतुष्ट राजाओं का सहयोग मिला जबकि अधिकांश बड़े राजाओं ने अंग्रेज शक्ति का साथ दिया। 1857 की क्रांति में राजाओं की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए बूंदी के राज्याश्रित कवि पण्डित सूर्यमल्ल मीसण ने 1857 में पीपल्या के ठाकुर को एक पत्र लिखा जिसमें वे कहते हैं- इस क्रांति ने अंग्रेजों को चालीस से लेकर साठ-सत्तर वर्ष पीछे धकेल दिया है तो भी ये राजा लोग कायरता दिखा रहे हैं ओर अंग्रेजों की गुलामी करते हैं परंतु मेरी बात आप याद रखिये कि जो इस बार अंग्रेज रह गया तो वही सर्वशक्तिमान हो जायेगा। पृथ्वी का मालिक कोई नहीं रहेगा, सब ईसाई हो जायेंगे। इसलिये यदि दूरदर्शिता से विचार किया जाये तो ऐसा करने से लाभ किसी को नहीं होगा, पर ऐसा सोचे तब न! सूर्यमल्ल ने ई.1858 में नामली के ठाकुर बख्तावरसिंह को लिखे एक पत्र में अपने अंतरमन की वेदना प्रकट की है। वे लिखते हैं- म्लेच्छों का इरादा ऐसा दिखाई पड़ता है कि यदि इस बार रह गये तो आर्यावर्त को परतंत्र कर ही डालेंगे और किसी हिन्दू के पास कोई जागीर या ठिकाना नहीं रह जायेगा। परमेश्वर की इच्छा भी ऐसी जान पड़ती है कि आर्य न रहे क्योंकि इस समय के क्षत्रियों को सब विपरीत बात ही अनुकूल जान पड़ती है।

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