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  • बड़े राजाओं ने देश को एक नहीं होने दिया!

     05.09.2017
    बड़े राजाओं ने देश को एक नहीं होने दिया!

    जून 1937 में बीकानेर नरेश गंगासिंह ने लंदन में घोषणा की कि हम ब्रिटेन के साथ अपने सम्बन्ध समाप्त करने की अपेक्षा लड़ना पसंद करेंगे। उसी वर्ष बीकानेर में आयोजित अपने जुबली दरबार के अवसर पर लॉर्ड लिनलिथगो को ब्रिटिश सम्राट के प्रति अपनी स्वामिभक्ति का विश्वास दिलाते हुए महाराजा ने कहा कि मैं बुरे समय में अपने राज्य के समस्त स्रोतों, आदमियों और सम्पत्ति को महामना सम्राट के निष्पादन पर समर्पित कर देने को तैयार हूँ किंतु सरकार की इस बात को नहीं मान सकता कि मैं भारत संघ में सम्मिलित होकर महामना सम्राट से सम्बन्ध समाप्त कर लूं।

    वायसराय ने भी अपने भाषण में सम्राट के प्रति महाराजा की स्वामिभक्ति और उनके द्वारा दी गयी अद्भुत सेवाओं के विगत अभिलेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि महाराजा अनेक स्मरणीय अवसरों पर महामना सम्राट के निजी सम्पर्क में भी रहे।

    इस प्रकार बीकानेर नरेश गंगासिंह ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में जिस बात का समर्थन करके राष्ट्रीय नेताओं की वाहवाही लूट ली थी, उसी बात को अपने वैयक्तिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका मात्र से अस्वीकार कर दिया। एस. के. बोस ने लिखा है- व्यक्तिगत रूप से बीकानेर महाराजा को दो भारत का विचार पसंद नहीं था। डॉ. करणीसिंह ने भी लिखा है- 'ऐसे दो भारत होने की युक्ति को, जो एक दूसरे से स्वतन्त्र रूप से विकसित हो सकते हों, महाराजा का समर्थन कभी भी प्राप्त नहीं हुआ था तथा एक देशभक्त भारतीय होने के नाते उन्हें अपनी मातृभूमि की महानता तथा भारत के साथ देशी राज्यों की अविकल एकता में अगाध श्रद्धा थी। ये सब आरंभिक एवं सैद्धांतिक बातें थीं किंतु उन्हें व्यवहार रूप में आता देखकर महाराजा ने उन विचारों को त्याग दिया था। अब वे इतिहास की धारा के विरुद्ध खड़े हुए दिखायी देने लगे थे।

    इस पर भी वायसराय लिनलिथगो ने हार नहीं मानी। जनवरी 1939 में वायसराय ने राज्यों के शासकों को उनकी मांगों, आशंकाओं तथा प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए एक नया सम्मिलन पत्र तैयार करवाकर राज्यों को भिजवाया। इसे अखिल भारतीय संघ निर्माण की दिशा में वायसराय की ओर से किया गया अंतिम प्रयास माना जाता है। वायसराय द्वारा भेजे गये परिपत्र में कहा गया था कि शासक वायसराय को छः माह के भीतर सूचित करें कि क्या वे इन नयी शर्तों पर संघ में सम्मिलिन के लिये तैयार हैं?

    कोनार्ड कोरफील्ड ने लिखा है- ''1939 में जब ये सम्मिलन पत्र शासकों को भिजवाये गये, उस समय मैं राजपूताने के रेजीडेंट का कार्य देख रहा था। जब ये संलेख राजाओं को मिले तो उनमें से कईयों ने पोलिटिकल एजेंण्टों से सलाह मांगी। बीकानेर के महाराजा पहले से ही संघ में न मिलने का निश्चय कर चुके थे। यहाँ तक कि वे संघ का विरोध करने वाले शासकों का नेतृत्व भी कर रहे थे किंतु कुछ शासक महाराजा बीकानेर का अनुसरण करने की इच्छा नहीं रखते थे तथा पोलिटिकल अधिकारियों की राय जानना चाहते थे। उनमें से अधिकतर शासक यह जानना चाहते थे कि यदि वे सम्मिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो क्या वे राज्य के दीर्घ इतिहास, परम्परा और निष्ठा के प्रति अविश्वसनीय हो जायेंगे?"

    कोनार्ड ने लिखा है कि एक शासक जो कि हाल ही में कई विवादों के बाद राज्य का उत्तराधिकारी बना था, उसने कोनार्ड से पूछा कि क्या मुझे भी हस्ताक्षर कर देने चाहिये? इस पर कोनार्ड ने उत्तर दिया कि ऐसा करने से क्राउन रिप्रजेण्टेटिव राजा की शासकीय योग्यता से प्रभावित होगा। एक अन्य शासक जो कि एक बार राजपूताना की समस्त रियासतों का नेता स्वीकार किया गया था, वह इस सुझाव से प्रभावित था कि यदि वह सबसे पहले हस्ताक्षर करता है तो ऐसा करके वह अपने अन्य राजपूत शासक भाईयों का नेतृत्व करेगा। एक तीसरे शासक ने यह दृष्टिकोण अपनाया कि वह अपने ब्रिटिश प्रधानमंत्री की सलाह लेने के अतिरिक्त शायद ही कुछ अच्छा कर सकता था जिस पर कि वह पूरी तरह विश्वास करता था।

    कोनार्ड कोरफील्ड के प्रयासों के फलस्वरूप राजपूताने के आधे से अधिक राजाओं ने भारत संघ में मिलने के लिये अपनी सहमति दे दी किंतु देश के अन्य हिस्सों में स्थित रियासतों ने ऐसा नहीं किया। कोनार्ड ने लिखा है- ''लॉर्ड लिनलिथगो ने मुझे बताया कि केवल राजपूताना ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ से आवश्यक 50 प्रतिशत शासकों की सहमति प्राप्त हो चुकी है किंतु बडे़ राज्यों की सहमति के बिना, 50 प्रतिशत जनसंख्या वाली शर्त पूरी नहीं हो सकती थी इसलिये इन राज्यों की सहमति का कोई परिणाम नहीं निकलने वाला था।"

    राजाओं व उनके मंत्रियों के बम्बई में आयोजित द्वितीय सम्मेलन में प्रस्ताव पारित किया गया कि पुनरीक्षित सम्मिलन पत्र में दी गयी नवीनीकृत शर्तें भी मूल रूप से असंतोषजनक हैं तथा हैदरी समिति के अनुसार नहीं हैं जिन्हें कि ग्वालियर सम्मेलन द्वारा सुनिश्चित किया गया था, इसलिये शासकों को स्वीकार्य नहीं हैं। वी. पी. मेनन ने लिखा है- ''कुछ राजाओं का व्यवहार देखने वाला था। उन्होंने अनौपचारिक बैठकों में कोई निश्चित रुख नहीं अपनाया अपितु वे बार बार राजनीतिक विभाग के पास भागते और उनसे कुछ छूट देने की प्रार्थना करते। राजनीतिक विभाग के अधिकारी वासयराय से बात करने के लिये जाते। इस प्रकार मेरी गो राउंड जैसी स्थिति बन गयी।"

    राजाओं द्वारा संघीय योजना को अस्वीकार कर दिये जाने के बाद भी वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के प्रयास जारी रहे। इस बार उन्होंने स्वयं ने भारत की प्रमुख रियासतों का दौरा करके आम सहमति बनाने का प्रयास किया। कुछ राजा संघ निर्माण की दिशा में वास्तव में कोई प्रयास नहीं कर रहे थे किंतु वायसराय को प्रसन्न करने के लिये लगातार वायसराय की हाँ में हाँ मिलाने का क्रम जारी रखे हुए थे। 1 मार्च 1939 को वायसराय के सम्मान में जोधपुर में स्टेट बैंक्वेट दिया गया, तब महाराजा उम्मेदसिंह ने दोहराया कि जोधपुर को संघ में प्रवेश करने से जी चुराने की कोई आवश्यकता नहीं है। राज्य के कई विभागों में तो हम संघ को पिछले कई वर्षों से अपना भी चुके हैं........संघ का प्रारूप भारत को ब्रिटिश कॉमनवैल्थ के अधीन एक मजबूत स्वशासी इकाई बनाने के लिये तैयार किया गया है ताकि भविष्य में हम न केवल अपने मामलों को सुलझा सकें अपितु स्वतंत्रता की रक्षा और स्वतंत्र संविधान के लिये शनैः-शनैः महान ब्रिटिश साम्राज्य के साथ खड़े हो सकें। वायसराय ने जोधपुर नरेश की इस मनोवृत्ति की प्रशंसा की।

    वायसराय ने महाराजा गंगासिंह को लिखा कि संघ योजना के सम्बन्ध में इस समय घोषित की गयी शर्तों के बारे में समझ लिया जाना चाहिये कि अब इनमें और अधिक शिथिलिकरण की गुंजाइश नहीं है। महाराजा गंगासिंह ने इस आमंत्रण को भी ठुकरा दिया। डा. करणीसिंह ने लिखा है कि महाराजा में तीन निष्ठायें काम कर रही थीं। उनकी प्रथम निष्ठा सम्राट की प्रति थी। यह उनमें धार्मिक पवित्रता का रूप ले चुकी थी। वे एक क्षण के लिये भी नहीं सोच सकते थे कि भारत सम्राट से अपने सम्बन्ध तोड़ ले अथवा साम्राज्य से अलग हो जाये। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत राष्ट्र मंडल का सदस्य रहकर ही उन्नति कर सकता है और सुरक्षित रह सकता है। उनका मत था कि भारत की सीमायें दूर-दूर तक फैली हुई हैं और वे अंग्रेजी समुद्री बेड़े और सेना की शक्ति से ही सुरक्षित रह सकती है। साथ ही भारत का व्यवस्थित और शांतिपूर्ण विकास ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा प्रदत्त सुविधाओं और साधनों पर काफी निर्भर है।

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