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  • भरतपुर ने अंग्रेजों को हिन्दुस्तानी तलवार का पानी पिलाया

     16.06.2017
    भरतपुर ने अंग्रेजों को हिन्दुस्तानी तलवार का पानी पिलाया

    भरतपुर ने अंग्रेजों को हिन्दुस्तानी तलवार का पानी पिलाया

    1757 की प्लासी विजय के बाद से ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपनी विजय पताका फहराते हुए बंगाल से उत्तर भारत की ओर बढ़ रही थी। उत्तरी भारत में उन्हें मराठों से लोहा लेना पड़ा था जो इस पूरे क्षेत्र में चौथ वसूलते फिरते थे। ई.1800 तक कम्पनी दो मराठा शक्तियों को तो परास्त कर चुकी थी किंतु दौलतराव सिंधिया तथा जसवंत राव होलकर अब भी उसके हाथ नहीं आ रहे थे।

    ई.1803 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली ने सिंधिया तथा होलकर के विरुद्ध बड़ा अभियान चलाने का निर्णय लिया। इस कार्य को सफल बनाने के लिये उसने राजपूताने के राज्यों से संधि करने का दायित्व जनरल लेक पर छोड़ा। लेक ने राजपूताना के राज्यों को सिंधिया के विरुद्ध सहायता देने की गारण्टी दी।

    उन दिनों अलवर राज्य दौलतराव सिंधिया की लूट से तो त्रस्त था ही, साथ ही वह जयपुर राज्य से भी भयभीत था। अलवर को भय था कि जयपुर राज्य ईस्ट इण्डिया कम्पनी से हाथ मिलाकर अलवर को हड़पने का प्रयास कर रहा है। अतः जब जनरल लेक ने अलवर के पास दोस्ती का संदेश भेजा तो अलवर ने उसे तुरंत स्वीकार कर लिया। 14 नवम्बर 1803 को दोनों पक्षें के मध्य संधि हुई।

    अंग्रेजों से संधि करने वाला अलवर प्रथम राज्य था। राजपूताने के कई राज्य विगत 10 वर्षों से कम्पनी बहादुर से संधि करने को लालायित थे किंतु अब तक जयपुर, बीकानेर तथा जोधपुर सहित किसी भी राज्य को इसमें सफलता नहीं मिली थी। अतः जब यह संधि हुई तो राजपूताने के राज्यों में हड़कम्प मच गया। राजपूताने के अन्य राज्यों ने बड़ी उत्सुकता और विस्मय के साथ इस संधि को होते हुए देखा।

    यह एक रक्षात्मक और आक्रामक संधि थी जिसमें अलवर राज्य पर केवल सैनिक सहायता देने का दायित्व डाला गया था। बदले में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अलवर को पृथक राज्य स्वीकार करके उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन दिया था। कम्पनी ने अलवर से कोई कर भी नहीं मांगा।

    होलकर को घेरने के लिये जनरल लेक ने ई.1803 में भरतपुर के राजा रणजीतसिंह के साथ भी संधि की किंतु वह संधि अधिक दिन तक नहीं टिक सकी। अदम्य महत्वाकांक्षाओं के कारण अंग्रेज शक्ति के लिये अपने किसी वचन पर टिके रहना संभव नहीं था तो दूसरी ओर जाट शासक की स्वतंत्र प्रकृति भी अंग्रेजों की ज्यादतियों को सहने के लिये तैयार नहीं थी।

    16 अप्रेल 1804 को लार्ड वेलेजली ने जनरल लेक को लिखा कि मैं निश्चय कर चुका हूँ कि जितनी जल्दी हो सके जसवंतराव होलकर के साथ युद्ध आरंभ कर दिया जाये। वेलेजली के नेतृत्व में दक्षिण की ओर से तथा कर्नल मेर के नेतृत्व में गुजरात की ओर से होलकर के राज्य पर आक्रमण किया गया। इस कार्य में दक्षिण भारत तथा गुजरात की अन्य राजनीतिक शक्तियों की सहायता ली गयी किंतु होलकर ने इस मिश्रित सेना को बुरी तरह परास्त किया।

    जुलाई 1804 में कर्नल मोन्सन के नेतृत्व में एक विशाल सेना होलकर को घेरने के लिये भेजी गयी। 17 जुलाई 1804 को मोन्सन ने चम्बल के किनारे होलकर को घेर लिया। होलकर ने कर्नल मोन्सन में कसकर मार लगायी तथा उसे चम्बल के तट पर हिन्दुस्तानी तलवार का पानी पिलाया। होलकर ने अंग्रेज सैन्य दल को लूट लिया। अंग्रेजों का तोपखाना और बहुत सी युद्ध सामग्री मराठों के हाथ लगी। राजपूताने में अंग्रेजों की यह प्रथम पराजय थी।

    होलकर से परास्त होकर मोन्सन आगरा की ओर भागा। होलकर ने उसका पीछा किया तथा कम्पनी के अधिकार में जा चुके मथुरा पर धावा बोल दिया। मथुरा में होलकर से पार पाना असंभव जानकर अंग्रेजों ने होलकर के राज्य पर चढ़ाई कर दी। इस पर होलकर अपने राज्य की रक्षा के लिये वापस लौटा। कर्नल बर्न, मेजर फ्रैजर और जनरल लेक की सेनाओं ने होलकर का पीछा किया।

    होलकर की सेनाओं ने डीग के पास हुई लड़ाई में मेजर फ्रैजर को मार डाला। डीग के दुर्ग पर होलकर का अधिकार हो गया। 23 दिसम्बर 1804 को अंग्रेजों ने होलकर को परास्त कर दिया और डीग पर अधिकार कर लिया। इस पर होलकर को भाग कर भरतपुर के दुर्ग में शरण लेनी पड़ी। भरतपुर के राजा रणजीतसिंह ने होलकर तथा उसकी सेना को अपने यहाँ शरण दी।

    गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली चाहता था कि होलकर अंग्रेजों को सौंप दिया जाये किंतु महाराजा रणजीतसिंह ने अपनी शरण में आये व्यक्ति के साथ विश्वासघात करने से मना कर दिया। 7 जनवरी 1805 को जनरल लेक ने भरतपुर के दुर्ग पर तोपों से हमला कर दिया। दुर्ग की प्राचीर मिट्टी से निर्मित थी इस कारण कुछ स्थान से गिर गयी। जब अंग्रेजों ने खाई पार करके अटल दरवाजे से नगर में प्रवेश करना चाहा तो जाटों ने उन्हें मजबूती से पीछे धकेल दिया। इस प्रकार पहला आक्रमण निष्फल हो गया।

    प्रथम आक्रमण में असफल रहने पर अंग्रेज सेना ने 14 दिन तक भरतपुर दुर्ग पर तोप के गोलों की भयानक वर्षा की जिससे 21 जनवरी को नीमदागेट के पास का भाग टूट गया। इसे देखकर भरतपुर के सैनिकों ने और अधिक दृढ़ता से युद्ध करना आरंभ कर दिया। जाटों का प्रतिरोध इतना प्रबल था कि अंग्रेज सेना नगर में घुसने की हिम्मत नहीं जुटा सकी।

    कम होती हुई रसद सामग्री तथा क्षीण होती होई सेना के कारण जनरल लेक इतना चिंतित हो गया कि उसने कुछ दिनों के लिये युद्ध स्थगित कर दिया। आगरा तथा गुजरात से अतिरिक्त सेना आने पर लेक ने भरतपुर पर तीसरा आक्रमण किया। इस आक्रमण से परकोटा तो भंग हो गया किंतु जाटों से भयभीत अंग्रेज सैनिकों ने नगर में प्रवेश करने से मना कर दिया। इस प्रकार तीसरा आक्रमण भी विफल हो गया।

    जब सम्मुख युद्ध से न तो जसवंतराव होलकर हाथ आया और न भरतपुर तो अंग्रेजों ने कूटनीति खेली। उन्होंने होलकर की घुड़सवार सेना के सेनापति अमीरखां पिण्डारी को 32 हजार रुपये रिश्वत देकर अपनी ओर फोड़ लिया। अमीरखां को दायित्व सौंपा गया कि वह किसी तरह रणजीतसिंह को राजी करे ताकि रणजीतसिंह होलकर को पकड़कर जनरल लेक के सुपुर्द कर दे। रणजीतसिंह प्रबल हिन्दू संस्कारों से जुड़ा हुआ राजा था। उसने अमीरखां से कहा कि वह इस काम में अमीरखां का साथ नहीं देगा।

    इस समय तक राजा रणजीतसिंह भी अपनी सैनिकों के बड़ी संख्या में मारे जाने तथा दुर्ग में रसद की कमी हो जाने से आशा-निराशा के झूले में झूलने लगा था फिर भी शरणागत वत्सलता को त्यागने के लिये तैयार नहीं था। जब उसने देखा कि होलकर के अपने सेनापति अमीरखां की नीयत बिगड़ी हुई है तो उसने मई 1805 में होलकर को बहुत सा दान, मान, सम्मान, धन तथा सेना देकर भरतपुर से होलकर के अपने राज्य के लिये रवाना कर दिया ताकि अमीरखां के षड़यंत्र से भरतपुर पर कलंक का टीका न लगे।

    यद्यपि अक्टूबर 1805 में जनरल लेक के चौथे आक्रमण में भरतपुर दुर्ग का पतन हो गया तथा भरतपुर को फिर से अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी जिसकी कुछ शर्तें अपमानजनक थीं किंतु तीन युद्धों में कम्पनी बहादुर को हिन्दुस्तानी तलवार का पानी पिलाने में सफल रहने के कारण भरतपुर दुर्ग अगले 20 वर्षों तक सम्पूर्ण भारत में विजय का प्रतीक बनकर खड़ा रहा।


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