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  • भारतीय राजाओं के किस्से यूरोपीय अखबारों में छा गये

     02.06.2020
    भारतीय राजाओं के किस्से यूरोपीय अखबारों में छा गये

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से यूरोपीय अखबारों में भारतीय नरेशों के रोचक किस्से छपने लगे थे। इन किस्सों में भारतीय राजाओं और रानियों के विविध शौक, उनकी सम्पत्तियां, उनकी प्रेम कहानियां तथा उनकी सनक के वाकये नमक मिर्च लगाकर बड़े चटखारों के साथ प्रस्तुत किये जाते थे। बीसवीं सदी के आरंभ तक यूरोप के अखबारों की हालत यह हो गयी थी कि यदि उनमें भारतीय राजाओं और रानियों के किस्से न हों तो वे बिकते ही नहीं थे।


    यूरोपवासियों को यह पढ़कर रोमांच का अनुभव होता था कि भारत के लोग अपने राजाओं, रानियों और राजकुमारों के पैर छूते हैं। राजाओं तथा रानियों के पास बेशुमार दौलत है। वे कीमती जेवर, मुकुट, हीरे-जवाहर, शानदार विशाल महलों, दुर्गों, स्वर्णजड़ित बग्घियों, भड़कीली पोशाकों, पालकियों, सोने चांदी के बरतनों तथा सजे हुए हाथियों के मालिक हैं। उनकी सैरगाहों तथा शिकारगाहों में आमोद प्रमोद तथा विलासिता के ऐसे-ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिन्हें देखकर पूरे यूरोप की संपदा फीकी पड़ जाये। राजाओं की रानियों तथा रखैलों की संख्या असंख्य है तथा उनके आस-पास रूप गर्व से दमदमाती वेश्याओं का मेला लगा रहता है। इन किस्सों को पढ़कर बहुत से यूरोप निवासी प्रतिवर्ष भारत की यात्रा करते थे।

    बहुत से यूरापीय पत्रकारों ने तो इन राजाओं को इतना अधिक रहस्यमय बना दिया कि गोरे लोग भारतीय राजाओं की एक झलक पाने को तरसते थे। ई.1902 में जब जयपुर नरेश माधोसिंह लंदन गया तो अपने साथ 680 किलो वजन की चांदी के दो विशाल लोटों में गंगाजल भरकर ले गया। जब वह अपने जहाज से लंदन के तट पर उतरा तो उसके जुलूस को देखने के लिये लगभग पूरा लंदन उमड़ पड़ा था। माधोसिंह ने भी पूरे ठाट-बाट से लंदन नगर में प्रवेश किया। उसने चांदी के विशाल लोटों को एक अलग गाड़ी में रखवाकर उनका सार्वजनिक प्रदर्शन करवाया। आज भी ये लोटे जयपुर के सिटी पैलेस में रखे हैं।

    लैरी कालिंस तथा दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है कि यदि औसत निकालें तो प्रत्येक भारतीय राजा के पास 11 पदवियां, 5.8 पत्नियां, 12.6 बच्चे, 9.2 हाथी, 2.8 निजी रेल डिब्बे, 3.4 रॉल्स राएस कारें थीं और प्रत्येक ने 22.9 शेरों का शिकार किया था। राजाओं की आय की कोई सीमा नहीं थी। दीवान जरमनीदास ने एक लेखक को उद्धृत करते हुए लिखा है- इंग्लैण्ड के बादशाह को कुल राजस्व में से प्रत्येक 16,000 में से एक अंश मिलता है, बेलजियम के बादशाह को 1,000 में से एक, इटली के बादशाह को 500 में से एक, डेन्मार्क के राजा को 300 में से एक और जापान के सम्राट को 400 में से एक। किसी राजा को 17 में से एक नहीं मिलता जिस प्रकार त्रावणकोर की महारानी को मिलता है। हैदराबाद के निजाम और बड़ौदा के महाराजा 13 में से एक, कश्मीर और बीकानेर के महाराजा 5 से एक अंश लेते हैं। सारा संसार यह जान कर निंदा करेगा कि बहुत से राजा लोग ऐसे हैं जो रियासत के राजस्व का एक तिहाई या आधा भाग अपने निजी खर्च में लगाते हैं।

    रुडयार्ड किपलिंग ने लिखा है कि ईश्वर ने महाराजाओं को खास इसलिये पैदा किया जिससे मानव जाति को दमदार धूम-धड़ाका देखने के अवसर मिले। राजा उग्र होते या नम्र, समृद्ध होते या गरीब, वीर होते या कायर........राजा नाम से ही लोगों को हाथी-घोड़ों की, हीरे जवाहरात की, सुंदरियों और शिकार की याद आ जाती। भारतीय राजाओं से जुड़ी दंतकथायें और परीकथायें तो दुनिया भर में कही और सुनी जाने लगी थीं। महाराजा भरतपुर का संग्रह सबसे विशिष्ट था। उनकी मास्टर पीस चीजें हाथीदांत की बनी हुई थीं। एक-एक चीज के पीछे किसी सम्पूर्ण परिवार का वर्षों का परिश्रम लगा हुआ था।

    पूरे यूरोप में यह बात विख्यात थी कि जयपुर महाराजा का जबर्दस्त खजाना राजस्थान की किसी पहाड़ी में दबा हुआ था जिसकी रक्षा पीढ़ियों से एक ही राजपूत लड़ाकू परिवार करता आ रहा था। हर महाराजा को जीवन में केवल एक बार वह खजाना दिखाया जाता ताकि वह ऐसे पत्थरों और जवाहिरात का चुनाव कर सके जिनके शकुन के जोर पर उसका राज्य दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता जाये। उस खजाने की एक अद्भुत चीज थी गले का वह हार, जिसमें मानिक की एक पर एक तीन झालरें सी लगी हुई थीं। उनमें तीन जबर्दस्त नीलम गुंथे हुए थे। झालरों का एक एक मानिक इतना बड़ा था जैसे कबूतर का अण्डा। सबसे बड़े मानिक का वजन 90 केरेट था।

    यूरोप भर में विख्यात था कि भारत की सर्वाधिक रोमांचक रॉल्स रॉयस गाड़ी महाराजा भरतपुर की है। चांदी से मढ़ी हुई उस गाड़ी की छत उठाई गिराई जा सकती है जिसमें से रहस्यमय कामोद्दीपक किरणें फूटती हैं। यह कार उंचे घरानों के लोगों को विवाह समारोह की शोभा बढ़ाने के लिये भी दी जाती थी। अगर किसी उंचे घराने को अपने वैवाहिक समारोह में उपयोग करने के लिये महाराजा की कार मिल जाती तो वह धन्य हो जाता था। शिकार का तामझाम लेकर चलने के लिये भरतपुर नरेश ने एक रॉल्स रॉयस अलग से मंगवाई। वह कार इतनी मजबूत, तेज रफ्तार और आरामदायक थी कि 1921 में जब प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आया तो भरतपुर नरेश, प्रिंस ऑफ वेल्स तथा लॉर्ड माउंटबेटन को उसमें बिठाकर शिकार पर निकला। माउंटबेटन ने अपनी डायरी में लिखा है - वह कार थी या तूफान? ऊबड़ खाबड़ मैदानों, पत्थरों और गड्ढों पर से वह ऐसे निकल जाती थी जैसे समुद्र में नौका।

    रॉल्स रॉयस श्रेणी से परे लंकास्टर कम्पनी की एक गाड़ी महाराजा अलवर के पास थी। वह खास महाराजा के ही दिये नक्शे पर तैयार की गयी थी और निःसंदेह भारत की सबसे महंगी गाड़ी थी। अंदर और बाहर दोनों तरफ वह सोने द्वारा मंढ़ी गयी थी। उसका कलात्मक स्टियरिंग व्हील हाथी दांत का था और शोफर के बैठने की गद्दी भी सोने की कसीदाकारी वाली थी। उसकी सीट हूबहू उस कोच जैसी बनाई गयी थी जिस पर इंगलैण्ड के राजा मुकुट धारण करने के बाद बैठा करते। उस भारी भरकम राक्षसी कार के यंत्र में ऐसी न जाने कौन सी खूबी थी कि सड़क पर वह 70 मील प्रति घण्टे की स्पीड से भाग सकती थी।

    यूरोप का बच्चा-बच्चा जानता था कि भरतपुर नरेश जब आठ साल के थे तब अपना पहला शेर मार चुके थे। पैंतीस साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने इतने शेर मारे कि उनके चमड़े सीं-सीं कर महल के सभी स्वागत कक्षों में बतौर कालीन के बिछा दिये गये। यह नैसर्गिक कालीन कमरों की दीवार से दीवार तक खिंचा हुआ था। भरतपुर राज्य में ही बत्तखों के शिकार का एक नया रिकार्ड कायम किया गया था। वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के सम्मान में मात्र तीन घण्टों में 4,482 बतखें गोली से उड़ा दी गयी थीं।

    अक्टूबर 1926 में कराची में दिये गये एक भाषण में श्रीनिवास शास्त्री ने कहा कि अधिकांश राजा अपने राज्यों में कदाचित ही रुकते हैं। उन्हें उस हर स्थान पर देखा जा सकता है जहाँ से वे अपनी प्रजा के धन से अपने लिये आनंद खरीद सकते हैं। आप लंदन चले जाइये, पेरिस चले जाइये या किसी भी फैशनेबल नगर में चले जाइये आपको कोई न कोई भारतीय राजा मिल जायेगा जो अपनी तड़क-भड़क से लोगों की आँखें चौंधिया रहा होगा या उन्हें बरबाद कर रहा होगा जो उसके निकट जाते हैं।

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