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  • किसी भी बदसूरत बुढ़िया को डाकन मान कर मारा जा सकता था

     19.05.2020
    किसी भी बदसूरत बुढ़िया को डाकन मान कर मारा जा सकता था

    उन्नीसवीं सदी में राजपूताने में समाधि लेने के प्रथा प्रचलित थी। समाधि लेने वाला व्यक्ति या तो गड्ढे में बैठकर मिट्टी के नीचे दब जाता था या फिर जल समाधि ले लेता था। अंग्रेज इसे मानव बलि के समान ही समझते थे। उन्होंने इस प्रथा पर रोक लगाने के लिये प्रयास आरंभ किये।

    हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टेन रिचार्ड ने 28 अप्रेल 1840 को एक परिपत्र द्वारा कोटा, बूंदी एवं झालावाड़ के शासकों को समाधि जैसी अमानवीय प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की इच्छा प्रकट की। जॉन लुडलो जुलाई 1844 में जयपुर में इसे प्रतिबंधित करवाने में सफल रहा। इसी प्रकार कैप्टेन मैलकम ने 1847 में जोधपुर राज्य में समाधि पर प्रतिबंध लगवाने में सफलता प्राप्त की।

    ई.1861 में यह कानून बनाया गया कि उस व्यक्ति को दण्डित किया जायेगा जिसकी भूमि पर कोई व्यक्ति समाधि लेता है। समाधि के लिये भी उसी सजा का प्रावधान किया गया जो सती प्रथा को प्रोत्साहित करने के अपराध के बदले दी जाती थी। धीरे-धीरे इस प्रथा पर सम्पूर्ण राजस्थान में ही रोक लगा दी गयी।

    राजपूताने में पति के मर जाने पर स्त्रियों के सती हो जाने की प्रथा प्रचलित थी। राजपूतों तथा ब्राह्मणों में ऐसे प्रकरण अधिक होते थे। महाजनों, विशेषकर अग्रवालों में भी ऐसी प्रथा अल्प मात्रा में प्रचलित थी। अन्य जातियों में इसका प्रचलन नहीं था।

    23 जुलाई 1724 को मारवाड़ नरेश अजीतसिंह की हत्या हुई थी। उसके साथ 6 रानियां, 20 दासियां, 9 उड़दा बेगणियां, 20 गायनें तथा 2 हजूरी बेगमें सती हुईं। गंगा नाम की पड़दायत (उपपत्नी) भी राजा के साथ जलाई गई। अजीतसिंह के साथ उसकी भी हत्या हुई थी। कई बन्दर और मोर भी अपनी इच्छा से चिता में गिर-गिर कर जल गये जो राजा से विशेष स्नेह रखते थे।

    ब्रिटिश संरक्षण में चले जाने पर इस प्रथा में शनैः-शनैः कमी आयी। ई.1818 के बाद से जयपुर राज्य परिवार में सती होने की एक भी घटना नहीं हुई। 1828 के बाद से बीकानेर राज्य परिवार में ऐसी एक भी घटना नहीं हुई। ई.1838 में मेवाड़ के महाराणा जवानसिंह की मृत्यु होने पर उनके साथ आठ रानियां सती हुईं। इसके तुरंत बाद बांसवाड़ा के महारावल के शव के साथ छः रानियां सती हुईं। ई.1843 में मारवाड़ के महाराजा मानसिंह के शव के साथ एक रानी तथा चार पड़दायतें सती हुईं। मारवाड़ का पोलिटिकल एजेण्ट कैप्टन लुडलो भी शमशान भूमि में उपस्थित था। इस दृश्य ने लुडलो को विचलित कर दिया। उसने सती प्रथा को बंद करने का निर्णय लिया।

    ई.1844 से 1848 तक लुडलो जयपुर का पोलिटिकल एजेण्ट रहा। उसके प्रयासों से 26 अप्रेल 1846 को जयपुर संरक्षक परिषद ने जयपुर राज्य में सती प्रथा को दण्डनीय अपराध घोषित किया। 1856 के अंत तक मेवाड़ को छोड़कर राजस्थान के सभी राज्यों में इस बुराई को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया। मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह ने 1860 में मेवाड़ में सती प्रथा की घोषणा कर दी।

    राजपूताने में उन दिनों डाकिनियों का भय व्याप्त था। लोगों का विश्वास था कि डाकिनियां बच्चों को खा जाती हैं। वे कमजोर स्त्रियों को बीमारी लगा देती हैं तथा छोटे बच्चों के शव शमशान से निकाल कर खाती हैं। इस भय के चलते किसी भी बदसूरत बूढ़ी स्त्री को डाकन मान लिया जाता था। उसे पत्थरों से पीट-पीटकर अथवा जीवित ही जलाकर कर उसकी हत्या की जा सकती थी। जिस स्त्री को समाज के द्वारा डाकिनी अथवा डाकन घोषित कर दिया जाता था, उस स्त्री की हत्या करने वाले को हत्या का दोषी नहीं माना जाता था।

    अक्टूबर 1853 तक ए.जी.जी. के निर्देश पर महाराणा मेवाड़ को छोड़कर सभी शासकों ने डाकन प्रथा को गैरकानूनी घोषित करके असहाय की सहायता के लिये प्रेरित किया। मगरापाल के आदिवासी प्रतिनिधियों ने रिखबदेव में राजपूताना के ए.जी.जी. वाल्टर से स्वयं डाकन प्रथा पर रोक लगाने की सहमति व्यक्त की तथा भविष्य में इस अपराध में संलिप्त अपराधियों को स्वयं पकड़कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का वचन दिया।

    इस काल में राजपूताने के विभिन्न राज्यों में वेश्यावृत्ति बड़े स्तर पर होती थी। यह इतनी लोकप्रिय थी कि अंग्रेज अधिकारी चाह कर भी इस प्रथा को नहीं रोक सके। नृत्य एवं संगीत में प्रवीण वेश्याओं को राजकीय संरक्षण प्राप्त होता था। मंदिरों में नृत्य एवं गायन करने वाली वेश्याओं को राज्य की ओर से धनराशि दी जाती थी।

    राजपूताना के ए.जी.जी. वाल्टर द्वारा ई.1888 में राजपुत्र हितकारिणी सभा नामक संगठन के माध्यम से राजपूतों एवं चारणों में समाज सुधार का प्रयास किया गया। देशी राजाओं और उनके उत्तराधिकारियों को अंग्रेजी शिक्षा देने के लिये लॉर्ड मेयो ने राजस्थान के केंद्र अजमेर में मेयो कॉलेज स्थापित किया। अंग्रेज चाहते थे कि देशी राजाओं के अल्पवयस्क पुत्रों को अधिक विलासी तथा अंग्रेज परस्त बना दिया जाये।

    जैसलमेर में माहेश्वरी जाति में लाणी प्रथा प्रचलित थी। इस प्रथा के अनुसार लोग पीतल के बर्तन में शर्करा अथवा मिश्री भरकर अपने समाज में वितरित किया करते थे। शर्करा वितरित करने वाला व्यक्ति प्रतिष्ठित माना जाता था। इस प्रथा को निरुत्साहित करने के लिये राज्य सरकार ने इस पर कर लगाया। महेश्वरी लोग न तो लाणी छोड़ने को तैयार थे और न कर देने को। ई.1895 में रणछोड़दास माहेश्वरी ने राज्य को कर चुकाये बिना लाणी का वितरण कर दिया। इस पर राजकीय अदालत ने उस पर अर्थदण्ड लगाया। इसी बीच कर चुकाये बिना ही रणछोड़ मर गया। इस पर सरकार ने उसकी विधवा को तंग किया जिससे माहेश्वरी समाज ने राज्य के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। अंत में ब्रिटिश सरकार ने हस्तक्षेप किया तथा लाणी प्रथा को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया।

    ई.1818 से 1858 तक के ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल में राजपूताने में आर्यसमाज सक्रिय रहा। जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह ने जोधपुर राज्य में आर्यसमाज को बढ़ावा देने के प्रयास किये। सर प्रताप ने आर्यसमाज के सहयोग से उन मुसलमानों को फिर से हिन्दू धर्म में लाने का प्रयास किया जो बलपूर्वक मुसलमान बना लिये गये थे किंतु कुछ पोंगा पंथी हिन्दुओं ने सर प्रताप का जमकर विरोध किया जिससे यह कार्य बीच में ही छोड़ दिया गया।

    उस काल में बहुत से लोग दहेज न देकर वधु-मूल्य लेने लगे थे। पालीवाल ब्राह्मणों और पोरवाल महाजनों में यह प्रवृत्ति बढ़ने लगी थी। मन वांछित वधु-मूल्य न मिलने के कारण बहुत से लोग अपने लड़कों की सगाई तोड़ देते थे। अंग्रेज अधिकारी ऐसे मामलों में चाहकर भी कुछ नहीं कर सके। आगे चलकर यह प्रवृत्ति इतनी बढ़ गयी कि ई.1890 से 1900 के बीच जोधपुर राज्य की दीवानी अदालतों में सगाई टूटने के 209 मुकदमे दर्ज हुए।

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