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  • देखते ही बनता था दो रेगिस्तानी रियासतों के राजाओं का वह मिलन

     11.07.2017
    देखते ही बनता था दो रेगिस्तानी रियासतों के  राजाओं का वह मिलन

    सूरतसिंह की मृत्यु के बाद रत्नसिंह बीकानेर का राजा हुआ। वह बीकानेर का 18वां राठौड़ राजा था। उसने 5 अप्रेल 1828 से 7 अगस्त 1851 तक बीकानेर रियासत पर शासन किया। उसके राजा बनते ही बीकानेर रियासत और जैसलमेर रियासत के मध्य झगड़ा हो गया। हुआ यूं कि जैसलमेर राज्य के राजगढ़ के भाटी बीकानेर राज्य के सरकारी सांडों का टोला पकड़ कर ले गये। मारवाड़ में मादा ऊँट को सांड कहा जाता है। शाह मानिकचंद ने उनका पीछा किया तथा राजगढ़ के हाकिम से प्रार्थना की कि वह सांडों को लौटा दे किंतु हाकिम ने उसकी सुनवाई नहीं की।

    इस पर बीकानेर राज्य से महाजन के ठाकुर वैरिशालसिंह, मेहता अभयसिंह तथा सुराणा हुकुमचंद की अध्यक्षता में 3 हजार सैनिकों ने जैसलमेर राज्य पर आक्रमण कर दिया। जैसलमेर की सेना ने वासणपी गाँव के पास बीकानेर की सेना का मार्ग रोका तथा उसमें कसकर मार लगायी। जैसलमेर की सेना ने बीकानेर की सेना का नगाड़ा छीनना चाहा किंतु एक वीर सिक्ख ने अपने प्रणा देकर नगाड़े की रक्षा की। उन दिनों युद्ध के दौरान नगाड़े तथा ध्वज का छिन जाना किसी भी राज्य एवं उसके राजा के लिये अत्यंत अपमान जनक माना जाता था।

    बीकानेर राज्य द्वारा जैसलमेर राज्य पर आक्रमण करना ईस्ट इण्डिया कम्पनी से हुई संधि की धारा 5 का उल्लंघन माना गया। इसलिये ब्रिटिश सरकार ने इस प्रकरण में हस्तक्षेप किया तथा उदयपुर के महाराणा जवानसिंह से प्रार्थना की कि वह इन दोनों राज्यों में मेल करवाये। महाराणा ने अपने विश्वासपात्र सेठ जोरावरमल को यह काम सौंपा। जोरावरमल ने परस्पर हर्जाना दिलवाने की शर्त पर दोनों पक्षों में सुलह करवा दी। इसके बाद 10 मई 1835 को बीकानेर एवं जैसलमेर राज्यों की सीमा पर अंग्रेज अधिकारियों की उपस्थिति में दोनों राजाओं के मिलना का कार्यक्रम निश्चित किया गया। लेफ्टीनेंट बोइलो ने अपनी डायरी में दोनों राजाओं के मिलने की घटना को विस्तार से अंकित किया है। बोइलो लिखता है-

    उस दिन मैं भी घड़ियाला पहुँच गया किंतु वहाँ जाकर ज्ञात हुआ कि अभी बीकानेर महाराजा के आने में एक दिन का विलम्ब है। इस पर मैं जैसलमेर राज्य के गिरिजासर गाँव में चला गया। घड़ियाला बीकानेर की सुदूर पश्चिमी सीमा पर बसा हुआ एक गाँव है जिसमें 130 घरों की बस्ती और एक छोटा सा दुर्ग है। जैसलमेर महारावल के ठहरने के लिये गिरजासर गाँव चुना गया था वह घड़ियाला से बड़ा है तथा वहाँ 300 से अधिक घर और एक दुर्ग है। वहाँ पहुंचने पर मैं लेफ्टीनेंट ट्राविलियन से मिला जो महाराजा को 10 मई को वहाँ लाने में सफल हुआ था। उसी दिन दोनों राजाओं को मिलना था किंतु दोनों राजाओं के थके हुए होने के कारण यह कार्य 12 मई के लिये निश्चत किया गया।

    11 मई को दोनों राज्यों की सीमा पर एक बड़ा सा शामियाना लगाकर दौलतखाना बनाया गया। सौ फुट लम्बी तथा 24 फुट चौड़ी जगह में दोनों ओर बराबर-बराबर भूमि में खेमे खड़े किये गये। भेंट के लिये नियत स्थान के दक्षिणी भाग में लेफ्टीनेंट ट्राविलियन का खेमा था। शामियाने में एक सिंहासन इस प्रकार रखा गया था कि उसका आधा-आधा भाग दोनों राज्यों की सीमा में पड़ता था। अन्य प्रबंध भी इसी भांति निष्पक्षता के साथ किये गये थे। दोनों राजाओं के लिये ऐसा प्रबंध किया गया था कि दौलतखाने में उनका आगमन एक ही समय में हो। दो विभिन्न द्वारों से खेमे में राजाओं का आना निश्चित हुआ था। अतः उनकी पेशवाई के लिये पैदल सेना को दो भागों में विभक्त करके दोनों ओर के दरवाजों पर खड़ा किया गया। दोनों सीमाओं पर खेमे के सामने एक पंक्ति में घुड़सवार खड़े किये गये। उनके पीछें तोपें इस प्रकार रखी गयीं जिससे एक-एक तोप सीमा के दोनों तरफ पड़ती थी। फिर एक तोप दागी गयी।

    12 मई को नियत समय पर एक तोप दागी गयी जिसे सुनकर घड़ियाला से बीकानेर महाराजा एवं गिरिजासर जैसलमेर महारावल अपने-अपने डेरे से रवाना हुए। बीकानेर महाराजा को डेढ़ मील की दूरी तय करनी थी तथा जैसलमेर महारावल को दो मील की। इसलिये बीकानेर महाराजा पहले ही सीमा पर पहुँच गया। जब दोनों राजा सीमा पर पहुँच गये तो दोनों ओर की तोपों से 17-17 तोपों की सलामियां सर की गयीं। इसके बाद वे अपनी अपनी खासों (ढंगकी हुई पालकियों) से नीचे उतरे। यह पूर्व में ही निश्चित कर लिया गया था कि दोनों ओर के महाराजा अपने साथ कम आदमी लायें किंतु मिलन स्थल पर लगभग तीन हजार आदमी एकत्र हो गये थे। सजे हुए हाथी, घोड़े, नक्कारे, निशान आदि से पूरा क्षेत्र गरिमामय हो गया था।

    सामान्यतः जब भी कोई राजा किसी स्थान पर पहुँचता था तो अंग्रेज अधिकारी उनकी पेशवाई करते थे किंतु इस समय पर अंग्रेज अधिकारियों ने उनकी पेशवाई नहीं की। खेमे के निकट पहुँचने पर दोनों ओर के सैनिकों ने अपने-अपने राजाओं का स्वागत किया। दोनों राजाओं के साथ-साथ प्रमुख ठाकुर तथा महाजन आये थे। अपने जीवन में पहली बार दोनों राजा एक ही तम्बू के नीचे एकत्रित हुए। लेफ्टीनेंट ट्राविलियन खेमे के बीच में दोनों राज्यों की सीमा के मध्य में खड़ा हुआ था। जब दोनों राजा खेमे के मध्य में पहुँचे तो लेफ्टीनेंट ट्राविलियन ने दोनों की तरफ अपना एक-एक हाथ बढ़ाया और उनका मिलाप करवा दिया। फिर दोनों राजाओं ने एक दूसरे से जुहार किया। जब दोनों राजा गले लगे तो दोनों ओर के खेमों से 'मुबारक-मुबारक’की ध्वनि आने लगी। दोनों राजा सिंहासन पर बैठे। इस बीच उनके दरबारी भी अंदर आ गये। वे लोग भड़कीली पोशाक और कीमती आभूषण पहने हुए थे। राजाओं ने केवल श्वेत रंग के जामे और मोतियों तथा पन्नों के कंठे पहने थे। दोनों राजाओं की कमर में खंजर लगे हुए थे।

    लेफ्टीनेंट ट्राविलियन महाराजा के दाहिनी तरफ तथा लेफ्टीनेंट बोइलो महारावल के बायीं तरफ नीचे गलीचे पर बैठे। राजाओं के मंत्री तथा सरदार उनके चारों ओर घेरा बनाकर बैठ गये। दरवाजों के सामने के गलीचे पर अन्य सम्मानित सरदार थे और निम्न श्रेणी के सरदार बाहर तक खड़े हुए थे। मेवाड़ का साहूकार जोरावरमल जो कि दोनों ही राजाओं का मित्र था, इस समय जैसलमेर की पंक्ति में बैठा। दोनों राजाओं ने एक दूसरे को अपने सरदारों का परिचय दिया। दोनों ही राजाओं ने अंग्रेज अधिकारियों की प्रशंसा की। इसके बाद इत्र एवं पान की रस्म हुई। लेफ्टीनेंट ट्राविलियन ने अपने दोनों हाथों से दोनों महाराजाओं को एक साथ इत्र लगाया जिससे जैसलमेर के महारावल को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसे भय था कि चूंकि लेफ्टीनेंट ट्राविलियन बीकानेर महाराजा के पास बैठा था अतः वह पहले उसे ही इत्र लगायेगा तथा जिसे पहले इत्र लगाया जायेगा वही राजा शक्तिशाली माना जायेगा।

    दोनों राजा अंग्रेज अधिकारियों एवं एक दूसरे को धन्यवाद देकर सिंहासन से उठ खड़े हुए तथा एक दूसरे को जुहार करके जिस तरह खेमे में आये थे उसी तरह खेमे से बाहर चले गये। इस अवसर पर सलामी की तोपें नहीं दागी गयीं किंतु दोनों शासकों के अपने-अपने खेमे में पहुँचने पर उनकी तरफ के लोगों ने सलामियां सर कीं। इस प्रकार मेल हो जाने पर दोनों राजाओं को बाद में भेंट करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। 16 मई को दोनों राजा एक दूसरे के खेमे में गये। दोनों ने एक दूसरे को बहुत से हाथी घोड़े तथा रत्न आदि के उपहार दिये। लेफ्टीनेंट ट्राविलियन ने दोनों तरफ के तीन-तीन आदमियों की समिति बनाकर समझौते की शर्तें निश्चित कर दीं तथा लिखित समझौता सम्पन्न हो गया। इसके बाद दोनों राजा अपनी-अपनी राजधानी को लौट गये।

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