Blogs Home / Blogs / मध्यकालीन भारत का इतिहास / 22 लड़ाईयां जीती थीं अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र ने
  • 22 लड़ाईयां जीती थीं अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र ने

     07.07.2019
    22 लड़ाईयां जीती थीं अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र ने

    22 लड़ाईयां जीती थीं अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र ने 


    ई. 1193 में तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर दिल्ली पर अधिकार किया तथा भारतवर्ष की अपार सम्पत्ति को हड़प लिया जिससे देश की जनता निर्धन हो गयी। मुहम्मद गौरी के गुलामों और सैनिकों ने भारत में भय और आतंक का वातावरण बना दिया। हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये। स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया। मंदिर एवं पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदों में परिवर्तित कर दी गयीं। दिल्ली का विष्णुमंदिर जामा मस्जिद में बदल दिया गया। धार, वाराणसी उज्जैन, मथुरा, अजमेर एवं जालौर की संस्कृत पाठशालायें ध्वस्त करके मस्जिदें खड़ी कर दी गयीं। अयोध्या, नगरकोट और हरिद्वार आदि तीर्थ जला कर राख कर दिये गये। हिन्दू धर्म का ऐसा पराभव देखकर जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल, श्रीलंका तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये। पूरे देश में हाहाकार मच गया। बौद्ध धर्म तो हूणों के हाथों पहले ही पराभव को प्राप्त हो चुका था। इस घटना के बाद पूरे तीन सौ पैंसठ वर्ष तक दिल्ली मुस्लिम शासकों के अधिकार मंें रही। लोग भूल गये कि दिल्ली पर कभी हिन्दू शासकों का भी शासन था। यह बात अलग थी कि दिल्ली को अभी अंतिम हिन्दू शासक देखना शेष था।

    दिल्ली के इस अंतिम हिन्दू सम्राट ने सोलहवीं शती के आरंभ में रेवाड़ी के एक धूसर बनिये के घर मंे जन्म लिया। उसका नाम हेमचंद्र था किंतु वह इतिहास में वह हेमू के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आरंभ में वह भी अपने बाप दादा की तरह रेवाड़ी की सड़कों पर नमक बेचता था किंतु कुछ समय पश्चात बाजार में तोल करने वाले कर्मचारी के पद पर नियुक्त हो गया। एक दिन शेरशाह सूरी के दूसरे नम्बर के पुत्र जलालखाँ की दृष्टि उस पर पड़ी। वह हेमू के वाक् चातुर्य से बड़ा प्रभावित हुआ और उसने हेमू को अपना गुप्तचर बना लिया।

    जब जलालखाँ इस्लामशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसने हेमू को महत्वपूर्ण पद प्रदान किये। हेमू में सामान्य प्रशासन और सामरिक प्रबंधन की उच्च क्षमतायें थीं। एक दिन वह प्रधानमंत्री बन गया। जब इस्लामशाह 8 साल शासन करके मर गया तो इस्लामशाह का 12 वर्षीय पुत्र फीरोजशाह दिल्ली का शासक हुआ। फीरोजशाह के मामा मुबारिजखाँ ने फीरोजशाह की हत्या कर दी और खुद आदिलशाह के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। आदिलशाह विलासी प्रवृत्ति का था और शासन के नीरस काम करना उसके वश की बात नहीं थी। उसे एक ऐसे विश्वसनीय और योग्य आदमी की तलाश थी जो उसके लिये दिल्ली से लेकर बंगाल तक फैले विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रख सके। उसने हेमू को बुलाकर पूछा कि वह किसके प्रति वफादार है? अपने पुराने स्वामियों इस्लामशाह और फीरोज शाह के प्रति या फिर आदिलशाह के प्रति?

    हेमू ने कहा कि जब तक पुराने स्वामी जीवित थे, तब तक वफादारी उनके साथ थी और यदि वे आज भी जीवित होते तो उनके प्रति ही वफादार रहता किंतु अब चूंकि वे दुनिया में नहीं रहे इसलिये आपके अधीन काम करने को तैयार हूँ। आदिलशाह ने हेमू को अपना प्रधानमंत्री बनाया। कुछ दिनों बाद सेना का भार भी उस पर छोड़ दिया। हेमू उच्च कोटि का सेनानायक सिद्ध हुआ। उसने आदिलशाह के लिये चौबीस लड़ाईयाँ लड़ीं जिनमें से बाईस जीतीं। हेमू न केवल वीर, साहसी, उद्यमी और बुद्धिमान व्यक्ति था अपितु भाग्यलक्ष्मी उसके सामने हाथ बांधे खड़ी रहती थी। उसने ऐसा तोपखाना खड़ा किया जिसकी बराबरी उस समय पूरी धरती पर किसी और बादशाह अथवा राजा का तोपखाना नहीं कर सकता था। उसके पास हाथियों की 3 फौजें थीं जिनका उपयोग वह तीस हजार सैनिकों के साथ करता था। हेमू के पास जितने हाथी थे उतने उस समय दुनिया में और किसी के पास नहीं थे।

    यह भाग्य की ही बात थी कि आदिलशाह जैसे धूर्त और मक्कार हत्यारे को हेमू जैसे उच्च सेनानायक की सेवायें प्राप्त हुई। शीघ्र ही हेमू की धाक शत्रुओं पर जम गयी। ई. 1930 में जब मुगल बादशाह हुमायूँ शेरशाह सूरी से परास्त होने के बाद भारत छोड़कर ईरान भागा था तब उसने हेमू का नाम तक नहीं सुना था किंतु जब 10 साल बाद उसने पुनः दिल्ली की ओर मुँह किया तो समूचा उत्तरी भारत हेमू के नाम से गुंजायमान था। उसके द्वारा जीती गयीं बाईस लड़ाईयों के किस्से सुन-सुन कर हुमायूँ और उसके तमाम सिपहसालार हेमू के नाम से कांपते थे। भाग्य से हुमायूं को हेमू का सामना नहीं करना पड़ा। एक बार एक चित्रकार ने ऐसा चित्र बनाया जिसमें एक आदमी के सारे अंग अलग-अलग दिखाये गये थे। जब अकबर ने उस चित्र को देखा तो भरे दरबार में कहा कि काश यह चित्र हेमू का होता! अकबर की बात सुनकर हुमायूँ के अमीरों के मुँह सूख गये। वे जानते थे कि एक न एक दिन उन्हें हेमू की तलवार का सामना करना ही है।

    ई. 1540 में हुमायूँ की मृत्यु हो गयी और बैरामखाँ अकबर को बादशाह घोषित कर दिल्ली की ओर चल पड़ा। यह समाचार पाकर हेमू भी अपनी सेना लेकर ग्वालिअर से आगरा पर चढ़ दौड़ा। आगरा का सूबेदार इस्कन्दरखा उजबेग हेमू का नाम सुनकर बिना लड़े ही आगरा छोड़कर दिल्ली की ओर भाग गया। उसकी सेना में इतनी भगदड़ मची कि तीन हजार मुगल सिपाही आपस में ही कुचल कर मर गये। हेमू ने आगरा पर अधिकार कर लिया और शाही सम्पत्ति लूट ली। आगरा हाथ में आते ही हेमू दिल्ली की ओर बढ़ा। दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेगखाँ अपनी सेना लेकर कुतुबमीनार से आठ किलोमीटर दूर पूर्व में तुगलकाबाद चला गया। हेमू ने उसमें जबरदस्त मार लगायी। तार्दीबेगखाँ और इस्कन्दरखा उजबेग परास्त होकर सरहिन्द की ओर भागे। संभल का शासक अलीकुलीखाँ हेमू का नाम सुनकर भगोड़ों के साथ हो लिया।

    हेमू ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसका धूर्त स्वामी आदिलशाह अपनी बेशुमार औरतों के साथ चुनार के दुर्ग में रंगरलियां मनाता रहा। हेमू को उसके पतित चरित्र से घृणा हो गयी थी जिससे हेमू ने अपने आप को मन ही मन स्वतंत्र कर लिया था। आगरा और दिल्ली अधिकार में आ जाने के बाद हेमू ने आदिलशाह को कोई सूचना नहीं भेजी और भारत भूमि को म्लेच्छों से मुक्त करवा कर हिन्दू पद पादशाही की स्थापना के स्वप्न संजोने लगा।

    दिल्ली हाथ में आ जाने के बाद हेमू ग्वालियर से लेकर सतलज नदी तक के सम्पूर्ण क्षेत्र का स्वामी हो गया। अपनी विशाल गजसेना के साथ उसने दिल्ली में प्रवेश किया। उसने दिल्ली के दुर्ग को गंगाजल से धुलवाकर पवित्र किया और एक दिन शुभ मूहूर्त निकलवाकर विक्रमादित्य हेमचंद्र के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर विधिवत् आरूढ़ हुआ। सदियों से बेरहम तुर्कों के क्रूर शासन के अधीन अपने दुर्भाग्य पर आठ-आठ आँसू बहाती हुई हिन्दू जनता को महाराज विक्रमादित्य हेमचन्द्र के सिंहासनारूढ़ होने पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कभी ऐसा दिन भी आयेगा जब दिल्ली पर पुनः हिन्दू राजा का शासन होगा। घर-घर शंख, घड़ियाल और नगाड़े बजने लगे। हजारों की संख्या में हिन्दू जनता दूर-दूर से चलकर दिल्ली पहुँचने लगी। दिल्ली की गलियां, चौक, यमुनाजी का तट और समस्त जन स्थल इन नागरिकों से परिपूर्ण हो गये। महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र की जय-जय कार से पूरी दिल्ली गूंजने लगी।

    सुहागिन स्त्रियों के झुण्ड के झुण्ड मंगल गीत गाते हुए मंदिरों की तरफ जाते हुए दिखाई देने लगे। सैंकड़ों साल से सुनसान पड़े मंदिरों में फिर से दीपक जलने लगे और आरतियाँ होने लगीं। मंदिरों के शिखरों पर केसरिया ध्वजायें लहराने लगीं। घर-घर वेदपाठ होने लगे तथा द्वार-द्वार पर गौ माता की पूजा आरंभ हो गयी। चावल के आटे से चौक पूरे गये और केले के पत्तों से तोरण सजाये गये। घरों के आंगन यज्ञों की वेदी से उठने वाले सुवासित धूम्र से आप्लावित हो गये। जब से महाराज हेमचंद्र दिल्ली के राजा हुए, यमुना का तट देश भर के तीर्थ-यात्रियों से पट गया। दूर-दूर से आने वाले हजारों श्रद्धालु रात्रि में इकट्ठे होकर यमुनाजी की आरती उतारते। महाराजा हेमचंद्र भी नित्य ही हाथी पर सवार होकर यमुनाजी के दर्शनों के लिये जाते। सैंकड़ों वेदपाठी ब्राह्मण कंधे पर जनेऊ और गले में पीताम्बर डाले हुए महाराजा के पीछे-पीछे चलते। महाराजा हेमचंद्र अकाल के इस कठिन समय में भी याचकों, ब्राह्मणों और बटुकों को अपने हाथों से भोजन करवाते और उन्हें धन-धान्य तथा वस्त्र प्रदान करते।

    वस्तुतः हिन्दू जनता का यह उत्साह पूरे तीन सौ पैंसठ साल बाद प्रकट हुआ था। अब जब महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के अधीश्वर हुए तो देशवासियों का उत्साह विशाल झरने की भांति फूट पड़ा। महाराज हेमचंद्र के अफगान व तुर्क सैनिक हिन्दू जनता के इस उत्साह को आश्चर्य और कौतूहल से देखते थे। ऐसा नहीं था कि जन-सामान्य देश में चारों तरफ रक्तपात और लूटमार करती हुई सिकंदर सूर, इब्राहिमखाँ, इस्लामशाह, आदिलशाह और बैरामखाँ की सेनाओं को भूल गया था। जनता पूरी तरह आशंकित और भयभीत थी कि कहीं महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र चार दिन की चांदनी सिद्ध न हों! वस्तुतः यह भय और आशंका ही जन सामान्य के बड़ी संख्या में उमड़ पड़ने का कारण था। जनता चाहती थी कि जब तक महाराजा विक्रमादित्य हेमचंद्र दिल्ली के तख्त पर हैं तब तक ही सही कुछ धर्म-कर्म और पुण्य लाभ अर्जित कर लिया जाये।

    उन दिनों उत्तरी भारत के समस्त बादशाह और सेनापति हेमू के नाम से थर्राते थे। इब्राहीम सूर के सैनिकों को यदि स्वप्न में भी हेमू के सिपाही दिख जाते तो वे शैय्या त्याग कर खड़े हो जाते। बंगाल का शासक मुहम्मदशाह तो उस दिशा में पैर करके भी नहीं सोता था जिस दिशा में हेमू की सेना के स्थित होने के समाचार होते थे। आगरा का सूबेदार इस्कन्दरखा उजबेग, दिल्ली का सूबेदार तार्दीबेगखाँ और संभल का सूबेदार अलीकुलीखाँ हेमू की सेना का नाम सुनकर ही भाग छूटे थे। उस समय समूचे उत्तरी भारत में केवल बैरामखाँ अकेला ही सेनापति था जो हेमू से दो-दो हाथ करने की तमन्ना दिल में लिये घूमता था। वह जानता था कि एक न एक दिन बैरामखाँ और हेमू एक दूसरे के सामने होंगे। वह अवसर शीघ्र ही आ उपस्थित हुआ।

    जब आगरा और दिल्ली के पतन के समाचार मिले तो अकबर के अमीरों ने अकबर को सलाह दी कि हिन्दुस्थान की ओर से ध्यान हटाकर अपनी सारी ताकत काबुल पर केंद्रित कर लेनी चाहिये क्योंकि इस समय मुगल सेना में केवल बीस हजार सैनिक हैं और हेमू एक लाख सैनिकों की ताकत का स्वामी है। उसके पास इस समय धरती भर की सबसे बड़ी हस्ति सेना है और धरती भर का सबसे बड़ा तोपखाना है। अकबर अपने अमीरों की सलाह से सहमत हो गया और उसने आदेश दिया कि सेना को दिल्ली की ओर बढ़ाने के बजाय काबुल की ओर कूच किया जाये।

    बैरामखाँ ने अकबर को समझाया कि भले ही हमारे पास बीस हजार सैनिक हैं और शत्रु के पास एक लाख सैनिक हैं किंतु बाबर और हुमायूँ भी तो इन्हीं परिस्थितियों में लड़ते और जीतते आये थे। भले ही हेमू के पास एक लाख सैनिक और तीस हजार हाथी हैं किंतु हेमू की असली ताकत उसके तोपखाने 
    में बसती है। यदि किसी तरह उससे तोपखाना छीन लिया जाये तो उसे आसानी से परास्त किया जा सकता है। इस पर अकबर काबुल लौट चलने के बजाय दिल्ली की ओर बढ़ने के लिये राजी हो गया। अकबर की सहमति पाकर बैरामखाँ दिल्ली की ओर बढ़ा।

    जब महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने देखा कि बैरामखाँ मुगल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहा है तो उन्होंने दिल्ली से बाहर जाकर पानीपत के मैदान में बैरामखाँ से दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया। महाराजा ने धन के लालची अफगान अमीरों को विपुल धन राशि देकर अपने वश में किया और पूरे उत्तरी भारत में दुहाई फिरवाई कि वह मुगलों को भारतवर्ष से बाहर खदेड़ने के लिये पानीपत जा रहा है। जिन राजाओं और सेनापतियों को अपनी जन्मभूमि से प्रेम हो, वे भी पानीपत पहुँचें। महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र का संदेश पाकर तीस हजार राजपूत सैनिक पानीपत के मैदान में आ जुटे। अब दिल्ली की सेना केवल अफगान सैनिकों के भरोसे नहीं रह गयी। महाराज विक्रमादित्य हेमचंद्र ने अपने विश्वस्त सलाहकारों से कहा कि यदि इस सयम महाराणा सांगा जीवित होते तो भारतवर्ष को म्लेच्छों से मुक्त करवा लेना कोई बड़ी बात नहीं होती।

    हेमचंद्र को अपने तोपखाने और हस्ति सेना पर बहुत भरोसा था किंतु ये तभी कारगर थे जब वे समय से पूर्व रणक्षेत्र में पहुँचकर उचित जगह पर तैनात कर दिये जायें। इनकी गति घुड़सवारों की तरह त्वरित नहीं थी। इसलिये हेमचन्द्र ने अपना तोपखाना पानीपत के लिये रवाना कर दिया और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाते हुए पानीपत की ओर बढ़े।

    अकबर के सेनापति अलीकुलीखाँ को सूचना लगी कि हेमचन्द्र ने अपना तोपखाना तो पानीपत की ओर भेज दिया है और स्वयं अपने हाथियों को मक्खन खिलाता हुआ मस्ती से आ रहा है। बैरामखाँं ने अलीकुलीखाँ को इसी काम पर तैनात कर रखा था कि किसी भी तरह मौका लगते ही तोपखाने को नष्ट कर दे। अलीकुलीखाँ ने अपनी सेना को दिल्ली की सेना के मार्ग में ला अड़ाया। दिल्ली के मुट्ठी भर सैनिक इस आकस्मिक युद्ध के लिये तैयार नहीं थे। बात की बात में अलीकुलीखाँ ने दिल्ली की सेना से तोपखाना छीन लिया।

    तोपखाना छीने जाने के दो सप्ताह बाद इधर से महाराज हेमचंद्र की सेना और उधर से बैरामखाँ की सेना पानीपत के मैदान में आमने सामने हुई। बैरामखाँ ने अलीकुलीखाँ, सिकन्दरखाँ उजबेग और अब्दुल्ला उजबेग को मोर्चे पर भेजा और स्वयं अकबर को लेकर पानीपत से पाँच मील पीछे ही रुक गया। तोपखाना छिन जाने के बाद महाराज हेमचंद्र ने अपना पूरा ध्यान हस्ति सैन्य पर केंद्रित किया। उन्होंने हाथियों को जिरहबख्तर पहनाये और उनकी पीठों पर बंदूकची बैठाये। सेना के दाहिनी ओर शादीखाँ कक्कड़ और बांयी ओर अपने भांजे रमैया को नियुक्त करके महाराज हेमचंद्र सेना के मध्य भाग में आ डटे। अपने हाथी पर खड़े होकर महाराज हेमचंद्र ने पहले अपनी सेना को और फिर शत्रु सेना को देखा। भाग्य की विडम्बना देखकर महाराजा का कलेजा कांप गया। उनका अपना तोपखाना शत्रु के हाथों में पड़कर उनके अपने सिपाहियों को निगलने के लिये तैयार खड़ा था। उन्हें लगा कि जिस हेमू के सामने भाग्यलक्ष्मी हाथ बांधे खड़ी रहती थी, आज उसके रूठ जाने से ही ऐसा हुआ है। उन्होंने अपने सैनिकों को धंसारा करने का आदेश दिया।

    हेमू द्वारा वर्षों से संचित तोपखाना महाराज हेमचंद्र की सेना पर आग फैंकने लगा किंतु हिन्दू सिपाही मृत्यु की परवाह न करके आगे को बढ़ते ही रहे जिससे महाराज हेमचंद्र की सेना का भी वही हश्र हुआ जो खानुआ के मैदान में राणा सांगा की सेना का हुआ था। मुगल सेना ने यहाँ भी तुगलुमा का प्रयोग किया। दुर्भाग्य से हिन्दू सैनिक इस पद्धति से युद्ध करने में सक्षम नहीं थे। देखते ही देखते हिन्दू चारों ओर से घिर गये। महाराजा हेमचंद्र चौबीस लड़ाईयों के अनुभवी सेनापति थे जिनमें से बाईस के परिणाम उनके पक्ष में आये थे। उन्होंने तोपखाने की परवाह न करके शत्रु सैन्य में वो मार लगाई कि अलीकुलीखाँ की सेना के दांये और बांये दोनों पक्षों को तोड़ दिया। थोड़ी ही देर में विजय तराजू के एक पलड़े में लटक गयी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पलड़ा महाराज हेमचंद्र के पक्ष में झुका हुआ था। हिन्दू वीर उत्साह से भर गये और भरपूर हाथ चलाने लगे।

    जब यह सूचना पानीपत से पाँच मील दूर पड़ाव कर रहे बैरामखाँ को दी गयी तो बैरामखाँ अपनी सारी बची-खुची सेना को लेकर युद्ध के मैदान में पहुँचा। जिस समय वह युद्ध क्षेत्र में कूदा, उस समय युद्ध बहुत ही नाजुक स्थिति में था। घोड़ों पर बैठकर महाराजा तक पहुँचना संभव नहीं जानकर बैरामखाँ और उसके अमीर घोड़ों से उतर पड़े तथा तलवारें निकाल कर पैदल ही महाराजा की ओर दौड़ पड़े। बैरामखाँ को युद्ध के मैदान में आया देखकर मुगलों का जोश दूना हो गया। वे तक-तक कर तीर, भाले और बंदूकें चलाने लगे।

    इतिहास गवाह है कि दुर्भाग्य और पराजय ने शायद ही कभी हिन्दू जाति का पीछा छोड़ा हो। इस सर्वत्रव्यापी दुर्भाग्य के चलते न पुरुषार्थ, न विद्या और न उद्यम, कुछ भी हिन्दुओं के काम नहीं आया। जब मुगल सेना में अफरा-तफरी मचनी आरंभ हुई और ऐसा लगा कि महाराज हेमचंद्र को विजय श्री मिलने ही वाली है, उसी समय जाने कहाँ से एक सनसनाता हुआ तीर आया और महाराजा की आँख फोड़ता हुआ निकल गया। महाराजा हेमचंद्र की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वे हौदे में गिर पड़े। शाहकुली मरहम ने महाराज के हाथी को पकड़ लिया। बैरामखां ने महाराज हेमचन्द्र की गर्दन उड़ा दी।

    हेमचन्द्र के पास कुबेर के कोष के बराबर धन सम्पत्ति थी। उसकी रानी ने यह सोचकर कि कहीं यह धन शत्रु के हाथों में न पड़ जाये, उस धन को अलवर जिले की बीजवाड़े की पहाड़ियों में छिपा दिया। तैमूर लंग को हिन्दुस्थान में कत्ले आम मचाकर केवल 120 हाथी मिले थे किंतु इस युद्ध के बाद बैराम खां ने हेमू के 1500 हाथी पकड़े। पानीपत के जिस मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर दिल्ली में मुगलों के राज्य की नींव रखी थी, एक बार फिर बैरामखाँ ने पानीपत के उसी मैदान में महाराज हेमचंद्र को परास्त कर फिर से दिल्ली हासिल कर ली। इसी के साथ म्लेच्छों को भारत भूमि से भगाने का स्वप्न हमेशा-हमेशा के लिये भंग हो गया।


    - मोहनलाल गुप्ता,

    63 सरदार क्लब योजना

    वायुसेना क्षेत्र, जोधपुर


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×