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  • छत्रपति शिवाजी द्वारा जजिया के विरोध में औरंगजेब को लिखा गया पत्र

     16.06.2017
    छत्रपति शिवाजी द्वारा जजिया के विरोध में औरंगजेब को लिखा गया पत्र

    छत्रपति शिवाजी द्वारा जजिया के विरोध में औरंगजेब को लिखा गया पत्र

    3 अप्रेल 1679 को औरंगजेब ने हिन्दू प्रजा पर जजिया लगाया। इससे भारत की हिन्दू प्रजा में भयानक असंतोष फैल गया। हजारों लोग प्रतिदिन औरंगजेब के लाल किले के झरोखे के नीचे एकत्रित होकर जजिया को समाप्त करने की प्रार्थना करते रहे किंतु औरंगजेब ने जजिया को जारी रखा। एक दिन औरंगजेब जुम्मे की नमाज पढ़ने के लिए जामा मस्जिद जा रहा था तो सैंकड़ों हिन्दू उसके मार्ग में धरती पर लेट गए कि यदि बादशाह जजिया समाप्त नहीं करेगा तो उसे हिन्दू प्रजा के शवों पर से गुजरना पड़ेगा। औरंगजेब के काफिले में चल रहे हाथियों तथा घोड़ों के पैरों के नीचे कुचल कर सैंकड़ों हिन्दू मारे गए किंतु औरंगजेब नहीं पिघला।

    इस घटना के बाद भारत के दो राजाओं ने औरंगजेब को धिक्कार भरे पत्र लिखे। मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब को फटकार लगाते हुए लिखा कि हिम्मत है तो मुझसे या अपने गुलाम आम्बेर के राजा मानसिंह से जजिया लेकर दिखाए। छत्रपति शिवाजी ने भी औरंगजेब को एक तीखे व्यंग्य बाणों से युक्त एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि औरंगजेब में हिम्मत हो तो पहले राणा राजसिंह से जजिया वसूल करे फिर मुझसे वसूल करे। नीला प्रभु नामक एक दरबारी से फारसी भाषा में अनुवाद किरवाया गया। राजसिंह तथा शिवाजी के पत्रों में काफी कुछ समानता होने से अनुमान होता है कि ये दोनों पत्र राजसिंह और शिवाजी में किसी प्रकार की पूर्व सहमति के आधार पर लिखे गए थे।

    महाराणा राजसिंह तथा छत्रपति शिवाजी के पत्रों को पाकर औरंगजेब इतना तिलमिलाया कि उसे दिल्ली के महलों से बाहर निकलना पड़ा। सबसे पहले उसने मेवाड़ पर आक्रमण किया किंतु मेवाड़ में उसे इतनी मार पड़ी कि वह दिल्ली लौटकर किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा। इसलिए वह छत्रपति शिवाजी पर आक्रमण करने दक्खिन चला गया। पूरे पच्चीस साल तक वह मराठों से लड़ता रहा किंतु कभी लौट कर दिल्ली नहीं आया। दक्खिन में ही औरंगजेब की मृत्यु हुई। इस दौरान मुगल राज्य तिनकों की तरह हवा में बिखरता रहा, टूटता रहा और लुटता रहा।

    यहाँ प्रस्तुत है शिवाजी द्वारा औरंगजेब को लिखे गए पत्र का हिन्दी अनुवाद-

    सम्राट आलमगीर की सेवा में, यह सदा मंगल कामना करने वाला शिवाजी ईश्वर के अनुग्रह तथा सम्राट की अनुकम्पा का धन्यवाद करने के बाद जो सूर्य से भी अधिक स्पष्ट है, जहांपनाह को सूचित करता है कि यद्यपि यह शुभेच्छु अपने दुर्भाग्य के कारण बिना आपकी आज्ञा लिए ही आपकी खिदमत से चला आया किंतु फिर भी वह सेवक के रूप में पूरा कर्त्तव्य यथासम्भव उचित रूप में निभाने के लिए तैयार है।

    हाल ही में मेरे कानों में यह बात पड़ी है कि मेरे साथ युद्ध में आपका धन समाप्त हो जाने तथा कोष खाली हो जाने के कारण आपने आदेश दिया है कि जजिया के रूप में हिन्दुओं से धन एकत्र किया जाए और उससे शाही आवश्यकताएं पूरी की जाएं। श्रीमान्, साम्राज्य के निर्माता बादशाह अकबर ने सर्व-प्रभुता से पूरे 52 (चन्द्र) वर्ष तक राज्य किया। उन्होंने समस्त सम्प्रदायों जैसे ईसाई, यहूदी, मुसलमान, दादूपंथी, आकाश पूजक, फलकिया, अनात्मवादी (अंसरिया) नास्तिक (दहरिया), ब्राह्मण और जैन साधुओं के प्रति सार्वजनिक सामंजस्य की प्रशंसनीय नीति अपनाई थी। उनके उदार हृदय का ध्येय सभी लोगों की भलाई और रक्षा करना था, इसलिए उन्होंने जगतगुरु की उपाधि पाई।

    तत्पश्चात् बादशाह जहांगीर ने 22 वर्ष तक विश्व के लोगों पर अपनी उदार छत्रछाया फैलाई। मित्रों को अपना हृदय दिया तथा काम में हाथ बंटाया और अपनी इच्छाओं की प्राप्ति की। बादशाह शाहजहां ने 32 वर्ष तक अपनी ममतामयी छत्रछाया पृथ्वी के लोगों पर डाली। परिणाम स्वरूप अनन्त जीवन फल प्राप्त किया।

    वह जो अपना नाम करता है,

    चिरस्थाई धन प्राप्त करता है।

    क्योंकि मृत्यु पर्यंत उसके सुकर्मों के आख्यान,

    उसके नाम को जीवित रखते हैं।


    इस उत्कृष्ट स्वभाव के परिणाम स्वरूप अकबर ने जहां कहीं अपनी गौरवशाली इच्छा की दृष्टि डाली, विजय और सफलता ने स्वयं अग्रसर होकर उनकी अगवानी की। अपने समस्त राज्य काल में उन्होंने अनेक राज्यों तथा किलों पर विजय पाई। इन सम्राटों की स्थिति तथा शक्ति का अनुमान बड़ी सरलता से केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि आलमगीर बादशाह केवल उनकी राजनीतिक प्रणाली का अनुसरण करने में भी असफल तथा गुमराह हो गए हैं। जजिया लगाने की शक्ति उनके पास भी थी किंतु उन्होंने अपने हृदय में धर्मान्धता नहीं आने दी। क्योंकि भगवान द्वारा सृजित छोटे-बड़े सभी लोगों को वे विभिन्न मतों और स्वभावों का जीता जागता उदाहरण समझते थे। उनकी कृपा और उदारता समय के पृष्ठ पर सदा के लिए अंकित है और इसलिए छोटे और बड़े सभी लोगों के मुखों व हृदयों में इन तीनों विशुद्ध आत्माओं की प्रशंसा सदा विद्यमान रहेगी। समृद्धि मनुष्य की भावनाओं का फल होती है। इसलिए उनका धन और सौभाग्य बढ़ता ही रहा। क्योंकि उनके राज्य में भगवान के सभी प्राणी शांति और सुरक्षा से रहे तथा उनके उपक्रम सफल हुए।

    किन्तु श्रीमान् के राज्य में अनेक किले और प्रदेश श्रीमान् के कब्जे से बाहर निकल गए हैं ओर शेष भी निकल जाएंगे। क्योंकि मैं उन्हें नष्ट और ध्वंस करने में कोई ढील नहीं डालूंगा। आपके किसान दयनीय दशा में हैं, हर गांव की उपज कम हो गई है। एक लाख की जगह केवल एक हजार और हजार की जगह केवल दस रुपए एकत्रित किए जाते हैं, और वह भी बड़ी कठिनाई से। जबकि बादशाह तथा शहजादों के महलों में गरीबी और भीख ने घर कर लिया है तो सामंतों और अमीरों की दशा की कल्पना आसानी से की जा सकती है। यह ऐसा राज्य है जहां सेना में उत्तेजना है, व्यापारी वर्ग को शिकायतें हैं, मुसलमान रोते हैं, हिन्दुओं को भूना जाता है। अधिकतर लोगों को रात का भोजन नहीं मिलता और दिन में वे अपने गालों को वेदना में पीट-पीटकर सुजा लेते हैं। ऐसी शोचनीय स्थिति में आपका शाही स्वभाव किस तरह आपको जजिया लादने की इजाजत देता है। यह बदनामी बहुत जल्दी पश्चिम से पूरब तक फैल जाएगी तथा इतिहास की किताबों में दर्ज हो जाएगी कि हिन्दुस्तान का बादशाह भिक्षा पात्र लेकर ब्राह्मणों, जैन साधुओं, योगियों, सन्यासियों, वैरागियों, दरिद्रों, भिखारियों, दीन-दुखियों तथा अकालग्रस्तों से वसूल करता है। अपना पराक्रम भिक्षुओं के झोलों पर आक्रमण करके दिखाता है। उसने तैमूर वंश का नाम मिट्टी में मिला दिया है।

    श्रीमान्! यदि आप वास्तव में पवित्र पुस्तक और भगवान की वाणी (कुरान) में विश्वास रखते हैं तो आप उसमें देखेंगे कि भगवान को रब-उल-अलामीन (सब मनुष्यों का स्वामी) कहा गया है न कि रब-उल-मुसलमान (केवल मुसलमानों का स्वामी।)

    वास्तव में इस्लाम और हिन्दू धर्म शब्दों में वैषम्य है। वे दिव्य (विभिन्न रंग हैं जिनके द्वारा) चित्रकर्मा ने रंग विन्यास कर तथा रूपरेखा बनाने के लिए (समस्त मानव वर्गों को अपना चित्रकर्मा का चित्र बनाने के लिए) प्रयुक्त किया है। मस्जिद में उनकी याद में अजान लगाई जाती है। मंदिर में उसी की कामना हेतु घण्टा बजाया जाता है। किसी के मत अथवा प्रथा के प्रति कट्टरता दिखाना, उस पवित्र पुस्तक के बदलने के बराबर है। किसी चित्र पर नई रेखाएं खींचना चित्रकार में दोष निकालना है।

    न्याय की दृष्टि से जजिया बिल्कुल गैर कानूनी है। राजनीतिक दृष्टि से यह तभी अनुमोदित किया जा सकता है जबकि एक सुन्दर स्त्री सोने के आभूषण पहने हुए बिना किसी डर के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में जा सकती हो किंतु आजकल शहर लूटे जा रहे हैं, खुले हुए देहातों की तो बात ही क्या ? जजिया लगाना न्याय संगत नहीं है, यह केवल भारत में ही की गई सर्जना है और अनुचित है।

    यदि आप हिन्दुओं को धमकाने और सताने को ही धर्मनिष्ठा समझते हैं तो सर्वप्रथम जजिया आपको राणा राजसिंह पर लगाना चाहिए जो हिन्दुओं के प्रधान हैं। तब मुझसे वसूल करना इतना कठिन नहीं होगा क्योंकि, मैं आपका अनुचर हूँ, किंतु चींटियों और मक्खियों को सताना शूरवीरता नहीं है।

    मुझे आपके अधिकारियों की स्वामिभक्ति पर आश्चर्य होता है, क्योंकि वे वास्तविकता को आपसे छिपाते हैं और प्रज्वलित अग्नि को फूस से ढंकते हैं। मेरी कामना है कि जहांपनाह का राजत्व महानता के क्षितिज के ऊपर चमके।

    इस पत्र को लिखने के बाद शिवाजी ने सूरत से आगे बढ़कर भड़ौंच तक भी धावे मारकर मुगलों की सम्पत्ति लूटी।

    - डॉ. मोहनलाल गुप्ता


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