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  • अध्याय - 36 भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (प्राचीन स्थापत्य, इण्डो-सारसैनिक, राजपूत एवं मुगल स्थापत्य) (4)

     09.01.2020
    अध्याय - 36 भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (प्राचीन स्थापत्य, इण्डो-सारसैनिक, राजपूत एवं मुगल स्थापत्य) (4)

    अध्याय - 36 भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (प्राचीन स्थापत्य, इण्डो-सारसैनिक, राजपूत एवं मुगल स्थापत्य) (4)

    राज-प्रासादों का स्थापत्य राजस्थान के स्थापत्य में राज-प्रासादों का एक विशिष्ट रूप दिखाई देता है। नगर-निर्माण में अथवा दुर्ग-निर्माण में राज-प्रासाद का होना अनिवार्य माना जाता था। प्रसिद्ध शिल्पी मण्डन ने राजप्रासाद बनाने का स्थान या तो नगर के बीच में या नगर के एक कोने में ऊँचे स्थान पर ठीक माना है। राजप्रासादों के निर्माण मेें जो भव्यता को प्रधानता दी गयी वह राजपूत शासकों की बढ़ती हुई शक्ति को प्रदर्शित करती है। राज-प्रासादों में जनानी ड्योढ़ी एवं मर्दानी ड्योढ़ी, अनिवार्यतः बनायी जाती थीं तथा दोनों को सुगम मार्ग से जोड़ा जाता था। मर्दानी ड्योढ़ी में दरबार लगाने, आम जनता तथा दरबारियों से मिलने, राजकुमारों के निवास आदि की व्यवस्था होती थी। जनानी ड्योढ़ी में राजपरिवार की महिलाओं के निवास व रसोड़े आदि की व्यवस्था होती थीं। राजप्रासाद के इन समस्त अंगों को जोड़कर एक पूर्ण इकाई का रूप दिया जाता था तथा दुर्ग-स्थापत्य के समान बुर्ज आदि भी बनवाये जाते थे। राजपूत शासकों के राज-प्रासादों के स्थापत्य में बहुत साम्य पाया जाता है। मुगलों से सम्पर्क स्थापित होने के बाद राज-प्रासादों को चमक-दमक वाले बनाने का क्रम आरम्भ हो गया। उनमें फव्वारे, छोटे उद्यान, पतले खम्भे और उन पर बेल-बूटों की नक्काशी तथा संगमरमर का प्रयोग होने लगा। राजप्रासादों का अलंकरण विशेष रूप से आरम्भ हुआ। बारीक खुदाई, नक्काशी, अलंकृत छज्जे,गवाक्ष आदि राजस्थानीय राजप्रासादों की अपनी विशेषता रही है। उदयपुर के अमरसिंह महल, पिछोला झील में स्थित जगनिवास और जगमन्दिर, जोधपुर दुर्ग में स्थित फूल महल, आमेर व जयपुर में दीवाने आम व दीवाने खास, बीकानेर में रंगमहल, शीशमहल व अनूप महल आदि में राजपूत स्थापत्य की प्रधानता होते हुए भी सजावट में मुगल शैली अपनायी गयी है। ज्यों-ज्यों राजपूत शासक एवं सामन्त मुगल दरबार में अधिकाधिक जाने लगे, उनमें मुगलों के वैभव के अनुरूप स्थापत्य में रुचि बढ़ने लगी। मुगलों के पतन के बाद मुगल-आश्रित अनेक शिल्पकारों के परिवारों को राजपूत शासकों ने आश्रय दिया। इनके द्वारा न केवल शासकों के महलों के स्थापत्य में, अपितु सामन्तों के राज-प्रासादों में भी मुगल शैली प्रगति करने लगी। जल संग्रहण स्रोतों की स्थापत्य कला भारत में सार्वजनिक उपयोग हेतु कुओं, तालाबों, बावड़ियों एवं अन्य प्रकार के जलाशयों के निर्माण की सुदीर्घ परम्परा रही है। ऋग्वेद में पुष्करिणी (तालाब) का उल्लेख हुआ है। शांखायनगृह्यसूत्र, अपरार्क, हेमाद्रि, दानक्रिया कौमुदी, जलाशयोत्सर्गतत्व, प्रतिष्ठामयूख, उत्सर्गमयूख, राजधर्म कौस्तुभ आदि ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के कूप, तालाब एवं जलाशयों को खुदवाने एवं उनकी प्रतिष्ठा करवाने की विधि लिखी है। विष्णुधर्मसूत्र में कहा गया है कि जो व्यक्ति जनहित के लिए कूप खुदवाता है, उसके आधे पाप उसमें पानी निकालने के समय नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति तालाब खुदवाता है वह सदा निष्पाप रहता है एवं वरुण लोक में निवास करता है। जनकल्याण हेतु खुदवाए गए जलाशय चार प्रकार के होते हैं- कूप, वापी, पुष्करिणी एवं तड़ाग्। कुछ ग्रंथों में लिखा है कि चतुर्भुजाकार या वृत्ताकार होने से कूप का व्यास 5 हाथ से 50 हाथ तक हो सकता है। इसमें साधारणतः पानी तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां नहीं होतीं। वापी वह कूप है जिसमें चारों ओर से अथवा तीन अथवा दो अथवा एक ओर से जल तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां बनी होती हैं तथा जिसका मुख 50 से 100 हाथ तक हो। पुष्करिणी 100 से 200 हाथ व्यास की होती है। तड़ाग 200 से 300 हाथ लम्बा होता है। मत्स्य पुराण के अनुसार वापी 10 कुओं के बराबर एवं हृद (गहरा जलाशय) 10 वापियों के बराबर होता है। एक पुत्र 10 हृदों के बराबर एवं एक वृक्ष 100 पुत्रों के बराबर होता है। वसिष्ठ संहिता के अनुसार पुष्करिणी 400 हाथ लम्बी और तड़ाग उसका 5 गुना बड़ा होता है। मिताक्षरा के अनुसार तड़ागों की सुरक्षा के लिए बने नियमों की पालना करना राजा का कर्त्तव्य है। विवादरत्नाकर के अनुसार जब कोई व्यक्ति वाटिका, कूप, बांध, जलाशय को तोड़ दे तो उनका जीर्णोद्धार होना चाहिए तथा अपराधी को 800 पणों का दण्ड मिलना चाहिए। जयपुर क्षेत्र में नगर नामक प्राचीन स्थल के विक्रम संवत् 741 (ई.684) के शिलालेख में एक वापी निर्माण का श्रेय मारवाड़ भीनमाल के कुशल शिल्पियों को दिया गया है और उन वास्तुविद्या विशारद सूत्रधारों की पर्याप्त प्रशंसा की गई है कि वे तो वास्तुविद्या के प्रगाढ़ पण्डित थे। सातवीं शती की यह वापी आज तक ज्ञात प्राचीनतम वापी है। वासुदेव शरण अग्रवाल का अनुमान है कि रहट और बावड़ी, दो प्रकार के विशेष कुएं शकों द्वारा भारत में लाये गये। बावड़ी (गुजराती बाव) के लिये प्राचीन नाम शकन्धु (शक देश का कुंआ) और रहट के लिये कर्कन्धु थे। बाण ने भी हर्षचरित में रहट का उल्लेख किया है। राजस्थान के प्राचीन शिलालेखों में उल्लेखित अरहट्ट भी इसी का द्योतक है। संभव है कि राजस्थान में वापी और रहट दोनों ही विदेशी सम्पर्क के कारण प्रचलित हुए हों। कुछ वर्ष पूर्व तक इस प्रकार के मृदभाण्डों वाले रहटों का राजस्थान के कुछ भागों में प्रयोग किया जाता रहा है और यही स्थिति बैलगाड़ी की भी है। भीनमाल में मध्य-कालीन, आयताकार वापी चण्डीनाथ मंदिर में आज भी स्थित है इसमें पूर्वमध्य-युगीन दो स्तंभ जडे़ हैं। भीनमान के वास्तुकारों का वापी निर्माण कला में अत्यन्त दक्ष होना इसी बात को इंगित करता है कि शकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया और उनके साथ आई वास्तुकला को सीखकर यहाँ के शिल्पी उस विद्या में पारंगत हुए जिन्हें वापी निर्माण हेतु दूर-दूर तक बुलाया जाता था। परमार शासक पूर्णपाल के वि.सं.1102 (ई.1045) के भडुण्ड अभिलेख के अनुसार पूर्णपाल के शासनकाल में 22 ब्राह्मण और 1 क्षत्रिय द्वारा एक बावड़ी का निर्माण करवाया गया। अभिलेख के अनुसार भडुण्ड गांव के ब्राह्मणों ने संसार की असारता का अनुभव करते हुए सज्जनों और साधुओं के हृदयों को आनंदित करने वाली सुंदर वापी बनवाई। न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में जल संग्रहण की सुदीर्घ परम्परा रही है। इस कड़ी की मजबूती सिर्फ शासकों पर नहीं छोड़ी गई थी अपितु समाज के वे अंग जो आज भी आर्थिक दृष्टि से कमजोर माने जाते हैं, बंध-बंधा, ताल-तलाई, जोहड़-जोहड़ी, नाडी, तालाब, सरवर, सर, झील, देईबंध, डहरी, खडीन आदि बनाते थे। राजपूत स्थापत्य शैली में बने जलाशयों पर कलात्मक भित्तियों एवं घाटों का निर्माण करवाया जाता था जिनके ऊपरी भाग में छतरियाँ बनी रहती थीं। जलाशय के निकट एक कलात्मक स्तम्भ लगाया जाता था जिसके ऊपरी भाग में शिखर बना रहता था और नीचे चारों ओर बनी ताकों में देव प्रतिमाएं उत्कीर्ण की जाती थीं। स्तम्भ के मध्य में जलाशय के निर्माण से सम्बन्धित सूचना लिखी जाती थी। जलाशय तक पहुँचने के लिए कलात्मक सीढ़ियां एवं घाट बनाए जाते थे। इस काल में जैसलमेर में कौशिकराम का कुण्ड, जैत सागर तथा ब्रह्म्रासागर; बूँदी मेें फूलसागर और सूरसागर; जोधपुर में बालसमन्द, गुलाब सागर, चौखेलाव तालाब और सरूप सागर; बीकानेर में सूरसागर, अनूपसागर, नाथूसर आदि जलाशय बनाए गए। 17वीं शताब्दी में उदयपुर में महाराणा राजसिंह द्वारा निर्मित राजसंमद जलाशय निर्माण-कला का श्रेष्ठतम उदाहरण है जिसके तोरण द्वार विशुद्ध हिन्दू शैली के हैं किन्तु मण्डपों में बनी जालियां तथा बेल-बूटों के अलंकरण पर मुगल शैली का प्रभाव है। जलाशय-निर्माण की यह पद्धति 19वीं शताब्दी तक काम में ली गई। स्मारक स्थापत्य राजपूत शासकों, सामन्तों, श्रेष्ठियों, संतों एवं धनी लोगों की स्मृति में स्मारक बनाने की परम्परा प्राचीनकाल से चली आयी थी। मध्ययुगीन राजपूत स्मारक स्तम्भों पर वीर योद्धा एवं उसके आयुधों का अंकन किया जाता था। इन्हें देवली भी कहते थे। राजपूत योद्धा प्रायः घोड़े पर सवार होता था और उसके निकट सतियों का अंकन किया जाता था। मुगलों से सम्पर्क होने के बाद इन स्मारकों पर मुगल शैली का प्रभाव दिखने लगा। 17वीं से 19वीं शताब्दी तक निर्मित छतरियां प्रायः एक वर्गाकार चबूतरे पर बनी हुई हैं, जिन पर एक छोटा वर्गाकार अथवा गोलाकार चबूतरा रहता है और उस पर चार, छः आठ और बारह खम्भों पर आधारित गोलाकार गुम्बद बना रहता है। इनके खम्भे विभिन्न कोणीय अथवा गोलाकृतियों में बने हुए होते हैं जिन्हें विभिन्न रेखाकृतियों द्वारा अंलकृत किया गया है। गुम्बदों की छतें प्रायः सादी हैं। कुछ छतरियों में शिवलिंग स्थापित हैं। साथ ही सम्बन्धित राजा, सामंत या योद्धा की आकृति से युक्त पाषाण पट्टियां और उस पर लेख भी उत्कीर्ण कराए गए हैं। मध्य-कालीन छतरियों में बीकानेर में बीकाजी की छतरी और रायसिंह की छतरी, जोधपुर में मण्डोर उद्यान में स्थित राव मालदेव की छतरी और अजीतसिंह की छतरी तथा उदयपुर के आहड़ ग्राम में स्थित अमरसिंह और कर्णसिंह की छतरियां विशेष उल्लेखनीय हैं। नागौर जिले के ताउसर गांव में अप्पाजी सिंधिया की छतरी में शिललिंग स्थापित है।ण्डोर में स्थित स्मारक मंदिरों की आकृतियों में बने हैं, इन्हें देवल कहा जाता है। अन्य राजपूत स्थापत्य पूर्व मध्य-काल एवं मध्य-काल में राजपूत स्थापत्य के अंतर्गत विजेता राजाओं द्वारा बनाए जाने वाले विजय-स्तम्भ एवं कीर्तिस्तम्भ, हवेली, स्मारक छतरियां एवं देवल आदि भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। इन भवनों की स्थापत्य शैलियां क्षेत्रीय विशेषताएं लिए हुए हैं तथा इन पर मध्ययुगीन मुस्लिम कला का भी प्रभाव है। मध्य-कालीन मुस्लिम स्थापत्य बारहवीं शताब्दी ईस्वी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला का प्रवेश हुआ। दिल्ली सल्तनत के तुर्क शासक अपने साथ जिस स्थापत्य कला को लेेकर आए, उसका विकास ट्रान्स-ऑक्सियाना, ईरान, इराक, मिस्र, अरब, अफगानिस्तान, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण पश्चिम यूरोप की शैलियों के मिश्रण से हुआ था। इस मिश्रित स्थापत्य को ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला कहा गया। इस शैली की कुछ विशेषताएं इसे भारतीय स्थापत्य शैलियों से अलग करती थीं, जैसे- नोकदार तिपतिया मेहराब, मेहराबी डाटदार छतें, अष्टकोणीय भवन, ऊंचे गोल गुम्बज, पतली मीनारें आदि। इस शैली को सारसैनिक या इस्लामिक कला भी कहा जाता है। भारतीय स्थापत्य एवं मुस्लिम स्थापत्य में अंतर भारतीय स्थापत्य एवं मुस्लिम स्थापत्य में कई अंतर थे जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं- (1.) भारतीय स्थापत्य में आदर्शवाद, काल्पनिकता, अलंकरण एवं रहस्य का समावेश था जबकि मुस्लिम स्थापत्य में यथार्थवाद, सादगी एवं वास्तविकता के तत्व अधिक थे। (2.) भारतीय मंदिर पत्थरों में उत्कीर्ण एक मनोरम संसार का परिदृश्य प्रतीत होते हैं जबकि मुस्लिम स्थापत्य में बनी मस्जिदें सादगी का प्रतिबिम्ब प्रतीत होती हैं और उनका मुख सुदूर मक्का की दिशा में होता है। (3.) मंदिर की दीवारों एवं शिखरों पर देवी-देवताओं एवं पौराणिक कथाओं का अंकन होता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण की जाती हैं। (4.) मंदिरों में देवी-देवताओं का मानवीय स्वरूप अंकित किया जाता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर मानवीय आकृतियों का अंकन निषिद्ध होता है। (5.) हिन्दू मंदिरों पर शिखर होते थे जबकि मुस्लिम इमारतों पर गोल गुम्बद होते थे। (6.) हिन्दू मन्दिरों का गर्भगृह प्रकाश एवं वायु से रहित होता था जबकि मस्जिद का भीतरी भाग प्रकाश एवं वायु से युक्त होता था। (7.) मंदिर का गर्भगृह छोटा होता था जबकि मस्जिद का मुख्यकक्ष विशाल होता था ताकि उसमें अधिक से अधिक लोग नमाज पढ़ सकें। (8.) हिन्दू स्थापत्य में अलंकृत स्तम्भों एवं सीधे पाटों पर रखी अलंकृत छतों को प्रमुखता दी जाती थी जबकि इस्लामिक स्थापत्य में तिकाने मेहराबों, गोल गुम्बदों और लम्बी मीनारों को अधिक महत्त्व दिया जाता था। (9.) हिन्दू मंदिरों के शिखरों पर कमल एवं कलश बनाए जाते थे, मंदिर के भीतरी स्तम्भों पर घण्टों, जंजीरों, घटपल्लवों, हथियों, कमल पुष्पों आदि का अंकन किया जाता था तथा खम्भों एवं छतों के जोड़ों पर कीचकों का अंकन किया जाता था किंतु मुस्लिम स्थापत्य में इस तरह के अलंकरणों का कोई प्रावधान नहीं था। मुस्लिम वास्तु के तीन चरण मुस्लिम वास्तु के तीन क्रमिक चरण स्पष्ट हैं- (1.) पहला चरण: पहला चरण विजेता आक्रांताओं के विजय-दर्प एवं धर्मांधता से प्रेरित होकर हिन्दू स्थापत्य को नष्ट करने का था। मुहम्मद गौरी के साथ भारत आए हसन निज़ामी ने लिखा है कि प्रत्येक किला जीतने के बाद उसके स्तंभ और नींव तक महाकाय हाथियों के पैरों तले रौंदकर धूल में मिला दिए जाते थे। अनेक भारतीय नगर, दुर्ग एवं मंदिर इसी प्रकार नष्ट किए गए। (2.) दूसरा चरण: दूसरा चरण सोद्देश्य और आंशिक विध्वंस का था जिसमें हिन्दू इमारतें इसलिए तोड़ी गईं ताकि विजेताओं की मस्जिदों और मकबरों के लिए तैयार शिल्प-सामग्री उपलब्ध हो सके। बड़ी-बड़ी धरनें और स्तम्भ मंदिरों एवं अन्य हिन्दू भवनों से निकालकर नई जगह ले जाए गए। इस काल में मंदिरों को विशेष क्षति पहुँची जो मुसलमानों द्वारा विजित प्रांतों की नई राजधानियों के निर्माण के लिए तैयार सामग्री की खान के रूप में प्रयुक्त हुए और उत्तर भारत से हिंदू वास्तु प्रायः सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गया। (3.) तीसरा चरण: मुस्लिम वास्तु का तीसरा एवं अंतिम चरण तब आरंभ हुआ जब मुस्लिम आक्रांता देश के अनेक भागों में मस्जिदें एवं मकबरे बनाने लगे। मुस्लिम वास्तु की तीन शैलियाँ मुस्लिम वास्तु-शैलियों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है- (1.) दिल्ली वास्तु शैली (ई.1193-1554): इसे पठान शैली एवं शहंशाही शैली भी कहा जाता है। इस शैली का अनुसरण दिल्ली सल्तनत के मध्य एशिया से आए तुर्की सुल्तानों एवं अफगानिस्तान से आए पठान सुल्तानों ने किया। इस शैली में दिल्ली की कुतुबमीनार (ई.1200), सुल्तान गढ़ी (ई.1231), अल्तमश का मकबरा (ई.1236), अलाई दरवाज़ा (ई.1305), निजामुद्दीन (ई.1320), गयासुद्दीन तुगलक (ई.1325) और फीरोजशाह तुगलक (ई.1388) के मकबरे, कोटला फीरोजशाह (ई.1354-1490), मुबारकशाह का मकबरा (ई.1434), मेरठ की मस्जिद (ई.1505), शेरशाह की मस्जिद (ई.1540-45) सहसराम का शेरशाह का मकबरा (ई.1540-45) और अजमेर का अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (ई.1205) आदि उल्लेखनीय हैं। (2.) प्रांतीय वास्तु शैलियाँ: मध्ययुगीन प्रांतीय मुस्लिम शैलियों में निम्नलिखित शैलियों को रखा जा सकता है- पंजाब शैली (ई.1150-1325) - इस शैली में शाह यूसुफ गर्दिजी (ई.1150), तब्रिजी (ई.1276), बहाउलहक (ई.1262) मुल्तान के श्रकने आलम (ई.1320) के मकबरे प्रमुख हैं। बंगाल शैली (1203-1573)- इस शैली में पंडुआ की अदीना मस्जिद (ई.1364), गौर के फतेहखाँ का मकबरा (ई.1657), कदम रसूल (ई.1530) तथा तांतीमारा मस्जिद (ई.1475) प्रमुख हैं। गुजरात शैली (ई.1300-1572): इस शैली में कैम्बे (ई.1325), अहमदाबाद (ई.1423), भड़ौंच और चमाने (ई.1523) की जामा मस्जिदें एवं नगीना मस्जिद (ई.1525) प्रमुख हैं। जौनपुर शैली (ई.1376-1479): इस शैली में जौनपुर की अटाला मस्जिद (ई.1408), लाल दरवाजा मस्जिद (ई.1450) और जामा मस्जिद (ई.1470) प्रमुख हैं। मालवा शैली (1405-1569): इस शैली में माण्डू के जहाज-महल (ई.1460), होशंग का मकबरा (ई.1440), जामा मस्जिद (ई.1440), हिंडोला महल (ई.1425), धार की लाट मस्जिद (ई.1405), चंदेरी का बदल महल फाटक (ई.1460), कुशक महल (ई.1445), शहज़ादी का रौजा (ई.1450) आदि प्रमुख हैं। दक्षिणी शैली (1347-1617): इस शैली में गुलबर्ग की जामा मस्जिद (ई.1367) और हफ्त गुंबज (ई.1378), बीदर का मदरसा (ई.1481), हैदराबाद की चारमीनार (ई.1591) आदि प्रमुख हैं। बीजापुर खानदेश शैली (1425-1660): इस शैली में बीजापुर के गोलगुंबज (ई.1660), रौजा इब्राहीम (ई.1615) और जामा मस्जिद (ई.1570), थालनेर खानदेश के फारूकी वंश के मकबरे (15वीं शती) आदि प्रमुख हैं। कश्मीर शैली (15-17 वीं शती): इस शैली में श्रीनगर की जामा मस्जिद (1400), शाह हमदन का मकबरा (17 वीं शती) आदि सम्मिलित हैं। (3.) मुगल वास्तु शैली: तीसरे वर्ग में मुगल शैली आती है जिसके उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर, इलाहाबाद, औरंगाबाद आदि में किलों, मकबरों, मस्जिदों राजमहलों, उद्यान-मंडपों आदि के रूप में स्थित है। इसी काल में स्थापत्य-कला लाल-बलुआ पत्थर से आगे बढ़कर संगमरमर तक पहुँची और दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद, जामा मस्जिद और आगरा के ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध भवन बने।

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