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  • अध्याय - 36 भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (3)

     02.06.2020
    अध्याय - 36 भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (3)

    भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (प्राचीन स्थापत्य, इण्डो-सारसैनिक, राजपूत एवं मुगल स्थापत्य) (3)


    खजुराहो मंदिर शैली

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    मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो प्राचीन एवं मध्य-कालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। इसे प्राचीन काल में खजूरपुरा और खजूर वाहिका कहा जाता था। यहाँ बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू और जैन मंदिर हैं। खजुराहो मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन एवं मध्य-कालीन प्रस्तर-शिल्पियों एवं मूर्तिकारों ने खजुराहो के मंदिरों में हिन्दू तक्षणकला को सदियों के लिए सुरक्षित कर दिया। इन मंदिरों में भोग-विलास एवं काम-क्रीड़ा के विभिन्न दृश्यों को अत्यंत कौशल के साथ उत्कीर्ण किया गया है।

    खजुराहो चन्देल साम्राज्य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश और खजुराहो के संस्थापक मध्य-काल के गुर्जर शासक थे। राजा चन्द्रवर्मन स्वयं को चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण ई.950 से 1050 के बीच इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। कवि चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो के महोबा खंड में चन्देल की उत्पत्ति का वर्णन किया है। राजा चन्द्रवर्मन ने कई युद्धों में विजय प्राप्त की। राजा चन्द्रवर्मन ने अपनी माता के कहने पर तालाबों और उद्यानों से आच्छादित खजुराहो में 85 अद्वितीय मंदिरों का निर्माण करवाया। चन्द्रवर्मन के उत्तराधिकारियों ने भी खजुराहो में मंदिर निर्माण जारी रखा।

    पश्चिमी समूह

    शिवसागर के निकट स्थित मंदिरों के एक विशाल समूह को पश्चिमी समूह कहा जाता है। यह खजुराहो के सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है। इस मंदिर समूह का निर्माण ई.954 में हुआ। इस परिसर के विशाल मंदिरों की बहुत ज्यादा सजावट की गई है जो चंदेल शासकों की संपन्नता और शक्ति को प्रकट करती है। मंदिरों में प्रदर्शित देवकुलों में शिव एवं विष्णु को दर्शाया गया है। इस परिसर में स्थित लक्ष्मण मंदिर उच्च कोटि का है। इसमें भगवान विष्णु को बैकुंठ में विराजमान दिखाया गया है।

    चार फुट ऊंची विष्णु की इस प्रतिमा के तीन सिर हैं। ये सिर मनुष्य, सिंह और वराह रूप में दर्शाए गए हैं। इस मंदिर के तल के बाएं हिस्से में जन-जीवन से सम्बन्धित क्रियाकलापों, कूच करती हुई सेना, घरेलू जीवन तथा नृतकों को दिखाया गया है। मंदिर के प्लेटफार्म की चार सहायक वेदियां हैं। इस मंदिर का सम्बन्ध तांत्रिक संप्रदाय से है। इसका अग्रभाग दो प्रकार की मूर्तिकलाओं से सजा है जिसके मध्य खंड में मिथुन या आलिंगन करते हुए दंपत्तियों को दर्शाया गया है।

    मंदिर के सामने दो लघु वेदियां हैं। एक देवी और दूसरी वराह देव को समर्पित है। विशाल वराह की आकृति पीले पत्थर के एक ही खण्ड से बनी है।

    कंदरिया महादेव मंदिर: कंदरिया महादेव मंदिर पश्चिमी समूह के मंदिरों में विशालतम है। यह अपनी भव्यता और संगीतमयता के लिए प्रसिद्ध है। इस विशाल मंदिर का निर्माण चन्देल राजा विद्याधर ने ई.1050 में किया था। यह एक शैव मंदिर है। मंदिर लगभग 107 फुट ऊंचा है। मकर तोरण इसकी मुख्य विशेषता है। मंदिर के संगमरमरी लिंगम में अत्यधिक ऊर्जावान मिथुन हैं। अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार यहाँ मिथुनों की सर्वाधिक आकृतियां हैं। उन्होंने मंदिर के बाहर 646 आकृतियों और भीतर 246 आकृतियों की गणना की थी।

    देवी जगदम्बा मंदिर: कंदरिया महादेव मंदिर के चबूतरे के उत्तर में जगदम्बा देवी का मंदिर है। यह मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित था और इसका निर्माण ई.1000 से 1025 के बीच हुआ। सैकड़ों वर्षों पश्चात इस मंदिर में छतरपुर के महाराजा ने देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित करवाई जिसके कारण इसे देवी जगदम्बा मंदिर कहते हैं। यहाँ उत्कीर्ण मैथुन-मूर्तियों में भावों की गहरी संवेदनशीलता है। यह मंदिर शार्दूलों के काल्पनिक चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। शार्दूल वह पौराणिक पशु था जिसका शरीर शेर का और सिर तोते, हाथी या वराह का होता था।

    सूर्य मंदिर (चित्रगुप्त मंदिर): खजुराहो में स्थित सूर्य मंदिर को चित्रगुप्त मंदिर कहते हैं। यह मंदिर एक ही चबूतरे पर स्थित चौथा मंदिर है। इसका निर्माण भी राजा विद्याधर के काल में हुआ था। इसमें भगवान सूर्य की सात फुट ऊंची प्रतिमा कवच धारण किए हुए स्थापित है। भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। एक मूर्तिकार को काम करते हुए कुर्सी पर बैठे दिखाया गया है। दक्षिण की दीवार पर ग्यारह सिर वाली विष्णु प्रतिमा स्थापित है।

    विश्वनाथ मन्दिर: शिव मंदिरों में अत्यंत महत्वपूर्ण विश्वनाथ मंदिर का निर्माण ई.1002-03 में हुआ। पश्चिम समूह की जगती पर स्थित यह मंदिर अति सुंदर है। पंचायतन शैली का संधार प्रासाद भगवान शिव को समर्पित है। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ ही नंदी पर आरोहित शिव प्रतिमा स्थापित की गयी है।

    अन्य मंदिर: लक्ष्मण मंदिर के सामने लक्ष्मी मंदिर स्थित है तथा कंदरिया महादेव मंदिर और देवी जगदम्बा मंदिर के बीच सिंह मंदिर बना हुआ है। बगीचे के रास्ते में पूर्व की ओर पार्वती मंदिर स्थित है। यह एक छोटा-सा मंदिर है जो भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर को छतरपुर के महाराजा प्रताप सिंह द्वारा ई.1843-से 1847 के बीच बनवाया गया था। इसमें देवी पार्वती को एक गोह पर आरूढ़ दिखाया गया है। पार्वती मंदिर के दायीं तरफ विश्वनाथ मंदिर है जो खजुराहो का विशालतम मंदिर है। यह मंदिर भगवान शंकर को समर्पित है। यह मंदिर राजा धंग द्वारा ई.999 में बनवाया गया था। मंदिर की दीवारों पर चिट्ठियां लिखती अप्सराओं एवं संगीत सभाओं के दृश्य अंकित किए गए हैं। विश्वनाथ मंदिर के सामने नन्दी मंदिर स्थित है।

    पूर्वी समूह

    पूर्वी समूह के मंदिरों को दो विषम समूहों में बांटा गया है। इस श्रेणी के प्रथम चार मंदिरों का समूह प्राचीन खजुराहो गांव के निकट है। दूसरे समूह में जैन मंदिर हैं जो गांव के स्कूल के पीछे स्थित हैं। हिन्दू मंदिर पुराने गांव के दूसरे छोर पर घंटाई मंदिर स्थित है जिसके निकट वामन मंदिर, जायरी मंदिर और ब्रह्मा मंदिर स्थित हैं। वामन मंदिर का निर्माण ई.1050 से 1075 के बीच किया गया। जबकि जायरी मंदिर का निर्माण ई.1075-से 1100 के बीच हुआ। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। ब्रह्मा मंदिर की स्थापना ई.925 में हुई। इस मंदिर में चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर का सम्बन्ध ब्रह्मा से न होकर भगवान शिव से है।

    जैन मंदिर: जैन मंदिरों का समूह एक अलग परिसर में स्थित है। ये दिगम्बर सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं। इस समूह का सबसे विशाल मंदिर तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित हैं जो कि पाशर््वनाथ मंदिर के उत्तर में स्थित है। जैन समूह का अन्तिम शान्तिनाथ मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर में यक्ष दम्पत्ति की आकर्षक मूर्तियाँ हैं।

    दक्षिणी समूह

    इस भाग में दो मंदिर हैं। एक भगवान शिव को समर्पित दुलादेव मंदिर है और दूसरा विष्णु को समर्पित चतुर्भुज मंदिर है। दुलादेव मंदिर खुद्दर नदी के किनारे स्थित है। इसे ई.1130 में राजा मदनवर्मन ने बनवाया था। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण ई.1100 में किया गया था। इसके गर्भगृह में 9 फुट ऊंची भगवान विष्णु की प्रतिमा को संत-वेश में दिखाया गया है। इस समूह के मंदिर को देखने लिए दोपहर का समय उत्तम माना जाता है। दोपहर में पड़ने वाली सूर्य-किरणें इन मूर्तियों को आकर्षक बनाती हैं।

    चतुर्भुज मंदिर: यह निरधार प्रकार का विष्णु मंदिर जटकारा ग्राम से आधा किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। इसमें अर्धमण्डप, मण्डप, संकीर्ण अंतराल के साथ-साथ गर्भगृह है। मंदिर की योजना सप्ररथ है। इस मंदिर का निर्माणकाल जवारी तथा दुलादेव मंदिर के निर्माणकाल के मध्य माना जाता है। बलुआ पत्थर से निर्मित खजुराहो का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें मिथुन प्रतिमाओं का सर्वथा अभाव दिखाई देता है। इस मंदिर की शिल्प कला अवनति का संकेत करती है। मूर्तियों के आभूषण का रेखांकन तो हुआ है किंतु उनका सूक्ष्म अंकन अपूर्ण छोड़ दिया है। मंदिर की दीवारों पर बनी पशु-प्रतिमाएँ भी अपरिष्कृत अरुचिकर हैं। अप्सराओं सहित अन्य शिल्प विधान रूढ़िगत हैं, जिनमें सजीवता और भावाभिव्यक्ति का अभाव है। विद्याधरों का अंकन आकर्षक मुद्राओं में किया गया है। यह मंदिर अपने शिल्प, सौंदर्य तथा शैलीगत विशेषताओं के आधार पर सबसे बाद में निर्मित दुल्हादेव के निकट माना जाता है। चतुर्भुज मंदिर के द्वार के शार्दूल सर्पिल प्रकार के हैं। कुछ सुर-सुंदरियाँ अधबनी ही छोड़ दी गयी हैं। मंदिर की अधिकांश अप्सराएँ और कुछ देव दोहरी मेखला धारण किए हुए हैं। मंदिर की रथिकाओं के अर्धस्तंभ वर्तुलाकार हैं।

    दुल्हादेव मन्दिर: यह मूलतः शिव मंदिर है। इसको कुछ इतिहासकार कुंवरनाथ मंदिर भी कहते हैं। इसका निर्माणकाल लगभग ई.1000 है। यह मंदिर प्रतिमा वर्गीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। निरंधार प्रासाद प्रकृति का यह मंदिर अपनी नींव योजना में समन्वित प्रकृति का है। मंदिर सुंदर प्रतिमाओं से सुसज्जित है। गंगा की चतुर्भुज प्रतिमा अत्यंत सुंदर है। मंदिर के भीतरी एवं बाहरी भाग में अनेक प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं जिनकी भावभंगिमाएँ सुंदर तथा उद्दीपक हैं। नारियों, अप्सराओं एवं मिथुनरत युगलों की प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में बनाई गई हैं। मंदिर के पत्थरों पर 'वसल' नामक कलाकार का नाम अंकित है।

    मंदिर के वितान गोलाकार तथा स्तंभ अलंकृत हैं। नृत्य मुद्रा वाली प्रतिमाएं सुंदर एवं आकर्षक हैं। मंदिर के गर्भगृह में योनि-वेदिका पर शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के बाहर तीन पट्टियों पर मूर्तियाँ अंकित हैं। यहाँ हाथी, घोड़े, योद्धा और सामान्य जीवन के दृश्य उत्कीर्ण हैं। अप्सराएं स्वतंत्र, स्वच्छंद एवं निर्बाध जीवन का प्रतीक मालूम पड़ती हैं। अप्सरा टोड़ों में अप्साओं को दो-दो, तीन-तीन की टोली में दर्शाया गया है। मंदिर, मण्डप, महामण्डप तथा मुखमंडप युक्त है। मुखमण्डप भाग में गणेश और वीरभद्र की प्रतिमाएँ अपनी रथिकाओं से झांकती हुई प्रतीत होती हैं।

    विद्याधर और अप्सराएँ गतिशील जान पड़ते हैं परन्तु प्रतिमाओं पर अलंकरण का भार अधिक दिखाई देता है। अष्टवसु मगरमुखी है। यम तथा नऋत्ति की केश सज्जा परंपराओं से पृथक है एवं पंखाकार है। मंदिर की जगती उँची है तथा सुंदर एवं दर्शनीय है। जंघा पर प्रतिमाओं की पंक्तियाँ स्थापित की गई हैं। प्रस्तर पर पत्रक सज्जा भी है। छज्जों को देवी-देवता, दिग्पाल, अप्सराओं, मानव युगलों एवं मिथुन-युगलों से सजाया गया है। भद्रों के छज्जों पर रथिकाएँ हैं। वहाँ देव प्रतिमाएँ भी उतकीर्ण हैं।

    दक्षिणी भद्र के कक्ष-कूट पर गुरु-शिष्य की प्रतिमा अंकित की गई है। शिखर सप्तरथ मूल मंजरी युक्त है। इसे भूमि-आमलकों से सुसज्जित किया गया है। उरुः श्रृंगों में से दो सप्तरथ तथा एक पंचरथ प्रकृति का है। शिखर के प्रतिरथों पर श्ृंग हैं, किनारे की नंदिकाओं पर दो-दो श्ृंग हैं तथा प्रत्येक करणरथ पर तीन-तीन श्ृंग हैं। श्ृंग सम आकार के हैं। अंतराल भाग का पूर्वी मुख का अग्रभाग सुरक्षित है जिसपर नौं रथिकाएँ बनाई गई हैं, नीचे से ऊपर की ओर उद्गमों की चार पंक्तियाँ हैं। आठ रथिकाओं पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं। स्तंभ शाखा पर तीन रथिकाएँ हैं, जिन पर शिव प्रतिमाएँ अंकित की गई हैं, जो परंपरा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु से घिरी हुई हैं।

    भूतनायक प्रतिमा शिव प्रतिमाओं के नीचे हैं, जबकि विश्रांति भाग में नवग्रह प्रतिमाएँ खड़ी मुद्रा में हैं। इस स्तंभ शाखा पर जल-देवियाँ त्रिभंगी मुद्राओं में हैं। मगर और कछुआ अंकित किये गये हैं। मुख्य प्रतिमाएँ गंगा-यमुना की प्रतीक मानी जाती है। एक प्रतिमा महाकाल की भी है, जो खप्पर युक्त है। मंदिर के बाहरी भाग की रथिकाओं में दक्षिणी मुख पर नृत्य-मुद्रा में छः भुजायुक्त भैरव, बारह भुजायुक्त शिव तथा एक अन्य रथिका में त्रिमुखी दश भुजायुक्त शिव प्रतिमा है। इसकी दीवार पर बारह भुजा युक्त नटराज, चतुर्भुज, हरिहर, उत्तरी मुख पर बारह भुजा युक्त शिव, अष्ट भुजा युक्त विष्णु, दश भुजा युक्त चामुंडा, गजेंद्र-मोक्ष रूप में चतुर्भुज विष्णु तथा शिव-पार्वती युग्म मुद्रा में हैं।

    पश्चिमी मुख पर चतुर्भुज नग्न नऋति, वरुण, वृषभमुखी वसु की दो प्रतिमाएँ हैं। उत्तरी मुख पर वायु की भग्न प्रतिमा के अतिरिक्त वृषभमुखी वसु की तीन तथा चतुर्भुज कुबेर एवं ईशान की एक-एक प्रतिमा उत्कीर्ण है।

    उड़ीसा की कलिंग मंदिर शैली

    उड़ीसा का स्थापत्य प्राचीनकाल में विकसित कलिंग वास्तुकला शैली में निर्मित है। उड़ीसा के मंदिर कलिंग स्थापत्य शैली के सबसे अच्छे उदाहरण हैं।

    मकाकानूका के मंदिर: मकाकानूका ओडिशा के पांच मंदिर स्थापत्य चमत्कार के नमूने माने जाते हैं।

    कोणार्क का सूर्य मंदिर: कोणार्क का सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी ईस्वी में गंगा राजवंश के राजा नरसिंघेव (प्रथम) ने बनवाया था। यह कलिंग शैली में बना है तथा भगवान बिरंचि-नारायण (सूर्य) को समर्पित है। कोणार्क शब्द, कोण और अर्क शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य, जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा। प्रस्तुत कोणार्क सूर्य-मन्दिर का निर्माण लाल रंग के बलुआ पत्थरों तथा काले ग्रेनाइट के पत्थरों से हुआ है। इसे ई.1236-54 में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया।

    यह मन्दिर, भारत के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। कलिंग शैली में निर्मित इस मन्दिर में सूर्य देव को रथ में विराजमान किया गया है तथा पत्थरों को उत्कृष्ट नक्काशी के साथ उकेरा गया है। मन्दिर को बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुए निर्मित किया गया है, जिसमें सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है। वर्तमान में केवल एक घोड़ा बचा है। मन्दिर के आधार को सुन्दरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महीनों को व्यक्त करते हैं तथा प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है, जो दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं। मुख्य मन्दिर तीन मंडपों में बना है। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं।

    तीसरे मण्डप में जहाँ मूर्ति थी, अंग्रेज़ों ने सभी द्वारों को रेत एवं पत्थर भरवा कर बंद करवा दिया था ताकि मन्दिर और क्षतिग्रस्त नहीं हो। मन्दिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं- (1.) बाल्यावस्था-उदित सूर्य - 8 फुट, (2.) युवावस्था-मध्याह्न सूर्य - 9.5 फुट, (3.) प्रौढ़ावस्था-अपराह्न सूर्य-- 3.5 फुट। प्रवेश-द्वार पर दो सिंह हाथियों पर आक्रमण के लिए तत्पर दिखाये गए हैं। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये 28 टन की 8.4 फुट लम्बी, 4.9 फुट चौड़ी तथा 9.2 फुट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार किया है। ये 10 फुट लम्बे एवं 7 फुट चौड़े हैं।

    मंदिर सूर्य देव की भव्य यात्रा को दिखाता है। इसके प्रवेश द्वार पर नट मंदिर है। यहाँ मंदिर की नर्तकियां, सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये नृत्य करतीं थीं। मंदिर में फूल, बेल और ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी की गई है। इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि की प्रतिमाएं भी एन्द्रिक मुद्राओं में प्रदर्शित की गई हैं। इनकी मुद्राएं कामुक हैं और कामसूत्र से लीं गई हैं। मंदिर लगभग खंडहर हो चुका है। यहाँ की शिल्प कलाकृतियों का एक संग्रह, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सूर्य मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित है।

    रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस मन्दिर के बारे में लिखा है-'कोणार्क जहाँ पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।' यह सूर्य मन्दिर भारतीय मन्दिरों की कलिंग शैली का है, जिसमें कोणीय अट्टालिका (मीनार रूपी संरचना) के ऊपर मण्डप की तरह छतरी होती है। आकृति में, यह मंदिर उड़ीसा के अन्य शिखर मंदिरों से भिन्न नहीं लगता है। 229 फुट ऊंचा मुख्य गर्भगृह 128 फुट ऊंची नाट्यशाला के साथ बना है। इसमें बाहर को निकली हुई अनेक प्रतिमाएं हैं।

    मुख्य गर्भ में प्रधान देवता का वास था, किंतु वह अब ध्वस्त हो चुका है। नाट्यशाला अभी पूरी बची है। नट मंदिर एवं भोग मण्डप के कुछ ही भाग ध्वस्त हुए हैं। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फुट गुणा 540 फुट आकार का है। मंदिर पूर्व-पश्चिम दिशा में बना है।

    जगन्नाथ मंदिर: पुरी के जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला प्राचीन काल की है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य देव की प्रतिमा स्थापित है तथा गर्भगृह के ऊपर ऊंचा शिखर बना हुआ है। उसके चारों ओर सहायक शिखर हैं। मंदिर परिसर एक दीवार से घिरा हुआ है, जिसमें से प्रत्येक तरफ एक द्वार है, जिसके ऊपर एक पिरामिड-आकार की छत है। राज्य में सबसे बड़ा मंदिर होने के कारण, इसमें रसोईघर सहित दर्जनों सहायक भवन स्थित हैं। मंदिर के शीर्ष पर अष्टधातुओं के मिश्रण से बना एक पहिया है।

    मुक्तेश्वर मंदिर: यह छोटा मंदिर 10.5 मीटर ऊंचा है। इसके बाहरी हिस्सों पर मूर्तियों का अंकन किया गया है जिनमें देवी-देवताओं के साथ पौराणिक दृश्य भी दर्शाए गए हैं। मंदिर का तोरण द्वारा नक्काशीदार युक्त है। सभा भवन की छत में प्रत्येक पंखुड़ी पर मूर्ति के साथ एक अष्ट-दल कमल की सुंदर चंदवा बनाई गई है।

    लिंगराज मंदिर: भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर 12वीं सदी में बना। यह मंदिर उड़ीसा की स्थापत्य कला का चरम माना जाता है। इसकी ऊँचाई 150 फुट है। इसकी वास्तुकला कलिंग शैली की सर्वाेच्च उपलब्धियों में से एक है।

    राजारानी मंदिर: भुवनेश्वर के राजारानी मंदिर का निर्माण ई.1000 के आसपास हुआ। इस मंदिर ने मध्य भारत के अन्य मंदिरों के वास्तुकला के विकास के लिए विशेष रूप से खजुराहो के मंदिरों का मार्गदर्शन किया। अप्सराओं और मिथुन मूर्तियों की कामुक नक्काशी के कारण प्रेम मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।

    दुर्ग स्थापत्य

    'दुः' का तात्पर्य दुष्कर (कठिन) से है तथा '' का तात्पर्य गमन करने से है। अर्थात् दुर्ग का तात्पर्य उस रचना से है जिस तक गमन करना कठिन होता है। दुर्ग से ही दुर्गम बना है। अतः कहा जा सकता है कि 'दुर्ग' स्थापत्य की वह रचना है जो शत्रु से सुरक्षा तथा युद्ध के लिये विशेष रूप से तैयार की गई हो। सामान्य शब्दों में कहें तो जिस भवन अथवा भवन-समूह के चारों ओर 'प्राकार' (प्राचीर अथवा परकोटा) हो, जिसमें सैनिक सन्नद्ध हों, जिसकी प्राचीर पर युद्ध उपकरण लगे हों, जिसमें शत्रु आसानी से प्रवेश न कर सके, जिसका मार्ग दुर्गम हो, शत्रु जिसमें प्रवेश करके भी राजा तक न पहुँच पाये, आदि गुणों से युक्त भवन को दुर्ग कहा जा सकता है।

    यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक दुर्ग में ये सभी गुण हों। सामान्यतः वह भवन जिसके चारों ओर सुदृढ़ एवं ऊँचा परकोटा हो, दुर्ग कहा जा सकता है। मानव जाति ने दुर्ग अथवा दुर्ग की तरह का परिघा (प्राकार अथवा परकोटा) तथा परिखा (खाई) से युक्त आवासीय बस्तियों की रचना करने की कला मध्य-पाषाण काल में ही सीख ली थी ताकि वह वन्य पशुओं तथा अचानक आक्रमण करने वाले शत्रुओं से अपनी और अपने समूह की रक्षा कर सके। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, प्राकार निर्माण मानव सभ्यता की आवश्यकता बन गया। जब 'राज्य' नामक व्यवस्था आरम्भ हुई तो राजा के लिये दुर्ग का निर्माण करना आवश्यक हो गया।

    ऋग्वेद में दुर्ग अथवा पुर के कई उदाहरण मिलते हैं। उस काल में दुर्ग चौड़े (पृथ्वी), विस्तृत (उर्वी) और और आयस (लौहवर्ण) होते थे और उनके अंदर विस्तृत क्षेत्र होता था-

    वि दुर्गा वि द्विषः पुरा घ्नंति राजान् एषाम्। नयंति दुरिता तिरः।

    रामायण काल के आते-आते दुर्ग-निर्माण के सिद्धांतों में काफी उन्नति हो गई। रामायण में चार प्रकार के किलों का वर्णन आता है। शुक्रनीति में राज्य के सात अंग- राजा, मंत्री, सुहृत, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना बताए गए हैं। अर्थात् इन सात चीजों के होने पर ही राज्य स्थापित हो सकता था। शुक्रनीति में दुर्ग को राज्य का हाथ और पैर कहा गया है-

    दृग मांत्यं सुहच्छोत्रं मुखं कोशो बलं मनः

    हस्तौ पादौ दुर्गे राष्ट्रे राज्यांगानि स्मृतानि हि।।

    मनुस्मृति में कहा गया है कि दुर्ग में स्थित एक धनुर्धारी, दुर्ग से बाहर खड़े सौ योद्धाओं का सामना कर सकता है तथा दुर्ग में स्थित सौ धनुर्धारी, दस हजार सैनिकों से युद्ध कर सकते हैं-

    एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः।

    शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्ग विधीयते।।

    आगे चलकर जब जनपदों, महाजनपदों एवं चक्रवर्ती साम्राज्यों की स्थापना हुई तो एक-एक सम्राट के अधीन कई-कई दुर्ग होने लगे। सम्राट अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये दुर्गों की विशाल शृंखला खड़ी करने लगे। ये दुर्ग-शृंखलाएं बड़े-बड़े साम्राज्यों का आधार बन गईं। यही कारण है कि राजा, महाराजा, सामंत, ठिकानेदार तथा सेनापतियों ने अपनी तथा अपने राज्य अथवा क्षेत्र की सुरक्षा के लिये विभिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण करवाया। समय के साथ, दुर्ग के स्थापत्य एवं शिल्प में विकास होता गया और दुर्गों की रचना जटिल होती चली गई।

    दुर्ग का प्राकार दोहरा और कहीं-कहीं तो तिहारा भी हो गया। भरतपुर के दुर्ग में दुर्ग-प्राचीर के बाहर मिट्टी की प्राचीर बनवाई गई थी ताकि तोप के गोले मिट्टी की दीवार में धंस जायें और दुर्ग का वास्तविक प्राकार सुरक्षित रह सके। दुर्ग के चारों ओर खाई खोदकर उसमें पानी भरने की व्यवस्था की गई ताकि शत्रु आसानी से दुर्ग की प्राचीर तक नहीं पहुँच सके। भारत के अनेक प्राचीन ग्रंथों में दुर्ग सम्बन्धी विवेचन किया गया है जिनमें शुक्रनीति, नरपति जयचर्चा, मनुस्मृति, विष्णुधर्म सूत्र, नीति वाक्यामृत, याज्ञवलक्य स्मृति आदि प्रमुख हैं।

    वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मत्स्य पुराण, श्रीमद्भागवत् पुराण आदि में भी विभिन्न दुर्गों के सम्बन्ध में संदर्भ आए हैं। मत्स्य पुराण में दुर्ग निर्माण की विधि तथा राज्य द्वारा दुर्ग के संगृहीत उपकरणों के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण दिया गया है। महाभारत में छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु स्मृति में भी छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु ने गिरि दुर्ग को अधिक गुणों वाला बताया है, इसमें नाना प्रयत्नों से शत्रु का संहार किया जा सकता है-

    सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत्।

    एषां हि बहुगुण्येन गिरिदुर्ग विशिष्यते।

    मौर्य कालीन सुप्रसिद्ध लेखक कौटिल्य ने दुर्गों की चार प्रमुख कोटियां निर्धारित की हैं- औदुक, पार्वत, धान्वन तथा वन दुर्ग। शुक्रनीति में नौ तरह के दुर्ग- एरण दुर्ग, पारिख दुर्ग, पारिघ दुर्ग, वन दुर्ग, धन्व दुर्ग, जल दुर्ग, गिरि दुर्ग, सैन्य दुर्ग तथा सहाय दुर्ग बताये गए हैं। नरपति जयाचार्य ने आठ प्रकार के दुर्ग बताये हैं। विष्णुधर्मसूत्र में दुर्गों के छः प्रकार इस प्रकार बताये हैं-

    (1.) धन्व दुर्ग: जलविहीन, खुली भूमि पर पांच योजन के घेरे में।

    (2.) महीदुर्ग: प्रस्तर खण्डों या ईंटों से निर्मित प्राकारों वाला।

    (3.) वार्क्ष दुर्ग: जो चारों ओर से एक योजन तक कंटीले एवं लम्बे वृक्षों, कंटीले लता गुल्मों एवं झाड़ियों से युक्त हो।

    (4.) जल दुर्ग: चारों ओर जल से आवृत्त।

    (5.) नृदुर्ग: जो चारों ओर से चतुरंगिणी सेना से सुरक्षित हो।

    (6.) गिरि दुर्ग: पहाड़ों वाला दुर्ग जिस पर कठिनाई से चढ़ा जा सके और जिसमें केवल एक ही संकीर्ण मार्ग हो।

    किला और गढ़ सामान्यतः एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं, किंतु वस्तुतः इनमें थोड़ा अंतर है। किला पहाड़ी पर बनाया जाता है, जबकि गढ़ का निर्माण भूमि पर होता है। दोनों के चारों ओर सुदृढ़ प्राचीर बनाई जाती थी किंतु गढ़ चूंकि भूमि पर निर्मित होता है, अतः उसके चारों ओर खाई भी खोदी जाती थी। धीरे-धीरे गढ़ और किले का अंतर लुप्त हो गया और वर्तमान में गढ़, किला, अरसाल, कोट, बरण, आसेद तथा दुर्ग समान अर्थ वाले प्रतीत होते हैं।

    दुर्ग मूलतः राज्य की सुदृढ़ता एवं सामरिक-शक्ति का प्रतीक माना जाता था। दुर्ग के निर्माण का बुनियादी सिद्धांत प्रायः एक समान रहा है- चारों ओर ऊँचे परकोटे, मजबूत दरवाजे, बुर्ज, कंगूरे, घुमावदार मार्ग इत्यादि। संस्कृत साहित्य में गढ़ की रचना के संदर्भ में 'कपिशीश' नामक एक संरचना का उल्लेख मिलता है। बाद में इन्हें जीवरखा एवं अंगरखा भी कहा जाना लगा। जीवरखा, टेढ़-मेढ़े ढलान युक्त मार्गों पर बनाया गया एक छोटा गढ़ होता था जिसमें सैनिक रखे जाते थे।

    दुर्ग के ऊपर चार-पांच अश्वों के एक साथ चल सकने योग्य चौड़ी प्राचीर बनाई जाती थी इन्हीं पर घुमटियों के रूप में जीवरखे अथवा अंगरखे बनाये जाते थे। यहाँ से दुर्गरक्षक सैनिक, आक्रांता सैनिकों पर तीर, गर्म तेल, पत्थर आदि फैंकते थे। जब तोपों का प्रचलन हो गया तो प्राचीर के ऊपरी हिस्से में मोखे बनाये जाने लगे जिनमें तोपों के मुंह खुलते थे। दुर्ग की प्राचीर को मजबूत बनाने के लिये उसके बीच-बीच में गोलाकार बुर्ज बनाई जाने लगी जो भीतर से पोली होती थी। यह एक प्रकार से कपिशीश का ही परिष्कृत रूप थी। इसके भीतर सैनिक एवं युद्ध सामग्री संगृहीत की जाती थी।

    दुर्ग में स्थित राजा अथवा सम्राट के आवास तक पहुँचने के लिये एक से अधिक संख्या में दरवाजों का निर्माण होता था जिन्हें पोल कहते थे। इन पोलों पर सैनिकों का कड़ा पहरा रहता था। पूर्व की तरफ का दरवाजा सूरजपोल, पश्चिम की ओर का चांदपोल तथा उत्तर की ओर का धु्रवपोल कहलाता था। दुर्ग की प्राचीरों पर पत्थर फैंकने के यंत्र लगाये जाते थे। यह चड़स जैसा यंत्र होता था जिसके माध्यम से पत्थर के गोले दूर तक फैंके जा सकते थे।

    इन यंत्रों का आविष्कार मनुष्य द्वारा उत्तर-वैदिक-काल में कर लिया गया था। इन्हें, ढेंकुली, नालि, भैंरोयंत्र तथा मरकटी यंत्र आदि नामों से पुकारा जाता था। इन यंत्रों का उपयोग सोलहवीं शताब्दी ईस्वी तक अर्थात् तब तक होता रहा जब तक कि भारतीय शासकों को तोपें और बंदूकें प्राप्त नहीं हो गईं। हिन्दू किलों को तोड़ना अत्यंत कठिन होता था। मुगलों ने हिन्दू किलों को तोड़ने में मुख्यतः तीन प्रकार की रचनाएं काम में लीं- पाशीब, साबात तथा बारूद।

    किले की प्राचीर के बाहर किले की ऊंचाई तक मिट्टी तथा पत्थरों की सहायता से चबूतरा बनाया जाता था जिसे पाशीब कहते थे। पाशीब का निर्माण सरल नहीं था क्योंकि पाशीब बनाने वाले शिल्पियों एवं सैनिकों पर दुर्ग की प्राचीर से पत्थर के गोले एवं तीर बरसाये जाते थे। उन्हें सुरक्षा देने के लिये साबात बनाये जाते थे। साबात गाय, बैल, भैंस या भैंसे आदि पशुओं के मोटे चमड़े की छावन को कहते थे। किले से बरसने वाले पत्थरों एवं तीरों की मार से बचने के लिये मोटे चमड़े की लम्बी छत बनाई जाती थी जिसके नीचे रहकर सैनिक दुर्ग की दीवार तक पहुँच जाते थे तथा दुर्ग की नींव एवं दीवारों में बारूद भरकर उसमें विस्फोट करते थे।

    अकबर ने चित्तौड़ के किले को तोड़ने के लिये ये तीनों तरीके काम में लिए थे। दुर्ग के भीतर सम्पूर्ण नगर बसाने, खेती करने एवं पशु पालन करने की भी परम्परा थी ताकि यदि दुर्ग को शत्रु द्वारा घेर लिया जाये तो लम्बे समय तक दुर्ग के भीतर खाद्य एवं अन्य जीवनोपयोगी सामग्री की उपलब्धता बनी रह सके।

    चित्तौड़ दुर्ग, रणथंभौर दुर्ग, जालोर दुर्ग तथा सिवाना दुर्ग सहित अनेक किलों पर मुसलमान शासकों ने कई-कई वर्ष लम्बे घेरे डाले किंतु दुर्ग के भीतर की स्वावलम्बी व्यवस्था के कारण वे दुर्ग पर तभी विजय प्राप्त कर सके जब या तो दुर्ग के भीतर रसद सामग्री समाप्त हो गई या किसी अपने ने दुर्ग के गुप्त-मार्गों के भेद, आक्रमणकारी को दे दिये। जालोर, सिवाना, रणथंभौर, जैसलमेर आदि दुर्गों का पतन ऐसे ही धोखों से हुआ था।

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