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  • अध्याय - 36 भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (1)

     14.02.2020
    अध्याय - 36 भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (1)

    भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला (प्राचीन स्थापत्य, इण्डो-सारसैनिक, राजपूत एवं मुगल स्थापत्य) (1)


    भारतीय कलात्मक संस्कृति का प्रभाव न केवल बाइजेण्टाइन (पूर्वी रोमन साम्राज्य) कला में, अपितु मध्ययुग के गोथिक शैली के चर्चों में भी स्पष्टतः खोजा जा सकता है। - ई. बी. हावेल।


    'वास्तु' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा की 'वस्' धातु से हुई है जिसका अर्थ 'बसना' होता है। बसने के लिये भवन की आवश्यकता होती है अतः 'वास्तु' का अर्थ 'रहने हेतु भवन' है। 'वस्' धातु से ही वास, आवास, निवास, बसति, बस्ती आदि शब्द बने हैं। नगर-निर्माण योजना एवं भवन निर्माण योजना बनाने वाले मुख्य व्यक्ति को 'स्थपति' कहते थे। 'स्थपति से ही 'स्थापत्य' शब्द बना है जिसका अर्थ नगर एवं भवन निर्माण कला है।

    स्थापत्य कला को कलाओं की रानी कहा जाता है। भारत में स्थापत्य कला का सर्वप्रथम विकास सिंधु घाटी सभ्यता में देखने को मिलता है। यह नगरीय सभ्यता थी जिसमें पक्के घरों का निर्माण किया गया था। वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल की सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण थी तथा इस काल के आर्य कच्ची झौंपड़ियों में रहना अधिक पसंद करते थे। यद्यपि वेदों में पुरों का उल्लेख हुआ है तथापि उस काल के पुरों के कोई अवशेष उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। ये संभवतः प्राकार से घिरे हुए लघु ग्राम ही थे।

    महाभारत कालीन सभ्यता के अवशेष कुरुक्षेत्र एवं मेरठ के पास की खुदाइयों में मिले हैं। इस काल तक सभ्यता काफी विकसित हो चुकी थी तथा मनुष्य ताम्र-सभ्यता की अवस्था में पहुँच गया था। मौर्यकालीन सभ्यता से लेकर गुप्तकालीन, हर्षकालीन, राजपूत कालीन, दिल्ली सल्तनत कालीन, मुगल कालीन एवं ब्रिटिश कालीन स्थापत्य कला के साक्ष्य प्रचुरता से प्राप्त होते हैं। इस कला के इतिहास एवं विभिन्न तत्त्वों के बारे में अलग अध्याय में विस्तार से चर्चा की गई है।

    प्राचीन नगर निर्माण कला

    प्राचीन आर्यों के नगरों के नाम महावन, तोरण एवं गोपुर आदि मिलते हैं जिनसे अनुमान होता है कि ये बसावटें जंगलों एवं गौचरों आदि में विकसित हुई होंगी तथा इनके आवास कच्चे अर्थात् घास-फूस एवं मिट्टी से बनते होंगे। इस कारण उस काल के स्थापत्य के अवशेष नहीं मिलते हैं। जब पक्के भवनों का निर्माण होने लगा तो नगरों की स्थापना निश्चित नगर-योजना के आधार पर होने लगी।

    ई.पू. 8वीं शती में मगध की राजधानी राजगृह उन्नति के शिखर पर थी। यद्यपि उस काल के पक्के भवन भी आदिकालीन झोपड़ियों के नक्शे के आधार पर गोलाकार ही बनते थे तथापि उनकी दीवारों में चौकोर दरवाजे एवं खिड़कियाँ लगते थे। बौद्ध लेखक धम्मपाल के अनुसार, ईसा पूर्व पाँचवीं शती में महागोविन्द नामक स्थपति ने उत्तर भारत की अनेक राजधानियों के विन्यास (नक्शे अथवा नगर योजना) तैयार किए थे। चौकोर नगरियों के मध्य-भाग में एक दूसरे को समकोण पर काटने वाली दो-दो मुख्य सड़कें बनाई गई थीं जो सम्पूर्ण नगरी को चार भागों में बाँट देती थीं।

    एक भाग में राजमहल होते थे जिनके विस्तृत वर्णन मिलते हैं। सड़कों के चारों छोरों पर नगरद्वार होते थे। मौर्यकाल (ई.पू. चौथी शती) के अनेक नगर यथा कपिलवस्तु, कुशीनगर, उरुबिल्व आदि एक ही नक्शे अथवा नगर-योजना के अनुसार बने थे। इनके नगरद्वार भी एक जैसे थे। इन नगरों से मिले भवनों के अवशेषों में बाहर निकले हुए छज्जों, अलंकृत गवाक्षों एवं स्तंभों से बौद्धकालीन नगरियों की भावुकता का आभास होता है।

    अशोक की भाँति कनिष्क भी बहुत बड़ा निर्माता था। उसने दो नगरों का निर्माण करवाया। उसने एक नगर तक्षशिला के समीप बनवाया जिसके खंडहर आज भी विद्यमान हैं। यह नगर 'सिरपक' नामक स्थान पर बसाया गया था। कनिष्क ने दूसरा नगर काश्मीर में बसाया था जिसका नाम कनिष्कपुर था।

    मौर्य कालीन स्थापत्य कला

    मौर्य कालीन स्थापत्य कला के स्मारक पाँच स्वरूपों में प्राप्त होते हैं-

    (1.) आवासीय भवन (2.) राजप्रासाद (3.) गुहा-गृह (4.) स्तम्भ तथा (5.) स्तूप।

    (1.) आवासीय भवनों का निर्माण: अशोक के पूर्व जो आवासीय भवन बने थे, वे ईटों तथा लकड़ी से निर्मित हुए। अशोक के शासन-काल में भवन निर्माण में लकड़ी तथा ईटों के स्थान पर पाषाण का प्रयोग आरम्भ हो गया। जो काम लकड़ी तथा ईटों पर किया जाता था, इस काल में वह पत्थर पर किया जाने लगा। काश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में ललितपाटन नामक नगरों की स्थापना उसी के शासन-काल में हुई थी।

    (2.) राजप्रासाद का निर्माण: मेगस्थिनीज ने पाटलिपुत्र में बने सुंदर राजप्रासाद का वर्णन किया है। यह राजप्रासाद इतना सुन्दर था कि इसके निर्माण के सात सौ वर्ष बाद जब फाह्यान ने इसे देखा तो वह आश्चर्य चकित रह गया। उसने लिखा है कि अशोक के महल एवं भवनों को देखकर लगता है कि इस लोक के मनुष्य इन्हें नहीं बना सकते। ये तो देवताओं द्वारा बनवाये गये होंगे। पटना से इस मौर्यकालीन विशाल राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

    एरियन के अनुसार यह राजप्रासाद कारीगरी का एक आश्चर्यजनक नमूना है। राज-प्रासाद के अवशेषों में चंद्रगुप्त मौर्य की राजसभा भी मिली है। पतंजलि ने इस राजसभा का वर्णन किया है। यह सभा एक बहुत ही विशाल मण्डप के रूप में है। मण्डप के मुख्य भाग में, पूर्व से पश्चिम की ओर 10-10 स्तम्भों की 8 पंक्तियां हैं। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार यह ऐतिहासिक युग का प्रथम विशाल अवशेष है जिसके दिव्य स्वरूप को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाता है। उसके विभ्राट स्वरूप की स्थायी छाप मन पर पड़े बिना नहीं रह सकती।

    (3.) गुहा स्थापत्य: बिहार में गया के पास बराबर एवं नागार्जुनी की पहाड़ियों में मौर्यकालीन सात गुहा-गृह प्राप्त हुए हैं। बराबर पर्वत समूह से चार गुफाएं मिली हैं- कर्ण चोपड़ गुफा, सुदामा गुफा, लोमस ऋषि गुफा तथा विश्व झौंपड़ी गुफा। नागार्जुनी पहाड़ियों से तीन गुफाएं मिली हैं- गोपी गुफा, वहियका गुफा तथा वडथिका गुफा। इन गुहा-गृहों का निर्माण मौर्य-सम्राट अशोक तथा दशरथ के शासन काल में किया गया था। ये गुहा-गृह शासकों की ओर से आजीवकों को दान में दिये गये थे। इन गुहा-गृहों की दीवारें आज भी शीशे की भाँति चमकती हैं।

    (4.) स्तम्भ: सांची तथा सारनाथ में अशोक के काल में बने तीस से चालीस स्तम्भ आज भी विद्यमान हैं। इनका निर्माण चुनार के बलुआ पत्थरों से किया गया है। इन स्तम्भों पर की गई पॉलिश शीशे की तरह चमकती है। ये स्तम्भ चालीस से पचास फुट लम्बे हैं तथा एक ही पत्थर से निर्मित हैं। इनका निर्माण शुण्डाकार में किया गया है। ये स्तम्भ नीचे से मोटे तथा ऊपर से पतले हैं। इन स्तम्भों के शीर्ष पर अंकित पशुओं की आकृतियाँ सुंदर एवं सजीव हैं। शीर्ष भाग की पशु आकृतियों के नीचे महात्मा बुद्ध के धर्म-चक्र प्रवर्तन का आकृति चिह्न उत्कीर्ण है। इन स्तम्भों के शीर्ष पर अत्यंत सुंदर, चिकनी एवं चमकदार पॉलिश की गई है जो मौर्य काल की विशिष्ट उपलब्धि है।

    लौरिया नंदन स्तम्भ के शीर्ष पर एक सिंह खड़ा है। संकिसा स्तम्भ के शीर्ष पर एक विशाल हाथी है तथा रामपुरवा के स्तम्भ शीर्ष पर एक वृषभ है। अशोक के स्तम्भों में सबसे सुंदर एवं सर्वोत्कृष्ट सारनाथ के स्तम्भ का शीर्षक है। सारनाथ स्तम्भ के शीर्ष पर चार सिंह एक दूसरे की ओर पीठ किये बैठे हैं। मार्शल के अनुसार ईस्वी शती पूर्व के संसार में इसके जैसी श्रेष्ठ कलाकृति कहीं नहीं मिलती। ऊपर की ओर बने सिंहों में जैसी शक्ति का प्रदर्शन है, उनकी फूली हुई नसों में जैसी प्राकृतिकता है, और उनकी मांसपेशियों में जो तनाव है और उनके नीचे उकेरी गई आकृतियों में जो प्राणवंत वास्तविकता है, उसमें कहीं भी आरम्भिक कला की छाया नहीं है।

    (5.) स्तूप: मौर्य कालीन स्थापत्य कला में स्तूपों का स्थान भी महत्वपूर्ण है। स्तूप निर्माण की परम्परा लौह कालीन तथा महापाषाणकालीन बस्तियों के समय से आरंभ हो चुकी थी किंतु अशोक के काल में इस परम्परा को विशेष प्रोत्साहन मिला। स्तूप ईंटों तथा पत्थरों के ऊँचे टीले तथा गुम्बदाकार स्मारक हैं। कुछ स्तूपों के चारों ओर पत्थर, ईंटें अथवा ईंटों की जालीदार बाड़ लगाई गई है। इन स्तूपों का निर्माण बुद्ध अथवा बोधिसत्व (सत्य-ज्ञान प्राप्त बौद्ध मतावलम्बी) के अवशेष रखने के लिये किया जाता था। बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक ने लगभग चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण करवाया था। इनमें से कुछ स्तूपों की ऊँचाई 300 फुट तक थी।

    चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत तथा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में इन स्तूपों को खड़े देखा था। वर्तमान में कुछ स्तूप ही देखने को मिलते हैं। इनमें मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट स्थित सांची का स्तूप प्रसिद्ध है। इसकी ऊँचाई 77.5 फुट, व्यास 121.5 फुट तथा इसके चारों ओर लगी बाड़ की ऊँचाई 11 फुट है। इस स्तूप का निर्माण अशोक के काल में हुआ तथा इसका विस्तार अशोक के बाद के कालों में भी करवाया गया। इस स्तूप की बाड़ और तोरणद्वार कला की दृष्टि से आकर्षक एवं सजीव हैं।

    साँची, भरहुत, कुशीनगर, बेसनगर (विदिशा), तिगावाँ (जबलपुर), उदयगिरि, प्रयाग, कार्ली (मुम्बई), अजन्ता, एलोरा, विदिशा, अमरावती, नासिक, जुनार (पूना), कन्हेरी, भुज, कोंडेन, गांधार (वर्तमान कंधार-अफगानिस्तान), तक्षशिला पश्चिमोत्तर सीमान्त में ईस्वी पूर्व चौथी शती से चौथी शती ईस्वी तक की वास्तुकृतियाँ कला की दृष्टि से अनूठी हैं। सर जॉन मार्शल ने 'भारत का पुरातत्व सर्वेक्षण 1912-13' में लिखा है कि- 'वे भवन तत्कलीन वास्तुकला की अद्वितीय सूक्ष्मता और पूर्णता का दिग्दर्शन कराते हैं। उनके कारीगर आज भी यदि संसार में आ सकते, तो अपनी कला के क्षेत्र में कुछ विशेष सीखने योग्य शायद न पाते।'

    दक्षिण भारत में गुंतूपल्ले (कृष्ण जिला) और शंकरन् पहाड़ी (विजगापट्टम् जिला) में शैलकृत्त वास्तु के दर्शन होते हैं। साँची, नालन्दा और सारनाथ में अपेक्षाकृत बाद की वास्तुकृतियाँ हैं।

    मौर्यकाल की कला पर विदेशी प्रभाव

    स्पूनर, मार्शल तथा निहार रंजन रे आदि अनेक विद्वानों ने मौर्यकाल की कला को भारतीय नहीं माना है। इन विद्वानों ने मौर्य काल की कला पर ईरानी कला का प्रभाव माना है। स्पूनर ने लिखा है कि पाटलिपुत्र का राजभवन फारस के राजमहल का प्रतिरूप था। स्मिथ ने लिखा है कि मौर्यों की कला ईरान तथा यवनों से प्रभावित हुई है। सिकंदर के आक्रमण के समय विदेशी सैनिक तथा शिल्पी भारत में बस गये थे, उन्हीं के द्वारा अशोक ने स्तम्भों का निर्माण करवाया। स्मिथ की मान्यता है कि अशोक से पहले, भारत में भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग नहीं किया जाता था।

    विदेशी कलाकारों द्वारा इसे संभव किया गया। इन विद्वानों की धारणा को नकारते हुए अरुण सेन ने लिखा है कि मौर्य कला तथा फारसी कला में पर्याप्त अंतर है। फारसी स्तम्भों में नीचे की ओर आधार बनाया जाता था जबकि अशोक के स्तम्भों में कोई आधार नहीं बनाया गया है। मौर्य स्तम्भ का लम्बा भाग गोलाकार है एवं चमकदार पॉलिश से युक्त है जबकि फरसी स्तम्भों में चमकदार पॉलिश का अभाव है। अतः मौर्य कला पर फारसी प्रभाव होने की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मौर्य कला अपने आप में पूर्णतः भारत में विकसित होने वाली कला है।

    दूसरी शताब्दी ईस्वी के विदेशी शासक कनिष्क ने अपनी राजधानी पुष्पपुर में 400 फुट ऊँचा लकड़ी का स्तम्भ तथा बौद्ध-विहार बनवाया। यहीं पर उसने एक पीतल की मंजूषा में बुद्ध के अवशेष रखवाकर एक स्तूप बनवाया। इस स्तूप का निर्माण कनिष्क ने एक यूनानी शिल्पकार से करवाया। अपने साम्राज्य के अन्य भागों में भी कनिष्क ने बहुत से विहार तथा स्तूप बनवाये। चीनी यात्री फाह्यान ने गान्धार में कनिष्क द्वारा बनवाये गये विहारों तथा स्तूपों को देखा था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 170 विहारों तथा स्तूपों का वर्णन किया है।

    हिन्दू स्थापत्य कला

    मौर्य काल के बाद हिन्दू स्थापत्य का तेजी से विकास हुआ। हिन्दू स्थापत्य दो रूपों में मिलता है-

    (1.) निजी उपयोग के भवन,

    (2.) सार्वजनिक उपयोग के भवन। निजी उपयोग के भवन प्रायः आवासीय थे। इनमें जन-साधारण के छोटे घरों से लेकर राजाओं के भव्य प्रासाद एवं सामंतों की हवेलियां तक सम्मिलित थे जबकि सार्वजनिक स्थापत्य कला में मंदिर, दुर्ग, उद्यान एवं जलाशय आदि आते थे। सार्वजनिक स्थापत्य के विकास में चार कारण प्रतीत होते हैं- (1.) धार्मिक प्रेरणा, (2.) सामरिक आवश्यकता, (3.) ऐश्वर्य, विलास एवं प्रतिष्ठा की आकांक्षा (4.) जनकल्याण की भावना।

    भारत में सार्वजनिक स्थापत्य की परम्परा अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में जलाशयों, मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों का निर्माण पूर्त-धर्म माना जाता था। याज्ञवलक्य स्मृति की टीका मिताक्षरा में स्त्रियों एवं विधवाओं को भी पूर्त-धर्म हेतु धन व्यय करने की अनुमति दी गई है। प्राचीन काल में सार्वजनिक लाभ एवं उपयोग के लिए दातव्य कार्यों एवं वस्तुओं से सम्बन्धित नियम बने हुए थे।

    स्मृतियों के अनुसार लोगों को कुएं, बांध जलयंत्र इत्यादि बनवाने चाहिए। कुछ ग्रंथकारों ने लिखा है कि यज्ञों से केवल स्वर्ग मिलता है परंतु मंदिरों एवं तालाबों के निर्माण से मुक्ति हो जाती है। स्मृति चंद्रिका, कात्यायन आदि ग्रंथों से ज्ञात होता है कि राजा लोग मंदिरों, तड़ागों, कूपों आदि सम्पत्तियों पर दृष्टि रखते थे और उन पर विपत्ति आने पर उनकी रक्षा करते थे।

    मंदिर स्थापत्य कला

    मंदिर मुख्यतः धार्मिक वास्तु है जिसमें भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट विकास देखने को मिलता है। देवी-देवताओं के मूर्त रूपों की पूजा हेतु मूर्ति स्थापना के लिए जो सुंदर भवन निर्मित हुए, वही भवन मंदिर कहलाए। मंदिरों की कल्पना ईश्वर के आवास के रूप में की जाती है इसलिए ईश्वर के प्रिय स्थलों को प्रतीकात्मक रूप में मंदिर में उत्कीर्ण किया जाता है। यही कारण है कि नदियां एवं उद्यान आदि के अंकन का मंदिर-वास्तुकला में प्रमुख स्थान है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्रतीकों का अंकन करके उपासकों एवं श्रद्धालुओं का मन एवं मस्तिष्क ईश्वर के ध्यान एवं दर्शन के लिए तैयार किया जाता है।

    भारतीय साहित्य में हिन्दू मंदिर की संकल्पना एक पर्वत के रूप में की गई है, जहाँ देवगण निवास एवं क्रीड़ा करते हैं। इस संकल्पना का आधार विष्णुधर्मोत्तर पुराण है। बृहत्संहिता तथा भविष्य पुराण के अनुसार तीर्थों एवं धर्म-क्षेत्रों में देवताओं की उपस्थिति अनुभव की जा सकती है। बृहत्संहिता तथा मत्स्य पुराण में पर्वतों की सूची में उद्धृत प्रथम तीन पर्वतों- मरु, मन्दर तथा कैलाश का नाम मंदिरों के अन्तर्गत भी आता है। मंदिरों की कल्पना पर्वतों के रूप में न केवल स्थापत्य-ग्रंथों में मिलती है अपितु साहित्य तथा अभिलेखों में भी प्राप्त होती है।


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