• अध्याय -34 भारतीय कलाएँ

     02.06.2020
    अध्याय -34 भारतीय कलाएँ

    भारतीय कलाएँ


    किसी भी राष्ट्रीय कला का वास्तविक मूल्यांकन करते समय हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि उस कला ने क्या उधार लिया है अपितु यह देखना चाहिए कि उसने क्या दिया है। इस प्रकाश में देखने पर भारतीय कला को यूरोप या एशिया में महान स्कूलों में भी महानतम स्थान पर रखना चाहिए। - ई. बी. हावेल।


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    आर्यों के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद (ई.पू.4000 से ई.पू.1000) में कला शब्द का प्रयोग हुआ है- 'यथा कला, यथा शफ, मध, शृण स नियामति।' भरतमुनि (ई.पू.400 से ई.100 के बीच किसी समय) ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में भी कला शब्द का प्रयोग किया है- 'न तज्जानं न तच्छिल्पं न वाधि न सा कला।' अर्थात् ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जिसमें कोई शिल्प नहीं, कोई विधा नहीं या जो कला न हो। भरतमुनि द्वारा प्रयुक्त 'कला' का आशय 'ललित कला' से लगाया जाता है और 'शिल्प' का आशय सम्भवतः किसी उपयोगी कला से। सामान्यतः कला उन क्रियाओं को कहते हैं जिन्हें करने के लिए थोड़ी चतुराई अथवा कौशल की आवश्यकता होती है। भारतीय कला-चिंतन में मन की सात्विक प्रवृत्तियों को उजागर करने पर बल दिया गया है।

    कला के उद्देश्य

    'कला' सृजन के अनेक उद्देश्य होते हैं। कला में आत्म-चैतन्य की प्रधानता होती है। कला का विचार भौतिक स्वरूप में प्रकट होता है किन्तु उसका उद्देश्य वस्तु के भौतिक स्वरूप को दर्शाना मात्र नहीं होता अपितु उसके आन्तरिक लक्षणों को भी दर्शाना होता है जिसमें कलाकार के अन्तर्मन की प्रतिच्छाया देखी जा सकती है। 'कला' मनुष्य को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है। भारतीय कलाकारों का मुख्य उद्देश्य स्थूल में सूक्ष्म की चेतना को जागृत करना रहा है।

    कला-सृजन के द्वारा मन और आत्मा का सौन्दर्य से साक्षात्कार होता है तथा आत्मा को शांति का अनुभव होता है। कला के माध्यम से रूप और सौन्दर्य का सृजन होता है। कला 'अव्यक्त' को 'व्यक्त' और 'अमूर्त' को मूर्त रूप प्रदान करती है। भारतीय दृष्टिकोण से कला 'रसानुभूति' के लिए किया गया 'सृजन' है। कला मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। दार्शनिकों के अनुसार 'कला ही जीवन है।' वास्तव में कला जीवन जीने का ढंग है। कला के द्वारा मनुष्य जीवन को पूर्णता प्राप्त होती है। कला मनुष्य की चेतना को स्पर्श करती है।

    कला की परिभाषाएँ

    'कला' वह मानवीय क्रिया है, जिसमें मानव की प्रकृति, रूप और भाव सम्मिलित रहते हैं। पाश्चात्य चिंतन में 'कला' शब्द का प्रयोग शारीरिक या मानसिक कौशल के लिए होता है। कौशलविहीन या बेढंग से किये गये कार्यों को कला नहीं माना जाता। आधुनिक काल में 'कला' की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं जिनमें से कुछ के अनुसार 'कला' मानवीय भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है। 'कला' कल्याण की जननी है। कल्पना की सौन्दर्यात्मक अभिव्यक्ति का नाम ही 'कला' है।

    कल्पना की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से एवम् भिन्न-भिन्न माध्यमों से हो सकती है। कला का उद्गम सौन्दर्य की प्रेरणा से हुआ है। अतः ललित का आकलन ही कला है। प्रत्येक प्रकार की कलात्मक प्रक्रिया का लक्ष्य सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है। महाकवि कालीदास (गुप्तकालीन) ने 'रघुवंश' में 'ललिते कला विधौ' का उल्लेख इसी प्रसंग में किया है। भगवतशरण उपाध्याय के अनुसार, 'अभिराम अंकन चाहे वह वाग्विलास के क्षेत्र में हों, चाहे राग-रेखाओं में, चाहे वास्तु-शिल्प में, वह कला ही है।' जयशंकर प्रसाद के अनुसार- 'ईश्वर की कर्त्तव्य-शक्ति का मानव द्वारा शारीरिक तथा मानसिक कौशलपूर्ण निर्माण कला है।'

    कला और विज्ञान में अंतर

    कला और विज्ञान में बहुत अंतर है। विज्ञान में ज्ञान का प्राधान्य है, कला में कौशल और कल्पना का। विज्ञान में प्रामाणिकता का निर्णय सूंघकर, चखकर, देखकर, नापकर, तौलकर तथा प्रयोगशाला में परख कर किया जाता है जबकि कला को प्रामाणिकता की आवश्यकता नहीं होती, उसका निर्णय मनुष्य की रसानुभूति करती है। विज्ञान की कृति हर काल, देश एवं परिस्थिति में एक जैसा परिणाम एवं प्रभाव उत्पन्न करती है जबकि 'कला' की रसानुभूति देश, काल एवं पात्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

    कला और प्रकृति में अंतर

    'कला' का कार्य 'प्रकृति' के कार्य से भिन्न है। कला का अर्थ है- रचना करना अर्थात् उसमें कृत्रिमता है जबकि प्रकृति में कृत्रिमता नहीं होती। कला उस प्रत्येक कार्य में है जो मनुष्य करता है जबकि प्रकृति स्वतः-स्फूर्त रचना है। कला को प्रकृति से प्रेरणा प्राप्त होती है। कला को कौशल की आवश्यकता होती है जबकि प्रकृति को किसी कौशल की आवश्यकता नहीं होती। कला में कल्पना होती है जबकि प्रकृति कल्पना से भी विचित्र होती है।

    कला के प्रकार

    वात्स्यायन केे ग्रंथ कामसूत्र, उशनस् के ग्रंथ शुक्रनीति, जैन ग्रंथ प्रबंधकोश, कलाविलास तथा ललितविस्तर आदि ग्रंथों में कला एवं उसके प्रकारों की चर्चा हुई है। अधिकतर ग्रंथों में कलाओं की संख्या 64 दी गई है। प्रबंधकोश आदि कुछ ग्रंथों में 72 कलाओं की सूची मिलती है। ललितविस्तर में 86 कलाओं के नाम गिनाये गये हैं। प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेंद्र ने अपने ग्रंथ कलाविलास में सर्वाधिक संख्या में कलाओं का वर्णन किया है। उसमें 64 जनोपयोगी, 32 धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष सम्बन्धी, 32 मात्सर्य-शील-प्रभावमान सम्बन्धी, 64 स्वच्छकारिता सम्बन्धी, 64 वेश्याओं सम्बन्धी, 10 भेषज सम्बन्धी, 16 कायस्थ सम्बन्धी कलाओं तथा 100 सार-कलाओं की चर्चा की गई है। सबसे अधिक प्रामाणिक सूची कामसूत्र की है।

    कलाओं का वर्गीकरण

    भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में कलाओं का वर्गीकरण 'गौण' एवं 'मुख्य' कलाओं के रूप में किया गया है। यही कलाएं आगे चलकर 'कारू' और 'चारू' कलाएँ कहलाईं जिन्हें 'आश्रित' और 'स्वतंत्र' कलाएं भी कहा जा सकता है। विद्वानों ने काव्य, संगीत, चित्र-शिल्प, नृत्य-नाट्य और वास्तु आदि में तादात्म्य स्थापित करते हुए, इन्हें कला में सम्मिलित किया है। ये सभी ललित कलाएँ स्वतंत्र रूप में पहचानी जाती हैं। आधुनिक काल में कला को मानविकी विषय के अन्तर्गत रखा जाता है जिसमें इतिहास, साहित्य, दर्शन और भाषा-विज्ञान आदि भी आते हैं। पाश्चात्य संस्कृति में कला के दो भेद किये गए हैं-

    (1.) उपयोगी कलाएँ (च्तंबजपबम ।तजे) तथा

    (2.) ललित कलाएँ (थ्पदम ।तजे)।

    परम्परागत रूप से लोकप्रिय कलाओं के मुख्य प्रकार इस प्रकार हैं-

    (1.) स्थापत्य कला (।तबीपजमबजनतम),

    (2.) मूर्त्तिकला (ैबनसचजनतम),

    (3.) चित्रकला (च्ंपदजपदह),

    (4.) संगीत (डनेपब),

    (5.) काव्य (च्वमजतल),

    (6.) नृत्य (क्ंदबम),

    (7.) रंगमंच (ज्ीमंजमत ंदक ब्पदमउं)।

    आधुनिक काल में फोटोग्राफी, चलचित्रण, विज्ञापन और कॉमिक्स के साथ-साथ अन्य विषय भी कला के प्रकारों में जुड़ गये हैं। आधुनिक काल की कलाओं को निम्नलिखित प्रकार से श्रेणीकृत कर सकते हैं-

    (1.) साहित्य- काव्य, उपन्यास, लघुकथा, महाकाव्य आदि;

    (2.) निष्पादन कलाएँ (च्मतवितउपदह ंतजे)- संगीत, नृत्य, रंगमंच;

    (3.) पाक कला (ब्नसपदंतल ंतजे)- बेकिंग, चॉकलेटरिंग, मदिरा बना;

    (4.) मीडिया कला- फोटोग्राफी, सिनेमेटोग्राफी, विज्ञापन;

    (5.) दृष्य कलाएँ- ड्राइंग, चित्रकला, मूर्त्तिकला आदि।

    कुछ कलाओं में दृश्य और निष्पादन दोनों के तत्त्व मिश्रित होते हैं, जैसे फिल्म।

    भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य

    भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य सैन्धव सभ्यता (ई.पू.3500 से ई.पू.1500 के बीच) की खुदाई में उपलब्ध सामग्री से प्राप्त हुए हैं। सैंधव सभ्यता में नगर-निर्माण कला, भवन निर्माण कला, कूप निर्माण कला, मूर्तिकला, नृत्य कला, संगीत कला, धातुकला, वस्त्र निर्माण कला, मिट्टी के बर्तन निर्माण कला, मुद्रा निर्माण कला आदि विविध कलाओं के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इस सभ्यता से मंदिर निर्माण कला के साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। सैंधव सभ्यता के बाद विविध कलाओं के साक्ष्य मौर्य काल (ई.पू.322 से ई.पू.184) में मिलते हैं तथा इसके बाद भारतीय कलाओं के साक्ष्य निरंतर मिलते हैं।

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  • अध्याय -35 भारतीय मूर्ति-कला

     02.06.2020
    अध्याय -35 भारतीय मूर्ति-कला

    भारतीय मूर्ति-कला


    सर्वोत्तम भारतीय मूर्ति सर्वोत्तम यूनानी मूर्ति की अपेक्षा अनुभूति के गहनतर स्वर और उत्कृष्ट मनोभावों को स्पर्श करती है। - ई. बी. हावेल।


    सैन्धव-मूर्तियाँ

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    सैन्धव सभ्यता के काल से ही आग में पकी हुई मिट्टी की मूर्तियाँ, चूड़ियाँ, बर्तन, खिलौने एवं मुहरें बड़ी संख्या में मिलने लगती हैं। पूजा में प्रयुक्त होने वाले लिंग, योनियाँ, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों के अंकन वाली मुहरें, योगी एवं योगिनी के अंकनों से युक्त मुहरें प्राप्त हुई हैं जिनसे उस काल के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, नृत्य, संगीत आदि विभिन्न कलाओं की जानकारी मिलती है। ये मृण्मूर्तियाँ सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं। इन मूर्तियों से ज्ञात होता है कि सिंधु सभ्यता के निवासियों ने लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं का विकास कर लिया था।

    सिंधु सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है किंतु उस काल की मूर्तियों, मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से उस काल की सभ्यता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इन मुद्राओं पर परमपुरुष, परमनारी एवं प्रजनन देवी की आकृतियां अंकित हैं। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान भी मिले हैं।

    मौर्य कालीन मूर्तिकला

    पाटलिपुत्र, मथुरा, विदिशा तथा अन्य कई क्षेत्रों से मौर्यकालीन पत्थर की मूर्तियाँ मिली हैं। इन पर मौर्य काल की विशिष्ट चमकदार पॉलिश मिलती है। इन मूर्तियों में यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियाँ सर्वाधिक सजीव एवं सुंदर हैं। इन्हें मौर्यकालीन लोककला का प्रतीक माना जाता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध दीदारगंज (पटना) से प्राप्त चामरग्राहिणी यक्षी की मूर्ति है जो पौने सात फुट ऊँची है। यक्षी का मुखमण्डल अत्यंत सुंदर है। अंग-प्रत्यंग में समुचित भराव कला की सूक्ष्म छटा है।

    मथुरा के परखम गांव से प्राप्त यक्ष-मूर्ति भी 8 फुट 8 इंच की है। इसके कटाव में सादगी है तथा अलंकरण कम है। बेसनगर की स्त्री मूर्ति भी इस काल की मूर्तियों में विशिष्ट स्थान रखती है। अशोक के स्तम्भ शीर्षों पर बनी हुई विभिन्न पशुओं की मूर्तियाँ उस काल की सर्वश्रेष्ठ मूर्तियाँ हैं। पटना, अहिच्छत्र, मथुरा, कौशाम्बी आदि में मिले भग्नावशेषों से बड़ी संख्या में मौर्यकालीन मृण्मूर्तियाँ प्राप्त की गई हैं। ये कला की दृष्टि से सुंदर हैं तथा मौर्य काल के परिधान, वेशभूषा एवं आभूषणों की जानकारी देती हैं। बुलंदीबाग (पटना) से प्राप्त मौर्य कालीन नर्तकी की मृण्मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

    मूर्तिकला पर विदेशी प्रभाव

    मौर्य साम्राज्य के बिखर जाने के बाद भारत में यूनानी, शक, कुषाण, हूण पह्लव एवं सीथियन आदि जातियाँ प्रवेश कर गईं। इन्होंने भारत के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। इस कारण भारतीय कला पर विदेशी कला, विशेषकर गान्धार-शैली का बहुत प्रभाव हो गया।

    कनिष्क कालीन मूर्तिकला

    रॉलिसन ने लिखा है- 'भारतीय संस्कृति के इतिहास में कुषाण काल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण युग है।' कनिष्क के काल में मूर्तिकला की खूब उन्नति हुई। मथुरा में इस काल की कई मूर्तियाँ मिली हैं। कनिष्क काल की मथुरा शैली की मूर्तियाँ सरलता से पहचानी जाती हैं क्योंकि इनके निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग हुआ है जो मथुरा के निकट 'सीकरी' से प्राप्त होता था। मथुरा शैली की मूर्तियाँ आकार मंे विशालाकाय हैं। इन मूर्तियों पर मूंछें नहीं हैं।

    बालों और मूछों से रहित मूर्तियों के निर्माण की परम्परा विशुद्ध रूप से भारतीय है। मथुरा की कुषाणकालीन मूर्तियों के दाहिने कंधे पर वस्त्र नहीं रहता। दाहिना हाथ अभय की मुद्रा में उठा हुआ होता है। मथुरा शैली की कुषाण कालीन मूर्तियांे में बुद्ध सिंहासन पर बैठे हुए दिखाये गये हैं। कनिष्क काल में मूर्तिकला की गान्धार-शैली की भी बड़ी उन्नति हुई। कनिष्क तथा उसके उत्तराधिकारियों ने जो बौद्ध-मूर्तियाँ बनवाईं, उनमें से अधिकंाश मूर्तियां, पाकिस्तान के गान्धार जिले में मिली हैं। इसी से इस कला का नाम गान्धार-कला रखा गया है।

    गान्धार-कला की बहुत सी प्रतिमाएँ मुद्राओं पर भी उत्कीर्ण मिलती हैं। गान्धार-कला को इण्डो-हेलेनिक कला अथवा इण्डो-ग्रीक कला भी कहा जाता है, क्योंकि इस पर यूनानी कला की छाप है। बुद्ध की मूर्तियों में यवन देवताओं की आकृतियों का अनुसरण किया गया है। इस कला को ग्रीक बुद्धिष्ट शैली भी कहा जाता है। इस शैली की मूर्तियों में बुद्ध कमलासन मुद्रा में मिलते हैं किंतु मुखमण्डल और वस्त्रों से बुद्ध, यूनानी राजाओं की तरह लगते हैं। बुद्ध की ये मूर्तियाँ यूनानी-देवता अपोलो की मूर्तियों से काफी साम्य रखती हैं। इनमें बुद्ध को यूरोपियन वेश-भूषा तथा रत्नाभूषणों से युक्त दिखाया गया है।

    गुप्तकालीन मूर्ति-कला

    गुप्त-काल में शिल्प-कला की बड़ी उन्नति हुई। गुप्तकाल की मूर्तिकला शैली को कनिष्ककालीन मथुरा शैली का ही विकसित रूप माना जाता है। गुप्त कालीन शिल्प-कला के सम्बन्ध में डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- 'गुप्त काल के शिल्पकारों की कृतियों की यह विशेषता है कि उनमें ओज, अंसयम का अभाव तथा शैली का सौष्ठव पाया जाता है।' गुप्त काल की शिल्पकला तथा चित्रकला के सम्बन्ध में डॉ. नीलकान्त शास्त्री ने लिखा है- 'शिल्प कला तथा चित्रकला के क्षेत्र में गुप्त कालीन कला भारतीय प्रतिभा में चूड़ान्त विकास की प्रतीक है और इसका प्रभाव सम्पूर्ण एशिया पर दीप्तिमान है।'

    डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार ने गुप्त कालीन शिल्प की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- 'सामान्यतः उच्चकोटि का आदर्श और माधुर्य तथा सौन्दर्य की उच्चकोटि की विकसित भावना गुप्त काल की शिल्प कला की विशेषता है।' अपने पूर्ववर्ती युगों की अपेक्षा गुप्त काल में मूर्ति-पूजा का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। इसलिये इस काल में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनाई गईं। इस काल की मूर्तिकला की कई विशेषताएँ हैं-

    (1.) इस काल की मूर्तियाँ बहुत सुन्दर हैं।

    (2.) वे विदेशी प्रभाव से मुक्त हैं और विशुद्ध भारतीय हैं।

    (3.) इनमें नैतिकता पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।

    (4.) इस काल में नग्न मूर्तियों का निर्माण बन्द हो गया और उन्हें झीने वस्त्र पहनाए गए।

    (5.) ये बड़ी ही सरल हैं। इन्हें अत्यधिक अलंकृत करने का प्रयत्न नहीं किया गया।

    (6.) गुप्तकाल की स्त्री प्रतिमाएं अधिक मांसल हैं तथा उनमें स्थूल स्तनों का अंकन प्रमुखता से किया गया है।

    इस काल की सारनाथ की बौद्ध प्रतिमा बड़ी सुन्दर तथा सजीव है। मथुरा से प्राप्त भगवान विष्णु की मूर्ति गुप्तकाल की कला का श्रेष्ठ उदाहरण है। गुप्तकाल में बनारस, पाटलिपुत्र एवं मथुरा मूर्तिकला के प्रसिद्ध केन्द्र थे।

    हर्षकालीन मूर्ति-कला

    हर्ष के शासनकाल में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ कला और साहित्य की भी बड़ी उन्नति हुई। हर्ष स्वयं कला और साहित्य का अनुरागी था। इस काल में भारत में बड़ी संख्या में हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों के मंदिर, चैत्य तथा संघाराम बने। मंदिरों के निर्माण के कारण मूर्तिकला का भी पर्याप्त विकास हुआ। बौद्धों ने बुद्ध की तथा हिन्दुओं ने शिव तथा विष्णु आदि देवताओं की सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया। इस काल की मूर्तिकला में भारशिव शैली तथा मथुरा शैली का सम्मिलन हो गया तथा गोल मुख के स्थान पर लम्बे चेहरे बनाये जाने लगे। अजन्ता की गुफा संख्या 1 एवं 2 की मूर्तियाँ इसी काल की हैं।

    सल्तनत कालीन मूर्तिकला

    मुसलमानों के भारत आने से पहले भारत में मूर्तिकला अत्यन्त ही उन्नत अवस्था में थी किन्तु मुस्लिम आक्रान्ता मूर्तियों को तोड़ना इस्लाम धर्म की सेवा तथा धार्मिक कर्त्तव्य मानते थे। अतः उन्होंने भारतीय मूर्तिकला पर घातक प्रहार किया। मुहम्मद गौरी एवं कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमण में दिल्ली, आगरा, अजमेर आदि में स्थित लगभग समस्त प्राचीन धार्मिक स्थलों की मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया। बहुत से मंदिरों ने अपने मंदिर के बाहर इस्लामिक चिह्न अंकित किये ताकि मुस्लिम आक्रांता उन्हें पूरी तरह नष्ट न कर सकें। फिर भी इन मंदिरों की मूर्तियों को पूर्णतः अथवा अंशतः विक्षत कर दिया गया। सल्तनत काल में मंदिर एवं मूर्तियों के निर्माण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई इसलिये उत्तर भारत में मूर्तिकला का विकास ठप्प हो गया। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य सहित उन अन्य राज्यों में मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण होता रहा जहाँ हिन्दू शासक राज्य कर रहे थे।

    मुगल कालीन मूर्तिकला

    मुगलों के काल में भी भारत की मूर्तिकला का निरंतर ह्रास होता रहा। बाबर और हुमायॅूँ भी कट्टर मुसलमान शासक थे और मूर्ति बनाना पाप समझते थे। उन्होंने अनेक मंदिरों एवं उनकी मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया। अकबर ने अपने उदार दृष्टिकोण के कारण मूर्तिकला को प्रोत्साहन दिया। जहाँगीर ने भी कुछ मूर्तियाँ बनवाईं किन्तु शाहजहाँ और औरंगजेब ने इसे कोई प्रोत्साहन नहीं दिया, जिससे मूर्तिकला पतनोन्मुख हो गई। औरंगजेब के शासन काल में मूर्तिकला को सर्वाधिक हानि हुई।

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