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  • अध्याय - 33 मध्य-कालीन भारतीय समाज (सामाजिक संस्थाएं एवं रीति-रिवाज)

     12.01.2020
    अध्याय - 33 मध्य-कालीन भारतीय समाज (सामाजिक संस्थाएं एवं रीति-रिवाज)

    मध्य-कालीन भारतीय समाज


    (सामाजिक संस्थाएं एवं रीति-रिवाज)


    हिन्दू अलग-अलग बैठकर भोजन खाते हैं और उनके भोजन का स्थान गोबर से लिपा चौका होता है। वे उच्छिष्ट का उपयोग नहीं करते हैं और जिन बर्तनों में खाते हैं, यदि वे मिट्टी के होते हैं तो भोजना खाकर बर्तन फैंक देते हैं। - अलबिरूनी, 10-11वीं सदी ईस्वी।


    मध्य-कालीन भारतीय समाज, प्राचीन काल में विसित हुई सामाजिक संस्थाओं का ही विकसित रूप था। इस काल के जन-जीवन में जाति, कुटुम्ब, विवाह, सोलह संस्कार, दान-पुण्य, हरि-कीर्तन, तीर्थ सेवन आदि परम्पराओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था किन्तु इस काल में भारतीय समाज हिन्दू और मुसलमान के रूप में पूरी तरह दो हिस्सों में विभक्त था। दोनों के सामाजिक नियमों तथा व्यवहार में बहुत अन्तर था। मुसलमानों में बराबरी और भाईचारे का सिद्धान्त था जबकि हिन्दुओं में जाति-प्रथा और छुआछूत के कारण समाज के भीतर भारी विषमता थी।

    हिन्दुओं एवं मुसलमानों में विवाह से लेकर उत्तराधिकार के नियमों, मृतकों के संस्कार, वेशभूषा, भोजन और स्वागत के ढंग पूरी तरह अलग-अलग थे। दोनों के तीज-त्यौहार एवं पर्व भी अलग-अलग थे। हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों में विवाह का निर्णय यद्यपि पारिवारिक होता था किंतु मुसलमानों में उसका आधार जातीय न होकर सामाजिक हैसियत होता था जबकि हिन्दुओं में विवाह का आधार जाति एवं सामाजिक हैसियत दोनों होता था। हिन्दुओं में सहभोज केवल अपनी जाति के लोगों के बीच होता था जबकि मुसलमानों में सहभोज का कोई आधार नहीं था।

    हिन्दुओं में विधवा-विवाह अब भी अच्छा नहीं माना जाता था तथा विधवा-विवाह न के बराबर होते थे किंतु मुसलमानों में विधवा-विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं था। हिन्दुओं में विवाह के बाद विच्छेद का कोई तरीका नहीं था किंतु मुसलमानों में पुरुषों द्वारा बड़ी आसानी से तलाक दिया जा सकता था। हिन्दू एक विवाह करते थे किंतु मुसलमान चार विवाह तक कर सकते थे।

    शहजादे एवं बादशाह कितने भी विवाह कर सकते थे। हिन्दुओं एवं मुसलमानों की संगीत कला, नृत्यकला, चित्रकला एवं स्थापत्यकला में भी भारी अंतर था। सामाजिक रीति-रिवाजों एवं सांस्कृतिक परम्पराओं के अंतर को लेकर हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे को हीन समझते थे और एक-दूसरे से घृणा करते थे। सम्पूर्ण मध्य-काल में यह समस्या बनी रही कि अपने-अपने सुदृढ़ आधारों वाली इन दो सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्थाआंे में सामंजस्य कैसे विकसित हो!

    सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत काल में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई गहरी तथा चौड़ी होती चली गई। मध्य-कालीन सन्तों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों की बुराइयों को लेकर उनकी आलोचना की तथा लड़ने की बजाए प्रेम की साधना करने का मार्ग सुझाया। मुगल काल में अकबर ने भी हिन्दू और मुसलमानों के धर्म एवं संस्कृति में निकटता लाने के प्रयास किए।

    कला और साहित्य के क्षेत्र में भी हिन्दू और मुस्लिम कला-परम्पराओं के समन्वय के प्रयास हुए किंतु इन दो संस्कृतियों में इतने अधिक अंतर थे कि इन्हें निकट लाना संभव नहीं हो सका। हिन्दुओं के संस्कारों में तिलक लगाना, जनेऊ धारण करना, मूर्ति-पूजा, गौ-पूजा, विष्णु-पूजा, गंगा-स्नान, रामायण एवं गीता का पाठ आदि इतने गहरे पैठ चुके थे कि वे इन बातों को छोड़ नहीं सकते थे जबकि मुसलमानों ने गौ-मांस खाना, हिन्दुओं को बलपूर्वमक मुसलमान बनाना, मंदिरों को तोड़ना आदि बातें इतनी मजबूती से पकड़ रखी थीं कि वे इन्हें छोड़कर हिन्दुओं को गले लगाने को तैयार नहीं थे।

    हिन्दुओं के रीति-रिवाज

    मध्य-काल में हिन्दू-धर्म में सोलह संस्कारों में से केवल जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन और विवाह संस्कार आदि पांच-छः संस्कार ही प्रचलन में रह गए थे। अबुल फजल ने लिखा है कि जातकर्म संस्कार में बच्चे का जन्म होने पर घी और शहद मिलाकर सोने के छल्ले से शिशु के मुँह में डाला जाता था। बंगाल में महिलाएँ नवजात शिशु की दीर्घायु की कामना करती हुई उस पर हरी घास तथा चावल न्यौछावर करती थीं।

    तुलसीदास और सूरदास ने अपनी रचनाओं में शिशु जन्म के बाद होने वाले 'नंदी मुख श्राद्ध' का उल्लेख किया गया है। इस अवसर पर ब्राह्मणों को स्वर्ण, गाय, कपड़े, भोजन आदि पदार्थ दान स्वरूप दिए जाते थे। परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों एवं त्यौहारों पर घर के दरवाजों पर आम या अशोक के पत्तों की बंदनवार बनाकर लटकाई जाती थे। शिशु जन्म के बाद जन्मकुंडली बनाकर उसके भविष्य के बारे में घोषणा की जाती थी। शिशु-जन्म के चालीस दिन बाद नामकरण संस्कार होता था।

    बंगाल में दूध, दही और हल्दी मिलाकर शिशु के ललाट पर तिलक लगया जाता था। बच्चे की रुचि जानने के लिए बच्चे के सामने धान, भात, मिट्टी, सोना, चाँदी आदि कई वस्तुएँ रख दी जाती थीं और यह देखा जाता था कि वह किसे हाथ लगाता है! शिशु के छः माह का हो जाने पर अन्न-प्राशन्न संस्कार किया जाता था। सूरदास के पदों में आए प्रसंग के अनुसार बालक को खीर, मधु और घी चखाया जाता था जिसे उसका पिता धार्मिक अनुष्ठान के उपरान्त खिलाता था।

    शिशु के तीन वर्ष का होने पर मुंडन संस्कार (चूड़ाकर्म) किया जाता था तथा सिर पर एक चोटी छोड़़कर शेष बाल काट दिए जाते थे। तभी बच्चे का कर्णच्छेदन संस्कार भी किया जाता था अर्थात् उसके दोनों कान छेदे जाते थे। आठ वर्ष की आयु में बच्चे का जनेऊ संस्कार किया जाता था जिसे उपनयन संस्कार भी कहते थे। जनेऊ में तीन सूत होते थे जिसमें प्रत्येक सूत तीन धागों को बुनकर बनाया जाता था। जनेऊ बालक के बाएं कन्धे पर लटकाया जाता था तथा जिसके छोर दाएं हाथ में लपेट दिए जाते थे।

    जनेऊ के तीन सूत- ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं तथा उसका सफेद रंग पवित्रता का सूचक है। जनेऊ धारण करने के बाद बालक अपना अध्ययन प्रारम्भ करता था। विद्याध्ययन आरम्भ करने से पहले बालक को गुरु द्वारा गायत्री मंत्र सुनाया जाता था। इस अवसर पर ब्राह्मणों को दक्षिणा एवं निर्धनों को दान दिया जाता था। बालक के विद्याध्ययन की समाप्ति पर समावर्तन संस्कार किया जाता था।

    मुसलमानों के रीति-रिवाज

    मुसलमान परिवारों में पुत्र के पैदा होने को अच्छा समझा जाता था। इस अवसर पर घर में जलसा किया जाता था। सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में इटली से भारत आए मानसी ने अमीर मुस्लिम परिवार में पुत्र जन्म पर मनाये जाने वाले समारोह का वर्णन किया है। पुत्र-जन्म होने पर शिशु के मुँह मंे शहद टपकाया जाता था और माँ का स्तन दबाकर उसमें से दूध की बूँद शिशु के मुख में डाली जाती थी। शिशु को अजान सुनाई जाती थी। अकबर ने शहजादों के जन्म पर हिन्दुओं की तरह जन्मकुडली भी बनवाई थी।

    जन्म के दिन ही शिशु का नाम रखा जाता था। यह कार्य प्रायः दादा के द्वारा किया जाता था। शिशु जन्म के छठे दिन छठी का समारोेेह मनाया जाता था। बालक के स्नान के बाद उसे किसी फकीर के द्वारा पहने गए पुराने कपड़े की कमीज पहनाई जाती थी। अकबर का पहला कपड़ा सूफी सन्त सैयद अली शिराजी की पोशक से तैयार किया गया था। शिशु जन्म के सातवें दिन अकिकाह किया जाता था। इस अवसर पर लड़के के लिए दो तथा लड़की के लिए एक बकरा काटा जाता था।

    उसी दिन लड़के की पहली हजामत होती थी। अबुल फजल ने मुगलों द्वारा अपनाये गए तुर्की रिवाजों का उल्लेख किया है। जब बच्चा चलने लगता था तो शिशु का दादा शिशु को अपनी पगड़ी से धक्का देता था जिससे वह गिर जाए। बालक के चार वर्ष चार महीने तथा चार दिन का होने पर बिस्मिल्लाह या मकतब किया जाता था। खतना या सुन्नत का आयोजन भी बहुत धूमधाम से किया जाता था। अकबर ने 12 वर्ष से पहले खतना करने की मनाही कर दी थी, इसके बाद भी यह काम उस बालक की इच्छा पर छोड़़ दिया जाता था।

    हिन्दुओं में विवाह की पम्पराएं एवं नियम

    मध्य-कालीन भारत में हिन्दू एवं मुसलमान दोनों में विवाह समारोह आज की ही तरह बड़ी धूम-धाम से होते थे। हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों में बाल-विवाह की प्रथा प्रचलित थी। असम में केवल ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों में बाल-विवाह का प्रचलन था। शेष जातियों में वयस्क होने पर ही विवाह होते थे। असम के अतिरिक्त शेष भारत में हिन्दुओं में बेटी का विवाह छः से आठ वर्ष की आयु तक कर दिया जाता था। अधिक उम्र की लड़कियों का पिता के घर में रहना वर्जित माना जाता था।

    बाल-विवाह की स्थिति में सहवास युवा होने पर ही होता था। अकबर ने विवाह की न्यूनतम आयु लड़कों के लिए 16 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 14 वर्ष निर्धारित की। विवाह के लिए दुल्हा और दुल्हन के साथ-साथ माता-पिता की सहमति भी अनिवार्य थी। अकबर के पश्चात् किसी बादशाह ने इस आदेश का समुचित पालन नहीं करवाया। हिन्दुओं में रक्त सम्बन्धियों एवं सगोत्रियों के साथ और अन्तर्जातीय विवाहों का निषेध था। अकबर निकट रिश्तेदारों में विवाह का समर्थक नहीं था। उसने किसी नवयुवक द्वारा धन के लोभ में अधेड़ आयु की महिला से विवाह करने की प्रथा को भी गलत माना।

    अकबर ने आदेश दिया कि यदि स्त्री अपने पति से 12 वर्ष से अधिक बड़ी है तो ऐसा विवाह गैर-कानूनी और रद्द माना जाएगा। समाज में दहेज प्रथा प्रचलित थी। अमीर लोग अपनी पुत्री के विवाह में बहुत सा धन दहेज के रूप में दिया करते थे। निर्धन लोग भी इस प्रथा से बचे हुए नहीं थे। महाराष्ट्र के महान् सन्त तुकाराम को भी अपनी बेटी के विवाह के लिए गाँव के लोगों से धन मांगना पड़ा था। अकबर दहेज प्रथा का विरोधी था किन्तु उसने इस बुराई को समाप्त करने का कोई प्रयत्न नहीं किया।

    पिता द्वारा पुत्री को दहेज दिए जाने के साथ-साथ, मामा द्वारा भांजी के विवाह में मायरा (भात) भरने की प्रथा प्रचलित थी। नरसी मेहता को अपनी दोहिती के विवाह में मायरा भरने के लिए ईश्वर से करुण पुकार लगानी पड़ी थी। मध्य-काल में प्रारम्भ में कुछ निम्न जातियों को छोड़कर शेष हिन्दू समाज में विधवा-विवाह पर प्रतिबंध था। किसी भी मध्य-कालीन शासक ने इसे पुनः प्रचलित करने का प्रयास नहीं किया। फलस्वरूप मध्य-काल में बाल-विधवाओं की समस्या विकट थी, जिन्हें घर की चार-दीवारी में रहते हुए नारकीय जीवन व्यतीत करना पड़ता था।

    अकबर ने विधवा-विवाह को कानूनी घोषित किया। उसका मानना था कि जो नवयुवती अपने पति के साथ सुखभोग नहीं कर सकी है, उसे सती नहीं किया जाना चाहिए, उसका विवाह किसी विधुर से कर दिया जाना चाहिए।

    हिन्दुओं में विवाह समरोह

    हिन्दुओं में वर-वधू का चुनाव माता-पिता या घर के बड़े सदस्यों द्वारा किया जाता था। विवाह सम्बन्ध के मामले में लड़के की बात सुनी जाती थी किन्तु लड़कियों को अपने विवाह के बारे में कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं था। धनी घरों की लड़कियां इसका अपवाद थीं। कुछ पुरोहित या पुरोहितिनियां या चतुर महिलाएं विवाह-योग्य लड़के-लड़कियों की जानकारी रखती थीं तथा विवाह के लिए परामर्श और सहयोग करती थीं।

    जब दोनों पक्ष विवाह सम्बन्ध के लिए सहमत हो जाते थे तब ज्योतिषियों द्वारा बताए गए शुभ-मुहूर्त के दिन सगाई का दस्तूर किया जाता था। इसमें वर के माथे पर तिलक लगाकर कुछ भेंट दी जाती थीं। यद्यपि हिन्दुओं में विवाह के धार्मिक कृत्य में जाति और प्रान्त के अनुसार काफी अन्तर था तथापि धार्मिक संस्कार एक जैसे थे।

    समकालीन साहित्यिक ग्रन्थों में इन विवाहों के धार्मिक कृत्यों का विवरण मिलता है। दूल्हा सुन्दर वस्त्र धारण करके अश्व पर सवार होता था, जिसके पीछे उसकी सहायता के लिए एक वयस्क पुरुष बैठता था। दूल्हे के साथ सजी हुई बारात दुल्हन के घर जाती थी। बारात के आगे रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे बाजे वाले चलते थे, जिनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र भी होते थे। बारात में मित्र और सम्बन्धी सम्मिलित होते थे।

    बारात के वधू-पक्ष के घर पहुँचने पर स्वागत किया जाता था और व्यंजन परोसे जाते थे जिसे ज्यौनार कहा जाता था। वर और वधू एक-दूसरे को माला पहनाते थे। पुरोहितों द्वारा वैदिक मन्त्र उच्चारित किए जाते थे और अग्निकुण्ड में आहुतियां देकर देवताओं का आह्वान किया जाता था। वर-वधू उस अग्निकुण्ड के चारों ओर सात फेरे लेते थे। वधू के पिता द्वारा कन्यादान किया जाता था। वधू को लाल चूड़ियां पहनाई जाती थीं और उसकी मांग में सिंदूर भरा जाता था।

    वधू का पिता वर तथा उसके सम्बन्धियों को नकद, स्वर्ण तथा वस्त्र के रूप में उपहार देता था। इसके बाद वर अपनी वधू को लेकर अपने पिता के घर आता था। अकबर ने आदेश जारी किए कि अमीर-उमराव शादी में मुबारकबाद के रूप में केवल दो नारियल भेंट करें। एक तो उस अधिकारी की ओर से तथा दूसरा बादशाह सलामत की ओर से माना जाएगा।

    मुसलमानों में विवाह समारोह

    मुस्लिम नियमों के अनुसार माँ का दूध टालकर अर्थात् सगी बहिन को छोड़कर किसी भी स्त्री से विवाह किया जा सकता था और कोई भी व्यक्ति चार स्त्रियों तक से विवाह कर सकता था। बहुविवाह के कारण बहुत से परिवारों में कलह और अनैकतिकता आ जाती थी। अकबर से पूर्व किसी भी शासक ने बहुविवाह प्रथा पर अंकुश लगाने का प्रयास नहीं किया था। यद्यपि अकबर के इबादतखाने के उलेमा 'निकाह' के द्वारा चार औरतों से तथा 'मूता' के अन्तर्गत कितनी भी औरतों से विवाह के समर्थक थे, किंतु अकबर ने आदेश दिया कि साधारण आय वाले व्यक्ति को केवल एक विवाह करना चाहिए, यदि पहली पत्नी निःसंतान हो तो दूसरे विवाह के बारे में सोचना चाहिए।

    अकबर का मानना था कि एक से अधिक पत्नी रखना व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए घातक है तथा इससे परिवार में व्यवस्था भी नहीं रहती। मुसलमानों में वैवाहिक सम्बन्ध 'कव्वाल' निर्धारित करते थे। इस कार्य के लिए परिवार से 1 दाम से 10 मुहर तक शुल्क वसूल किया जाता था। उच्च राजकीय अधिकारियों एवं दरबारियों के लड़के-लड़कियों के विवाह से पहले शाही अनुमति ली जाती थी। मुगल बादशाहों ने अपनी लड़कियों की शादी नहीं करने का रिवाज बना रखा था किंतु औरंगजेब ने कुछ मुसलमान फकीरों के कहने पर अपनी दो पुत्रियों मेहरून्निसा और जुबेदामुन्निसा का विवाह किया था।

    मुसलमानों में विवाह समारोह दुल्हन के घर से 'सचाक' (चार मूल्यवान उपहार) और मेहन्दी भेजने से आरम्भ होता था। सुन्दर तश्तरियों में फल, मिठाईयां और रुपए सजाकर भेजे जाते थे। परिवार की महिलाएं दूल्हे के हाथों पर मेहंदी लगाती थीं। विवाह के मजहबी काम काजी पूरे करता था। इसमें दुल्हन की औपचारिक स्वीकारोक्ति प्राप्त की जाती थी तथा दूल्हे के द्वारा इबादत तथा मेहर की घोषण से शादी की रस्म पूरी होती थी। शाही के अंत में कुरान पढ़ी जाती थी।

    हिन्दुओं में विवाह विच्छेद

    हिन्दू किसी भी परिस्थिति में अपनी पत्नी को तलाक नहीं दे सकता था कई बार विभिन्न कारणों से पति-पत्नी अलग रहते थे किंतु उनमें विवाह विच्छेद की कोई कानूनी, सामाजिक या धार्मिक रीति नहीं थी।

    मुसलमानों में विवाह विच्छेद

    मुसलमानों में तलाक को अच्छा नहीं समझा जाता था फिर भी उनमें तीन तलाक की प्रथा प्रचलित थी जिसमें पति अपनी पत्नी से असंतुष्ट होने पर तीन बार- 'तलाक' शब्द का उच्चारण करके उसे छोड़ देता था। इस अवसर पर उसे अपनी छोड़ी गई पत्नी को मेहर की रकम चुकानी होती थी। यदि पति पुनः उसी स्त्री से विवाह करता चाहता था तो उस स्त्री को किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह करके उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद दूसरे पति को तलाक देकर पुनः पहले पति से विवाह किया जा सकता था। इसे हलाला करना कहते थे।

    हिन्दुओं के मृतक संस्कार

    हिन्दुओं मंे अंतिम संस्कार का बड़ा महत्त्व था, क्योंकि वे इहलोक से परलोक को अधिक मान्यता देते थे। इनके मुख्य अनुष्ठान दाह-संस्कार, उदकर्म, असौच, अस्थि-संचयन, शान्ति-कर्म और सपिंडी कर्म थे। अबुल फजल ने कुछ ऐसे वर्गों का उल्लेख किया है जिनके लिए दाह-संस्कार वर्जित था। धर्मशास्त्र के अनुसार छोटे बच्चों और तपस्वियों के लिए भू-समाधि एवं जल-समाधि का प्रावधान था। जब व्यक्ति मरणासन्न हो जाता था तब उसे चारपाई से उठाकर जमीन पर लिटा देते थे।

    उसका सिर उत्तर की तरफ रहता था तथा उस पर हरी दूब बिखेर कर गाय का गोबर लगाते थे। उसके मस्तक पर पवित्र गंगाजल डालकर मुँह में तथा वक्षस्थल पर तुलसीदल रखते थे। मरणासन्न व्यक्ति को भवसागर पार कराने के उद्देश्य से गोदान किया जाता था। अन्न, वस्त्र एवं, भोजन एवं सिक्के दान किए जाते थे। अबुल फजल ने बंगाल की एक प्रथा का उल्लेख किया है, इसमें मृत्युशैय्या पर पड़े व्यक्ति को उठाकर निकट की नदी में ले जाया जाता था और मृत्यु के समय उसके शरीर को कमर तक जलधार में डुबाये रखते थे।

    सिक्ख-पंथ के संस्थापक गुरुनानक ने उल्लेख किया है कि किसी सम्बन्धी की मृत्यु की सूचना देने वाले पत्र के ऊपरी कौने को फाड़ दिया जाता था। यह प्रथा आज भी प्रचलित है। मृत्यु के पश्चात् तीन दिन तक परिवार के सदस्य भूमि पर सोते थे, दिन में मांगकर या खरीद कर लाए गए भोजन ग्रहण करते थे। घर में भोजन नहीं बनाया जाता था। मृतक के परिवार वाले दस दिन से लेकर एक माह का शोक रखते थे। इस दौरान वे हजामत बनाने, वेद-पाठ करने, देव-प्रतिमाओं की पूजा करने आदि का निषेध रखते थे।

    गहरे रंग के कपड़े नहीं पहने जाते थे। औरतें सिर पर सफेद दुपट्टा रखती थीं। चार से दस दिन में 'अस्थि-संचयन' किया जाता था जिसमें चिता से राख एवं अस्थियों को एकत्रित करके दूध तथा गंगाजल से धोया जाता था और पवित्र नदियों में विसर्जित कर दिया जाता था। मृत्यु के तेरहवें दिन रिश्तेदारों द्वारा मृतक के उत्तराधिकारी को पगड़ी बांधते थे। अबुल फजल के अनुसार मृत्यु के एक साल बाद मृतक का श्राद्ध किया जाता था जिसमें ब्राह्मणों को दान दिया जाता था।

    मुसलमानों के मृतक संस्कार

    मुसलमानों के मृत्यु संस्कार के नियम अलग थे। मरणासन्न व्यक्ति का मुख मक्का की तरफ फेर दिया जाता था और उसके निकट कुरान के यासीन अध्याय का पाठ किया जाता था। उसे मक्का के जमजम कुएं का पानी या शर्बत पिलाया जाता था, जिससे शरीर से प्राण निकलने में सुविधा हो। व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर मृत्यु की घोषणा की जाती थी। शाही परिवार के किसी सदस्य या बादशाह के प्रिय व्यक्ति के मरने पर वकील अपनी बांह पर नीला रूमाल बांधकर बादशाह के सामने उपस्थित होता था।

    मृतक के सम्बन्धी अपने कपड़ों को फाड़ते और अपने सिर पर धूल डालते थे। मृतक के शव को फूल मालाओं तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुसज्जित कर कब्रिस्तान ले जाया जाता था। किसी शाही अधिकारी की मृत्यु होने पर उसके प्रतीक चिह्न, ध्वज तथा हाथी-घोड़े आदि भी शव-यात्रा में शामिल होते थे। कुछ मुसलमान भी अपने प्रियजन की मृत्यु पर सिर मुंडवा लेते थे। चालीस दिनों तक शोक रखा जाता था। शोक में स्वादिष्ट भोजन और सुन्दर पोशाक से परहेज रखा जाता था। शोक की समाप्ति चालीसवें दिन होती थी।

    इस दिन मृतक के सम्बन्धी एवं मित्र, मृतक की कब्र पर जाते थे और मृतक के नाम पर गरीबों में खाना, कपड़ा और पैसे बांटते थे। मृत्यु की वार्षिकी भी इसी तरह मनाई जाती थी। जहाँगीर के अनुसार वार्षिकी मनाने का रिवाज मुसलमानों ने हिन्दुओं से ग्रहण किया था। फातिहा पढ़े जाने के बाद गरीबों में भोजन बांटा जाता था। इब्नबतूता ने उल्लेख किया है कि मृतक को उसके जीवन काल के समान ही आवश्यक वस्तुएं भेंट दी जाती थी। अमीर लोग अपने पूर्वजों की कब्र पर रोशनी एवं सजावट करते थे और साधारण लोग मृतक की कब्र पर दीपक जलाते थे। अमीरों की कब्रों के प्रवेश द्वार पर हाथी-घोड़े बांधे जाते थे।

    कुरान पढ़ने के लिए खतमी (वाचक) नियुक्त किए जाते थे। सन्तों की कब्र पर अमीरों द्वारा दरगाह बनवाई जाती थी, जहाँ उसके अनुयाइयों की भीड़ लगती थी। फीरोज तुगलक की तरह औरंगजेब भी कब्रिस्तान में औरतों के प्रवेश का विरोधी था। वह कब्रों पर छत डालने तथा उसकी दीवारों पर सफेदी पोतने को भी पसन्द नहीं करता था।

    सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

    मध्य-कालीन भारतीय समाज में जाति-प्रथा बुरी तरह से हावी थी। इस कारण सामाजिक शिष्टाचार भी अपनी जाति तक सीमित होकर रह गया था। दूसरी जातियों के साथ सामाजिक व्यवहार प्रायः नहीं के बराबर था। समाज पूरी तरह पुरुष-प्रधान था। घरों की स्त्रियां, घर में आए पुरुष अतिथियों से प्रायः बातचीत नहीं करती थीं। गांव की चौपाल पर पुरुष तो परस्पर मिलते रहते थे, किंतु स्त्रियों को मित्र और सम्बन्धियों से मिलने की अनुमति नहीं थी।

    शहरों में भी पुरुष अपने कार्य के सिलसिले में एक-दूसरे से मिलते थे किंतु स्त्रियों को ऐसे अवसर बहुत कम उपलब्ध थे। स्त्रियों में पर्दा-प्रथा प्रचलित थी। जन्म, विवाह, शव-यात्रा आदि के समय या किसी की बीमारी पर स्त्रियों को घर में आए सगे-सम्बन्धियों से मिलने के अवसर प्राप्त होते थे। मध्ययुग में अतिथियों के स्वागत के लिए अनेक औपचारिकताएं की जाती थीं। अतिथि के आगमन पर घर का मुखिया द्वार पर जाकर उसका स्वागत करता था। प्रवेश द्वार पर ही अतिथि अपने जूते उतार देता था।

    पुरुष-अतिथि एवं संत आदि के आगमन पर हिन्दुओं में चन्दन, पुष्प, चावल आदि युक्त जल से उसके पैर धोये जाते थे, फिर उसे बैठक में ले जाया जाता था। अमीरों के घर में बैठक का कमरा सजाकर रखा जाता था जिसमें मूल्यवान दरियां और मखमल के गद्दे बिछे रहते थे। साधारण घरों में चटाई और चारपाई होती थी। शाही पुरुष अपने अतिथियों से दीवानखाने में मिलते थे, जहाँ प्रतिदिन दरबार लगता था।

    इस कक्ष को सुन्दर कालीन और बहुमूल्य पर्दों से सजाया जाता था। अतिथि अपनी सामाजिक स्थिति के अनुसार गृहस्थ के दाईं या बाईं ओर बैठता था। अपरिचितों को भी बैठक में आकर मिलने की अनुमति होती थी। शाही लोगों से मिलने पर भेंट देने की परम्परा थी। किसी बड़े ओहदेदार व्यक्ति के पास छोटे आदमी का खाली हाथ जाना अशिष्टता मानी जाती थी। बादशाह एवं शहजादे के जन्मदिन, विजय अभियान एवं शिकार से सकुशल वापसी, नौरोज आदि अवसरों पर नजराना दिया जाता था, जिनमें से कुछ हिस्सा रखकर शेष लौटा दिया जाता था। भारतीयों के आचार-व्यवहार की अनेक विदेशी यात्रियों ने प्रशंसा की है।

    परस्पर वार्तालाप में लोग मर्यादा का ध्यान रखते थे। अपने से बड़े या श्रेष्ठ व्यक्ति से बातचीत में सावधानी बरती जाती थी और उसके प्रति सम्मान के लिए अपना सिर ढका जाता था। बड़ों की उपस्थिति में लोग प्रायः खड़े ही रहते थे। शाही दरबार में उपस्थित होने के विस्तृत नियम थे। अमीर, उमराव एवं दरबारियों को प्रतिदिन सुल्तान के समक्ष उपस्थित होना पड़ता था। विशिष्ट दरबारियों तथा शहजादों के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति दरबार में नहीं बैठ सकता था। राज्य के उच्च अधिकारियों, विदेशों से आए राजदूतों तथा वित्तीय एवं सैन्य सहायता के लिए आए पदच्युत रजवाड़ों के शासकों को भी इस नियम से छूट नहीं दी गई थी।

    बादशाह के जाने से पूर्व किसी को दरबार छोड़़ने की अनुमति नहीं थी। बादशाह का नाम जो भी सुने, जहाँ भी सुने उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह सम्मान के साथ अपना सिर झुकाए। पत्रवाहक से शाही फरमान प्राप्त करने के लिए अमीरों, सेनापतियों और दरबारियों को थोड़ी दूर चलकर आना पड़ता था और फरमान लेते समय झुकना और उसे अपने सिर से लगाना पड़ता था। दरबार में भी उत्तम ढंग से शिष्टाचार का निर्वाह किया जाता था।

    अभिावादन की परम्पराएं

    मध्य-काल में अभिवादन की परम्पराएं बहुत कुछ आज की ही तरह थीं। हिन्दुओं में बराबरी वालों को राम-राम कहकर अभिवादन किया जाता था। उच्च पदस्थ व्यक्ति, सूबेदार, मंत्री या सेनापति का अभिवादन सिर से ऊपर हाथों को जोड़कर किया जाता था। छोटों के द्वारा बड़ों का अभिवादन उसके पैरों को छूकर किया जाता था। गुरु के अभिवादन में लेटकर दण्डवत् किया जाता था। राजा का अभिवादन, ब्राह्मणों को छोड़़कर, शेष लोगों के द्वारा पैर छूकर या धरती को स्पर्श करके किया जाता था।

    ब्राह्मण राजा के अभिवादन में सिर से ऊपर अपने दोनों हाथ जोड़ लेते थे। विजयनगर दरबार में प्रत्येक व्यक्ति को नंगे पैर जाना होता था। दरबार में जाने वाला व्यक्ति राजा के पांव चूमने के बाद हाथ बांधकर एक ओर खड़ा हो जाता था तथा तब तक धरती पर दृष्टि रखता था जब तक राजा उसे सम्बोधित नहीं करता था। गुरु नानक ने अपने अनुयाइयों को नमस्कार के उत्तर में 'सत-कर्तार' कहने की सलाह दी थी। मुसलमान अभिवादन के लिए 'सलाम' अथवा 'अस्सलाम वालेकुम' कहते थे और प्रत्युत्तर में 'वालेकुम अस्सलाम' कहते थे।

    बराबरी के लोगों एवं मित्रों का अभिवादन करते समय दांये हाथ को मस्तक के सामने तक उठाते थे। एवं तीन बार गले लगाकर एक-दूसरे का हाथ पकड़ते थे। वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ जन के अभिवादन में आगे झुककर दायें हाथ को मस्तक के पास ले जाते हैं। सुल्तान के अभिवादन के लिए भी नियम बनाए गए थे। इसके लिए सामान्य तरीका 'जमींबोसी' (धरती चूमना) या 'पांवबोसी' (पैर चूमना) है। बलबन पांवबोसी का तरीका अधिक पसन्द करता था।

    अबुल फजल ने बादशाह के प्रति सामूहिक अभिवादन के रूप में 'कोर्निस' और 'तसलीम' का उल्लेख किया है। कोर्निस में दायें हाथ की हथेली को ललाट पर रखकर आगे की ओर सिर झुकाया जाता था। तसलीम पेश करते समय दायें हाथ को जमीन पर रखना होता था, जिसमें हथेली ऊपर की ओर रहती थी। फिर हथेली को छाती एवं माथे से लगाया जाता था। अकबर ने आदेश जारी किया कि तसलीम की यह क्रिया एक साथ तीन बार की जानी चाहिए।

    उसने अभिवादन का दूसरा तरीका सिजदा अर्थात् बादशाह के सामने दण्डवत लेटना भी शुरू कराया था किन्तु कट्टरपंथी मुसलमानों ने इसे व्यक्ति-पूजा मानकर इस तरीके पर आपत्ति की। अतः दीवान-ए-आम में इसकी मनाही हो गई फिर भी निजी कक्ष में इसकी अनुमति थी। शाहजहाँ के शासन काल में इस तरीके को समाप्त कर दिया गया और इसकी जगह जमींबोसी का तरीका अपनाया गया। बाद में इसे भी स्थगित कर तसलीम के पुराने ढंग को संशोधित करके अपनाया गया।

    नए तरीके में कम से कम चार बार तसलीम करनी होती थी। औरंगजेब ने इस प्रकार के समस्त अभिवादनों को मूर्ति-पूजा का परिचायक मानते हुए इन्हें समाप्त कर दिया और अभिवादन के लिए केवल 'अस्सलाम वालेकुम' को मान्यता दी।

    वस्त्र, प्रसाधन और आभूषण

    मध्य-कालीन भारत में लोगों के वस्त्र, प्रसाधन एवं आभूषण उनकी आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत के अनुसार होते थे। विभिन्न समुदायों के लोग प्रायः सूती वस्त्र पहनते थे।

    जन-सामान्य की पोषाक: हिन्दू पुरुषों में धोती, कुर्ता तथा पगड़ी अधिक प्रचलित थे और हिन्दू औरतों में कांचली, घाघरा ओढ़नी अधिक लोकप्रिय थी किंतु साड़ी-ब्लाउज और पेटीकोट भी समान रूप से प्रचलित थीं। औरतें घर से निकलते समय शरीर को चादर से लपेट लेती थीं। मजदूर और किसान वर्ग के लोग घुटनों से ऊपर तक छोटी सी धोती लपेटते थे। सर्दियों में साधारण लोग सूती कोट पहना करते थे, जिसमें रुई भरी होती थी। उत्तर भारत में पगड़ी अथवा साफा प्रचलित था किंतु कश्मीर और पंजाब में रुई भरी हुई टोपी का चलन था। अत्यंत निर्धन लोग केवल लंगोट लगाकर जीवन बिताते थे। मुसलमानों के राज्य में ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती चली गई थी।

    सरकारी कारिंदों की पोषाक: मुसलमान सैनिकों की कोई विशेष पोशाक नहीं थी फिर भी वे चुस्त कपड़े पहनते थे जिन पर तलवार, ढाल, गुप्ती आदि हथियार कसे हुए होते थे। शाही कारिंदे एवं गुलाम कमरबंद, लाल जूते और 'कुला' पहनते थे।

    तुर्की सुल्तानों के काल की पोषाक: दिल्ली सुल्तानों के काल में लम्बी तातारी टोपी पहनने का प्रचलन था किंतु बाद में तातारी टोपी का स्थान पगड़ी ने ले लिया। पगड़ी दोनों समुदायों के लोग सामान्य रूप से धारण करते थे। मुस्लिम सफेद और गोल पगड़ी बांधते थे जबकि हिन्दुओं में रंगीन, ऊँची और नोकदार पगड़ी प्रचलित थी। गर्मी के कारण जुर्राबें बहुत कम पहनी जाती थी। अधिकांश हिन्दू नंगे पैर रहते थे। बलबन ने अपने गुलामों को जुर्राब पहनने का आदेश दिया था। कट्टर धार्मिक प्रवृत्ति के मुसलमान नमाज आदि में सफाई बनाए रखने के लिए जुर्राबों का इस्तेमाल आवश्यक मानते थे। उस समय तुर्की जूते अधिक प्रचलित थे, जो सामने से नोकदार तथा ऊपर से खुले हुए होते थे। इनको पहनने और उतारने में अधिक सुविधा रहती थी। अमीर अपने जूते रंगीन मखमल या जरी के बनवाते थे जिन पर रेशम और चमड़े के फीते लगाए जाते थे। कुछ जूतों पर हीरे-जवाहरात भी जड़वाये जाते थे। कालीकट के ब्राह्मण जाड़ों में भूरे चप्पल तथा गर्मियों में काठ की खड़ाऊ पहनते थे। मध्यम-वर्गीय परिवार लाल चमड़े के जूते पहनते थे, जिन पर फूलों की आकृतियां बनी रहती थीं। साधु-सन्तों, फकीरों एवं दरवेशों को उनकी पोषाक से पहचाना जाता था। मुस्लिम फकीर लम्बी 'दरवेश-टोपी' तथा पैरों में 'काठ की चट्टी' पहनते थे और शरीर पर एक लम्बा चोगा डालते थे। मुस्लिम दार्शनिक पगड़ी, चोगा तथा पाजामा पहनते थे। हिन्दू संन्यासी एवं योगी केवल लंगोटी से काम चलाते थे। हिन्दू पंडित कमर में रेशमी चादर लपेट लेते थे, जिसका एक छोर पांव तक लटकता रहता था और लाल रंग की रेशमी चादर कन्धों पर डाल लेते थे।

    मुगलकाल में शाही अमीरों की पोषाक: उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र महंगे होते थे। अमीर मुसलमान सलवार, सुतन्नी और पाजामा पहनते थे। शरीर के ऊपरी भाग पर कुर्ता, जैकेटनुमा कोट, काबा या लम्बा कोट पहना जाता था जो घुटनों तक लटकता था। यह मलमल या बारीक ऊन का बना होता था। मुगल बादशाह रोएंदार फर के कोट पहनते थे। धनी लोग कन्धे पर रंगीन ऊनी चादर रखते थे। मध्य-युगीन सुल्तान, अमीर, खान आदि शाही पुरुष जरी वाले रेशमी और मखमली कपड़े पहनते थे। उनकी पोषाकों में दिबा-ए-हफ्तरंग (सप्तरंगी किमखाब), बीसात-ए-जमुरादी (मोतिया रंग की पोशाक), जामा-ए-जारबफ्त (जरी या सोने के तारों से बुना कपड़ा), कतान-ए-रूसी (रूस में बना कपड़ा), कतान-ए-बिरारी, बरकरमान (कई रंगों का ऊनी कपड़ा) आदि का भी प्रयोग होता था।

    अकबर की पोषाक: अकबर ने अपनी पोशाकों के लिए कुशल दर्जी नियुक्त किए। आइन-ए-अकबरी में ग्यारह प्रकार के कोट का विवरण मिलता है। उनमें 'टकन चिया पेशवाज' सर्वाधिक महत्त्व का था। यह गोल-घेरदार कोट था, जो सामने से खुला रहता था और दांयी ओर से बंद होता था। इसके साथ ही रोएंदार कोट 'शाह आजीदाह' का भी महत्त्व था। अकबर मुलायम रेशम की धोती भी पहनता था। मॉन्सेरट ने अकबर की पोशाक के बारे में लिखा है- 'बादशाह सलामत की पोशाक रेशम की थी, जिस पर सोने का सुन्दर काम किया रहता था। उनकी पोशाक घुटनों तक झूलती थी तथा उसके नीचे पूरे गांव का जूता होता था। वे मोती और सोने के जेवर भी पहनते थे।'

    महिलाओं की पोषाक: महिलाओं की पोशाक साधारण थी। गरीब स्त्रियां साड़ी पहनती थीं जिसके एक छोर से उनका सिर ढका रहता था। गरीब और अमीर दोनों वर्ग की स्त्रियां वक्ष पर अंगिया पहनती थीं। दक्षिण भारत में निम्न-वर्ग की स्त्रियां सिर नहीं ढकती थीं। गरीब उड़िया स्त्रियां कपड़ा प्राप्त न होने के कारण पत्तियों से शरीर को ढकती थीं। मुसलमान स्त्रियां सलवार-कमीज पहनती थीं, ऊपर से बुर्का डालती थीं।

    मध्य-कालीन चित्रों में स्त्रियों को ओढ़नी के साथ पीठ पर बंधने वाली चोली पहने हुए चित्रित किया गया है। स्त्रियां घाघरा भी पहनती थीं, जिनमें किनारी एवं कसीदाकारी का काम होता था। बंगाली स्त्रियां कांचुली या चोली पहनती थीं। यह दो प्रकार की होती थी, एक छोटी होती थी, जिससे केवल स्तन ढकते थे, दूसरी लम्बी होती थी और कमर तक जाती थी। धनी औरतें कश्मीरी ऊन का बना बारीक 'कावा' पहनती थीं। कुछ स्त्रियां उत्तम प्रकार के कश्मीरी शॉल ओढ़ती थीं।

    हिन्दू और मुसलमान महिलाएं सूती, रेशमी या ऊनी दुपट्टे से सिर ढकती थी। उस काल में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां जूतों का प्रयोग अधिक करती थीं। सौन्दर्य प्रसाधन मनुष्य में सुंदर एवं आकर्षक दिखने की ललक आदिकाल से है। इसलिए शरीर पर सुगंधित पदार्थों का लेप करने, अंगराग लगाने, उबटन मलने, बाल संवारने, काजल लगाने, वस्त्रों को रंगने, आभूषण पहनने आदि की परम्पराएं भी अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही हैं। मध्य-कालीन भारतीय समाज में भी ये परम्पराएं प्रचलन में थीं।

    स्नान करने और कपड़ा धोने के लिए साबुन का उपयोग किया जाता था। शरीर एवं कपड़ों पर लगाने के लिए कई प्रकार की कीमती सुगंधियों का प्रयोग किया जाता था। केशों को काला करने के लिए 'वस्मा' और 'खिजाब' का प्रयोग होता था। कपड़ों को सफेद बनाए रखने के लिए नील का प्रयोग होता था। साबुन, पाउडर और क्रीम जैसी प्रसाधन सामग्रियों के रूप में 'घासूल', त्रिफला, उबटन और चन्दन का प्रयोग होता था।

    अबुल फजल ने मुगल काल में स्त्रियों के सोलह श्ृंगारों का उल्लेख किया है जिनमें स्नान करना, केशों में तेल, लगाना, चोटी गूँथना, रत्नों से वेणी शृंगार करना, मोतियों से सजाकर बिन्दी लगाना, काजल लगाना, हाथ रंगना, पान खाना तथा स्वयं को फूलमालाओं तथा कर्णफूल, हार, करधनी आदि आभूषणों से सजाना आदि सम्मिलित हैं। हिन्दू महिलाएं अपने केश पीछे की ओर बांधती थीं। धनी परिवारों की महिलाएं अपनी केशों को सिर के ऊपर शंक्वाकार गूँथकर उनमें सोने-चांदी के कांटे लगाती थीं।

    नकली केश लगाने का उल्लेख भी मिलता है। हिन्दू स्त्रियां सिन्दूर का टीका लगाने तथा उससे मांग भरने को शुभ मानती थीं। आंखों में काजल लगाती थीं तथा पलकों को रंगने के लिए सुरमे का प्रयोग करती थीं। भारतीय स्त्रियां अपने हाथों और पांवों में मेहन्दी लगाती थीं। मुंह पर लगाने के लिए 'गलगुना' और 'गाजा' (लाल रंग) का प्रयोग किया जाता था। केश संवारने में लकड़ी, पीतल एवं हाथी दांत की कंघियों का प्रयोग होता था।

    अकबर ने शाही परिवार की सुगन्धित पदार्थों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए शेख मन्सूर की अध्यक्षता में 'खुशबूखाना' स्थापित किया था। जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ की माँ ने गुलाब से एक नवीन इत्र का निर्माण किया था जिसका नाम 'इत्र-ए-जहाँगीरी' रखा गया। नूरजहाँ स्वयं भी फूलों से इत्र तैयार करती थी और वह विभिन्न डिजाइनों के सुंदर कपड़े डिजाइन करती थी। उन पर चित्र भी बनाती थी।

    आभूषण

    सभ्यता के विकास के साथ ही स्त्रियों में आभूषणों के प्रति बोध उत्पन्न हुआ। वे अपने शरीर के विभिन्न अंगों को फूल, कौड़ी, छोटे शंख, मिट्टी, ताम्बे एवं सोने के बने मनकों तथा सिक्कों आदि से सजाती थीं। अत्यंत प्राचीन काल से ही हार, ताबीज एवं मनके मिलने लगते हैं। मुगलकालीन लेखक अबुल फजल ने सैंतीस आभूषणों का उल्लेख किया है। चौक, मांग, कतबिलादर (संभवतः आधुनिक चंद्रमान), सेकर और बिंदुली आदि आभूषण सिर और ललाट पर धारण किए जाते थे। कर्णफूल, पीपल पत्ती, मोर भांवर और बाली कानों में पहने जाते थे। नाक में पहनने के आभूषणों की शुरुआत संभवतः मुसलमानों ने की थी।

    इनमें 'नथ' और 'बेसर' अधिक प्रचलित थे। हिन्दू स्त्रियां सिर के आगे के भाग में सोने-चांदी का टीका या बोर धारण करती थीं। टीका माथे पर झूलता रहता था जबकि बोर माथे के अगले भाग पर स्थिर रहता था। नाक के बाएं भाग में सोने-चांदी की लौंग पहनी जाती थी जिसके आगे के भाग में मोती, हीरा या अन्य कीमती पत्थर जड़ा जाता था। गले में सोने-चांदी के हार पहने जाते थे जिनमें हीरे, जवाहरात एवं मोती आदि से बने नग जड़े जाते थे। हार एक लड़ी से लेकर कई लड़ी के भी होते थे।

    धनी स्त्रियों के हार में पांच-सात लड़ियां होती थीं। हाथ के ऊपरी भाग में बाजूबन्द या तोड़े पहने जाते थे और कलाई में कंगन, चूड़ी एवं गजरा पहने जाते थे। कमर में तगड़ी, क्षुद्र खंटिका, कटि मेखला एवं सोने की पेटी धारण की जाती थी। अंगुलियों में अंगूठियां पहनी जाती थीं। पैरों में जेहर, घुंघरू, पायल आदि पहनते थे। पैरों की अंगुलियों में झांक, बिछुआ तथा आंवट पहने जाते थे। हिन्दू पुरुष कानों में कर्णफूल, गले में साने की चेन तथा अंगुलियों में अंगूठियाँ पहनतेे थे।

    राजपूत पुरुषों में 'कर्णफूल' धारण करना अनिवार्य था। मुसलमान पुरुष आभूषणों के विरोधी थे, फिर भी कुछ मुसलमान 'ताबीज' और 'गण्डा' आदि पहनते थे। सुल्तान और मुगल बादशाह सोने, चांदी, हीरे, माणिक आदि के आभूषण पहनते थे। सर टॉमस रो ने उल्लेख किया है कि- 'जहाँगीर अपने जन्मदिन पर कीमती वस्त्रों तथा हीरे-जवाहर के आभूषणों से सजकर प्रजा के समक्ष आता था। उसकी पगड़ी सुंदर पक्षी के पंखों से सजी रहती थी, जिसमें एक ओर काफी बड़े आकार का माणिक, दूसरी ओर बड़े आकार का हीरा तथा बीच में हृदय की आकृति का पन्ना सुशोभित होता था। कन्धों पर मोतियों और हीरों की लड़ियां झूलती थीं तथा गले में मोतियों के तीन जोड़े हार होते थे। बाजुओं में हीरे के बाजूबन्द तथा कलाई में हीरे के तीन कंगन होते थे। हाथ की प्रायः प्रत्येक अंगुली में अंगूठी होती थी।' बहूमूल्य हीरों की बनी 'मांग टीका' की कीमत पांच लाख टका तक हो सकती थी। सोने और चांदी के काम में गुजराती हिन्दू स्वर्णकार अधिक विख्यात थे। एक चतुर कारीगर की फीस 64 दाम प्रति तोला थी।

    भोजन

    मध्य-कालीन भारतीय समाज में हिन्दुओं एवं मुसलमानों के भोजन में मांस के अतिरिक्त कोई विशेष अंतर नहीं था। हिन्दुओं के भोजन में विभिन्न प्रकार के अनाज एवं दाल, दूध, दही, मक्खन तथा तेल आदि से बने कई तरह के व्यंजन होते थे। धनी लोग अपने भोजन में गेहूँ एवं मक्का का आटा एवं दलिया, चावल, बेसन तथा उबली हुई सब्जियों का प्रयोग करते थे। उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा के धनी लोग पूड़ी और लूची का अधिक प्रयोग करते थे। वे चावल के साथ बादाम, किशमिश आदि मिलाकर पुलाव तथा अन्य व्यंजन तैयार करते थे। सामान्यतः दाल-भात खाया जाता था। अल्पाहार में दही-चिउड़ा का प्रयोग अधिक होता था।

    मिष्ठान्न में हलवा, लापसी, खीर, मीठे चावल एवं मीठे दलिया का अधिक प्रचलन था। ब्राह्मण, वैश्य, जैन, बौद्ध-भिक्षु एवं अन्य उच्च वर्ग के लोग मांस, मछली, अण्डा, प्याज, लहसुन जैसे तामसिक भोजन को घृणास्पद मानते थे किंतु राजपूत इनका प्रयोग करते थे। समाज में निम्न समझी जाने वाली जातियाँ भी मांस-मछली एवं अण्डे का प्रयोग करती थीं। दक्षिणी भारत के हिन्दुओं में सामिश भोजन का प्रचलन बहुत कम था। विदेशी यात्रियों का कथन है कि- 'हिन्दू मांसाहार की कम जानकारी रखते थे तथा वैसा भोजन नहीं करते थे जिसमें रक्त हो।'

    उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में ऐसी बहुत सी जातियां थीं जो मांसाहार से दूर रहती थीं जबकि पंजाब, बंगाल और कश्मीर में कुछ ब्राह्मण भी मांस-मछली खाते थे। मुसलमान सामिष भोजन अधिक करते थे। मुसलमानों को मांस तथा उसके बने हुए विविध व्यंजन अधिक प्रिय थे। वे मांस-मछली से 'दूजा ब्रियानी' और 'कीमा पुलाव' बनाया करते थे। अकबर एवं उसके बाद के कुछ मुगल बादशाहों ने पवित्र दिनों में पशुवध का निषेध कर रखा था।

    अकबर ने पहले, शुक्रवार को फिर रविवार को मांसाहार करना छोड़़ दिया था। जहाँगीर ने अपने पिता के जन्मदिन पर पशुवध की मनाही कर दी थी तथा वह स्वयं सप्ताह में एक दिन व्रत रखता था और उस दिन केवल गुजराती खिचड़ी खाता था। तुर्की सुल्तान और मुगल बादशाह काबुल से सूखी मेवा, बदख्शां से तरबूज, समरकंद से अंगूर और सेव, याज्द से अनार, यूरोप से अनानास और काबुल से बेर एवं जामुन आदि मंगवाते थे। सूखे मेवे में नारियल, खजूर, मखाना, कमलगट्टा, अखरोट, पिस्ता आदि होते थे।

    पीने के लिए नदी एवं कुएं आदि का ताजा जल काम में लाया जाता था। साधारण लोग तालाबों एवं ताल-तलैयों का जल भी पीते थे। हिन्दू राजा, मुगल बादशाह तथा कुछ रईस लोग गंगाजल को स्वास्थ्यवर्धक और पवित्र मानते थे। अन्य नदियों का जल भी मंगवाया जाता था। मुगल बादशाह बर्फ के शौकीन थे। अमीर एवं उच्च वर्ग के मुसलमान विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों के मांस एवं अण्डों से विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार करवाते थे। साधारण वर्ग के लोगों के भोजन में दलिया, खिचड़ी, भात एवं पुलाव आदि का अधिक प्रयोग होता था।

    दक्षिण में लोगों का मुख्य भोजन चावल था। गुजराती लोग चावल और दही पसन्द करते थे। कश्मीरियों के भोजन में उबले चावल तथा नमकीन उबली सब्जियों की प्रमुखता थी। उत्तर के लोगों में गेहूँ, ज्वार या बाजरा की चपातियां खाई जाती थीं। बेझर एवं मिस्सी रोटियों का भी प्रचलन था। धनी एवं मध्यमवर्गीय लोग दिन में तीन बार तथा निर्धन लोग दिन में दो बार भोजन करते थे एवं दोपहर में चने तथा भुने हुए अनाज खाते थे।

    माद्रक द्रव्य

    मध्य-काल में प्रयोग किए जाने वाले मादक द्रव्यों में मुख्यतः शराब, अफीम, भांग और तम्बाकू थे। कुछ लोग गांजा एवं सुल्फा भी पीते थे। पान, चाय और कॉफी को भी माद्रक द्रव्य माना जाता था। जन-सामान्य मादक द्रव्यों के सेवन को दुर्गुण मानता था। अल्लाउद्दीन खलजी आदि तुर्की सुल्तानों और जहाँगीर एवं औरंगजेब आदि कुछ मुगल बादशाहों ने अपने शासन में मद्य-सेवन पर प्रतिबंध लगाए। बाबर मद्यपान करता था किंतु उसने अपनी सेना पर अपने नैतिक प्रभाव में वृद्धि करने के उद्देश्य से मद्यपान त्याग दिया था।

    अकबर, जहाँगीर एवं शाहजहाँ भी मदिरापान करते थे किंतु औरंगजेब मद्यपान नहीं करता था। अधिकांश मुगल अमीर भी मद्यपान करते थे। मुगल काल में देशी शराब की विख्यात किस्मों में ताड़ी, नीरा, महुआ, खेरा, बधचार और जागरे प्रमुख थीं। पुर्तगाल और फारस से उत्तम किस्म की शराब मंगायी जाती थी। राजपूतों में अफीम का सेवन अधिक प्रचलित था। वे युद्धकाल में अफीम का सेवन अधिक करते थे। कुछ मुगल बादशाह भी अफीम का सेवन करते थे। आरम्भ में भारत में तम्बाखू पैदा नहीं होता था किंतु पुर्तगाली अपने साथ पहली बार तम्बाखू लेकर आए।

    जन-साधारण में कुछ ही वर्षों में तम्बाखू पीने की लत इतनी अधिक बढ़ गई कि ई.1617 में जहाँगीर ने तम्बाखू के सेवन पर रोक लगाई किंतु जनता पर इस रोक का कोई असर नहीं हुआ। इटावली यात्री मानुसी ने लिखा है कि अकेले दिल्ली में तम्बाकू पर लगाई गई चुंगी से प्रतिदिन 5,000 रुपये की आय होती थी। जहाँगीर ने 'भांग' को अस्वास्थ्यकर मानकर उसके सेवन पर रोक लगाई। सुसंस्कृत परिवारों में चाय और कॉफी को भी नशा माना जाता था। इनका प्रचलन कोरोमंडल के तटवर्ती क्षेत्रों में अधिक था।

    मध्य-कालीन आवास

    मध्य-कालीन समाज में आज की ही तरह अमीरों के घर बड़े, पक्के एवं महंगे होते थे जबकि गरीबों के घर छोटे, कच्चे एवं सस्ते होते थे। घरों का निर्माण जलवायुवीय आवश्यकताओं के आधार पर होता था। देश के गर्म हिस्सों में जालीदार खिड़कियां और झरोखे अधिक बनाए जाते थे ताकि प्रकाश और वायु का आगमन निर्बाध रूप से हो। जबकि ठण्डे क्षेत्रों में खिड़कियां छोटी रखी जाती थीं। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती थी या बर्फ गिरती थी, उन क्षेत्रों में घरों की छतें ढलवां बनाई जाती थीं। शाही आवास: शाही आवास प्रायः किसी दुर्ग के भीतर बनाए जाते थे। ये दुर्ग किसी बड़ी नदी या पहाड़ी झरने के निकट होते थे। राजमहलों एवं शाही महलों में मुख्य प्रवेश द्वार के निकट मर्दाना महल एवं भीतर की ओर 'जनाना' महल एवं ड्यौढ़ी बनाए जाते थे। शाही महलों में दीवाने आम, दीवाने-ए-खास, शस्त्रागार, भण्डार, खजाना, घुड़साल, नक्कारखाना आदि भी बनाए जाते थे। जनाना महलों में छोटे झरोखे होते थे जिनमें से हरम अथवा अन्तःपुर की औरतें संगीत समारोह, पशुओं की लड़ाई एवं दरबार की कार्यवाही आदि देखती थीं। महलों के चारों ओर बाग, बारादरी, फव्वारे और जलाशय बनाए जाते थे। मुगलों द्वारा बनाए गए भवनों में लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर का प्रयोग अधिक होता था। धनी लोगों के आवास: धनी लोगों के घर भी 'मर्दाना' और 'जनाना' दो हिस्सों में बनाए जाते थे। अतिथियों के लिए दीवान या बैठक, सोने के लिए शयनकक्ष, भोजन पकाने के लिए रसोई एवं नहाने के लिए स्नानागार बनाए जाते थे। अमीरों के घरों में शौचालय भी होते थे। प्रायः घर के मध्य में एक बड़ा सा आंगन होता था। औरतों की अधिकतर गतिविधियां प्रायः इसी आंगन में होती थीं। घरों के ऊपर प्रायः समतल छत होती थी, जहां गर्मियों में रात के समय परिवार के लोग खुले में सोते थे। छत पर प्रायः एक कक्ष या छतदार बरामदा होता था जिसे बरसाती कहते थे जहाँ वर्षा के समय सोया जा सकता था। धनी लोगों के घरों के चारों ओर उद्यान लगाया जाता था। प्रायः साग-सब्जियों एवं पूजा के लिए फूलों की वाटिकाएं भी होती थीं। व्यापारियों के घर ईंट और चूने से बहुमंजिले भवन के रूप में बनते थे। मलाबार में धनिकों के घर टीक की लकड़ी से बनाए जाते थे, जो प्रायः दो मंजिले होते थे। सोने के लिए खाट और पलंग का प्रयोग होता था। धनी लोगों के घरों में लकड़ी की आराम-कुर्सियां होती थीं। रईस लोगों के पलंगों एवं खाटों पर कीमती बिछावन और तकिए होते थे। वे लोग जाड़ों में कम्बल एवं गर्मियों में मच्छरदानी का प्रयोग करते थे। रईसों की बैठकें कालीनों से सजाई जाती थीं। बैठकों में गोलाकार गाव-तकिये या मसनद होते थे। हाथ से झलने वाले पंखों का भी चलन था। ये पंखे ताड़पत्र, हाथीदांत, जरी, रेशम, मोटे कागज आदि से बनते थे। अमीरों की हवेलियों में दास-दासियां पंखे झलते थे। छत की कड़ियों से बड़े-बड़े पंखों को लटकाया जाता था जिन्हें कक्ष के बाहर बैठे सेवक डोरी से खींचते थे। बादशाह या अमीरों के यहाँ पंखे के हत्थे सोने या चांदी के होते थे, जिनमें हीरे-जवाहरात जड़े होते थे। जन-साधारण के आवास: साधारण आय वाले लोगों के घर रईसों के घरों की तुलना मंें छोटे और साधारण होते थे। यदि घर मुख्य सड़क पर होता था तो नीचे की मंजिल में दुकानों के लिए कुछ स्थान आगे की ओर निकाल दिया जाता था। घरों की छत के साथ छज्जे भी होते थे जिनसे मकानों की दीवारों पर छाया रहती थी तथा धूप एवं वर्षा से बचाव होता था। दीवारों पर सफेदी पोती जाती थी। मध्यम वर्गीय लोगों के घर प्रायः पक्के एवं एक-दो मंजिल के होते थे जबकि निम्न मध्यमवर्गीय लोगों के घर कच्चे एवं एक-मंजिले होते थे। निर्धन लोगों के आवास: निर्धन घास-फूस की झोंपड़ियों में रहते थे जिनमें कोई खिड़की या अलग कोठरी नहीं होती थी। एक झोंपड़ी में ही पूरा परिवार रहता था। दो झोंपड़ियों को मिलाकर बड़ा घर तैयार करना विशेष बात समझी जाती थी। झोंपड़ी का एक दरवाजा प्रवेश द्वार के रूप में होता था। कच्चे घरों एवं झौंपड़ियों के आंगन तथा दीवारें मिट्टी और गोबर से लीपे जाते थे। कश्मीर में अधिकांश घर लकड़ी से बनते थे। बहुत-से लोग नावों पर भी रहते थे। झौंपड़ियों एवं कच्चे घरों में सोने के लिए प्रायः चटाई का प्रयोग होता था। गरीब लोेग बिछावन के लिए केवल दरी या चादर का प्रयोग करते थे। गरीब लोग ताड़ और नारियल के पत्तों से बने पंखे प्रयोग करते थे। मनोरंजन के साधन मध्य-कालीन भारत में मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध थे। अमीरों एवं गरीबों के खेल एवं मनोरंजन के साधन अलग-अलग थे। इसी प्रकार नगरों एवं गांवों के मनोरंजन के साधन अलग-अलग थे। गरीब लोग प्रायः कबड्डी, कुश्ती, गिल्ली डण्डा, गेंद आदि खेल खेलते थे। जबकि शाही परिवारों के सदस्य, धनी लोग एवं मध्यमवर्गीय लोग चौपड़, गंजीफा एवं ताश और शतरंज खेलना अधिक पंसद करते थे। भारत में मुसलमानों द्वारा नाई का खेल आरम्भ किया गया था। पच्चीसी का खेल एक प्राचीन भारतीय खेल था जिसे अकबर ने बढ़ावा दिया। चौपड़: चौपड़ एक प्राचीन भारतीय खेल था जो अब भी पच्चीसी, चौसर और चौपड़ आदि नामों से जाना जाता है। आज की तरह मध्य-काल में भी यह 16 गोटियों द्वारा खेला जाता था जो विभिन्न रंगों के 4 हिस्सों में होती थीं। साधारणतः यह खेल चार खिलाड़ियों द्वारा खेला जाता था, जो दो-दो सदस्यों के दो दलों में विभक्त होते थे। प्रत्येक खिलाड़ी के हिस्से में चार गोटियां आती थीं। प्रत्येक खिलाड़ी पासे चलता था और पासे पर आए अंकों के अनुसार अपनी गोटियां चौपड़ के खानों पर आगे बढ़ाता था। चौपड़ का खेल महाभारत से लेकर मुगल बादशाहों के काल तक राजपरिवारों में अत्यधिक लोकप्रिय रहा। अकबर ने चौपड़ के नियमों में कुछ परिवर्तन करके 'चन्दर-मण्डल' का खेल बनाया। इसमें खिलाड़ियों की संख्या 16 होती थी तथा उनमें बराबर बांटने के लिए गोटियों की संख्या 64 कर दी गई थी। औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा अपना अधिकांश समय अपनी सहेलियों के साथ चौपड़ खेलने में व्यतीत करती थी। ताश: ताश प्राचीन भारतीय खेल था। मध्य-कालीन ताश के खेल में ताश के 144 पत्ते होते थे। 12-12 पत्तों के 12 समूह हुआ करते थे, जिनमें बादशाह और उसके वजीर आदि सहयोगी होते थे। अकबर के समय तक इन समूहों के नाम संस्कृत भाषा में थे। अकबर ने इनमें से अन्तिम सात के नए नाम बदल दिए और पांचवें को 'धनपति' समूह नाम दिया। मुगलों में यह खेल बहुत लोकप्रिय था। ताश के समस्त पत्तों पर एक ही चित्र होता था। एक ताश पर शकटासुर का वध करते हुए कृष्ण का चित्र अंकित था। राजस्थान में गोलाकार ताश के पत्तों का प्रचलन था। ताश के खेल की तरह गंजीफे का खेल भी खेला जाता था। शतरंज: शतरंज भी भारत का पुराना खेल है, जो उस समय राजपरिवारों से लेकर जन-साधारण में समान रूप से लोकप्रिय था। इसमें एक चौकोर चौकी पर एक वर्गाकार आकृति बनाई जाती थी जिसमें आठ पंक्तियों में 8-8 वर्ग अर्थात् कुल 64 वर्ग बने हाते थे, ये वर्ग काले-सफेद रंगों से पुते होते थे। इस वर्ग की दो तरफ एक-एक खिलाड़ी बैठता था जिनमें से एक के पास सफेद रंग के तथा दूसरे खिलाड़ी के पास काले रंग के 16-16 मोहरे होते थे। ये मोहरे एक सेना का प्रनिनिधित्व करते थे जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट एवं पैदल अर्थात् चतुरंगिणी सेना होती थी। प्रत्येक सेना के केन्द्र में बादशाह एवं वजीर होता था। अकबर इस खेल को बहुत पसन्द करता था। शतरंज के अन्तर्राष्ट्रीय मुकाबले भी होते थे। जहाँगीर के एक दरबारी 'खानखाना' का पर्सिया के शाह सफी से मुकाबला हुआ, जिसमें तीन दिन के खेल के बाद 'खानखाना' पराजित हुआ था। पच्चीसी का खेल: पच्चीसी एक प्राचीन हिन्दू खेल था जिसे अकबर विशेष रूप से पसन्द करता था। इसे बड़े आकार की चौपड़ कहा जा सकता है। आगरा तथा फतेहपुर सीकरी के शाही-महलों में संगमरमर के पत्थरों पर इस खेल के चतुर्भुजाकार खाने आज भी बने हुए हैं। गोटियों का खेल दो गोटी, तीन गोटी और बारह गोटी शहरी और देहाती दोनों क्षेत्रों में प्रचलित था। दो गोटी के खेल में चौखाने में आमने-सामने दो गोटियां रखी जाती थीं और एक-दूसरे की गोटियां मारने के लिए चालें चली जाती थीं। इसी प्रकार तीन गोटी का खेल तीन गोटी से तथा नौ गोटी का नौ गोटियों से खेला जाता था। गोटियों के अन्य खेल: गोटियों के अन्य खेलों में मुगल-पठान, लाम-तुर्क, भाग-चल, भाग-चक्कर, छब्बीस गोटी तथा भेड़-बकरी के खेल अधिक प्रचलित थे। घर के बाहर के खेल: घर के बाहर मैदानों में खेले जाने वाले खेलों में अमीर लोग चौगान, पशुओं का शिकार, जानवरों की लड़ाई आदि खेल खेलते थे। शाही परिवारों का प्रिय खेल चौगान था जिसे वर्तमान में पोलो कहते हैं। भारत में सम्भवतः मुसलमानों ने ही इस खेल को प्रचलित किया था। राजपूत भी इस खेल को बड़े चाव से खेलते थे। इस खेल में पांच-पांच सदस्यों के दो दल होते थे। अकबर के काल में दो चौगान-खिलाड़ी मीर शरीफ और मीर गियासुद्दीय अधिक प्रसिद्ध थे। मुगल अभिलेखों में 'घोफरी' खेल का भी उल्लेख मिलता है जो हॉकी के खेल से मिलता-जुलता था। यह ग्रामीण क्षेत्रों में गेंद और छड़ी से खेला जाता था। मुगलकाल में कुश्ती तथा मुक्केबाजी भी मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। अकबर अपने दरबार में फारसी और तूरानी मुक्केबाज रखता था। उच्चवर्गीय रईसों में घुड़सवारी भी मनोरंजन का साधन था। इसके लिए विशेष प्रकार के अरबी घोडे़ यमन, ओमन आदि से मंगाये जाते थे। घुड़सवारी में राजपूत और गुजराती मुख्य प्रतियोगी हुआ करते थे। तीरंदाजी, तलवारबाजी, गोला फेंकना, भाला फंेकना आदि में भी जन-सामान्य की रुचि थी और इसके लिए प्रतियोगिताएं हुआ करती थीं। जन-साधारण के लोग कुश्ती और मुक्केबाजी, पशु-दौड़ आदि खेल खेलते थे। शिकार खेलना: बादशाहों, राजाओं एवं अमीरों में शिकार खेलना मनोरंजन का उत्तम साधन समझा जाता था जिसमें राजा और अमीरों के साथ-साथ साधारण लोग भी भाग लेते थे। शेर का शिकार केवल बादशाह, शहजादे एवं राजा किया करते थे। हाथियों का शिकार बादशाह या राजा की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता था। राजपूत योद्धा प्रायः शेर, बाघ एवं जंगली सूअर का शिकार करते थे। अकबर ने भारत में शिकार खेलने का तुर्की तरीका प्रचलित किया जिसे 'कमारघा शिकार' कहते थे। इसमें ढोल-नगाड़े एवं मनुष्यों की चिल्लाहट का हाका लगाकर जंगली जानवरों को एक घेरे में ले लिया जाता था और फिर बादशाह एवं बेगम उन पशुओं का शिकार करते थे। पक्षियों का शिकार अमीर और गरीब दोनों का मनपसन्द खेल था। मध्य-काल में मछली पकड़ना भी मनोरंजन का प्रमुख साधन था। मछली पकड़ने के लिए विशेष प्रकार के जाल का प्रयोग किया जाता था जिसे सफरा या भँवर जाल कहते थे। मेढ़ों, सांडों एवं भैंसों आदि की लड़ाई भी उस काल के खेलों में प्रमुख स्थान रखती थीं। निर्धन लोग छोटे जानवरों की लड़ाई से मनोरंजन करते थे। बुलबुल, बटेर एवं मुर्गे भी लड़ाए जाते थे। कबूतर उड़ाना भी व्यापक स्तर पर प्रचलित मनोरंजन था। मध्य-कालीन समाज में बाजीगरी, जादूगरी, नटविद्या, कठपुतली के खेल, मुशायरा, नृत्य-संगीत के आयोजन, कलाबाजी और नाटक-तमाशे भी मनोरंजन के लोकप्रिय साधन थे। हिन्दू जनता रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन करती थी। राजस्थान में 'पार्श्वनाथ चरित्र' तथा 'राजा हरिश्चन्द्र चरित्र' के मंचन के भी प्रमाण मिलते हैं। गुजरात के कलाकार देश के विभिन्न भागों में नाटक तथा खेल-तमाशे किया करते थे। मध्य-कालीन समाज में त्यौहार, उत्सव और मेले हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग त्यौहार मनाते थे। ये त्यौहार पूरे देश में एक समय पर मनाये जाते थे किन्तु इन्हें मनाने के ढंग में स्थानीय भिन्नताएं रहती थीं। दीपावली पर दीयों की सजावट, अतिशबाजी तथा सोने-चांदी और जवाहरात के प्रदर्शन होते थे। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ होली, दीपावली एवं राखी आदि कुछ हिन्दू त्यौहारों को मनाते थे किन्तु औरंगजेब ने अपने दरबार में कई हिन्दू तथा फारसी त्यौहारों का मनाया जाना बन्द कर दिया। हिन्दुओं के त्यौहार पूरे वर्ष में फैले हुए थे तथा लगभग प्रत्येक माह में आते थे, इन्हें विक्रम कलैण्डर की तिथियों के अनुसार मनाया जाता था। हिन्दुओं के त्यौहार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष से वर्ष का पहला महीना आरम्भ होता था। इसके शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक चैत्रीय नवरात्रियों का आयोजन किया जाता था। चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा, चैत्रीचन्द्र (चेटीचण्ड) मनाया जाता था। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवान राम का जन्मदिन अर्थात् रामनवमी का त्यौहार मनाया जाता था। चैत्र-पूर्णिमा को हनुमान जयंती अर्थात् हनुमानजी का जन्म दिवस मनाया जाता था। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वट सावित्री का पर्व होता था जिसमें पत्नी अपने पति की दीर्घ आयु की कामना के साथ व्रत करती थी। इसका महाराष्ट्र में अधिक महत्व था। आषाढ़ माह की पूर्णिमा को गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाते थे। इस दिन भगवान वेदव्यास का जन्मदिन होता है। इस दिन लोग अपने गुरु की पूजा करके उन्हें दक्षिणा आदि देते थे। श्रावण माह की पूर्णिमा को रक्षा-बन्धन मनाया जाता था इस दिन बहिनें अपने भाइयों के घर जाकर उनकी कलाई पर राखी बांधती थीं और उनकी रक्षा की कामना करती थीं। भाद्रपद माह की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी मनाया जाता था। दिन में निराहार अथवा फलाहार के साथ उपवास करते थे एवं अर्द्ध-रात्रि के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर गुड़-धनिये का प्रसाद बांटते थे। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाते थे। आश्विन (कार्तिक) माह के शुक्ल पक्ष के पहले नौ दिन में शारदीय नवरात्रि का आयोजन किया जाता था। दसवें दिन दशहरा अर्थात् विजयादशमी का आयोजन होता था। इस दिन को भगवान राम द्वारा रावण के वध के दिवस के रूप में मनाया जाता था। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस, चतुर्दशी को रूप चौदस एवं अमावस्या को दीपावली मनाई जाती थी। इस दिन को भगवान राम के अयोध्या में लौटने का दिन माना जाता था और उनके स्वागत में प्रत्येक, गांव, नगर मौहल्ले, गलियों एवं घरों में दिए जलाए जाते थे। रात्रि में माँ लक्ष्मी की पूजा होती थी एवं कुछ लोग द्यूतक्रीड़ा करना अच्छा समझते थे। दीपावली के अगले दिन यम द्वितीया होती थी जिसे भाई दूज के रूप में मनाया जाता था। इस दिन भाई अपनी बहिन के घर जाकर उससे टीका करवाता था। इसी दिन गोवर्द्धन का आयोजन किया जाता था। गोवर्द्धन पूजा में अकबर भी भाग लेता था। बहुत सी गायों को नहला-धुलाकर एवं आभूषणों से सजाकर बादशाह के सामने लाया जाता था। बादशाह उनकी पूजा करता था। जहाँगीर ने भी इस त्यौहार का उल्लेख किया है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को भी दिए जलाए जाते थे। इस दिन त्रिपुरी पूर्णिमा का आयोजन किया जाता था। माघ माह में जब सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता था तब पूरे देश में मकर संक्रान्ति मनाई जाती थी। इस दिन नदियों में स्नान करके निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान दिया जाता था एवं अपने से बड़ों को भेंट दी जाती थी। इस दिन तमिनाडु में पोंगल का आयोजन किया जाता था। माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसन्त पंचमी के रूप में सरस्वतीजी का जन्म-दिवस मनाया जाता था। इस दिन पीले कपड़े पहनते थे एवं पीले व्यंजन बनाए जाते थे। माघ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि का आयोजन होता था। इस दिन पूरे दिन एवं पूरी रात निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा की जाती थी। फाल्गुन माह वर्ष का अंतिम माह होता था। इसमें सबसे बड़ा त्यौहार होली मनाया जाता था। फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता था। इस दिन हिरणाकश्यप की बहिन होलिका का दहन किया जाता था तथा प्रहलाद की रक्षा की जाती थी। होली की अग्नि में नया धान सेककर खाया जाता था। अगले दिन रंग खेला जाता था जिसे धुलण्डी कहते थे। इनके अतिरिक्त करवा चौथ, सकट चौथ, शीतला सप्तमी, बड़ अमावस, हरियाली अमावस आदि अनेक छोटे-छोटे त्यौहार मनाए जाते थे। प्रत्येक एकादशी को निराहार रहकर व्रत किया जाता था तथा अगले दिन प्रदोष का व्रत किया जाता था। कुछ प्रांतों में कुछ विशिष्ट त्यौहार भी मनाए जाते थे। केरल में ओणम, ओडिसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, विषु, बिहार में छठ पूजा, पंजाब में लोहड़ी एवं वैशाखी, बंगाल में काली पूजा इसी प्रकार के विशिष्ट त्यौहार थे। हिन्दुओं के ये समस्त त्यौहार अत्यंत प्राचीन काल से मनाए जाते रहे थे एवं वर्तमान समय में भी ये त्यौहार सामाजिक जन-जीवन में विशिष्ट स्थान रखते हैं। वर्ष भर में आने वाले सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण भी दान-पुण्य एवं स्नान के कारण पर्व की तरह दिखाई देते थे। अबुल फजल ने राम-नवमी और कृष्ण-जन्माष्टमी का उल्लेख महत्त्वपूर्ण हिन्दू त्यौहारों के रूप में किया है। मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार मुसलमानों के प्रमुख त्यौहारों में मुहर्रम, मीलाद उन-नबी, सबे-उल-फितर और ईद-उल-जुहा मुख्य थे। मध्य-कालीन मुस्लिम समाज इन त्यौहारों को बड़ी श्रद्धा से मनाता था। मुहर्रम के पहले दस दिनों में शिया मुसलमान शोक मनाते थे। शिया अनुश्रुतियों के अनुसार हज़रत अली और उनके दो पुत्र-हसन और इमाम हुसैन, दीन की खातिर शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में शिया हर वर्ष मुहर्रम के महीने की दसवीं तारीख को ताजिये निकाल कर शोक मानते हैं। इस दिन शिया मुसलमान पुरुष अपने शरीर को यातनाएं देते थे और अपने सिर पर धूल डालते थे। वे शोक की काली पोशाक पहनते थे। इब्नबतूता के अनुसार लोग उस दिन गरीबों को आटा, चावल और मांस बांटा करते थे। मुगल बादशाह यद्यपि सुन्नी थे तथापि उन्होंने मुहर्रम मनाये जाने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया था किन्तु औरंगजेब ने अपने राज्य में मुहर्रम का जुलूस निकालने की मनाही कर दी थी। फिर भी मुहर्रम का जमाव तथा ताजिये का जुलूस कभी बन्द नहीं हुआ। इस कारण मुहर्रम के दिन शिया और सुन्नियों में खूनी-संघर्ष हो जाते थे जिनमें कई लोग मारे जाते थे। हिजरी महीने 'रबी-उल-अव्वल' के बाहरवें दिन हजरत मुहम्मद के जन्मदिन को मीलाद उन-नबी के रूप में मनाया जाता था। इस दिन शाही-महल में सैयदों, विद्वानों और सन्तों की सभा होती थी और कुरान पढ़ी जाती थी। गुलाब-जल का छिड़काव करने के साथ गरीबांे में मिठाई और हलुआ बांटा जाता था। शाहजहाँ इस अवसर पर एक बड़ी रकम खैरात के रूप में बांटता था। इसी दिन हजरत मुहम्मद का निधन भी हुआ था। हिजरी माह 'शाबान' के चौदहवें दिन 'सबे-बरात' मनाया जाता था। इस दिन पैगम्बर मुहम्मद स्वर्ग में दाखिल हुए थे। इसलिए मुसलमान उस दिन खुशियां मनाते थे। शाबान के तेरहवें दिन लोग अपने परिवार के मृतक व्यक्तियों के नाम पर दही और मिठाइयों की थालियां सजाकर उन पर 'फातिहा' पढ़ते थे। आपस में मिठाई और उपहार का आदान-प्रदान होता था। इस पर्व की दूसरी विशेषता घरों तथा मस्जिदों में दीपक जलाना तथा आतिशबाजी का खेल था। फीरोज तुगलक इस पर्व पर तीन दिनों तक आतिशबाजी करता था। शाही परिवार के साथ ही दिल्ली की जनता भी रोशनी तथा सजावट देखने के लिए सड़कों पर निकलती थी। राजमहलों, सरकारी इमारतों, बाग-बगीचों तथा बावलियों पर रोशनी की जाती थी और बादशाह एवं अमीर लोग गरीबों में पैसे बांटते थे। रमजान महीने में मुसलमान दिन में निराहार रहकर 'रोजे' रखते थे। इस दौरान वे पानी की एक बूंद भी नहीं पीते थे। रमज़ान महीने का आखरी जुमा (शुक्रवार) जुमातुल विदा के रूप में मानाया जाता था। ईद-उल-फितर तथा ईद-उल-जुहा मुसलमानों के महत्त्वपूर्ण त्यौहार थे। ईद-उल-फितर रमजान के महीने के अंत में आता था। ईद की घोषणा तोप दाग कर तथा बिगुल बजाकर की जाती थी। ईद के दिन तथा उसके अगले दिन मुसलमान अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के गले लगकर उन्हें मुबारक देते थे। इस अवसर पर घरों में मिठाइयां बनाकर गरीबों में बांटी जाती थी एवं घर पर ईद की बधाई देने के लिए आने वालों को परोसी जाती थीं। अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों के घर भी मिठाइयाँ भेजी जाती थीं। परिवार के बड़े सदस्य अपने से छोटों को 'ईदी' (कुछ रुपये एवं उपहार) दिया करते थे। फिरोज तुगलक इस अवसर पर अपने दरबारियों, कर्मचारियों तथा गुलामों को कपड़े एवं मिठाई देता था। सुल्तन हाथी-घोड़ों के जुलूस के साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने जाता था। सिकन्दर लोदी ने इस अवसर पर कुुछ कैदियों को जेल से रिहा करने की प्रथा शुरू की थी। जहाँगीर और शाहजंहा ने ईद के दिन जरूरतमंदों और गरीबों में बांटने के लिए खैरात की बड़ी राशि निश्चित की थी। औरंगजेब भी इस पर्व को धूमधाम से मनाता था। हिजरी कलैण्डर के शव्वाल मास की पह्ली तारीख को ईद उल-फ़ित्र मनाई जाती थी। हिजरी कलैण्डर के बारहवें महीने 'जई-उल-हज्जा' के दसवें दिन ईद-उल-अज़हा या बकरा ईद मनाई जाती थी। इसकी तैयारियां कई दिन पहले से होती थीं। बादशाह जुलूस एवं लाव-लश्कर के साथ ईदगाह जाकर ईद की नमाज पढ़ता था। इसके बाद बादशाह की उपस्थिति में ऊँट की बलि दी जाती थी। तुर्की सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक और मुगल बादशाह जाहंगीर अपनी तलवार से बकरे की बलि किया करते थे। सम्पन्न लोग भी अपने घरों में बकरे या भेड़ की बलि देते थे। घरों में मिठाइयां, पूडियां आदि तैयार करते थे तथा अपने पूर्वजों के नाम का फातिहा पढ़ते थे। समकालीन ग्रंथों से पता चलता है कि मध्य-कालीन मुस्लिम समाज में बड़ा-वफात', आखिर-चहर और शंबा नामक पर्व भी प्रचलित थे। इन के अलावा योम अल जुमा अर्थात् प्रत्येक साधारण शुक्रवार भी ईद उल मोमिनीन अर्थात् इस्लाम के विश्वासियों का पर्व कह्लाता है। मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में नौरोज, मीना बाजार और आबे-पशम भी मनाए जाने लगे थे। 'नौरोज' फारसी वर्ष के पहले महीने 'फरवारदीस' के प्रथम दिवस को (20 या 21 मार्च) को मनाया जाता था। इस समारोह को मुख्यतः उच्च वर्गीय मुसलमान और अमीर मनाते थे। इसका समारोह उन्नीस दिनों तक चलता था। यही समय भारत में बंसत के जाने का और गर्मी के आने का होता था। इस पर्व की तैयारियां महीने पहले शुरू हो जाती थीं। शाही राजधानी में बाजार, दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम जैसे स्थानों को किनखाब, मखमल, जरी के सुनहले कपड़ों से सजाया जाता था। मुख्य समारोह का आयोजन दीवान-ए-आम में होता था जहाँ बड़ी वैभवपूर्ण सजावट की जाती थी। अमीर लोग भी अपने महलों को सजाते थे। साधारण-जन अपने मकानों की सफाई करके बंदनवार आदि लटकाते थे। बहुत से स्थानों पर नौरोज का मेला लगता था। इस त्यौहार पर जुआ खेलने पर से प्रतिबंध हट जाता था। सप्ताह में एक दिन समस्त प्रजा के लिए बादशाह का दरबार खोल दिया जाता था। मुगल बादशाहों ने ऐसे अवसर पर 'निसार' के नाम से नए सिक्के चलाने की प्रथा प्रारम्भ की जो उस अवसर पर गरीबों को बांटने तथा लोगों को नजराने के लिए काम आते थे। राज्याभिषेक के अवसर पर भी ऐसे सिक्के चलाये जाते थे। इन उन्नीस दिनों में शराब भी खूब पी जाती थी और चारों ओर आनन्द एवं उत्साह रहता था। फारस के कई गायक, वादक और नर्तक बादशाह के दरबार में पहुँचते थे। बादशाह का चंदोबा बीच में लगाया जाता था जो हीरे-मोती और कीमती जवाहरात से सुसज्जित होता था। इसके चारों ओर अमीरों के चंदोबे होते थे। बादशाह तथा उसके अमीर एक दूसरे को मूल्यवान भेंट देते थे। बादशाह का जन्मदिन भी बड़े उत्साह और आनन्द से मनाया जाता था। अकबर ने यह प्रथा प्रारम्भ की कि उसका जन्मदिन सूर्य-वर्ष और चन्द्र-वर्ष दोनों के अनुसार मनाया जाए। इस दिन नौरोज की तरह ही शाही महल और दरबार को सजाया जाता था। हाथी-घोड़ों को सजाकर बादशाह के समक्ष पेश किया जाता था। बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर अपनी माता से आशीर्वाद लेने जाता था। हुमायूँ ने इस अवसर पर बादशाह को मूल्यवान धातुओं तथा उपयोगी वस्तुओं से तौलने की प्रथा आरम्भ की। अकबर यह रस्म वर्ष में दो बार- सूर्य वर्ष तथा चन्द्र वर्ष के अनुसार करता था। यह प्रथा जहाँगीर तक तथा कुछ परिवर्तनों के साथ शाहजहाँ के समय तक चलती रही किन्तु औरंगजेब ने वर्ष में एक बार तौले जाने की पुरानी पद्धति अपनाई तथा 51 वर्ष की उम्र में इस प्रथा को समाप्त कर दिया। औरंगजेब ने यह प्रथा अपने पुत्रों के लिए बीमारी के उपरान्त स्वस्थ होने पर, इस शर्त पर कायम रखी कि इसमें प्राप्त धन और वस्तुएं गरीबों में बांट दी जाएं। तौलने की रस्म शहजादे के दो वर्ष के होने पर शुरू होती थी, जबकि उसे केवल एक वस्तु से तौला जाता था। फिर वस्तुओं की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ाई जाती थी, जो धीरे-धीरे सात-आठ तक पहुँच जाती थी किन्तु किसी भी स्थिति में यह बारह से अधिक नहीं होती थी। ये वस्तुएं बाद में फकीरों तथा जरूरतमंद लोगों को बांट दी जाती थीं। इस समारोह के बाद बादशाह तख्त पर बैठकर लोगों से उपहार ग्रहण करता था। बादशाह इस अवसर पर कुछ लोगों के लिए मनसबदारी घोषित करता था तथा कुछ लोगों को महंगे उपहार तथा जागीरें देता था। मीना बाजार की शुरूआत सर्वप्रथम हुमांयू ने की थी। अकबर इन दिनों को 'खुशरोज' कहता था। शाहजहाँ प्रत्येक समारोह के बाद इस प्रकार का बाजार लगवाया करता था, नौरोज के बाद इस बाजार का लगना अनिवार्य हो गया था। अकबर के समय इस बाजार की सबसे अधिक उन्नति हुई। पहले माह बाजार बादशाह के महल के अन्दर नावों पर लगाया जाता था किंतु बाद में हरम की बारादरी में लगने लगा। इसमें अमीरों की स्त्रियां और पुत्रियां दुकानें लगाकर बैठती थीं। राजपूत स्त्रियां भी इसमें भाग लेती थीं। अधिकांश दुकानें बहुमूल्य कपड़ों और जेवरातों की होती थीं। बादशाह शहजादियों तथा हरम की बेगमों के साथ बाजार में आता था और दुकानों से दुगने-तिगुने दाम देकर सौदा खरीद लेता था। बादशाह जिस स्त्री से प्रसन्न हो जाता, उससे अधिक वस्तुएं खरीदकर आवश्यकता से अधिक धन प्रदान कर देता था। शाहजहाँ ने मुमताज महल को पहली बार मीना बाजार में ही देखा और पसंद किया था। औरतों के इस बाजार के बाद मर्दों का बाजार लगता था, जहाँ संसार के कई देशों के व्यापारी सामान बेचने आते थे। वर्षा के आरम्भ में मुगल दरबार में होली की तरह एक पर्व मनाया जाता था। जहाँगीर इस पर्व को 'आब-ए-पशम' कहता था किन्तु इतिहासकार लाहोरी ने 'पडशनामा' में इसे 'ईद-ए-गुलाबी' कहा है। इस अवसर पर शाहजादे, प्रमुख अमीर एवं दरबारी एक-दूसरे पर गुलाब-जल छिड़कते थे। बादशाह को भेंट तथा उपहार प्रदान किए जाते थे। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मध्ययुगीन भारतीय समाज में हिन्दू और मुसलमान अपने-अपने त्यौहार मनाते थे। मुस्लिम बादशाहों ने कुछ हिन्दू त्यौहारों को अपना लिया था तथा हिन्दू भी मुसलमानों के कुछ त्यौहारों में भाग लेते थे।


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