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  • अध्याय-32 भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

     12.01.2020
    अध्याय-32 भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

    भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन


    यह बात अत्यन्त उपहासास्पद है कि जब मुसलमान उत्तर भारत के मन्दिर तोड़ रहे थे तब उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्तों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार से यदि भक्ति की धारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिन्ध में, फिर उत्तरभारत में, प्रकट होना चाहिए था, पर हुई वह दक्षिण में। - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।


    भगवद्-भक्ति की अवधारणा आर्यों के प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में ईश्वर की स्तुतियां लिखी गई थीं। इस प्रकार भक्ति की अवधारणा का बीज वेदों में उपलब्ध था जो उपनिषद काल में हरे-भरे पौधे में बदलने लगा। बादरायण के ब्रह्मसूत्र ने इस कार्य को भलीभंाति आगे बढ़ाया। श्रीमद्भगवतगीता ने भक्ति रूपी पौधे को वैचारिक एवं दार्शनिक खाद-पानी देकर विशाल वटवृक्ष बन जाने का अवसर प्रदान किया। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है- 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शरणम् व्रज।' अर्थात् सब धर्मों को छोड़कर मेेरी शरण में आ। अर्थात् मेरी भक्ति कर। गीता के बारहवें अध्याय में भक्ति का अत्यन्त सौम्य निरूपण किया गया है।

    छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में बौद्धों तथा जैनियों के धार्मिक आंदोलनों के उठ खड़े होने से भक्ति रूपी वृक्ष कूछ सूखने लगा किंतु शुंग, कण्व, सातवाहन तथा गुप्त शासकों के काल में भक्ति रूपी इस वृक्ष का फिर से उद्धार हुआ। यही कारण था कि शुंग काल (ई.पू.184-ई.पू.72) से लेकर गुप्त काल (ई.320-495) तक विविध धार्मिक साहित्य की रचना हुई और भक्ति रूपी विशाल वटवृक्ष फिर से पूरे उत्साह के साथ लहराने लगा। शुंगकाल में सूत्र-ग्रंथों एवं स्मृतियों की रचना हुई जबकि गुप्तकाल में विविध पुराणों को लिखा गया जो मूल रूप से भक्ति-ग्रंथ हैं और विष्णु एवं उसके विविध रूपों अर्थात् भगवान एवं उसके अवतारों की भक्ति का उपदेश देते हैं।

    भागवत पुराण के अनुसार भगवान को पूर्ण आत्मसमर्पण करके हम ब्रह्म को आनन्दमय अवस्था में प्राप्त कर सकते हैं। विभिन्न पुराणों के माध्यम से भगवत्-भक्ति के विशाल वटवृक्ष पर वैष्णव धर्म की विविध शाखाओं ने आकार लिया। पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म के जन्म एवं विकास की चर्चा हम 'पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास' नामक अध्याय में विस्तार से कर चुके हैं।

    पुरुगुप्त से लेकर विष्णुगुप्त तक (ई.467-550) के परवर्ती-गुप्त शासकों ने पुनः बौद्ध धर्म को आश्रय दिया जिससे भक्ति-धर्म का पौधा एक बार फिर मुरझाने लगा। आठवीं शताब्दी ईस्वी में शंकराचार्य ने बौद्धों के मत का खण्डन करके ब्रह्म को जगत् का आधार बताया तथा 'भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढ़मते' का उद्घोष करके उन्होंने भक्ति के अवरुद्ध प्रवाह को पुनः खोल दिया।

    चूंकि शंकराचार्य का 'ब्रह्म' भक्तों की करुण-पुकार सुनने के लिए उपलब्ध नहीं था इसलिए शंकराचार्य के बाद के लगभग सभी आचार्यों ने शंकराचार्य के अद्वैतमत का खण्डन एवं मण्डन करके भक्ति को ज्ञान की काराओं से मुक्त कर दिया। शंकराचार्य के बाद दक्षिण भारत में 'सगुण वैष्णव-भक्ति' की धारा प्रकट हुई। वेदों से लेकर, उपनिषदों, सूत्र ग्रंथों, स्मृतियों, पुराणों आदि में भक्ति के जितने भी सिद्धांत एवं स्वरूप प्रस्तुत किए गए थे, आलवार एवं नयनार संतों ने उन सिद्धांतों को लोकभाषा में गीत लिखकर भगवत्-भक्ति को सहज रूप से जन-सामान्य के लिए उपलब्ध करा दिया। उन्होंने भक्ति का अत्यंत सरस स्वरूप तैयार किया जिसकी दार्शनिक भावभूमि अत्यंत उच्च कोटि की थी।

    यद्यपि आलवार एवं नयनार संतों का यह काल लगभग आठ सौ से नौ सौ वर्ष लम्बा है। ये संत कम शिक्षित थे और साधारण जीवन व्यतीत करते थे। इनकी संख्या तय करना कठिन है। आलवार सन्तों ने भगवान विष्णु को अराध्य देव मानकर गीतों और भजनों के माध्यम से भक्ति की धारा प्रवाहित की तो नयनार संतों ने शिव की उपासना का मार्ग प्रस्तुत किया। नयनार संत भगवान शिव को प्रेमपात्री के रूप में तथा स्वयं को प्रेमी के रूप में प्रदर्शित करते हुए गम्भीर भक्तिमय उद्गार प्रकट करते थे।

    इस प्रकार दक्षिण से आई भक्ति की फुहारों का सहारा पाकर ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास हिन्दू-धर्मरूपी वटवृक्ष फिर से लहलहा उठा। भक्ति रूपी यह विशाल वटवृक्ष आज भी पूरी ऊर्जा के साथ खड़ा है और मनुष्य मात्र को शीतल छाया प्रदान कर रहा है।

    भक्ति आन्दोलन के पुनरुद्धार के कारण

    दिल्ली सल्तनत काल (ई.1206-1526) में, हिन्दू-धर्म को इस्लाम से बचाने के लिए भारत भूमि पर भक्ति आंदोलन का पुनरुद्धार हुआ। भक्ति आंदोलन तब तक वेगवती नदी के समान प्रवाहरत रहा जब तक कि पंद्रहवीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत कमजोर न पड़ गई। इस भक्ति आंदोलन के प्रभाव से हिन्दुओं को नवीन मनोबल प्राप्त हुआ तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रांतीय राज्यों का उदय हुआ। इनमें से अनेक राज्य हिन्दू राजपूतों द्वारा शासित थे। उनके सरंक्षण में हिन्दू-धर्म के भीतर भक्ति आंदोलन अपने चरम को पहुँच गया। भक्ति आन्दोलन के पुनरुद्धार के निम्नलिखित कारण प्रतीत होते हैं-

    (1.) राष्ट्रीय आवश्यकता: भारत में जिस समय दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई, उस समय देश में प्रचलित वैष्णव धर्म, शैव धर्म, शाक्त धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन-धर्म तो उपस्थित थे ही, साथ ही इन धर्मों के भीतर भी बड़ी संख्या में मत-मतांतर एवं सम्प्रदाय बने हुए थे। राजाओं-महाराजाओं एवं साधु-संतों से लेकर साधारण प्रजा तक दिग्भ्रमित होकर इन सम्प्रदायों में टूटी और बिखरी हुई थी। प्रत्येक सम्प्रदाय स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ एवं एकमात्र सत्य घोषित करता था तथा दूसरे सम्प्रदाय को पूरी तरह नकारता था।

    ऐसी स्थिति में भारत भूमि पर जब इस्लाम का आक्रमण हुआ तो इन सम्प्रदायों को एक ही दार्शनिक भावभूमि में पिरोकर एक सर्व-स्वीकार्य धर्म की छतरी के नीचे लाने की आवश्यकता हुई। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो खण्ड-खण्ड हुआ हिन्दू-धर्म इस्लाम की चपेट खाकर पूरी तरह से नष्ट हो जाता। इस काल में बौद्ध धर्म नष्ट-प्रायः था तथा जैन-धर्म का प्रभाव अत्यंत सीमित था किंतु हिन्दू-धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों को समेट कर एक करने की आवश्यकता थी।

    शंकर के अद्वैतवाद और मायावाद, हिन्दुओं को इस्लाम के समक्ष टिकाए रखने में समर्थ नहीं थे। इसलिए हिन्दू-धर्म को ऐसे दार्शनिक आधार की आवश्यकता थी जो भगवान के सर्व-सामर्थ्यवान एवं भक्त-वत्सल होने का भरोसा दे सके ताकि लोग अपने धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास करें और विदेशी धर्म को स्वीकार नहीं करें।

    (2.) हारे को हरि नाम: मुस्लिम शासन काल में हिन्दू किसानों पर समस्त कर लाद दिए गए तथा मुसलमान बनने वाले किसानों के कर माफ कर दिए गए। इसी प्रकार हिन्दुओं के लिए राजकीय सेवा के द्वार बंद कर दिए गए थे किंतु मुसलमान बनने वालों को राजकीय सेवा में रखा जाता था और उन्हें सम्मानित किया जाता था। जब हिन्दुओं का पेट भरना कठिन हो गया तो वे स्वतः ही मुसलमान बनने लगे। बहुत से लोग ऐसे भी थे जो मरना पंसद करते थे किंतु मुसलमान नहीं बनते थे।

    ऐसे लोगों ने हारे को हरिनाम कहावत को सार्थक करते हुए ईश्-भक्ति का सहारा लिया। बर्नीयर ने तारीखे फीरोजशाही में लिखा है- 'हिन्दुओं के पास धन अर्जित करने के साधन नहीं रह गये थे। उनमें से अधिकांश को निर्धनता एवं अभावों का जीवन-यापन करते हुए अजीविका के लिये निरंतर संघर्ष करना पड़ता था। हिन्दू प्रजा के रहन-सहन का स्तर अत्यंत निम्न कोटि का था। करों का समस्त भार उन्हीं पर था। राज्य पद उनको अप्राप्य थे। अल्लाउद्दीन खिलजी ने दोआब के हिन्दुओं से उपज का 50 प्रतिशत भाग बड़ी कठोरता से उगाहा था।'

    इन विकट परिस्थतियों में हिन्दुओं में हारे को हरिनाम अर्थात् परास्त एवं कमजोर व्यक्ति का आसरा स्वयं परमेश्वर है, की भावना ने जन्म लिया तथा हिन्दुओं ने अपने कष्टों को कम करने के लिये ईश्वर की शरण में जाने का मार्ग पकड़ा। फलतः सल्तनत काल में हिन्दू-धर्म में भक्ति आंदोलन का पुनरुद्धार हुआ।

    (3.) क्रियात्मक शक्ति के नियोजन की आवश्यकता: जब हिन्दुओं को बड़ी संख्या में राजकीय सेवाओं से निकाल दिया गया, उनकी खेती बाड़ी चौपट हो गई, खेत एवं घर मुसलमानों द्वारा छीन लिये गये, उन्हें सम्पत्ति कमाने तथा रखने के अधिकारों से वंचित कर दिया गया तब हिन्दुओं के पास अपनी क्रियात्मक शक्ति को नियोजित करने का कोई माध्यम नहीं रहा। ऐसी स्थिति में संकटापन्न एवं विपन्न हिन्दुओं ने स्वयं को भगवद्-भक्ति में नियोजित किया। इस प्रकार भक्ति भावना की अपार धारा प्रवाहित हो चली।

    (4.) सबके लिये सुलभ मार्ग की आवश्यकता: मुस्लिम शासन काल में हिन्दू-धर्म के बाह्याडम्बरों एवं जाति प्रथा से तंग आकर बहुत से हिन्दू स्वेच्छा से मुसलमान बनने लगे। तब हिन्दू-धर्म-सुधारकों ने इस बात को अनुभव किया कि हिन्दू-धर्म को सब लोगों के लिये सुगम बनाना होगा ताकि लोग इसे छोड़कर अन्य धर्म न अपनायें। इसलिये ईश्वर की सरल भक्ति का मार्ग विस्तारित किया गया जो सबके लिये सुलभ थी और सबको बराबर स्थान देती थी।

    (5.) पराधीनता के कष्टों को भूलने का साधन: दिल्ली सल्तनत के शासकों द्वारा हिन्दुओं को आभूषण पहनने, घोड़े पर चढ़ने, राजकीय सेवा करने, सम्पत्ति रखने आदि अधिकारों से वंचित कर दिया गया था। यह पराधीनता उन्हें सालती थी। भक्ति-मार्ग उनकी पराधीनता के विस्मरण का अच्छा साधन सिद्ध हुआ। ईश्वर की प्राप्ति तथा मोक्ष को सर्वप्रधान मानकर यह प्रचारित किया जाने लगा कि ईश्वर की प्राप्ति केवल ईश्वर की दया एवं भक्ति से हो सकती है।

    (6.) परस्पर सहयोग की आवश्यकता: मनुष्य सामाजिक प्राणी है, साथ-साथ रहने से उसे एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह तभी संभव है जब समाज में कटुता नहीं हो। भगवद्-भक्ति का आधार भी समस्त प्राणियों को ईश्वर की संतान मानकर उनसे प्रेम करने की प्रेरणा ही है। इस भावना को निरंतर विस्तारित करने की आवश्यकता थी, इसलिये भक्ति आंदोलन निरंतर आगे बढ़ता रहा।

    मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदायों की विशेषताएँ

    मध्य-युगीन भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने जिस भक्ति पर जोर दिया, उसका स्वरूप सरल एवं पवित्र था। उसका कोई पुरोहित तथा कर्मकाण्ड नहीं था। भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने हिन्दू-धर्म के आडम्बरों तथा जटिलताओं को दूर करके उसे सरल तथा स्पष्ट बनाने के प्रयास किए। इन लोगों ने एकेश्वरवाद एवं अवतारवाद का सहारा लिया तथा ईश्वर की भक्ति विष्णु तथा उनके अवतारों अर्थात् राम एवं कृष्ण के रूप में की गई। हिन्दू-धर्म सुधारकों का विश्वास था कि मोक्ष केवल ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो सकता है।

    भक्ति-मार्गी सुधारकों ने 'नाम' तथा 'गुरु' की महत्ता पर बल दिया। उनके उपदेशों में 'समर्पण' की प्रधानता है तथा 'अहंकार' का अभाव है। इन सन्तों में से कुछ मूर्तिपूजक थे जबकि कुछ मूर्ति-पूजा को निरर्थक मानते थे परन्तु समस्त संतों ने एक स्वर से जाति-पाँति का विरोध किया तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाया।

    कुछ संतों ने भक्ति के साथ-साथ प्रपत्ति एवं शरणागति का मार्ग भी सुझाया। समस्त संतों की मान्यता थी कि ईश्वर किसी स्थान विशेष में नहीं रहकर कण-कण में समाया हुआ है तथा प्रत्येक प्राणी के भीतर निवास करता है। ईश्वर को भक्ति से प्रसन्न एवं अपने वश में किया जा सकता है। प्रायः प्रत्येक संत ने साधक के लिए सच्चे गुरु का होना आवश्यक माना। भक्तिमार्गी सन्तों ने अपने दार्शनिक ग्रंथों की भाषा संस्कृत रखी किंतु उपदेशों एवं भजनों के लिए हिन्दी एवं लोकभाषा को स्वीकार किया।

    भक्ति आन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

    श्रीमद्भगवत्गीता में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताये गये हैं- ज्ञान, कर्म एवं भक्ति। इनमें से ज्ञान-मार्ग सर्वाधिक कठिन और भक्ति-मार्ग सर्वाधिक सरल है। भक्ति अपने उपास्यदेव के प्रति भक्त की अपार श्रद्धा तथा असीम प्रेम है। भक्ति करने से भक्त को ईश्वर का प्रसाद अर्थात् विशेष कृपा प्राप्त होती है जिससे मोक्ष मिलता है। ईश्वर भक्ति के तीन प्रधान मार्गों- ज्ञान, प्रेम तथा उपासना को आधार बनाकर भक्ति की तीन धाराएं प्रवाहित हुईं- ज्ञान-मार्गी धारा, प्रेम-मार्गी धारा तथा भक्ति-मार्गी धारा।

    ज्ञान-मार्गी धारा

    ज्ञान-मार्गी धारा के संतों ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बाह्याडम्बरों तथा मिथ्याचारों की आलोचना करके दोनों को एक दूसरे के निकट लाने का प्रयत्न किया। इस धाारा के प्रधान प्रवर्तक कबीर थे। वे एकेश्वरवादी तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। उन्होंने नाम तथा गुरु दोनों की महत्ता को स्वीकार किया।

    प्रेम-मार्गी धारा

    प्रेम-मार्गी धारा के सन्तों ने ईश्वर के विभिन्न रूपों से प्रेम करने का मार्ग अपनाया। इन सन्तों ने ईश्वर को स्वामी, पिता, पति एवं सखा आदि सम्बन्धों से स्वीकार किया तथा उसी भाव से उन्हें भजने का मार्ग पुष्ट किया। तुलसी के लिए वे स्वामी थे, सूर के लिए सखा थे, मीरां के लिए पति थे और नामदेव के लिए वे पिता थे। प्रेम-मार्गी भक्तों की हरिदासी आदि धाराओं के संतों ने स्वयं को अपने उपास्य देव की प्रेयसी घोषित किया।

    भक्ति-मार्गी धारा

    भक्ति-मार्गी धारा के सन्त अपने इष्टदेव की पूजा तथा उपासना में लीन रहते थे। वे ईश्-भजन को जीवात्मा के कल्याण का सर्वोत्तम उपाय मानते थे। भक्ति-मार्गी सन्तों को राज-दरबार के ऐश्वर्य के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। इन सन्तों ने विष्णु एवं उनके अवतारों राम तथा कृष्ण के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे दुर्गा, लक्ष्मी एवं सरस्वती आदि ईश्वरीय शक्तियों की भी उपासना करते थे। इन सन्तों ने अपने कर्मों तथा गुणों की अपेक्षा भगवत् कृपा को अधिक महत्व दिया।

    इस युग के संतों ने जिस धार्मिक धारा का आह्वान किया वह पूर्णतः आस्तिक थी, वेदों की सर्वोच्चता में विश्वास रखती थी एवं श्रीराम और श्रीकृष्ण को वैदिक देवता 'विष्णु' का अवतार मानती थी। भक्ति-मार्गी सन्तों की दो धाराएं हैं- राम-भक्ति धारा एवं कृष्ण-भक्ति धारा-

    (1.) राम-भक्ति धारा: राम-भक्ति धारा के सन्तों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अतिशय विनयशीलता तथा मर्यादाशीलता है। रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य तथा तुलसीदास, राम-भक्ति मार्गी सन्त थे। इन सन्तों ने विभिन्न मत-मतान्तरों, उपासना-पद्धतियों तथा विचार-धाराओं में समन्वय स्थापित किया तथा हिन्दू जाति को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।

    (2.) कृष्ण-भक्ति धारा: कृष्ण-भक्ति धारा के सन्तों ने श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं का गुणगान किया और श्रीकृष्ण की उपासना पर बल दिया। निम्बार्काचार्य, चैतन्यमहाप्रभु तथा सूरदास, मीराबाई आदि कृष्ण-भक्ति मार्गी सन्त थे।

    मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

    मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदायों में रामानुजाचार्य का श्री सम्प्रदाय, विष्णु गोस्वामी का रुद्र सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य का निम्बार्क सम्प्रदाय, माधवाचार्य का द्वैतवादी माध्व सम्प्रदाय, रामानंद का विशिष्टाद्वैतवादी रामानन्द सम्प्रदाय, वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतवादी पुष्टि सम्प्रदाय, चैतन्य महाप्रभु का गौड़ीय सम्प्रदाय अथवा चैतन्य सम्प्रदाय, हितहरिवंश का राधावल्लभी सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।


    भक्ति मार्गी सन्त

    रामानुजाचार्य

    ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से भारत में वैष्णव आचार्यों की एक नवीन परम्परा आरम्भ हुई। इस परम्परा में आलवार संत यमुनाचार्य के प्रधान शिष्य रामानुजाचार्य (ई.1016-1137) को विशेष सफलता प्राप्त हुई। रामानुजाचार्य को मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन का जन्मदाता कहा जाता है। उनका जन्म ई.1016 में श्रीरंगम् के आचार्य परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद उन्हें कांजीवरम् के यादव प्रकाश के पास वेदान्त की शिक्षा के लिए भेजा गया। वेद की ऋचाओं के अर्थ निकालने में उनका अपने गुरु से मतभेद हो गया और उन्होंने स्वतन्त्र रूप से अपने विचारों का प्रचार आरम्भ किया।

    कुछ दिनों तक गृहस्थ जीवन बिताने के बाद उन्होंने सन्यास ले लिया। उन्होंने दक्षिण तथा उत्तर भारत के धार्मिक स्थानों का भ्रमण किया तथा विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया। उन्होंने अपने विचारों की पुष्टि के लिए पाँच ग्रन्थों की रचना की-(1.) वेदान्त सारम् (2.) वेदान्त संग्रहम्, (3.) वेदान्त दीपक, (4.) भगवद्गीता की टीका और (5.) ब्रह्मसूत्र की टीका जो 'श्रीभाष्य' के नाम से प्रसिद्ध है। रामानुजाचार्य ने 120 वर्ष के दीर्घ आयुकाल में 'श्री सम्प्रदाय' की स्थापना की तथा शंकर के 'अद्वैतवाद' एवं 'मायावाद' का खण्डन करके 'विशिष्टाद्वैत दर्शन' का प्रतिपादन किया।

    शंकर का ब्रह्म शुद्ध, बुद्ध और निराकार था। उसका मनुष्य से कोई सीधा सम्पर्क नहीं है। साधारण मनुष्य उसकी कल्पना भी नहीं कर पाता था। इसी ब्रह्म में ईश्वरत्व का आरोपण कर रामानुज ने उसे साधारण मनुष्य की बुद्धि की पकड़ में लाने का प्रयास किया। रामानुज ने ईश्वर, जगत् और जीव, तीनों को सत्य, नित्य और अनादि माना तथा जीव और जगत् को अनिवार्य रूप से ईश्वर पर आश्रित माना। रामानुज का ईश्वर सगुण, सर्वगुण सम्पन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वत्र है। वह इस सृष्टि का निर्माता है और उसकी रचना सीमित अर्थ में सृष्टि से अलग है। ईश एवं सृष्टि का यही द्वैध, भक्ति के सिद्धान्त का आधार है।

    भक्ति के माध्यम से जीव ईश्वर से प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। रामानुजाचार्य को 'शेष' अर्थात् लक्ष्मण का अवतार माना जाता है। उनके शिष्यों की मान्यता है कि शेष ही राम के साथ लक्ष्मण के रूप में तथा श्रीकृष्ण के साथ बलराम के रूप में अवतरित हुए तथा कलियुग में उन्होंने रामानुज के रूप में अवतार लेकर विष्णु-धर्म की रक्षा की। रामानुज ने विष्णु एवं लक्ष्मी को एक ही घोषित किया तथा उनकी सगुण भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाया। वे ईश्वर को प्रेम तथा सौन्दर्य के रूप में मानते थे।

    उनका मानना था कि विष्णु सर्वेश्वर हैं। वे मनुष्य पर दया करके इस पृथ्वी पर मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं। रामानुज 'राम' को विष्णु का अवतार मानते थे और राम की पूजा पर जोर देते थे। उनका कहना था कि पूजा तथा भक्ति से मोक्ष प्राप्त हो सकता है। रामानुज के प्रयासों से, सगुणोपासना करने वाले वैष्णव धर्म को सम्पूर्ण दक्षिण भारत में लोकप्रियता प्राप्त हुई एवं जनसाधारण तेजी से इस ओर आकर्षित होने लगा। उन्हें न केवल अपने धर्म की श्रेष्ठता में विश्वास हुआ अपितु भगवान के भक्त-वत्सल होने तथा भगवान द्वारा भक्तों की रक्षा करने के लिए दौड़कर चले आने में भी विश्वास हुआ।

    रामानुज ने भक्ति के साथ-साथ 'प्रपत्ति' का मार्ग भी सुझाया। मोक्ष प्राप्ति के लिए यह मार्ग सबसे सरल है, क्योंकि इसमें ज्ञान, विद्याभ्यास तथा योग साधना की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर में पूर्ण विश्वास करके स्वयं को उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देना ही 'प्रपत्ति' है। ईश्वर प्राप्ति का यह मार्ग समस्त मनुष्यों के लिए खुला था। इससे लाखों शूद्रों और अन्त्यजों के लिए भी हिन्दू-धर्म में बने रहने के लिए नवीन आशा का संचार हुआ। अब उन्हें धार्मिक तथा आध्यात्मिक सन्तोष के लिए दूसरा मार्ग ढूँढने की आवश्यकता न रही।

    माधवाचार्य (मध्वाचार्य)

    दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में माधवाचार्य (ई.1197-1278) वैष्णव परम्परा के बड़े आचार्य हुए। उनका जन्म ई.1197 मंे कन्नड़ जिले के उडिपी नगर के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अपनी शारीरिक शक्ति के कारण वे भीम समझे जाते थे। उन्होंने युवावस्था में ही सन्यास ले लिया। वे भी रामानुज की भांति विष्णु के उपासक थे। उन्हें आनंदतीर्थ भी कहा जाता है तथा वायुदेव का अवतार माना जाता है।

    उन्होंने शंकर के अद्वैतवाद का खण्डन करके वैष्णव-भक्ति परम्परा में 'द्वैतवाद' के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार ब्रह्म, जीव एवं माया तीनों के पृथक् अस्तित्व हैं और तीनों ही अक्षर हैं अर्थात् इनका कभी क्षरण नहीं होता। उन्होंने वेदान्त के निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर 'विष्णु' की प्रतिष्ठा की। मध्वाचार्य में वाद-विवाद करने की अद्भुत योग्यता थी। अपने विचारों की पुष्टि के लिए उन्होंने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया और अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। मध्वाचार्य का 'द्वैतवाद' का सिद्धान्त रामानुज के 'विशिष्टाद्वैत' के सिद्धान्त से काफी मिलता-जुलता है।

    दोनों ईश्वर की भक्ति में विश्वास रखते हैं और विष्णु को ही ईश्वर मानते हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि रामानुज ने ईश्वर, जगत् और जीव, तीनों को सत्य, नित्य और अनादि माना तथा जीव और जगत् को अनिवार्य रूप से ईश्वर पर आश्रित माना। अर्थात् इनमें विशिष्ट प्रकार का द्वैत है। जबकि मध्वाचार्य जीव और जगत् को ईश्वर से सर्वथा भिन्न मानते हैं। मध्वाचार्य के विचार से अन्य समस्त तत्त्व ईश्वर से भिन्न होते हुए भी उस पर आधारित हैं। केवल ईश्वर की ही अपनी स्वतन्त्र सत्ता है।

    मध्वाचार्य का ईश्वर सर्वगुणसम्पन्न है और उसका सम्पूर्ण ज्ञान मानव की शक्ति एवं समझ से परे है। ज्ञान द्वारा ईश्वर की प्राप्ति सम्भव नहीं हो सकती। ईश्वर की प्राप्ति केवल भक्ति से हो सकती है। इसके लिए निष्काम कर्म, योग्य गुरु का मार्गदर्शन और ईश्वर की उपासना आवश्यक है। उनके विचार में मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य 'हरि-दर्शन' प्राप्त करना है। हरि-दर्शन से मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

    निम्बार्काचार्य

    रामानुज तथा माधवाचार्य के बाद निम्बार्क स्वामी ने बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म को नवीन गति दी। उनका जन्म मद्रास प्रान्त के वेलारी जिले में हुआ था। वे रामानुज के समकालीन थे। रामानुज की भांति निम्बार्क ने भी शंकाराचार्य के अद्वैतवाद का खण्डन किया किंतु निम्बाकाचार्य मध्यम मार्गी थे। वे द्वैतवाद तथा अद्वैतवाद दोनों में विश्वास करते थे। इस कारण उनका मत 'द्वैताद्वैतवाद' तथा 'भेदाभेदवाद' कहा जाता है।

    निम्बार्क के अनुसार जीव तथा ईश्वर व्यवहार में भिन्न हैं किन्तु सिद्धान्त्तः अभिन्न (एक) हैं। ब्रह्म इस विश्व का रचयिता है। निम्बार्काचार्य 'कृष्ण-मार्गी' थे और कृष्ण को ईश्वर का अवतार मानते थे। उनके विचार से राधा-कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति एवं आत्मसमर्पण से मोक्ष मिल सकता है। निम्बार्क के मत को 'सनक सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। सनक सम्प्रदाय में शरणागति का भाव तो स्वीकार्य था परन्तु ध्यान एवं योग आदि को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

    निम्बार्क का कृष्ण समस्त अच्छे गुणों से युक्त तथा समस्त विकारों से परे है। उनका अवतारवाद में भी विश्वास था। उन्होंने नैतिकता के नियमोें के पालन पर जोर दिया। निम्बार्क सम्प्रदाय ने जन साधारण को चमत्कार दिखाकर भक्ति में शक्ति होने का विश्वास दिलाया।

    संत नामदेव

    महाराष्ट्र के सन्तों में नामदेव का नाम अग्रणी है। उनका जन्म ई.1270 में एक दर्जी परिवार में हुआ। उनका विवाह बाल्यावस्था में ही कर दिया गया तथा पिता की मृत्यु के बाद परिवार का बोझ भी उनके कन्धों पर आ पड़ा। माता और पत्नी ने उन पर पैतृक व्यवसाय करने के लिए जोर डाला परन्तु नामदेव केवल हरि-कीर्तन करते रहे। कुछ समय बाद वे पण्ढरपुर में जाकर बस गए। यहाँ से वे भारत भ्रमण के लिए निकले। पंजाब आदि प्रान्तों में भक्ति का प्रचार करके वे पुनः पुण्ढरपुर आ गए।

    नामदेव ने जनसाधारण को प्रेममयी-भक्ति का उपदेश दिया और परम्परागत रीति-रिवाज तथा जाति-पाँति के बन्धनों को हटाने का प्रयास किया। उनके शिष्यों में समस्त जातियों और वर्गों के लोग थे। नामदेव भी अन्य सन्तों की भाँति एकेश्वरवादी थे और मूर्ति-पूजा तथा पुरोहितों के नियन्त्रण के विरुद्ध थे। उनकी मान्यता थी कि भक्ति के माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। दक्षिण भारत की जनता पर नामदेव के उपदेशों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों से अपनी बुराइयां त्यागने को कहा-


    हिन्दू अन्धा, तुरको काना।

    दूवौ तो ज्ञानी सयाना।

    हिन्दू पूजै देहरा, मुसलमान मसीद,

    नामा सोई सेविया जहं देहरा न मसीद।।

    रामानन्दाचार्य

    रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में 14वीं शताब्दी ईस्वी में रामानंद हुए जिन्हें वैष्णव परम्परा की धार्मिक क्रांति को दक्षिण से उत्तर भारत में ले आने का श्रेय प्राप्त है- 'भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानन्द।' कुछ विद्वानों के अनुसार रामानंद का जन्म ई.1299 में प्रयाग के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने बनारस में शिक्षा प्राप्त की तथा वहाँ स्वामी राघवानन्द से श्री सम्प्रदाय की दीक्षा ली। रामानन्द ने बैकुण्ठवासी विष्णु के स्थान पर मानव शरीरधारी और राक्षसों का संहार करने वाले भगवान् राम को अपना आराध्य बनाया।

    उस समय हिन्दू समाज को एक ऐसे धर्म की आवश्यकात थी जो वीरत्व, त्याग एवं बलिदान के लिए प्रेरित कर सके। यद्यपि विष्णु के अवतार के रूप में भगवान राम को पहले से ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी परन्तु राम की भक्ति और उपासना का व्यापक प्रचार रामानन्द ने ही किया। रामानन्द ने 'ब्रह्मसूत्र' पर 'आनन्द भाष्य' लिखा जिसमें ब्रह्म के रूप में श्रीराम को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने ईश्वर के सगुण और निर्गुण, दोनों रूपों का समर्थन किया। उनके द्वारा स्थापित सम्प्रदाय 'रामावत सम्प्रदाय' कहलाता है। रामानन्दी लोग राम तथा सीता की पूजा करते हैं।

    रामानंद रामानुज के 'विशिष्ठ दर्शन' में आस्था रखते थे और उन्होंने रामानुज के विचारों का समस्त उत्तर भारत में प्रचार किया। रामानुज, निम्बार्क और मध्वाचार्य के उपदेशों की भाषा संस्कृत थी किंतु रामानंद ने अपने उपदेश हिन्दी में दिए। रामानन्द के विचार रामानुज के विचारों से भी अधिक क्रान्तिकारी थे। रामानुज चारों वर्णों और अनेक जातियों की एकता में विश्वास नहीं करते थे परन्तु रामानन्द जाति-प्रथा को नहीं मानते थे।

    रामानन्द ने जाति-पाँति और ऊँच-नीच का भेद नहीं माना और शूद्रों, मुसलमानों तथा स्त्रियों को भी अपना शिष्य बनाया। उनके पूर्व स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से धार्मिक विचार-विमर्षों में भाग नहीं लेने दिया जाता था। रामानन्द ने इस प्रतिबन्ध को नहीं माना। उनकी मान्यता थी कि राम के भक्त बिना भेदभाव के एक साथ खा-पी सकते हैं। भगवान के भक्तों के लिए वर्णाश्रम का बन्धन व्यर्थ है। परमेश्वर का एक ही गोत्र है और एक ही परिवार है। अतः समस्त विष्णु-भक्त भाई-भाई हैं और सबकी जाति एक है।

    रामानंद के 12 शिष्यों में सभी जातियों के स्त्री-पुरुष सम्मिलित थे- अनन्तानन्द, सुखानन्द, योगानन्द, सुरसुरानन्द, गालवानन्द, नरहरि आनन्द, भावानन्द (सभी ब्राह्मण), कबीरदास (जुलाहा), पीपा (क्षत्रिय), रैदास (चमार), धन्ना (जाट) तथा सेन (नाई)। कुछ सूचियों में योगानंद तथा गालवानंद के स्थान पर पद्मावती तथा सुरसुरी नामक महिला शिष्याओं के नाम मिलते हैं। कहा जाता है कि गंगा नामक एक वेश्या ने भी रामानंद से दीक्षा प्राप्त की। रामानंद के शिष्यों में से कुछ सगुणोपासक हुए तथा कुछ निर्गुणोपासक।

    ये सभी शिष्य मुस्लिम शासन काल में हिन्दू-धर्म को दृढ़ता देने वाले सिद्ध हुए। इनकी प्रेरणा से समाज के विभिन्न वर्गों एवं जातियों के करोड़ों लोग, अनेक विपत्तियां सहकर भी वैष्णव धर्म में बने रहे। चूंकि रामानंद ने स्वर्ग में रहने वाले विष्णु के स्थान पर धरती पर विचरने वाले राम एवं सीता को अपना आराध्य बनाया, संस्कृत के स्थान पर हिन्दी को उपदेशों का माध्यम बनाया तथा ब्राह्मण की जगह हर जाति के व्यक्ति को अपना शिष्य बनाया इसलिए उन्हें अपने पूर्ववर्ती वैष्णव आचार्यों अर्थात् रामानुज, माधवाचार्य तथा निम्बार्क से अधिक सफलता मिली। इस सफलता के आधार पर कई बार यह भी कह दिया जाता है कि मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन का सूत्रपात रामानन्द ने किया।

    वल्लभाचार्य

    महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म ई.1479 में दक्षिण भारत के एक तैलंग ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता एक उच्चकोटि के विद्वान् थे और उन्होंने बनारस को अपना कार्यक्षेत्र बना रखा था। 13 वर्ष की आयु में ही वल्लभाचार्य समस्त धर्मग्रन्थों में पारंगत हो गए। उनके विचारों पर विष्णु स्वामी के भक्ति-सिद्धान्तों का विशेष प्रभाव पड़ा।

    वल्लभाचार्य ने उनके विचारों को अधिक सुस्पष्ट करके उनका प्रचार किया। उन्हें अग्निदेव का अवतार माना जाता है। उन्होंने सनातन धर्म के समक्ष 'शुद्धाद्वैत' सिद्धांत की संकल्पना प्रस्तुत की तथा पुष्टि सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अणुभाष्य, सिद्धान्त रहस्य और भागवत टीका सुबोधिनी आदि अनेक ग्रंथों की रचना करके अपने मत के समर्थन में दार्शनिक भावभूमि तैयार की तथा ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवत् और श्रीमद्भगवद्गीता को पुष्टि मार्ग का प्रमुख साहित्य घोषित किया।

    वल्लभाचार्य की मान्यता थी कि सृष्टि में तीन तत्व विद्यमान हैं- ब्रह्म, जगत् एवं जीव। आत्मा और जड़-जगत् ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। ब्रह्म बिना किसी वस्तु अथवा शक्ति की सहायता से विश्व का निर्माण करता है, वह सगुण और सच्चिदानन्द है किंतु हमारी अविद्या के कारण वह हमें जगत् से अलग जान पड़ता है। इस अविद्या से मुक्ति पाने का मार्ग भक्ति है। वल्लभाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद का विरोध करके यह सिद्ध किया कि जीव उतना ही सत्य है जितना कि ब्रह्म। फिर भी, वह ब्रह्म का अंश और सेवक ही है।

    उन्होंने कहा कि जीव भगवान् की भक्ति के बिना शान्ति नहीं पा सकता। भगवान का अनुग्रह होने पर जीव का पोषण होता है। वल्लभाचार्य के अनुसार ब्रह्म के तीन स्वरूप हैं- आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी। अनंत दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्री कृष्ण ही परमब्रह्म हैं। उनका मधुर रूप एवं लीलाएं, जीव में आनंद का आविर्भाव करने वाला अक्षय स्रोत है। सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म का विलास है तथा सम्पूर्ण जगत लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्मकृति है।

    उन्होंने प्रेम-लक्षणा-भक्ति पर विशेष बल दिया और वात्सल्य-रस से ओत-प्रोत भक्ति की शिक्षा दी। वल्लभाचार्य का भगवत्-कृपा में अटूट विश्वास था। उनके अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं। उनकी सेवा एवं भक्ति ही जीव का परम कर्त्तव्य है। मनुष्य संसारिक मोह और ममता का त्याग करके एवं श्रीकृष्ण के चरणोें में सर्वस्व समर्पण करके भक्ति के द्वारा ही उनका अनुग्रह प्राप्त कर सकता है।

    उन्होंने भारत में कृष्ण-भक्ति का व्यापक प्रचार किया तथा भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को भक्ति का आधार बनाया ताकि जन साधारण, बाल-लीलाओं के गुणगान में रस का अनुभव कर सके और बालक के रूप में विहार करने वाले सहज-सरल ईश्वर के साथ अधिक तादात्म्य स्थापित कर सके। वल्लभाचार्य का लक्ष्य मुक्ति नहीं है। वह तो अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण के निकट पहुँचकर सदैव के लिए उनकी सेवा में रत रहना चाहते हैं।

    वल्लभाचार्य के जीवन का अधिकांश समय ब्रज में व्यतीत हुआ। उन्होंने मथुरा के निकट गोवर्द्धन पर्वत से भगवान श्रीकष्ण का विग्रह प्राप्त कर उसकी स्थापना की। भगवान के इस प्राकट्य को उस काल की विलक्षण घटना माना गया तथा देश भर से विष्णु-भक्त, भगवान के इस विग्रह के दर्शनों के लिए गोवर्द्धन पर्वत पहुँचने लगे। वल्लभाचार्य की प्रेरणा से देश भर में श्रीमद्भागवत् का पारायण होने लगा। वल्लभाचार्य के सैंकड़ों शिष्य थे जिनमें सूरदास भी सम्मिलित थे।

    वल्लभाचार्य के शिष्य पूरे देश में फैल गए और उन्होंने भजन-कीर्तन एवं अपनी रचनाओं के माध्यम से देश भर में कृष्ण-भक्ति का प्रचार किया। यद्यपि वल्लभाचार्य ने संसार के भोग-विलास त्याग कर विरक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का उपदेश दिया था परन्तु उनके अनुयायी इसका अनुसरण नहीं कर सके। ई.1531 में महाप्रभु वल्लभाचार्य का निधन हुआ।

    सूरदास

    सूरदास का जन्म सोलहवीं सदी में हुआ। वे वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्य थे तथा भक्ति आंदोलन के महान संत थे किंतु वे उपदेशक अथवा सुधारक नहीं थे। उन्होंने अपने गुरु वल्लभाचार्य के निर्देश पर भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया तथा भागवत् पुराण में वर्णित लीलाओं को आधार बनाते हुए कई हजार सरस पदों की रचना की। इन पदों में भगवान कृष्ण के यशोदा माता के आंगन में विहार करने से लेकर उनके दुष्ट-हंता स्वरूप का बहुत सुंदर एवं रसमय वर्णन किया गया।

    सूरदास ने भ्रमर गीतों के माध्यम से निर्गुण भक्ति को नीरस एवं अनुपयोगी घोषित किया तथा न केवल सगुण भक्ति करने अपितु भक्त-वत्सल भगवान की रूप माधुरी का रसपान करने वाली भक्ति करने का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी रचनाएँ- सूरसागर, सूरसारावली एवं साहित्य लहरी में संकलित हैं। उनकी रचनाएं ब्रज भाषा में हैं। ब्रजभाषा में इतनी प्रौढ़ रचनाएं सूरदास के अतिरिक्त अन्य कोई कवि नहीं कर सका। सूरदास की रचनाओं में भक्ति, वात्सल्य और शृंगार रसों की प्रधानता है।

    पुष्टि मार्ग में दीक्षित होने से सूरदास की भक्ति में दास्य भाव एवं सखा भाव को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने सूरसागर का आरम्भ 'चरण कमल बन्दौं हरि राई' से किया है। इन पदों को देश-व्यापी लोकप्रियता अर्जित हुई तथा जन-सामान्य को अनुभव हुआ कि भक्ति के बल पर भगवान को अपने आंगन में बुलाया जा सकता है। उन्हें संकट के समय पुकारा जा सकता है और अपने शत्रु से त्राण पाने में सहायता ली जा सकती है। परमात्मा की शक्ति से ऐसे नैकट्य भाव का अनुभव इससे पूर्व किसी अन्य सम्प्रदाय द्वारा नहीं कराया गया था।

    चैतन्य महाप्रभु

    चैतन्य महाप्रभु, महाप्रभु वल्लभाचार्य के समकालीन थे। चैतन्य का जन्म ई.1486 में कलकत्ता से 75 मील उत्तर में स्थित नवद्वीप अथवा नादिया ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस समय मुसलमानों के आतंक से भयभीत वैष्णव-भक्त बंगाल से भागकर नवद्वीप में शरण ले रहे थे। इस कारण नवद्वीप में वैष्णव-भक्ति की धारा अबाध गति से बह रही थी। चैतन्य ने संस्कृत, व्याकरण और काव्य का अध्ययन करने के बाद भागवत पुराण तथा अन पुराणों का अध्ययन किया।

    उनके बड़े बड़े भाई विष्णुरूप ने बहुत कम आयु में ही सन्यास ले लिया था, इसलिए उनकी माता ने बाल्यकाल में ही चैतन्य का विवाह कर दिया। जब चैतन्य 11 वर्ष के हुए तो उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के पिण्डदान और श्राद्ध के लिए ई.1505 में चैतन्य को गया जाना पड़ा। वहाँ उनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक सन्यासी से हुई। चैतन्य उनके शिष्य हो गए। इसके बाद चैतन्य गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर कृष्ण-भक्ति में लीन रहने लगे।

    चैतन्य ने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया किंतु उनसे चैतन्य की जिज्ञासा शान्त हुई तो उन्होंने भक्ति तथा प्रेम के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग अपनाया। 24 वर्ष की आयु में वे केश्व भारती से दीक्षा लेकर सन्यासी हो गए। सन्यास लेने के बाद आठ वर्ष तक चैतन्य ने देश का भ्रमण किया। वे सर्वप्रथम नीलांचल गए और इसके बाद दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र एवं सेतुबंध आदि स्थानों पर रहे। उन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया।

    ई.1515 में विजयादशमी के दिन चैतन्य ने अपनी विशाल शिष्य मण्डली के साथ वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। ये वन के रास्ते ही वृंदावन को चले। कहा जाता है कि चैतन्य के हरिनाम उच्चारण से वशीभूत होकर वन्यपशु भी नाचने लगते थे। शेर, बाघ और हाथी आदि भी इनके आगे प्रेमभाव से नृत्य करते चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा को चैतन्य अपने शिष्यों सहित वृंदावन पहुँचे। वृंदावन में आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गौरांग-आगमनोत्सव मनाया जाता है।

    वृंदावन में महाप्रभु ने इमली-तला और अक्रूर-घाट पर निवास किया तथा जन साधारण के समक्ष प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति-भावनाओं को जागृत किया। वृंदावन से महाप्रभु प्रयाग गए। वहाँ कुछ काल तक निवास करने के पश्चात् महाप्रभु ने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि तीर्थों में भगवद्नाम संकीर्तन किया।

    उनका मानना था कि ईश्वर कई रूप धारण करता है परन्तु उनमंे सबसे मोहक और आकर्षक रूप श्रीकृष्ण का है। वे कृष्ण को ईश्वर का अवतार न मान कर ईश्वर मानते थे। उनके विचार से सबसे ऊँची भक्ति और प्रेम का घनिष्ठ स्वरूप पति-पत्नी के सम्बन्ध में होता है जिसमें किसी प्रकार का व्यापार नहीं होता और न उस प्रेम की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए राधा और कृष्ण की कल्पना की गई है।

    कृष्ण परम-ब्रह्म हैं और उनके भक्त राधा स्वरूप हैं। इसलिए भक्त का कृष्ण के प्रेम में विह्वल होना स्वाभाविक है। चैतन्य आत्मविभोर होकर अपना अस्तित्त्व भूल जाते थे और कृष्ण में लीन हो जाते थे। चैतन्य ने भगवान की भक्ति के लिए संगीत और नृत्य का सहारा लिया जो संकीर्तन कहलाता था। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ ढोलक, मृदंग, झाँझ, मंजीरे आदि वाद्य बजाकर, नृत्य करते हुए उच्च स्वर में हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया- 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे।'

    उनकी संकीर्तन पद्धति मथुरा-वृन्दावन से लेकर पूर्वी-बंगाल तक व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गई। इसमें भक्तजन समूह में संकीर्तन करते थे। चैतन्य और उनके अनुयाई सार्वजनिक मार्गों पर भजन-कीर्तन करते हुए नाचते-गाते थे और अर्द्ध-मूर्च्छित स्थिति में पहुँच जाते थे। स्वयं चैतन्य भी भक्ति के आवेश में मूर्च्छित और समाधिस्थ हो जाते थे। चैतन्य ने लोगों को कृष्ण-भक्ति का मन्त्र दिया। कृष्ण-भक्ति एवं कीर्तन का प्रचार उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। उनके निर्मल चरित्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार से असंख्य लोग उनके अनुयाई बन गए।

    चैतन्य का धर्म रस्मों और आडम्बरों से मुक्त था। उन्होंने परमात्मा में पूर्ण आस्था रखने का उपदेश दिया। उनकी उपासना का स्वरूप प्रेम, भक्ति, कीर्तन और नृत्य था। प्रेमावेश में ही भक्त परमात्मा से साक्षात्कार का अनुभव करता है। चैतन्य का कहना था कि यदि कोई जीव कृष्ण पर श्रद्धा रखता है, अपने गुरु की सेवा करता है तो वह मायाजाल से मुक्त होकर कृष्ण के चरणों को प्राप्त करता है। चैतन्य ने ज्ञान के स्थान पर प्रेम और भक्ति को प्रधानता दी। उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों से पृथक् रहने का उपदेश दिया।

    वे मूर्ति-पूजा और धर्मग्रन्थों के विरोधी नहीं थे परन्तु उन्हें कर्मकाण्ड तथा आडम्बरों से घृणा थी। चैतन्य के अनुसार समस्त लोग समान रूप से ईश्वर की भक्ति कर सकते हैं। भक्ति मार्ग में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं होता, समस्त भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणाश्रित होने के अधिकारी हैं। चैतन्य और उनके अनुयाइयों ने मुसलमानों एवं निम्न जातियों के लोगों को भी कृष्ण-भक्ति का उपदेश दिया। चैतन्य के प्रभाव से शूद्रों को भी भक्ति का अधिकार मिल गया।

    चैतन्य ने अपने 'शिक्षाष्टक' में कृष्ण-भक्ति के विषय में अपने विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार भक्ति का प्रथम और प्रमुख साधन 'हरिनाम संकीर्तन' है। चैतन्य महाप्रभु बंगाल के सबसे बड़े धर्म-सुधारक थे। उनके विचार में केवल कर्म से कुछ नहीं होता। मोक्ष प्राप्ति के लिए हरि-भक्ति तथा उनका गुण-गान करना आवश्यक है। प्रेम तथा लीला इस सम्प्रदाय की विशेषताएँ हैं। चैतन्य सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य की भांति भेदाभेद के सिद्धान्त को मानते थे अर्थात् जीवात्मा एक दूसरे से भिन्न तथा अभिन्न दोनों है।

    केवल भक्ति के बल से ही मानव की आत्मा श्रीकृष्ण तक पहुँच सकती है। मनुष्य की आत्मा ही राधा है। उसे श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहना चाहिए। दास, मित्र, पत्नी तथा पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण से प्रेम करना मानव जीवन का प्रधान लक्ष्य है। चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में व्यतीत किए। वे जीवन के अन्तिम बारह वर्ष में कृष्ण-विरह में व्याकुल रहा करते थे और हर समय उनके नेत्रों से आँसू बहा करते थे।

    उनके भक्त उन्हें कृष्ण की प्रेम-लीलाएँ सुना-सुना कर सान्त्वना दिया करते थे। ई.1533 में 47 वर्ष की अल्पायु में रथयात्रा के दिन चैतन्य भक्ति के उन्माद में समुद्र में घुस गए तथा उनका शरीर पूरा हो गया। बंगाल, बिहार, उड़ीसा एवं उत्तर प्रदेश की प्रजा पर चैतन्य महाप्रभु की संकीर्तन भक्ति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी मृत्यु के पश्चात् वृन्दावन के गोस्वामियों ने चैतन्य के सिद्धान्तों और संकीर्तन-पद्धति को व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा चैतन्य-सम्पद्राय की स्थापना की।

    इस सम्प्रदाय को गौड़ीय सम्प्रदाय भी कहा जाता है। वृन्दावन के गोस्वामी, चैतन्य को अपना प्रभु मानते थे परन्तु नादिया ग्राम के अनुयाई उन्हें कृष्ण का अवतार मानने लगे और गौरांग महाप्रभु के रूप में स्वयं चैतन्य की पूजा होने लगी।

    कबीर

    रामानन्द के शिष्यों में कबीर का नाम अग्रण्य है। उनका जन्म ई.1398 में काशी में एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से हुआ। माता द्वारा लोकलाज के कारण त्याग दिये जाने से कबीर नीरू नामक मुसलमान जुलाहे के घर में पलकर बड़े हुए। उनकी पत्नी का नाम लोई था। उससे उन्हें एक पुत्र कमाल और पुत्री कमाली हुई। कबीर ने विधिवत् शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। बड़े होने पर वे रामानन्द के शिष्य बन गए। कबीर ने घर-गृहस्थी में रहते हुए भी मोक्ष का मार्ग सुझाया। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम दोनों के धर्मग्रन्थों का ज्ञान था।

    कबीर बहुत बड़े धर्म-सुधारक थे। वे अद्वैतवादी थे तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। वे जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि भेदभाव नहीं मानते थे। वे मूर्ति-पूजा और बाह्याडम्बर के आलोचक थे। उनके शिष्यों में हिन्दू तथा मुसमलान दोनों ही बड़ी संख्या में थे। इसलिए उन्होंने हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों को पाखण्ड तथा आडम्बर छोड़कर ईश्वर की सच्ची भक्ति करने का उपदेश दिया तथा उनकी बुराइयों की खुलकर आलोचना की-


    जो तू तुरक-तुरकणी जाया, भीतर खतना क्यों न कराया!

    जो तू बामन-बमनी जाया, आन बाट व्है क्यों नहीं आया।

    कबीर ने कुसंग, झूठ एवं कपट का विरोध किया। उनके अनुसार जिस प्रकार लोहा पानी में डूब जाता है उसी प्रकार कुसंग के कारण मनुष्य भी भवसागर में डूब जाएगा। कबीर का मानना था कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु 'काम' है और 'स्त्री' काम को बढ़ाती है। इसलिए उन्होंने स्त्री को 'कामणि काली नागणी' अर्थात् जादू करने वाली काली सर्पिणी कहा। कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों के अर्थहीन आडम्बरों और रस्मों का खण्डन किया।

    वे हिन्दुओं के छाप-तिलक एवं मूर्ति-पूजा के विरोधी थे तथा उन्होंने मुसलमानों की नमाज, रमजान के उपवास, मकबरों और कब्रों की पूजा आदि की भी आलोचना की उन्होंने मुसलमानों से कहा कि यदि तुम्हारे हृदय में भक्ति-भावना का उदय नहीं होता तो हजयात्रा से कोई लाभ नहीं है। कबीर ने एकेश्वरवाद एवं प्रेममयी भक्ति पर जोर दिया। कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' नाम से प्रसिद्ध है।

    बीजक के तीन भाग है- (1.) रमैनी, (2.) सबद, और (3.) साखी। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी अथवा खिचड़ी कहलाती है जिसमें खड़ी बोली, अवधी, ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, इत्यादि अनेक भाषाओं का मिश्रण है। उनकी भाषा साहित्यिक न होने पर भी प्रभावशाली है। कबीर ने ईश्वर के निर्गुण-निराकार रूप की पूजा की। उनका राम दशरथ-पुत्र राम न होकर अजन्मा, सर्वव्यापी एवं घट-घट वासी राम था। उनका राम समस्त गुणों से परे था। वे कहते हैं-


    कोई ध्यावे निराकार को, काई ध्यावेे आकारा।

    वह तो इन छोड़न तै न्यारा, जाने जानन हारा।

    ई.1518 में कबीर का निधन हुआ। इस प्रकार उनकी आयु 120 वर्ष मानी जाती है। समाज की निम्न समझी जाने वाली जातियों पर कबीर के उपदेशों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उनके अनुयाई कबीर-पंथी कहलाए। आगे चलकर उनके शिष्यों ने उन्हें भगवान का अवतार मान लिया।

    भक्त रैदास

    भक्त रैदास का जन्म काशी के एक चमार परिवार में हुआ। वे रामानन्द के बारह प्रमुख शिष्यों में से थे। वे विवाहित थे तथा जूते बनाकर अपनी जीविका चलाते थे। रैदास तीर्थयात्रा, जाति-भेद, उपवास आदि के विरोधी थे। हिन्दू तथा मुसलमानों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं मानते थे। वे निर्गुण भक्ति में विश्वास रखते थे। उनमें ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना स्पष्ट झलकती है। श्री हरि चरणों का अनन्य आश्रय ही उनकी साधना का प्राण है। उनके प्रभाव के कारण निम्न जातियों के लोगों में भगवद्-भक्ति में आस्था उत्पन्न हुई। रैदास के शिष्यों ने 'रैदासी सम्प्रदाय' प्रारम्भ किया। मेवाड़ राजपरिवार की रानी मीरांबाई उन्हें अपना गुरु मानती थी।

    गुरु नानक

    पंजाब के सन्तों में गुरु नानक का नाम अग्रणी है। उनका जन्म ई.1469 में लाहैर से 50 किलोमीटर दूर तलवण्डी गांव के खत्री परिवार में हुआ। उनके पिता कालू ग्राम के पटवारी थे। नानक विवाहित थे तथा उनके दो पुत्र भी हुए किंतु बाद में साधु-संतों की संगत में रहने लगे। वे निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा करते थे। नानक एकेश्वरवादी थे और ऊँच-नीच, हिन्दू-मुस्लिम तथा जाति-पाँति के भेद को नहीं मानते थे।

    वे मूर्ति-पूजा तथा तीर्थ-यात्रा के भी घोर विरोधी थे। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए। नानक का कहना था कि संसार में रहकर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत करके भी मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। नानक पर सूफी मत का अधिक प्रभाव था तथा वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और उनके झगड़ों को बेइमानों का काम बताते थे-


    बन्दे इक्क खुदाय के, हिन्दू मुसलमान।

    दावा राम रसूल का, लड़दे बेईमान।।

    नानक ने अपने हिन्दू शिष्यों से कहा कि- 'मैंने चारों वेद पढ़े, अड़सठ तीर्थों पर स्नान किया, वनों और जंगलों में निवास किया और सातों ऊपरी एवं निचली दुनियाओं का ध्यान किया और इस नतीजे पर पहुँचा कि मनुष्य चार कर्मों द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकता है- भगवान से भय, उचित कर्म, ईश्वर तथा उसकी दया में विश्वास और एक गुरु में विश्वास जो उचित मार्गदर्शन कर सके।'

    नानक ने अपने मुसलमान शिष्यों से कहा- 'दया को अपनी मस्जिद मानो, भलाई एवं निष्कपटता को नमाज की दरी मानो, जो कुछ भी उचित एवं न्याय-संगत है, वही तुम्हारी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मानो, शिष्टाचार को रोजा मानो। इससे तुम मुसलमान बन जाओगे।'

    उन्होंने पाँचों नमाजों की व्याख्या करते हुए कहा- 'पहली नमाज सच्चाई, दूसरी इन्साफ, तीसरी दया, चौथी नेक-नियति और पाँचवीं नमाज अल्लाह की बंदगी है।' नानक ने विभिन्न स्थानों का भ्रमण करके अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया। नानक के शिष्यों ने सिक्ख धर्म की स्थापना की। वे सिक्ख धर्म के पहले गुरु माने जाते हैं। उनकी शिक्षाएँ आदि ग्रन्थ में पाई जाती हैं जो आगे चलकर गुरु ग्रंथ साहब कहलाया।

    मीराबाई

    मध्य-कालीन भक्तों में मीराबाई का नाम अग्रणी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मीरा का जन्म वि.सं. 1573 (ई.1516) में माना है जबकि गौरीशंकर हीराचंद ओझा, हरविलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने मीराबाई का जन्म वि.सं. 1555 (ई.1498) में माना है। मीरा मेड़ता के राठौड़ शासक राव दूदा के पुत्र रतनसिंह की पुत्री थी। जब मीरा दो साल की थीं, उनकी माता का निधन हो गया। मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ।

    विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजराज एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। कुछ दिन बाद मीरा के श्वसुर महाराणा सांगा और पिता रतनसिंह भी खानवा के युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए। कुछ समय बाद जोधपुर के राजा मालदेव ने मीरां के चाचा वीरमदेव से उनका मेड़ता राज्य छीन लिया। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और श्रीकृष्ण को अपना पति मानती थीं। अब वह सांसारिक सुखों से विरक्त होकर साधु-संतों के साथ भगवान का भजन करने लगीं। महाराणा सांगा के बाद उनके पुत्र रतनसिंह और विक्रमादित्य क्रमशः मेवाड़ के महाराणा हुए किंतु उन दोनों को मीरा का साधुओं के साथ भजन गाना एवं नृत्य करना अच्छा नहीं लगा।

    उन्होंने मीरा को रोकने का प्रयास किया किंतु मीरा चितौड़ छोड़़कर वृन्दावन चली गई। वहाँ से कुछ दिन वह द्वारिका चली गई और वहीं उसका शरीर पूरा हुआ। मीराबाई ने चित्तौड़ के राजसी वैभव त्यागकर वैराग्य धारण किया तथा चमार जाति में जन्मे संत रैदास को अपना गुरु बनाया। वे जाति-पांति तथा ऊँच नीच में विश्वास नहीं करती थीं। उन्होंने ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे उच्चकोटि की कवयित्री थीं। जन-साधारण में उनके भजन आज भी बड़े प्रेम एवं चाव से गाए जाते हैं।

    मीराबाई से प्रेरणा पाकर देश की करोड़ों नारियों ने श्रीकृष्ण भक्ति का मार्ग अपनाया जिससे हिन्दू परिवारों का वातावरण श्रीकृष्ण मय हो गया। राजपूताने के अनेक राजाओं ने भी श्रीकृष्ण भक्ति एवं ब्रज भाषा की कविता का प्रचार किया। मीरा की आध्यात्मिक यात्रा के तीन सोपान हैं। पहले सोपान में मीरा कृष्ण के लिए लालायित हैं और अत्यंत व्यग्र होकर गाती हैं- 'मैं विरहणी बैठी जागूँ, जग सोवे री आली।' कृष्ण-विरह सी पीड़ित होकर वे गाती हैं- 'दरस बिन दूखण लागे नैण।'

    कृष्ण भक्ति के दूसरे सोपान में मीरा श्रीकृष्ण को प्राप्त कर लेती हैं और वह कहती हैं- 'पायोजी मैंने राम रतन धन पायो।' भक्ति के तीसरे और अन्तिम सोपान में मीरा को आत्मबोध हो जाता है और वे परमात्मा से एकाकार हो जाती हैं। यही सायुज्य भक्ति का चरम बिंदु है। इस सोपान में पहुँचकर मीरा कहती हैं- 'म्हारे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई।' मीरा के काव्य में सांसारिक बन्धनों को त्यागकर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव मिलता है।

    मीरा कृष्ण को ही परमात्मा और अविनाशी मानती थी। उनकी भक्ति आडम्बर रहित है। मीरा किसी सम्प्रदाय विशेष से बँधी हुई नहीं थीं और उनके मन्दिर के द्वार सबके लिए खुले हुए थे। मीरा ने बहुत से पदों की रचना की जो फुटकर रूप में प्राप्त होते हैं। महादेवी वर्मा के अनुसार मीरा के पद विश्व के भक्ति साहित्य के अनमोल रत्न हैं। मीरा ने 'राग गोविन्द' नामक ग्रन्थ भी लिखा था किंतु यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है।

    दादू दयाल

    भक्ति आन्दोलन के संतों में दादू दयाल का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। उनका जन्म अहमदाबाद में हुआ तथा उनका अधिकांश जीवन राजस्थान में व्यतीत हुआ। कबीर एवं नानक की भाँति दादू ने भी अन्धविश्वास, मूर्ति-पूजा, जाति-पाँति, तीर्थयात्रा, व्रत-उपवास आदि का विरोध किया और जनता को सीधा और सच्चा जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया। दादू एक अच्छे कवि थे। उन्होंने भजनों के माध्यम से विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य प्रेम एवं भाईचारे की भावना बढ़ाने पर जोर दिया। उनका पन्थ दादू-पन्थ के नाम से विख्यात हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों- गरीबदास और माधोदास ने उनके उपदेशों को फैलाने का अथक प्रयास किया।

    गोस्वामी तुलसीदास

    रामानंद की शिष्य मण्डली के प्रमुख सदस्य नरहरि आनंद के शिष्य तुलसीदास, अकबर के समकालीन संत हुए। उनका जन्म ई.1532 के लगभग हुआ। उन्होंने रामचरित मानस, गीतावली, कवितावली, विनय पत्रिका, एवं हनुमान बाहुक आदि ग्रंथों की रचना की। उन्होंने भारत की जनता को धनुर्धारी दशरथ-नदंन श्रीराम की भक्ति करने की प्रेरणा दी जो धरती, ब्राह्मण, गाय तथा देवताओं की रक्षा के लिए मनुष्य का शरीर धारण करते हैं- 'गो द्विज धेनु देव हितकारी, कृपासिंधु मानुष तनुधारी।' तथा जो जनता को सुखी करने वाले, वैदिक धर्म की रक्षा करने वाले एवं दुष्टों का विनाश करने वाले हैं- 'जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।'

    तुलसी ने जनसामान्य को भगवान में विश्वास रखने की प्रेरणा देते हुए कहा- हे परमात्मा, आप ही मेरे स्वामी, गुरु, पिता और माता हैं, आपके चरण-कमलों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ- 'मोरे तुम प्रभु गुर पितु माता, जाऊँ कहाँ तजि पद जल जाता।' तुलसीदास ने जनसामान्य को सद्ग्रंथों का पठन करने का आह्वान किया तथा विभिन्न गुरुओं द्वारा फैलाए जाने वाले पंथों और मार्गों को निंदनीय बताया ताकि हिन्दू-धर्म को एकता के सूत्र में पिरोए रखा जा सके तथा धर्म-भीरु प्रजा को दुष्ट व्यक्तियों द्वारा धर्म के नाम पर उत्पन्न की जा रही भूल-भुलैयाओं में भटकने से रोका जा सके।

    तुलसी ने पाखण्डी गुरुओं को चेतावनी देते हुए कहा- 'हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।' अर्थात् जो गुरु, शिष्य के शोक को नहीं हरता अपितु उसका धन हड़पता है, वह घनघोर नर्क में पड़ता है। उन्होंने राजाओं को भी अपनी अच्छी प्रजा अर्थात् सज्जनों के पालन का निर्देशन करते हुए कहा- 'जासु राज प्रिय प्रजा दुःखारी, सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।' उन्होंने 'कोउ नृप होहु हमें का हानि' की मानसिकता को दास-दासियों की मानसिकता बताया। तुलसी की रामचरित मानस घर-घर पहुँच गई।

    करोड़ों लोगों को इसकी चौपाइयां कण्ठस्थ हो गईं तथा घर-घर पाठ होने लगे। रामचरित मानस के श्रीराम पर विश्वास हो जाने से सैंकड़ों वर्षों से दबे-कुचले कोटि-कोटि जनसमुदाय के मन में नवीन साहस का संचार हुआ। लोग ईश्वरीय सत्ता में विश्वास रखनकर अपने धर्म पर अडिग बने रहे। तुलसीदास द्वारा विभिन्न सम्प्रदायों में समन्वय के प्रयास: दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी) एवं मुगलों के शासन काल (16वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी) में हिन्दू-धर्म के शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों के बीच कटुता का वातावरण था।

    यहाँ तक कि सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच भी कटुता व्याप्त थी। सभी सम्प्रदायों के मतावलम्बी अपने-अपने मत को श्रेष्ठ बताकर दूसरे के मत को बिल्कुल ही नकारते थे। गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस के माध्यम से इस कटुता को समाप्त करने का सफल प्रयास किया। इस ग्रंथ में तुलसी ने शैवों के आराध्य देव शिव तथा विष्णु के अवतार राम को एक दूसरे का स्वामी, सखा और सेवक घोषित किया।

    राम भक्त तुलसी ने 'सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के, हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के' कहकर शंकर की स्तुति की। इतना ही नहीं तुलसी ने अपने स्वामी राम के मुख से- 'औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउं कर जोरि, संकर भजन बिना नर भगति न पावई मोर' कहलवाकर राम-भक्तों को शिव की पूजा करने का मार्ग दिखाया एवं राम-पत्नी सीता के मुख से शिव-पत्नी गौरी की स्तुति करवाकर शाक्तों एवं वैष्णवों को निकट लाने में सफलता प्राप्त की- 'जय जय गिरिबर राज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।'

    तुलसी ने 'सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा' कहकर सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया। तुलसी ने भक्तिमार्गियों एवं ज्ञानमार्गियों के बीच की दूरी समाप्त करते हुए कहा- 'भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।' तुलसीदास ब्राह्मणों की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे किंतु उनके राम जन-जन के राम थे जिन्होंने शबर जाति की स्त्री के घर बेर खाए, गृध्र जाति के जटायु का उद्धार किया, निषादराज को अपना मित्र बनाया तथा केवट एवं अहिल्या का उद्धार किया।

    तुलसी के राम ने ताड़का-वध, शूर्पनखा की नासिका कर्तन तथा सिंहका का वध करके यह स्पष्ट संदेश दिया कि स्त्री यदि अच्छे गुणों से युक्त हो तभी वह पूज्य है, दुष्ट स्त्री उसी प्रकार वध के योग्य है जिस प्रकार बुरा पुरुष। तुलसी के प्रयासों को बाद में आने वाले अन्य संतों ने भी बल दिया जिसके परिणाम स्वरूप शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों तथा इन सम्प्रदायों के भीतर उपस्थित विभिन्न विचारधाराओं के अनुयाइयों के बीच की दूरियां कम हुई और हिन्दू-धर्म, विदेशी धरती से आने वाले धर्मों के समक्ष साहस पूर्वक खड़ा हो गया। ई.1623 (वि.सं.1680) में तुलसी का देहान्त हो गया।

    संत तुकाराम

    संत तुकाराम का जन्म ई.1608 में महाराष्ट्र के देहू गांव में हुआ। वे अपने समय के महान् संत और कवि थे तथा तत्कालीन भारत में चले रहे भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। उन्हें 'तुकोबा' भी कहा जाता है। उनके जन्म आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। तुकाराम को चैतन्य नामक साधु ने 'राम कृष्ण हरि' मंत्र का स्वप्न में उपदेश दिया। संत तुकाराम ने 17 वर्ष तक जन-साधारण को उपदेश दिए। अपने जीवन के उत्तरार्ध में उनके द्वारा गाए गए तथा उनके शिष्यों द्वारा लिपिबद्ध किए गए लगभग 4000 'अभंग' आज भी उपलब्ध हैं।

    तुकाराम ने अपनी साधक अवस्था में संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। इन तीनों संत कवियों के साहित्य में एक ही आध्यात्म सूत्र पिरोया हुआ है। स्वभाव से स्पष्टवादी होने के कारण इनकी वाणी में कठोरता दिखलाई पड़ती है, उसके पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य समाज से दुष्टों का निर्दलन कर धर्म का संरक्षण करना था। उन्होंने सदैव सत्य का ही अवलंबन किया और किसी की प्रसन्नता एवं अप्रसन्नता की ओर ध्यान न देते हुए धर्म-संरक्षण के साथ-साथ पाखंड-खंडन का कार्य किया।

    उन्होंने अनुभव-शून्य पोथी-पंडित, दुराचारी-धर्मगुरु इत्यादि समाज-कंटकों की अत्यंत तीव्र आलोचना की है। उनके उपदेशों का यही सार है कि संसार के क्षणिक सुख की अपेक्षा परमार्थ के शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु मानव का प्रयत्न होना चाहिए।

    अन्य भक्ति सम्प्रदाय

    भक्ति सम्प्रदायों की इस परम्परा में विष्णु गोस्वामी का रुद्र सम्प्रदाय, हितहरिवंश का राधावल्लभी सम्प्रदाय तथा हरिदासी सम्प्रदाय महत्वपूर्ण हैं।

    भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

    भक्ति-आन्दोलन का भारतीयों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यह प्रभाव इतना गहरा था कि जहाँ साधारण जनता मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध धर्म को अपनी ढाल बनाकर खड़ी हो गई, वहीं भारत के हिन्दू राजाओं ने भी शत्रुओं के हाथों से अपनी प्रजा की रक्षा करने के काम को ईश्वरीय आदेश की तरह शिरोधार्य किया-

    (1.) हिन्दू जाति में साहस का संसार

    हिन्दू जनता मुस्लिम शासन द्वारा किये जा रहे दमन के कारण नैराश्य की नदी में डूब रही थी। भगवद्गीता से प्रसूत ईश्-भक्ति का अवलम्बन प्राप्त हो जाने से उसमें मुसलमानों के अत्याचारों को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो गई।

    (2.) मुसलमानों के अत्याचारों में कमी

    भक्ति-मार्गी सन्तों के उपदेशों का मुसलमानों पर भी प्रभाव पड़ा। इन सन्तों ने ईश्वर के एक होने का उपदेश दिया और बताया कि एक ईश्वर तक पहुँचने के लिये विभिन्न धर्म विभिन्न मार्ग की तरह हैं। इससे मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों में कमी हुई।

    (3.) बाह्याडम्बरों में कमी

    भक्तिमार्गी सन्तों ने धर्म में बाह्याडम्बरों की घोर निन्दा की और जीवन को सरल तथा आचरण को शुद्ध बनाने का उपदेश दिया।

    (4.) मूर्ति-पूजा का खंडन

    कबीर, नामदेव तथा नानक आदि संत निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा में विश्वास रखते थे। उन्होंने मूर्ति-पूजा का खंडन किया।

    (5.) उदार भावों का संचार

    भक्ति-मार्गी सन्तों के उपदेशों के फलस्वरूप हिन्दुओं तथा मुसलमानों में उदारता का संचार हुआ और वे एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता प्रदर्शित करने लगे।

    (6.) धर्मों की मौलिक एकता का प्रदर्शन

    भक्तिमार्गी सन्तों तथा सूफी प्रचारकों ने एकेश्वरवाद, ईश्वर प्रेम एवं भक्ति पर जोर देकर दोनांे धर्मो की मौलिक एकता प्रदर्शित की। इसका हिन्दू तथा मुसलमान, दोनों पर प्रभाव पड़ा और वे एक दूसरे को समझने का प्रयत्न करने लगे।

    (7.) जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव की उत्पति

    भक्ति मार्गी सन्तों द्वारा विष्णु एवं उसके अवतारों के भक्त-वत्सल होने तथा अत्याचारी का दमन करने के लिये अवतार लेने का संदेश बड़ी मजबूती से जनमसामान्य तक पहुँचाया गया। इससे हिन्दुओं में जातीय एवं व्यक्तिगत गौरव उत्पन्न हुआ। वे निर्बल की रक्षा करना ईश्वरीय गुण मानने लगे और स्वयं को भी इस कार्य के लिये प्रस्तुत करने लगे। उन्होंने गौ, स्त्री तथा शरणागत की रक्षा को ईश कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना।

    (8.) प्रान्तीय भाषाओं का विकास

    भक्ति मार्गी सन्तों ने अपने उपदेश जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिये लोक भाषाओं को अपनाया। फलतः प्रान्तीय भाषाओं तथा हिन्दी भाषा की प्रगति को बड़ा बल मिला और विविध प्रकार के साहित्य की उन्नति हुई।

    (9.) दलित समझी जाने वाली जातियों को नवजीवन

    सन्तों के उपदेशों से भारत की दलित समझी जाने वाली जातियों में नवीन उत्साह तथा नवीन आशा जागृत हुई। भक्ति, प्रपत्ति और शरणागति के मार्ग का अवलम्बन करके हर वर्ग एवं हर जाति का मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता था। इस आन्दोलन ने भारतीय समाज में उच्च एवं निम्न जातियों के बीच बढ़ती हुई खाई को कम किया तथा हिन्दू समाज में नवीन आशा का संचार किया।

    (10.) राष्ट्रीय भावना की जागृति

    भक्ति आन्दोलन का राजनीतिक प्रभाव भी बहुत बड़ा पड़ा। इसी आन्दोलन के परिणामस्वरूप पंजाब तथा महाराष्ट्र में मुगल काल में राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ हुए। इस आन्दोलन को पंजाब में गुरु गोविन्दसिंह ने और महाराष्ट्र में शिवाजी ने चलाया था। यह प्रभाव ब्रिटिश शासन काल में भी चलता रहा।


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