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     08.06.2018
    अध्याय - 29 : ब्रिटिश भारत की साम्प्रदायिक राजनीति में हिंसा का विष

    अध्याय - 29


    ब्रिटिश भारत की साम्प्रदायिक राजनीति में हिंसा का विष

    साम्प्रदायिक हिंसा से हिन्दू-मुस्लिम एकता भंग साम्प्रदायिक एकता को सर्वप्रथम आघात मालाबार के मोपला मुस्लिमों ने पहुँचाया। ई.1921 के अगस्त-सितम्बर माह में मोपलों ने असंख्य हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया, हिन्दू स्त्रियों को भी उनके अत्याचारों का शिकार बनना पड़ा। जब ये तथ्य समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए तो पूरे देश में तनाव व्याप्त हो गया। मुल्तान में भी मुसलमानों ने अनेक हिन्दुओं को मार डाला; उनकी सम्पत्ति लूट ली या नष्ट कर दी। सहारनपुर में भी ऐसी घटनाएं घटित हुईं। लाहौर में भी साम्प्रदायिक दंगे हुए। 23 दिसम्बर 1926 को एक धर्मान्ध मुसलमान ने आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानन्द के घर में घुसकर रोगी-शैया पर ही उनकी हत्या कर दी। आर्य समाज के कुछ अन्य नेताओं की भी हत्या कर दी गई। इन घटनाओं ने हिन्दू जनता को विचलित कर दिया।

    कोहाट के हिन्दू मुस्लिम दंगे

    मई 1924 में पंजाब के एक मुस्लिम समाचार पत्र 'लाहुल' में एक हिन्दू विरोधी कविता छपी, जिसका एक अंश इस प्रकार था- तुझे तेग ए मुस्लिम उठानी पड़ेगी। कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी।  इसके जवाब में जम्मू के हिन्दू समाचार पत्र ने भी एक कविता प्रकाशित की जिसका एक अंश इस प्रकार था- बनाएंगे काबा में विष्णु का मन्दिर, नमाजी की हस्ती मिटानी पड़ेगी। जीवनदास नामक एक व्यक्ति ने हिन्दू समाचार पत्र की एक हजार प्रतियां प्राप्त कीं तथा 22 अगस्त 1924 को कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर लगभग 30-40 प्रतियां बेच दीं। जब ये प्रतियां मुसलमानों तक भी पहुंचीं तो उन्होंने हिन्दुओं पर हमले करने आरम्भ कर दिए। हिन्दुओं के घर जला दिए गए, 12 हिन्दुओं को मार डाला गया, 13 हिन्दू लापता हो गए, 24 हिन्दुओं के शरीर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त किए गए, 62 हिन्दू सामान्य रूप से घायल हुए। इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मुसलमानों पर हमले किए और कोहाट में दंगे आरम्भ हो गए। कुल मिलाकर 10 मुसलमान मार डाले गए, 1 या 2 मुसलमान लापता कर दिए गए, 6 मुसलमान बुरी तरह से तथा 17 मुसलमान सामान्य रूप से घायल हुए। इस घटना के बाद हिन्दुओं को कोहाट से रावलपिण्डी भेज दिया गया। कोहाट के दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए गांधीजी तीन बार रावलपिण्डी गए किंतु कोई सहायता नहीं कर सके। भाई परमानंद ने स्थानीय हिन्दू सभा की सहायता से पीड़ित हिन्दुओं को सहायता पहुंचाने में सफलता प्राप्त की।

    बंगाल में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़

    बंगाल में हिन्दुओं की आबादी तेजी से घटती जा रही थी और मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही थी। इस कारण सड़कों, गली-मुहल्लों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर मस्जिदों की बाढ़ सी आ गई थी। जब कभी हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धार्मिक जुलूसों को लेकर गाजे-बाजे के साथ इन मस्जिदों के सामने से निकलते तो मुसलमान, इन जुलूसों पर हमला बोल देते थे। ई.1926 के मध्य में देश में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़ आ गई। सबसे पहले कलकत्ता में भयानक साम्प्रदायिक हमले शुरु हुए। छः सप्ताह तक कलकत्ता की सड़कों पर नृशंस हत्याएं हुईं। 110 स्थानों पर आगजनी हुई, मंदिरों और मस्जिदों पर हमले हुए। सरकारी वक्तव्य के अनुसार पहली मुठभेड़ में 44 मनुष्य मरे और 584 घायल हुए। दूसरी मुठभेड़ में 66 मनुष्य मरे और 391 घायल हुए। मरने वालों एवं घायल होने वालों में हिन्दू अधिक थे। इस समय लॉर्ड इरविन भारत के गवर्नर जनरल थे। हिन्दू महासभा ने 22 मई 1926 को दिल्ली में एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से मांग की कि कलकत्ता के हिन्दुओं की रक्षा की जाए। जब हिन्दू महासभा के डॉ. मुंजे तथा पं. मदनमोहन मालवीय कलकत्ता गए तो बंगाल की सुहरावर्दी सरकार ने उन दोनों के विरुद्ध सम्मन जारी कर दिए। पूर्वी बंगाल में तो स्थिति और भी बुरी थी। वहाँ हिन्दू महिलाओं एवं बच्चों के अपहरण, बलात्कार, आगजनी एवं हत्याओं के मामले प्रतिदिन बढ़ने लगे। उत्तरी बंगाल के मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।

    गणपति उत्सव पर हमले

    महाराष्ट्र में भी गणपति उत्सव में जुलूस निकालने पर मुसलमानों द्वारा उन पर हमले किए जाने लगे। स्थितियां इतनी बिगड़ गईं कि हिन्दू महासभा ने देश की महिलाओं के नाम अपील की कि अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्रत्येक हिन्दू महिला अपने साथ शस्त्र रखें।

    कानपुर में साम्प्रदायिक हिंसा

    ई.1931 में कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें बड़ी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया और अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर सकी। इन्हीं दंगों के दौरान 25 मार्च 1931 को पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गई।

    मुस्लिम लीग द्वारा नेशनल गार्ड का गठन

    मुस्लिम लीग ने ई.1938 में अपनी एक निजी सेना का गठन करना आरम्भ किया। इस सेना के दो हिस्से थे, एक था मुस्लिम लीग वालंटियर कॉर्प तथा दूसरा था मुस्लिम नेशनल गार्ड। मुस्लिम नेशनल गार्ड, मुस्लिम लीग का गुप्त भाग था। उसकी सदस्यता गुप्त थी और उसके अपने प्रशिक्षण केंद्र एवं मुख्यालय थे जहाँ उसके सदस्यों को सैन्य प्रशिक्षण और ऐसे निर्देश दिए जाते थे जो उन्हें दंगों के समय लाभ पहुंचायें। इन प्रशिक्षण केन्द्रों पर लाठी-भाला चलाने, चाकू मारकर हत्या करने और धावा बोलने का प्रशिक्षण दिया जाता था। नेशनल गार्ड द्वारा भारी मात्रा में हथियार एकत्र किए गए और भारतीय सेना के विघटित मुस्लिम सैनिकों को भर्ती किया गया। मुस्लिम नेशनल गार्ड के यूनिट कमाण्डरों को सालार कहा जाता था। जनवरी 1947 में पंजाब पुलिस ने मुस्लिम नेशनल गार्ड के लाहौर कार्यालय पर छापा मारा तो वहाँ से बड़ी संख्या में स्टील के हेलमेट, बिल्ले तथा सैन्य उपकरण मिले। मुस्लिम नेशनल गार्ड के पास अपनी लारियां और जीपें थीं जिनका उपयोग हिंदू और सिक्ख क्षेत्रों पर आक्रमण करने तथा अकेले मुसाफिरों को लूटने में होता था। मुस्लिम नेशनल गार्ड के लोग अपने साथ पैट्रोल रखते थे जिसका उपयोग आगजनी में होता था। अप्रेल 1947 में पंजाब सरकार के प्रमुख सचिव अख्तर हुसैन ने पंजाब के गवर्नर को रिपोर्ट दी कि मुस्लिम लीग ने 5,630 गार्ड भर्ती किए हैं। इसके 15 दिन बाद की रिपोर्ट में कहा गया कि मुस्लिम लीग के नेशनल गार्डों की संख्या अब लगभग 39,000 है। नेशनल गार्ड के लम्बे चौड़े जवान, हथियारों से लैस होकर जिन्ना के चारों ओर बने रहकर उसकी सुरक्षा करते थे।

    सीधी कार्यवाही दिवस

    आसानी से पाकिस्तान हाथ आता हुआ न देखकर मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 के दिन सीधी कार्यवाही दिवस मनाने तथा पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए सड़कों पर उतर कर भयानक हिंसा करने का निर्णय लिया। जिन्ना को अपना निर्णय पलटने का अनुरोध करने के लिए जवाहरलाल नेहरू 16 अगस्त 1946 को जिन्ना के घर गए किंतु जिन्ना पर नेहरू की अपील का कोई असर नहीं हुआ। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और सुहरावर्दी वहाँ का मुख्यमंत्री था। सुहरावर्दी ने 16 अगस्त को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया ताकि मुस्लिम लीग के स्वयंसेवक बिना किसी रोक-टोक के सीधी कार्यवाही की हिंसा में भाग ले सकें। मुस्लिम लीग के आह्वान पर लाखों मुस्लिम युवक सड़कों पर निकल आए। उन्होंने हिन्दुओं के घरों एवं दुकानों में आग लगा दी और हिन्दुओं का कत्लेआम आरम्भ कर दिया। कलकत्ता में भीषण हत्याकाण्ड हुआ जिसमें लगभग 4,000 हिन्दू मारे गए तथा 17 हजार हिंदू गंभीर रूप से घायल हुए। मोसले ने लिखा है कि 16 अगस्त 1946 की सुबह से तीन दिन बाद की शाम तक कलकत्ता में 6 हजार लोगों को मारपीट, खून-खराबा, आग, छुरेबाजी और गोलियों से मौत के घाट उतारा गया। बीस हजार लोगों के साथ बलात्कार हुआ अथवा वे जीवन भर के लिए अपंग बना दिए गए।

    पश्चिमी बंगाल में आरमभ हुए साम्प्रदायिक दंगे पूर्वी बंगाल के नोआखाली और त्रिपुरा जिलों में भी फैल गए जिनमें लगभग 5000 हिन्दू मारे गए। नोआखाली में बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया गया तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार किए गए। नोआखाली में 7.5 लाख हिन्दुओं को कई महीनों तक शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा। इन दंगों की प्रतिक्रिया में बिहार में हिन्दुओं ने मुसलमानों पर आक्रमण कर दिया। सरकारी सूत्रों के अनुसार बिहार में लगभग 4,300 मुसलमान मारे गए। संयुक्त प्रान्त में 250 मुसलमान मारे गए। पूर्वी भारत की तरह पश्चिमी भारत में भी सीधी कार्यवाही में हिन्दुओं एवं सिक्खों के विरुद्ध भयानक हिंसा हुई। पंजाब में मरने वाले सिक्खों तथा हिन्दुओं की संख्या 3,000 तक पहँुच गई। दंगों के दौरान सिक्खों तथा हिन्दुओं की करोड़ों रुपये मूल्य की सम्पत्ति लूट ली गई अथवा तोड़-फोड़ एवं आगजनी में नष्ट कर दी गई।

    अंतरिम सरकार के गठन के बाद साम्प्रदायिकता में वृद्धि

    2 सितम्बर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने अन्तरिम सरकार का गठन किया। सत्ता का सारा लाभ कांग्रेस को न मिल जाय, इस आशंका से ग्रस्त मुस्लिम लीग अपने पूर्व निर्णय को बदल कर 13 सितम्बर को अन्तरिम सरकार में सम्मिलित हो गई। मुस्लिम लीग, नेहरू सरकार के समक्ष इतने कांटे बिछाना चाहती थी कि सरकार विफल हो जाए। मुस्लिम लीग की ओर से मंत्री बना लियाकत अली खाँ वित्त मंत्रालय मिलने से संतुष्ट नहीं था। वह अपने लिए गृह मंत्रालय चाहता था। चौधरी मोहम्मद अली ने, लियाकत अली खाँ को समझाया कि यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह ऐसा बजट बनाए कि कांग्रेस की सहायता करने वाले करोड़पतियों का दम निकल जाए। चौधरी मोहम्मद अली भारतीय अंकेक्षण और लेखा सेवा का अधिकारी था। उसने लंदन से अर्थशास्त्र तथा विधि में शिक्षा प्राप्त की थी। उसने वित्तमंत्री बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वित्त मंत्री के रूप में बात-बात में खर्चे के मदों पर आपत्ति उठाने लगा।

    वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अली को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। उसने अपने कार्यकलापों से मंत्रिमण्डल को पंगु बना दिया। मंत्रिगण लियाकत अली की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे। लियाकत अली ने कांग्रेसी मंत्रियों को ऐसी उलझन में डाला कि वे कर्तव्यविमूढ़ हो गए।

    मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा है- 'मंत्रिमण्डल के मुस्लिम लीगी सदस्य प्रत्येक कदम पर सरकार के कार्यों में बाधा डालते थे। वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के विरुद्ध थे। वास्तव में वे इस स्थिति में थे कि हमारे प्रत्येक कदम को ध्वस्त कर सकें। लियाकत अली खाँ ने जो प्रथम बजट प्रस्तुत किया, वह कांग्रेस के लिए नया झटका था। कांग्रेस की घोषित नीति थी कि आर्थिक असमानताओं को समाप्त किया जाए और पूंजीवादी समाज के स्थान पर शनैः शनैः समाजवादी पद्धति अपनायी जाए। जवाहरलाल नेहरू और मैं भी युद्धकाल में व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा कमाये जा रहे मुनाफे पर कई बार बोल चुके थे। यह भी सबको पता था कि इस आय का बहुत सा हिस्सा आयकर से छुपा लिया जाता था। आयकर वसूली के लिए भारत सरकार द्वारा सख्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता थी। लियाकत अली ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें उद्योग और व्यापार पर इतने भारी कर लगाए कि उद्योगपति और व्यापारी त्राहि-त्राहि करने लगे। इससे न केवल कांग्रेस को अपितु देश के व्यापार और उद्योग को स्थाई रूप से भारी क्षति पहुंचती। लियाकत अली ने बजट भाषण में एक आयोग बैठाने का प्रस्ताव किया जो उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आयकर न चुकाने के आरोपों की जांच करे और पुराने आयकर की वसूली करे। उसने घोषणा की कि ये प्रस्ताव कांग्रेसी घोषणा पत्र के आधार पर तैयार किए गए हैं। कांग्रेसी नेता, उद्योगपतियों और व्यापारियों के पक्ष में खुले रूप में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। लियाकत अली ने बहुत चालाकी से काम लिया था। उसने मंत्रिमण्डल की स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी कि बजट साम्यवादी नीतियों पर आधारित हो। उसने करों आदि के विषय में मंत्रिमण्डल को कोई विस्तृत सूचना नहीं दी थी। जब उसने बजट प्रस्तुत किया तो कांग्रेसी नेता भौंचक्के रह गए। राजगोपालाचारी और पटेल ने अत्यंत आक्रोश से इस बजट का विरोध किया।'

    घनश्यामदास बिड़ला ने गांधीजी और जिन्ना के बीच खाई पाटने के उद्देश्य से लियाकत अली खाँ को समझाने की चेष्टा की किंतु कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर लार्ड माउण्टबेटन ने लियाकत अली से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं। मुस्लिम लीग ने सरकार में सम्मिलित होने के बाद भी संविधान सभा का बहिष्कार जारी रखा। मुस्लिम लीग के अंतरिम सरकार में सम्मिलित होने पर बंगाल और पंजाब के मुसलमानों ने हिंदुओं के विरुद्ध हमले तेज कर दिए। इस कारण मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से हिन्दू जनता भागने लगी। लाहौर से लेकर पेशावर तक पूरा पंजाब धू-धू कर जलने लगा। अलगाववादी मुल्लाओं और मौलानाओं ने जानवरों की हड्डियां दिखा-दिखा कर मुसलमानों को भड़काया कि यह बिहार में हिंदुओं के अत्याचार के कारण मरे मुसलमानों की हड्डियां हैं। मुस्लिम लीग के वालंटियर (रजाकार) चुन-चुन कर हिन्दुओं के मोहल्लों और मकानों को लूटने लगे, आग लगाने लगे, स्त्रियों से बलात्कार करने लगे और उनका अपहरण करने लगे।

    लॉर्ड माउण्टबेटन की नियुक्ति

    24 मार्च 1947 को माउंटबेटन ने भारत में वायसराय का कार्यभार संभाला। उनकी जिम्मेदारी थी कि वह भारत को शांतिपूर्वक तरीके से स्वतंत्र कर दे। जिस समय माउण्टबेटन ने वायसराय का कार्यभार संभाला, उस समय भारत विचित्र स्थिति में फंसा हुआ था। एक ओर मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग को लेकर देश में खून की होली खेल रही थी तो दूसरी ओर कांग्रेसी नेता अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग को मानने के लिए तैयार नहीं थे। गांधीजी अपने साथियों को समझा रहे थे कि जिन्ना को पाकिस्तान तब तक नहीं मिलेगा, जब तक कि अंग्रेज पाकिस्तान बनाकर उसे दे न दें और अंग्रेज ऐसा तब तक नहीं करेंगे जब तक कि कांग्रेस का बहुमत इसके विरोध में खड़ा है। कांग्रेस चाहे तो इसे रोक सकती है। अंग्रेजों से कह दो कि वे चले जाएं। जो जैसा है उसे वैसा ही छोड़ कर चले जाएं। उनके पीछे जो भी होगा, हम देख लेंगे, भुगत लेंगे। अगर देश में आग लगती है तो लग जाने दो। देश इस आग में तप कर कुंदन की तरह निखर कर सामने आयेगा, देश को अखण्ड रहने दो। जबकि मुस्लिम लीग की मांग थी कि अंग्रेज पहले देश का बंटवारा करें तब देश छोड़ें।

    गांधीजी की मान्यता के ठीक उलट, अंग्रेजों की मान्यता थी कि जब तक हिंदुस्तान, हिंदू-मुस्लिम झगड़े में उलझा है तब तक हिंदुस्तान को आजादी नहीं दी जा सकती। अंग्रेजों का मानना था कि अगर अंग्रेज अपनी ओर से पाकिस्तान की मांग मान लें तो कांग्रेस पूरी ताकत से इसके विरुद्ध संघर्ष करेगी और यदि पाकिस्तान की मांग को नहीं माना गया तो मुसलमान बगावत करेंगे और गृहयुद्ध होगा। इस प्रकार 1947 के आते-आते भारत की आजादी की लड़ाई केवल कांग्रेस और अंग्रेजों के बीच न रहकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस और अंग्रेजों के दोहरे मोर्चे में बदल गई थी। कांग्रेस अंग्रेजों पर आरोप लगा रही थी कि भारत के अंग्रेज जानबूझ कर मुस्लिम लीग की मदद कर रहे हैं ताकि झगड़ा बना रहे और उनका राज भी। दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देश की नैया मंझधार में लाकर खड़ी कर दी थी। सांप्रदायिकता का ज्वार इस नैया को बेरहमी से थपेड़े मार रहा था।

    लॉर्ड माउण्टबेटन ने घोषणा की- 'मैं रक्तपात और लूटमार नहीं होने दूंगा। मैं थलसेना और वायुसेना से काम लूंगा। मैं उत्पात करने वालों का दमन करने के लिए टैंकों और वायुयानों का उपयोग करूंगा।' एक ओर वायसराय दंगों को रोकने के लिए कृत संकल्प था तो दूसरी ओर पंजाब का गर्वनर फ्रांसिस मुडी जिन्ना को आश्वासन दे रहा था- 'मैं सबसे कह रहा हूँ कि मैं इस बात की चिंता नहीं करता कि सिक्ख सीमा पर कैसे पहुंचेंगे। अच्छी बात तो यह है कि यंथासंभव शीघ्र से शीघ्र उनसे छुटकारा हो जाए।' यही कारण था कि वायसराय की घोषणा पर अमल नहीं हुआ। पंजाब में बड़ी संख्या में सिक्खों का कत्ल हुआ और अंग्रेज उनकी रक्षा नहीं कर पाए। सिक्खों की रक्षा करने की कौन कहे, स्वयं अँग्रेजों की जान के लाले पड़े हुए थे, वे किसी तरह भारत से सही सलामत निकलकर अपने देशी पहुंच जाना चाहते थे।

    1.14 करोड़ लोगों ने देशों की अदला-बदली की

    इस प्रकार भारत में साम्प्रदायिक समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया और देश का विभाजन निश्चित जान पड़ने लगा। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान तथा 15 अगस्त 1947 को भारत अस्तित्व में आया। रैडक्लिफ रिपोर्ट के प्रकाशित होने पर दोनों देशों में भगदड़ मच गई। भारत में रह गए मुसलमानों ने पाकिस्तान की ओर तथा पाकिस्तान में रह गए हिन्दुओं एवं सिक्खों ने भारत की ओर पलायन किया। एक अनुमान के अनुसार 1 करोड़ 14 लाख लोगों ने सीमा पार करके अपने देशों की अदला-बदली की।

    छः लाख लोगों ने साम्प्रदायिक हिंसा में प्राण गंवाए

    अंग्रेज अधिकारियों का अनुमान था कि इन दंगों में 5 लाख लोग मारे गए। उनके अनुसार मौत का यह आंकड़ा न्यूनतम 2 लाख से लेकर अधिकतम 10 लाख के बीच था। स्वतंत्र भारत में हुए एक शोध अध्ययन (ई.1909-47) में डॉ. अनिल कुमार मिश्र ने लिखा है कि विभाजन के पश्चात् करीब 6 लाख निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, असंख्य स्त्रियों के शील भंग किए गए। यह शोधग्रंथ यह भी दावा करता है कि हिन्दू महासभा के नेता वीर सावरकर विभाजन के इस दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम को रोकने के लिए गृहयुद्ध चाहते थे। वे चाहते थे कि देशभक्तों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करके उन आतंकवादियों के खिलाफ धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी जाए जो राष्ट्रीय धारा से पृथक् होते चले जा रहे थे किंतु गांधीजी की अहिंसा के पथ पर चलने वाली कांग्रेस ऐसा कुछ करने को तैयार नहीं थी।

    शरीर से जहर अलग हुआ

    जिन्ना के पाकिस्तान चले जाने के बाद सरदार पटेल ने दिल्ली में एक वक्तव्य दिया-
    'भारत के शरीर से जहर अलग कर दिया गया। हम लोग अब एक हैं और हमें कोई अलग नहीं कर सकता। नदी या समुद्र के पानी के टुकड़े नहीं हो सकते। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, उउनकी जड़ें उनके धार्मिक स्थान और केन्द्र यहाँ हैं। मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आऐंगे।'

     


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