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  • अध्याय - 26 : हिन्दू महासभा के मंच पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

     09.03.2018
    अध्याय - 26 : हिन्दू महासभा के मंच पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

    अध्याय - 26


    हिन्दू महासभा के मंच पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 

    सबसे पहले पंजाब विश्वविद्यालय के संस्थापक बाबू नवीनचंद्र राय तथा रायबहादुर चंद्रनाथ ने ई.1882 में लाहौर में हिन्दू महासभा की स्थापना की थी। इसके बाद अलग-अलग स्थानों पर हिन्दू महासभाएं आकार लेती रहीं। ई.1910 में मदनमोहन मालवीय द्वारा अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना की गई। तब से इसका एक वार्षिक अधिवेशन देश के विभिन्न भागों में आयोजित किया जाता था जिसमें देश के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेताओं और महापुरुषों को बुलाकर उनसे इस अधिवेशन की अध्यक्षता करवाई जाती थी। ई.1916 में बालगंगाधर तिलक ने इसके लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। हिन्दू महासभा के उपाध्यक्ष डॉ. केशव बलिराम हेडगवार ने 27 सितम्बर 1925 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। यद्यपि इन दोनों संगठनों का उद्देश्य हिन्दू हितों की रक्षा करना था तथापि इनकी कार्यप्रणाली में बहुत अंतर था। हिन्दू महासभा एक राजनैतिक संगठन था जबकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन था।

    15 अक्टूबर 1938 को नागपुर में हिन्दू महासभा का बीसवां अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगवार को आमंत्रित किया गया। अध्यक्षीय शोभायात्रा में लगभग 70 हजार लोग सम्मिलित हुए। अधिवेशन में इससे भी कहीं अधिक संख्या में लोगों ने भाग लिया। विशाल जनसमुदाय की उपस्थिति इस बात की द्योतक थी कि हिन्दुओं में अब मुस्लिम राजनीति के कारण बेचैनी फैल रही थी। इस अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए डॉ. हेडगवार ने बड़ा मर्मस्पर्शी एवं विचारोत्तेजक भाषण दिया जो ब्रिटिश भारत की तत्कालीन साम्प्रदायिक राजनीति को दर्शाता है। उन्होंने कहा-

    'हिन्दू राष्ट्र जीवन तत्वों से बना है, कागज की संधि से नहीं। हमारे इतिहास के 5000 वर्ष पूर्व वैदिक युग से ही हमारे पूर्वज हमारे लोगों को धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आदि सूत्रों में बांधकर एक राष्ट्र बना रहे थे। जो आज हिन्दू राष्ट्र के नाम से समस्त भारतवर्ष में फैला हुआ है। भारतवर्ष सभी हिन्दुओं की पुण्यभूमि एवं पितृभूमि है। चीन को छोड़कर संसार में कोई देश ऐसा नहीं है जो यह दावा कर सके कि वह अविच्छिन्न रहा है। केवल हिन्दू राष्ट्र ही अविच्छिन्न रूप से बढ़ा है। हिन्दू राष्ट्र की वृद्धि कुकुरमुत्ते के समान नहीं हुई है। यह संधि करके बनाया गया एक राष्ट्र नहीं है। यह कागज के टुकड़ों से निर्मित नहीं है ....... यह इसी भूमि में बढ़ा है ओर इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और दूर-दूर तक फैल गई हैं। यह मुसलमानों को अथवा संसार में किसी भी व्यक्ति को चिढ़ाने के लिए कपोल-कल्पित कथा नहीं है अपतिु यह उसी प्रकार एक विशाल और ठोस सत्य है जिस प्रकार हिमालय हमारे देश के उत्तर में अचल रूप से खड़ा हुआ है।'

    इस मंच से वीर सावरकर ने भी देश को सम्बोधित किया। उन्होंने कहा-

    'विगत 50 वर्षों में कांग्रेस मुसलमानों को संयुक्त भारत में मिलाने का प्रयत्न कर रही है परन्तु असफल क्यों रही? क्योंकि कांग्रेस ने उनसे यह नहीं कहा कि पहले भारतीय बनो, बाद में मुसलमान बनना। यह बात नहीं है कि मुसलमान, भारत राष्ट्र नहीं चाहते हों लेकिन उनकी यह कल्पना गलत है कि भारत की राष्ट्रीय एकता प्रादेशिक एकता पर निर्भर नहीं है। यदि किसी मुसलमान ने अपने हृदय के भाव को पूर्णतः स्पष्ट किया है तो मोपला विद्रोह के नेता अली मुसलियर ने। उसने विद्रोह में हजारों की संख्या में हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार करवाया अथवा उन्हें मौत के घाट उतार दिया। उसने इस कृत्य का औचित्य बताते हुए कहा है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता तभी आ सकती है जब सारे हिन्दू, मुसलमान बन जाएं। वे हिन्दू जो ऐसा करने से इन्कार करते हैं वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के शत्रु हैं। वे कत्ल करने के योग्य हैं। राष्ट्र निर्माण करने के लिए प्रादेशिक एकता नहीं अपितु धार्मिक, सांस्कृतिक एवं जातीय एकता आवश्यक है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इसे समझने में असफल रही है। यही कारण है कि वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के अपने प्रयास में भी असफल रही है।

    यही सब प्रश्नों में सबसे बड़ा प्रश्न है और कांग्रेसी हिन्दू अपने कांग्रेस के अधिवेशन के आरम्भ में इस तत्व पर एक मिनट के लिए भी विचार नहीं करते और न उस समय करते हैं जब कांग्रेस का अधिवेशन मुसलमानों की नमाज के लिए स्थगित किया जाता है। सामान्यतः यह घोषित करना व्यर्थ है कि केवल मुस्लिम लीग साम्प्रदायिक है। यह कोई समाचार नहीं है। वास्तविकता यह है कि कांग्रेसी मुसलमानों सहित समस्त मुस्लिम समुदाय साम्प्रदायिक हैं। इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि वे उतने साम्प्रदायिक क्यों हैं? कांग्रेसी हिन्दू इस प्रश्न पर आरम्भ से ही विचार नहीं करना चाहते। क्योंकि उन्हें भय है कि यदि वे इस प्रश्न पर विचार करेंगे तो उन्हें अपनी प्रादेशिक राष्ट्रीयता के धुन के भूत को धर्मान्धता, मूर्खता कहकर छोड़ना पड़ेगा। आप भले ही धर्मान्धता या मूर्खता कहें परन्तु मुसलमानों के लिए यह धर्मान्धता या मूर्खता एक ठोस तत्व है। आप गालियां देकर उस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते हैं, अपितु जिस अवस्था में वह है, उसमें मुकाबला करना चाहिए।

    इसमें आश्चर्य करने की बात नहीं है कि मुस्लिम लीग ने खुले आम घोषित किया है कि भारत के दो भाग किए जाएंगे- एक मुस्लिम फेडरेशन और दूसरा हिन्दू फेडरेशन। हिन्दुओं के मुँह पर थुकवाने के लिए ब्रिटिश सरकार अपनी लाडली बीवी पर इतना अधिक विश्वास कर रही है। इन कारणों से भारतीय मुसलमान एक राजनैतिक एकता का राष्ट्र बनाने में हिन्दुओं का साथ नहीं दे रहे हैं। इसलिए हिन्दू देशभक्तों का कर्तव्य है कि हम अपनी पहली भूल का सुधार करें। हमारा पहला राजनैतिक अपराध जो हमारे कांग्रेसवादी हिन्दुओं ने अनजाने में कर डाला और जिसे आज भी वे करते जा रहे हैं, वह यह बात है कि वे प्रादेशिक राष्ट्र की मृगतृष्णा के पीछे दौड़े चले जा रहे हैं और अपनी इस व्यर्थ की दौड़ में वे उस सजीव हिन्दू राष्ट्र को मार डालना चाहते हैं जो इतने प्रेम से पोषित किया गया था। हम हिन्दुओं को चाहिए कि जहाँ से मराठा और सिख हिन्दू साम्राज्य का पतन हुआ है, वहीं से हम राष्ट्रीय जीवन का सूत्र ग्रहण करें।

    यदि आप भारतीय राष्ट्र कहेंगे तो यह हिन्दू राष्ट्र का पर्याय समझा जाएगा। हम हिन्दुओं के लिए भारत और हिन्दुस्तान एक ही देश है। हम हिन्दू होने के नाते भारतीय भी हैं और भारतीय होने के कारण हिन्दू भी हैं। हाँ हम हिन्दू स्वयं में एक राष्ट्र हैं। क्योंकि हमारे धर्म, संस्कृति, ऐतिहासिक रिश्ते सब एक साथ जुड़े हुए हैं। संसार में सभी मानव एक हैं। हमें सांसारिक भाई-चारे के सम्बन्ध में सोचना चाहिए परन्तु भारतीय राष्ट्रीयता का दावा करने वालों से एक प्रश्न है कि वे केवल इस राष्ट्र के बारे में ही क्यों सोचते हैं अथवा क्यों भारतीय राष्ट्रीयता को एक साम्प्रदायिक तरीके से सोचते हैं। ऐसा क्यों है क्योंकि भारत एक प्रादेशिक इकाई है किंतु विश्व में अन्य बहुत सी क्षेत्रीय इकाइयां हैं तो क्या आप भारतीय देशभक्त ही हैं, अबीसीनिया के क्यों नहीं हैं, और वहाँ जाना चाहिए और स्वतंत्रता के लिए लड़ना चाहिए। हमारी विदेश नीति हिन्दू दृष्टिकोण पर आधारित होगी। वे सभी राष्ट्र जो मित्रतापूर्वक हिन्दू राष्ट्र के लिए सहायक हैं, वे हमारे मित्र होंगे और उनसे हमारा अच्छा सम्बन्ध रहेगा। वे सभी जो हिन्दू राष्ट्र का विरोध करेंगे अथवा हिन्दू हितों पर आघात पहुंचायेंगे, वे हमारे द्वारा उपेक्षित किए जाएंगे। अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति हमारा दृष्टिकोण घृणापूर्ण नहीं होगा चाहे वह मुसलमान हों, ईसाई हों अथवा भारतीय यूरोपियन।

    जब तक कांग्रेस हिन्दू संगठनों के लिए व्यवहारिक लाभ पहुंचाने का दावा न करे, तब तक हमें कांग्रेस तथा उसके नेताओं को समर्थन नहीं देना चाहिए। आज राष्ट्रीय एवं राजनीतिक शक्ति के रूप में कांग्रेस को जो सफलता मिली और मंत्रिमण्डलों में एक बहुसंख्यक पार्टी बनी, वह मात्र हिन्दू निर्वाचक मण्डलों के परिणामस्वरूप है। कांग्रेसी हिन्दू, मुसलमानों का एक भी वोट प्राप्त नहीं कर सकते हैं। क्योंकि वह स्वयं साम्प्रदायिक हैं। मुसलमान सिर्फ मुसलमान को मतदान करते हैं, कांग्रेसी नेता जो मुख्यतः हिन्दू हैं, अतः वे विधान सभाओं में, बोर्ड में और नगर पालिकाओं में हिन्दू वोटों के आधार पर चुने जाते हैं। यदि हिन्दू यह तय करले कि कांग्रेस के टिकट पर खड़े व्यक्ति का चुनाव नहीं करना है, तो क्या होगा? तो यही होगा कि कांग्रेस का एक भी प्रत्याशी न तो लोकल बॉडी के चुनावों में और न असेम्बली चुनावों में सफल हो सकेगा। वे एक हिन्दू प्रत्याशी के रूप में केवल हिन्दू के वोटों पर टिके हुए हैं और जब वे हिन्दू बहुसंख्यक क्षेत्रों से चुन लिए जाते हैं तो हिन्दुओं को पीछे से लात मार देते हैं किंतु यदि आप कांग्रेस को सहयोग देने से अपना कंधा हटा लें तो आप पाएंगे कि कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति का जनाधार उसी तरह मर जाएगा जैसे दरवाजे की कील। वे अपने को भारतीय राष्ट्रीय कहते हैं किंतु प्रत्येक कदम जो वे उठाते हैं, वह सभी साम्प्रदायिक होते हैं। वे अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा प्रदान करने की जमानत दे चुके हैं। वे अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमान, ईसाई एवं यूरोपियन हैं। क्या यही भारतीय राष्ट्रीयता है? एक सच्चे भारतीय राष्ट्रीय होने का मतलब होना चाहिए कि जहां हिन्दू, मुसलमान एवं ईसाई सभी बराबर हों तथा सुरक्षा के प्रश्न पर अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक का प्रश्न ही न उठे। उसके लिए सभी भारतीय एक से हैं।

    वास्तविक भारतीय राष्ट्रीय चुनाव प्रणाली मण्डल मुसलमान, गैर मुसलमान, ईसाई, विशेष एवं सामान्य, इस रूप में नहीं बंट सकता है। भारत की चुनाव प्रणाली ही राष्ट्रीय नहीं है। यदि कांग्रेसी सच्चे हैं तो साम्प्रदायिक तौर-तरीके से चुने होने के कारण उन्हें त्यागपत्र देना चाहिए। इसलिए साम्प्रदायिक चुनाव मण्डलों में जहाँ मुसलमानों को अपना मत देते हैं, उसी प्रकार जो व्यक्ति चुने, आम हिन्दू हितों की जमानत दे, उसे ही हिन्दू चुनाव क्षेत्रों से चुनना चाहिए। कांग्रेस की हिन्दू विरोधी एवं राष्ट्र विरोधी नीतियों को दण्ड देने का मात्र एक रास्ता है कि कांग्रेस के जवाब में एक ठोस हिन्दू राष्ट्रीय दल तैयार हो। हमारे हिन्दू समाज के साधु, सन्यासी, सनातनी, आर्य समाजी और हिन्दू संगठन की सभी संस्थाओं को मन में संकल्प ले लेना चाहिए कि कांग्रेस प्रत्याशी को कभी भी वोट नहीं देंगे, यदि वोट देंगे तो सिर्फ हिन्दू राष्ट्रवादी प्रत्याशी को वोट देंगे।

    अगर मुसलमान बंगाल में यह एक्ट पास कर दें कि मुसलमानों को सरकारी नौकरियों में 60 प्रतिशत जगह दी जाएगी तो हिन्दू बहुसंख्यक प्रांतों में तुरंत यह एक्ट पास किया जाए कि हिन्दुओं को सरकारी नौकरी में 90 प्रतिशत जगह दी जाएगी। जहाँ हम केवल 80 प्रतिशत हैं। यदि हम ऐसा व्यवहार करना शुरु कर देंगे तो मुसलमान एक दिन में अपने होश में आ जाएंगे और इस प्रकार हम केवल हिन्दू अधिकारों एवं सम्मान की रक्षा हिन्दू प्रान्तों में ही नहीं, अपितु उन प्रान्तों में भी अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। हिन्दू राष्ट्र का झण्डा ऊंचा करो। देखो कि भारत सदा हिन्दुस्तान बना रहे। पाकिस्तान कभी नहीं बनने पाए, इंग्लिस्तान कभी नहीं, कभी नहीं और सम्पूर्ण भारत में हिन्दू धर्म की जय, हिन्दू राष्ट्र की जय, वन्दे मातरम्। इस प्रकार की ध्वनि पुनः सुनाई देने लगे।'


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