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  • अध्याय - 30 : स्वतंत्र भारत में मुस्लिम शासित रियासतों की समस्या

     09.03.2018
    अध्याय - 30 : स्वतंत्र भारत में मुस्लिम शासित रियासतों की समस्या

    अध्याय - 30


    स्वतंत्र भारत में मुस्लिम शासित रियासतों की समस्या

    4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 पारित कर दिया। इस अधिनियम की धारा 8 में प्रावधान किया गया कि 15 अगस्त 1947 को देशी राज्यों पर से ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता समाप्त हो जाएगी तथा यह पुनः देशी राज्यों को हस्तांतरित कर दी जाएगी। देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे।

    स्वतन्त्रता के समय भारत में छोटी बड़ी 566 देशी रियासतें थीं। समस्त भारत का 40 प्रतिशत क्षेत्रफल और 25 प्रतिशत जनसंख्या इन राज्यों में निवास करती थी। प्रस्तावित पाकिस्तान की सीमा में पड़ने वाली 12 रियासतों पर मुस्लिम नवाबों और खानों का शासन था तथा वहाँ की बहुसंख्य जनसंख्या भी मुसलमान थी। जबकि भारतीय क्षेत्र में रह जाने वाली 554 रियासतों में से हैदराबाद, जूनागढ़, भोपाल तथा टोंक रियासतों पर मुसलमान शासकों का शासन था किंतु वहाँ की बहुसंख्य जनसंख्या हिन्दू थी। केवल जम्मू-काश्मीर अकेली ऐसी रियासत थी जिस पर हिन्दू शासक का शासन था और वहाँ की बहुसंख्य जनसंख्या मुसलमान थी। शेष समस्त रियासतों पर हिन्दू शासकों का शासन था और वहाँ की बहुसंख्य जनसंख्या हिन्दू थी। प्रत्येक देशी राज्य में एक ब्रिटिश रेजींडेट अथवा पोलिटिकल अधिकारी होता था जिसके माध्यम से वायसराय, देशी राज्यों पर शासन करता था।

    देशी राज्यों की मंशा

    देशी राज्य किसी भी कीमत पर भारत संघ अथवा पाकिस्तान में प्रवेश के इच्छुक नहीं थे। वे अपने स्वतंत्र राज्य उसी प्रकार बने रहने देना चाहते थे जिस प्रकार ब्रिटिश छत्रछाया में जाने से पहले थे ताकि उन्हें अपनी रियासतों के राजस्व पर पूरा अधिकार हो। वे अपनी मर्जी से अपने पड़ौंसियों से युद्ध अथवा मित्रता कर सकें और अपनी प्रजा को उसके अपराधों के लिए मृत्युदण्ड अथवा क्षमादान देते रहें। जोधपुर, जयपुर, त्रावणकोर, हैदराबाद, जम्मू एवं काश्मीर, मैसूर, इन्दौर, भोपाल, नवानगर यहाँ तक कि बिलासपुर की बौनी रियासत ने भी पूर्णतः स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखा। अलवर नरेश ने 3 अप्रेल 1947 को बम्बई में आयोजित नरेन्द्र मंडल की बैठक में कहा कि देशी राज्यों के अधिपतियों को हिंदी संघ राज्य में नहीं मिलना चाहिये। 5 जून 1947 को भोपाल तथा त्रावणकोर ने स्वतंत्र रहने के निर्णय की घोषणा की। हैदराबाद को भी यही उचित जान पड़ा। जम्मू एवं काश्मीर, इन्दौर, जोधपुर, धौलपुर, भरतपुर तथा कुछ अन्य राज्यों के समूह के द्वारा भी ऐसी ही घोषणा किए जाने की संभावना थी। इस प्रकार देशी रियासतों के शासकों की महत्वाकांक्षाएं देश की अखण्डता के लिए खतरा बन गयीं।

    जिन्ना का षड़यंत्र

    भारत विभाजन का निर्णय हिंदू-मुस्लिम जनसंख्या की बहुलता के क्षेत्रों के आधार पर किया गया था। फिर भी मुहम्मद अली जिन्ना ने प्रयत्न किया कि वह भारत की हिन्दू रियासतों को प्रस्तावित पाकिस्तान में मिलने के लिए सहमत करे ताकि एक कटे-फटे तथा छिद्रयुक्त कमजोर भारत का निर्माण हो। उसकी योजना थी कि यदि हिन्दू रियासतें पाकिस्तान में मिलने की घोषणा न करें तो, स्वतंत्र रहने की ही घोषणा कर दें। जिन्ना ने अपना ध्यान मुसिलम शासकों द्वारा शासित बड़ी रियासतों एवं पाकिस्तान की सीमा से सटी हुई हिन्दू रियासतों पर केन्द्रित किया। भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां जिन्ना की इस योजना में सम्मिलित हो गया। एक ओर कांग्रेस देशी राज्यों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देशी राज्यों के साथ बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया। मुस्लिम लीग के लिए ऐसा करना सुविधाजनक था क्योंकि प्रस्तावित पाकिस्तान की सीमा में देशी राज्यों की संख्या 12 थी। शेष 554 रियासतें प्रस्तावित भारत संघ की सीमा के भीतर स्थित थीं। जिन्ना हिन्दू राजाओं के गले में यह बात उतारना चाहता था कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा देशी राजाओं की साझा शत्रु है। जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर राजपूताना की रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उसने घोषित किया कि देशी राज्यों में मुस्लिम लीग बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जाएगी। लीग की ओर से राजस्थान के राजाओं में गुप्त प्रचार किया गया कि उन्हें पाकिस्तान में मिलना चाहिये, हिंदी संघ राज्य में नहीं।

    निजाम हैदराबाद के प्रति माउण्टबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। जिन्ना ने वायसराय के राजनीतिक सविच कोनार्ड कोरफील्ड और भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ का उपयोग भारत को कमजोर करने में किया। त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया। महाराजा जोधपुर और बहुत सी छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे। महाराजा बड़ौदा ने अपने हाथ से सरदार पटेल को लिखा- 'जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत को दबाने में सहयोग देंगे।'

    इस पर भारत सरकार ने महाराजा प्रतापसिंह की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को बड़ौदा का महाराजा बना दिया। भारत सरकार का कठोर रवैया देखकर अधिकांश राजा विनम्र देश-सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। जो राज्य संघ उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिए बनाया था, उसे भंग कर दिया गया। उन्होंने समझ लिया कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा, फिर भी जिन्ना तथा उसके साथियों का षड़यंत्र जारी रहा।

    भोपाल नवाब का षड़यंत्र

    भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ तीसरे मोर्चे का नेता था। वह छिपे तौर पर मुस्लिम परस्त, पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहा था किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो वह प्रत्यक्षतः मुस्लिम लीग के समर्थन में चला गया तथा जिन्ना का निकट सलाहकार बन गया। वह जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गया जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिए प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे। भोपाल नवाब चाहता था कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाए। इसलिए उसने जिन्ना की सहमति से एक योजना बनाई कि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य, पाकिस्तान का अंग बन जाएं। इस योजना में उदयपुर और बड़ौदा की ओर से बाधा उपस्थित हो सकती थी किंतु महाराजा जोधपुर ने उक्त रियासतों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया। भोपाल नवाब की गतिविधियों को देखकर रियासती मंत्रालय के तत्कालीन सचिव ए. एस. पई ने रियासती विभाग के मंत्री सरदार पटेल को एक नोटशीट भिजवायी- 'भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहा है।'

    जिन्ना के संकेत पर नवाब तथा धौलपुर के महाराजराणा उदयभानसिंह ने जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर तथा जयपुर आदि रियासतों के राजाओं से बात की तथा उन्हें जिन्ना से मिलने के लिए आमंत्रित किया। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि अलवर रियासत में मुस्लिम मेवों ने लम्बे समय से हिंसा फैला रखी थी तथापि भोपाल नवाब का साथ देने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा भी थे।

    15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हो गया। पाकिस्तानी क्षेत्र में स्थित 12 रियासतें- (1.) बहावलपुर, (2.) खैरपुर, (3.) कलात, (4.) लास बेला, (5.) मकरान, (6.) खरान, (7.) अम्ब (तनावल), (8.) चित्राल, (9.) हुंजा, (10.) धीर, (11.) नगर, (12.) स्वात, पाकिस्तान में सम्मिलित हो गईं और शेष 554 रियासतें भारत में रह गईं। जूनागढ़़ (सौराष्ट्र), हैदराबाद (दक्षिण भारत) और जम्मू-काश्मीर को छोड़कर 551 रियासतों ने सरदार पटेल के प्रयत्नों से 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में मिलने पर सहमति दे दी। जूनागढ़, हैदराबाद तथा जम्मू-काश्मीर राज्य भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए।

    जूनागढ़ की समस्या

    गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में ई.1748 से जूनागढ़ रियासत स्थित थी। इस पर मुस्लिम नवाब का शासन था। इस रियासत की 80 से 90 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। जूनागढ़ रियासत चारों ओर से हिन्दू रियासतों से घिरी हुई थी। जूनागढ़ रियासत तथा पाकिस्तान की सीमा के बीच 240 मील की दूरी में समुद्र स्थित था। इस रियासत का अंतिम नवाब मुहम्मद महाबत खानजी (तृतीय) 11 वर्ष की आयु में रियासत का शासक बना था। उसने मेयो कॉलेज अजमेर में पढ़ाई की थी। उसे तरह-तरह के कुत्ते पालने तथा शेरों का शिकार करने का शौक था। 1947 ई. के आरम्भ में मुस्लिम लीग का वरिष्ठ नेता अब्दुल कादिर मुहम्मद हुसैन जूनागढ़ गया। हुसैन ने नवाब को डराया कि यदि जूनागढ़ भारत में मिला तो कांग्रेस उसके कुत्तों को मार डालेगी तथा शेरों का राष्ट्रीयकरण कर देगी। जबकि पाकिस्तान में वह अपने कुत्तों को सुरक्षित रख सकेगा तथा निर्बाध रूप से शेरों का शिकार कर सकेगा। यह बात नवाब के मस्तिष्क में बैठ गई।

    जब वायसराय की 25 जुलाई 1947 की दिल्ली बैठक के बाद भारत सरकार ने नवाब को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन भिजवाया तो नवाब ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए तथा समाचार पत्रों में एक घोषणा पत्र प्रकाशित करवाया- 'पिछले कुछ सप्ताहों से जूनागढ़ की सरकार के समक्ष यह सवाल रहा है कि वह हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करे। इस मसले के समस्त पक्षों पर सरकार को अच्छी तरह गौर करना है। यह ऐसा रास्ता अख्तयार करना चाहती थी जिससे अंततः जूनागढ़ के लोगों की तरक्की और भलाई स्थायी तौर पर हो सके तथा राज्य की एकता कायम रहे और साथ ही साथ असकी आजादी और ज्यादा से ज्यादा बातों पर इसके अधिकार बने रहें। गहरे सोच विचार और सभी पहलुओं पर जांच परख के बाद सरकार ने पकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया है और अब उसे जाहिर कर रही है। राज्य का विश्वास है कि वफादार रियाया, जिसके दिल में राज्य की भलाई और तरक्की है, इस फैसले का स्वागत करेगी।'

    जूनागढ़ की जनता ने नवाब की कार्यवाही का जबरदस्त विरोध किया और एक स्वतन्त्र अस्थायी हुकूमत की स्थापना कर ली। भारत सरकार ने लियाकत अली से पूछा कि क्या पाकिस्तान इसे स्वीकार करेगा किंतु पाकिस्तान की ओर से कोई जवाब नहीं आया। कई हफ्ते बीत जाने के बाद पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि जूनागढ़ का निर्णय मान लिया गया है तथा अब वह पाकिस्तान का हिस्सा माना जाएगा।

    भारत सरकार की ओर से कहा गया कि नवाब के उत्पीड़न के कारण जूनागढ़ से हिन्दू शरणार्थी भाग रहे हैं। जूनागढ़ के चारों तरफ छोटी हिन्दू रियासतों का जमावड़ा था। नवाब ने अपनी सेनाएं भेजकर इन रियासतों पर अधिकार कर लिया। उन्होंने भी भारत सरकार से सहायता मांगी। जूनागढ़ रियासत के दीवान शाह नवाज भुट्टो के बुलावे पर भारत सरकार ने सेना भेजकर जूनागढ़ को चारों से घेर लिया। कुछ दिन बाद जब जूनागढ़ की सेना के पास रसद की कमी हो गई तब भारतीय सेना आगे बढ़ी। जूनागढ़ की जनता ने इस सेना का स्वागत किया। 24 अक्टूबर 1947 को नवाब अपने विशेष हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान भाग गया। नवाब अपनी चार बेगमों एवं अधिक से अधिक संख्या में अपने कुत्तों को हवाई जहाज में ले जाना चाहता था किंतु एक बेगम जूनागढ़ में ही छूट गई। नवाब अपने साथ अपने समस्त जवाहरात भी ले गया। नवाब तथा उसका परिवार कराची में बस गए। 9 नवम्बर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया। 20 फरवरी 1948 को भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ में जनमत-संग्रह करवाया गया जिसमें रियासत की 2 लाख से अधिक जनसंख्या ने भाग लिया। 99 प्रतिशत जनसंख्या ने भारत में मिलने की तथा शेष लोगोें ने पाकिस्तान में मिलने की इच्छा व्यक्त की। 17 नवम्बर 1959 को नवाब की पाकिस्तान में मृत्यु हो गई।

    हैदराबाद की समस्या

    हैदराबाद रियासत की स्थापना ई.1720 में चिनकुलीजखाँ ने की जिसने निजामुल्मुल्क की उपाधि धारण की थी। इस कारण हैदराबाद के शासक को निजाम कहा जाता था। ई. 1798 में हैदराबाद निजाम ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता की संधि की। हैदराबाद निजाम को 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल 2,15,339 वर्ग किलोमीटर था। यह भारत की सबसे बड़ी तथा सबसे समृद्ध रियासत थी। जूनागढ़ की भांति हैदराबाद का शासक भी मुसलमान था किंतु बहुसंख्यक 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। हैदराबाद रियासत भी चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरी हुई थी। हैदराबाद के अंतिम निजाम ओस्मान अली खान आसिफ जाह (सप्तम) के 28 पुत्र तथा 44 पुत्रियां थीं। निजाम को सोना तथा हीरे-जवाहर एकत्र करने की सनक थी। वह अपने राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र रखना चाहता था। वह प्रजातन्त्र को दूषित प्रणाली समझता था और राजाओं के दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था। उसने रियासत के समस्त शासनाधिकार स्वयं में केन्द्रित कर रखे थे। निजाम के अधिकारी भी उसी के समान चालाक तथा लालची थे।

    9 जून 1947 को निजाम ने वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा- 'पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां हिस्सा (क्लॉज) जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महीनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनीतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया। यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एक तरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करती है बल्कि यह आभास भी देती है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा। जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही। इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है। मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिए राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किए बगैर बिल पास हो गया। आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जाएं तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले। मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाए। लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है। मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।'

    इस पर वासयराय ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जाएगा। ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हैदराबाद के लिए एक ही रास्ता है कि वह हिन्दुस्तान में सम्मिलित हो जाए। हैदराबाद ने इस सलाह को मानने से इन्कार कर दिया। इस पर 7 अगस्त 1947 को कांग्रेस ने हैदराबाद रियासत में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। हैदराबाद सरकार ने इस आंदोलन को सख्ती से कुचलने का प्रयास किया। इस कारण यह आंदोलन हिंसक रूप लेने लगा। इसी समय तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली किसान संघर्ष भी हुआ।

    वायसराय के दबाव से नवम्बर 1947 में निजाम ने भारत के साथ स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट पर दस्तख्त कर दिए परन्तु संघ में सम्मिलित होने की बात को टालता रहा। इसी के साथ-साथ वह अपने राज्य में कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित करता रहा। निजाम ने रजाकारों को विश्वास दिलाया कि जब हम विद्रोह करेंगे तो हमारे अँग्रेज दोस्त हमारी सहायता करेंगे। निजाम की शह पाकर मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इतिदाद-उल-मुसलमीन और उसके अर्द्ध सैनिक रजाकरों ने हैदराबाद रियासत के बहुसंख्यक हिन्दुओं को डराना-धमकाना तथा लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया ताकि वे रियासत छोड़कर भाग जाएं। रजाकारों की हिंसक वारदातों से रियासत में शान्ति व्यवस्था बिगड़ गई। रियासत से होकर गुजरने वाले रेलमार्गों तथा सड़कों को क्षतिग्रस्त किया जाने लगा तथा रेलों एवं बसों से यात्रा करने वाले हिन्दुओं को लूटा जाने लगा।

    मुस्लिम रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने धमकी दी कि वे सम्पूर्ण भारत को जीतकर दिल्ली के लाल किले पर निजाम का आसफजाही झण्डा फहरायेंगे। इसके बाद हैदराबाद राज्य में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्याएं की जाने लगीं तथा उनकी सम्पत्ति को लूटा अथवा नष्ट किया जाने लगा। माउण्टबेटन, सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने निजाम को समझाने का प्रयास किया परन्तु अब स्थिति उसके नियन्त्रण में नहीं रही थी। रजाकार और कट्टर मुल्ला-मौलवी, मुसलमान जनता को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवा रहे थे। सरदार पटेल और वी. पी. मेनन तब तक चुप रहे जब तक कि माउण्टबेटन इंग्लैण्ड नहीं लौट गए। सितम्बर 1948 में माउण्टबेटन के लौटने के दो दिन बाद, निजाम ने घोषणा की कि वह माउण्टबेटन योजना को स्वीकार करने के लिए तैयार है। इस पर पटेल ने उत्तर दिया- 'अब बहुत देरी हो चुकी। माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है।' इसके कुछ देर बाद ही 13 सितम्बर 1948 को मेजर जनरल जोयन्तोनाथ चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना हैदराबाद में प्रवेश कर गई। पांच दिन की कार्यवाही में भारतीय सेना ने मुस्लिम रजाकारों के प्रतिरोध को कुचल डाला। 17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद के सेनापति जनरल ईआई एड्रूस ने सिकंदराबाद में जनरल चौधरी के समक्ष समर्पण कर दिया। 18 सितम्बर को मेजर जनरल चौधरी ने हैदराबाद रियासत के सैनिक गवर्नर का पद संभाल लिया। हैदराबाद रियासत को भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया गया। विवश होकर निजाम को नई व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी। भारत सरकार ने उसके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया। स्वतंत्र भारत में हैदराबाद रियासत को तोड़कर उसके क्षेत्र आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र प्रांतों में मिला दिए गए।

    जम्मू-काश्मीर की समस्या

    भारत के उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र में 2,10,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला जम्मू-काश्मीर राज्य सामरिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। इसकी सीमाएं भारत, पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान से सटी हुई हैं और सोवियत रूस भी अधिक दूर नहीं है। जम्मू काश्मीर रियासत ई.1846 में अस्तित्व में आई। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा देशी राज्य था। जम्मू-काश्मीर रियासत का डोगरा शासक हरिसिंह, हिन्दू क्षत्रिय वंश से था किन्तु उसकी लगभग 75 प्रतिशत जनता मुस्लिम थी। इस राज्य की सीमाएं भारत और पाकिस्तान दोनों से मिली हुई थीं। वह चाहे जिससे मिल सकता था किंतु डोगरा शासक हरिसिंह ने भारत अथवा पाकिस्तान में मिलने के स्थान पर स्वतन्त्र रहने का निश्चय किया।

    पाकिस्तान को जम्मू-काश्मीर के डोगरा शासक का निर्णय अच्छा नहीं लगा। सामरिक एवं भौगोलिक स्थिति, हिन्दू राजवंश, बहुसंख्यक मुस्लिम जनता, काश्मीर नरेश की अनिश्चित नीति और पाकिस्तान की लोलुप दृष्टि, इन समस्त तत्त्वों ने मिलकर जम्मू-काश्मीर की समस्या को अत्यधिक गम्भीर बना दिया। पाकिस्तान ने काश्मीर की आर्थिक नाकेबन्दी करके जम्मू-काश्मीर राज्य को अनाज, नमक, पैट्रोल, केरोसीन आदि आवश्यक सामग्री पहुंचना बन्द कर दिया परन्तु पाकिस्तान सरकार की यह कार्यवाही जम्मू-काश्मीर सरकार को झुकाने में असफल रही। तब पाकिस्तान सरकार ने उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइलियों को जम्मू-काश्मीर में घुसकर मारकाट मचाने के लिए भेजा। कबाइलियों ने 22 अक्टूबर 1947 को जम्मू-काश्मीर राज्य की सीमा में प्रवेश करके गांवों पर आक्रमण किया। ज्यों-
    ज्यों कबाइली आगे बढ़ते गए, स्थानीय मुल्ला-मौलवियों के उकसाने पर राज्य के अधिकांश मुस्लिम सैनिक एवं सिपाही भी उनके साथ होते गए। चार दिन में ही कबाइली, राजधानी श्रीनगर से 15 मील दूर बारामूला में पहुँच गए जिससे राजधानी खतरे में पड़ गई।

    संकटापन्न अवस्था जानकर डोगरा शासक हरिसिंह ने भारत सरकार से सैनिक सहायता भेजने का अनुरोध किया किंतु भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू उस समय तक काश्मीर को सैनिक सहायता देने के लिए तैयार नहीं हुए जब तक कि राज्य के मुख्य राजनीतिक दल- नेशनल कान्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला ने पं. नेहरू को यह आश्वासन नहीं दिया कि राज्य में संवैधानिक शासन की शर्त पर वह और उनका दल काश्मीर को भारत में सम्मिलित किए जाने के पक्ष में है। स्पष्ट है कि नेहरू चाहते थे कि काश्मीर का भारत में विलय केवल हिन्दू शासक की इच्छा मात्र से न हो, अपितु बहुसंख्यक मुस्लिम जनता की स्वीकृति के साथ हो। जब नेहरू की इच्छा-पूर्ति कर दी गई तो काश्मीर को भारत में सम्मिलित करने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया। यह भी निश्चित किया गया कि युद्ध समाप्ति के बाद काश्मीर में इस विषय पर जनमत-संग्रह कराया जाएगा। इस समझौते के पश्चात् 27 अक्टूबर 1947 को हवाई मार्ग से भारतीय सेना को श्रीनगर पहुंचाया गया जिसने दुश्मन के जबरदस्त आक्रमण से श्रीनगर को बचा लिया। काश्मीर को अपने हाथ से निकलते देखकर पाकिस्तान की सेना ने कबाइलियांे के नाम पर युद्ध में हस्तक्षेप किया परन्तु भारतीय सेना के सामने उसकी एक न चली। में पाकिस्तानी सेना को बारामूला से पीछे धकेल दिया गया। परन्तु पं. नेहरू की देरी का नुकसान भारत को उठाना पड़ा। लगभग 35,000 वर्ग मील क्षेत्रफल पाकिस्तान के अधिकार में चला गया जिसे पाकिस्तान ने आजाद काश्मीर कहना आरम्भ कर दिया।

    1 जनवरी 1948 को भारत ने सुरक्षा परिषद् में शिकायत की कि भारत के एक अंग काश्मीर पर सशस्त्र कबाइलियों ने आक्रमण कर दिया है और पाकिस्तान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, दोनों तरीकों से उन्हें सहायता दे रहा है। उनके आक्रमण से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलाने तथा कबाइलियों को सैनिक सहायता न देने को कहा जाए और पाकिस्तान की इस कार्यवाही को भारत पर आक्रमण माना जाए। भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल इस मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाने के पक्ष में नहीं थे परन्तु माउण्टबेटन की सलाह पर पं. नेहरू इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए। 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान ने भारत के आरोपों को अस्वीकार कर दिया और भारत पर बदनीयती का आरोप लगाते हुए कहा कि जम्मू-काश्मीर का भारत में विलय असंवैधानिक है और इसे मान्य नहीं किया जा सकता। सुरक्षा परिषद् ने इस समस्या के समाधान के लिए पांच राष्ट्रों की एक समिति गठित की और इस समिति को मौके पर स्थिति का अवलोकन करके समझौता कराने को कहा। संयुक्त राष्ट्र समिति ने काश्मीर आकर मौके का निरीक्षण किया और 13 अगस्त 1948 को दोनों पक्षों से युद्ध बन्द करने और समझौता करने हेतु निम्न सुझाव प्रस्तुत किए-

    (1) पाकिस्तान काश्मीर से अपनी सेना हटा ले। पाकिस्तान कबाइलियों तथा गैर-कश्मीरियों को भी काश्मीर से हटाने का प्रयास करे।

    (2) सेनाओं द्वारा खाली किए गए क्षेत्रों का शासन प्रबन्ध स्थानीय अधिकारी संयुक्त राष्ट्र समिति की देखरेख में करें।

    (3) जब समिति भारत को सूचित कर दे कि पाकिस्तान ने उपर्युक्त शर्तें पूरी कर ली हैं, तो भारत भी समझौते के अनुसार अपनी अधिकांश सेना वहाँ से हटा ले।

    (4) अन्तिम समझौता होने तक भारत युद्ध-विराम की सीमा के अन्दर उतनी ही मात्रा में सैनिक रखे, जितने कि स्थानीय अधिकारियों को शान्ति एवं व्यवस्था को स्थापित रखने के लिए आवश्यक हो। इन बिंदुओं के आधार पर दोनों पक्षों के बीच लम्बी वार्त्ता हुई जिसके बाद 1 जनवरी 1949 को दोनों पक्ष युद्ध-विराम के लिए सहमत हो गए। यह भी तय किया गया कि अन्तिम फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया जाएगा। इसके लिए एक अमरीकी नागरिक चेस्टर निमित्ज को प्रशासक नियुक्त किया गया परन्तु पाकिस्तान ने समझौते की शर्तो का पालन नहीं किया और जनमत-संग्रह नहीं हो पाया। निमित्ज ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

    ई.1954 में पाकिस्तान, पश्चिमी गुट में सम्मिलित हो गया और उसे अमेरिका से भारी सैनिक सहायता मिलने लगी। अब पश्चिमी देश, काश्मीर समस्या पर पाकिस्तान का पक्ष लेने लगे। दूसरी तरफ सोवियत संघ, भारत के पक्ष में आ गया। इससे काश्मीर-समस्या शीत युद्ध का अंग बन गई। अगस्त 1965 में पाकिस्तान ने कच्छ और काश्मीर पर आक्रमण किया परन्तु भारत के हाथों पाराजित होकर उसे ताशकन्द समझौता करना पड़ा। ई.1971 में पाकिस्तान ने एक बार पुनः भारत पर आक्रमण किया और परास्त होकर उसे शिमला समझौता करना पड़ा। ई.1999 में कारगिल में घुसपैठ के माध्यम से पाकिस्तान ने पूरे काश्मीर को हड़पने का प्रयास किया किंतु उसे इस बार भी सफलता नहीं मिली। भारत की संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया कि पाकिस्तान के कब्जे वाली भारतीय भूमि को वापस लिया जाएगा किंतु उसके लिए भारत सरकार द्वारा अब तक कोई प्रयास नहीं किया गया है। इस प्रकार काश्मीर की समस्या अभी तक अधर में पड़ी है और आजाद काश्मीर क्षेत्र पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा स्थापित है।


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