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  • अध्याय - 28 : सम्प्रदायों के आधार पर राष्ट्र-विभाजन की राजनीति

     09.03.2018
    अध्याय - 28 : सम्प्रदायों के आधार पर राष्ट्र-विभाजन की राजनीति

    अध्याय - 28


    सम्प्रदायों के आधार पर राष्ट्र-विभाजन की राजनीति

    भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय

    भारतीय राजनीति में जिन्ना का उदय भारत में साम्प्रदायिक समस्या को चरम पर पहुंचाने वाले प्रमुख तत्त्वों में से एक था। मुहम्मद अली जिन्ना का जन्म ई.1876 में कराची में हुआ था। भारत में यह बात प्रचलित है कि जिन्ना के पूर्वज गुजराती हिन्दू थे, जबकि पाकिस्तानी यह मानते हैं कि उसके पूर्वज ईरान से आए थे। जिन्ना ने कभी भी स्वयं को इस्पहानी नहीं कहा, जैसा कि अपनी ईरानी वंशावली को प्रमाणित करने के लिए लोग कहते थे। पाकिस्तान में अन्य लोग मानते हैं कि उसकी वंशावली राजपूत जाति में है, जिसका अर्थ है कि उसके पूर्वज हिन्दू थे। कहा जाता है कि वह राजपूत जाति पंजाब में साहिवाल कहलाती थी। जिन्ना के किसी पूर्वज ने गुजरात के समृद्ध खोजा समुदाय की लड़की से विवाह किया। उस दम्पत्ति के वंशज खोजा मुसलमान माने गए।

    जिन्ना ने ई.1896 में लंदन से बैरिस्टरी की परीक्षा पास की और उसी वर्ष बम्बई में वकालात आरम्भ की। दादाभाई नौरोजी, जिन्ना को राजनीति में लेकर आए। दिसम्बर 1904 में बम्बई में आयोजित कांग्रेस के बीसवें सम्मेलन में जिन्ना ने भी भाग लिया। ई.1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने उसे अपने सचिव की हैसियत से कांग्रेस के मंच से बोलने दिया। कांग्रेस में यह उसका पहला भाषण था। इस भाषण में उसने मुसलमानों के लिए अलग सुविधाओं की मांग का विरोध करते हुए कहा कि मुसलमानों के साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो हिन्दुओं के साथ हो रहा है। इस प्रकार अपनी राजनीतिक यात्रा के आरम्भ में जिन्ना राष्ट्रवादी था तथा भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं था। ई.1906 में ढाका में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और लीग ने मुसलमानों के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग की तो जिन्ना ने उसका विरोध किया और कहा कि इस तरह का प्रयास देश को विभाजित कर देगा। ई.1913 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग की सदस्यता ग्रहण की किंतु वह कांग्रेस का सदस्य भी बना रहा। उस समय मुस्लिम लीग तथा हिन्दू महासभा आदि विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य भी कांग्रेस की सदस्यता रख सकते थे। ई.1916 में वह मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया।

    ई.1919 में पार्लियामेंट्री कमेटी में एक गवाही देते हुए जिन्ना ने कहा कि मैं भारतीय राष्ट्रवादी की हैसियत से बोल रहा हूँ। इस घटना के बाद भारत के राष्ट्रवादियों ने जिन्ना को एकता का राजदूत कहना आरम्भ किया। ई.1919 में बम्बई के गवर्नर जॉर्ज लॉयड ने वायसराय मांटेग्यू को लिखा था- 'जिन्ना जुबान के सफेद किंतु दिल के काले हैं...... उनके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता क्योंकि केवल वही हैं जो कहते एक बात हैं किंतु फौरन दूसरा काम करते नजर आते हैं।'

    ई.1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जिन्ना ने गांधीजी को महात्मा कहने से मना कर दिया और उन्हें मंच से मिस्टर घैण्ढी कहकर सम्बोधित किया। अंग्रेजियत के रंग में पला-बढ़ा जिन्ना, हिन्दी शब्दों का ढंग से उच्चारण नहीं कर पाता था इसलिए गांधीजी को मिस्टर घैण्ढी कहता था। इस पर कांग्रेेस के नेताओं ने जिन्ना का अपमान किया। इस घटना के बाद, जिन्ना एवं नेहरू बीच दूरियां बढ़ने लगीं। 30 सितम्बर 1921 को जिन्ना, कांग्रेस से अलग हो गया फिर भी वह राष्ट्रवादी बना रहा।

    मोसले ने लिखा है- '1920 तक वह वैधानिक तरीकों से अपनी बात मनवाने के लिए प्रचार करता था। 1928 तक वह हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करता था। सत्ता के लालच ने उसे पहले कांग्रेस छोड़ने और फिर देश का बंटवारा करने की मांग के लिए विवश कर दिया।'

    ई.1933 में जब चौधरी रहमत अली ने पाकिस्तान नामक अलग देश की अवधारणा दी तो जिन्ना ने उसे दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। ई.1937 में भारत सरकार अधिनियम-1935 के प्रावधानों के अनुसार प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन हुए। इन चुनावों में जवाहरलाल नेहरू ने एक वक्तव्य दिया- 'देश में केवल दो ही ताकतें हैं- सरकार और कांग्रेस। सरकार का मुकाबला केवल कांग्रेस कर सकती है।'

    इस वक्तव्य से जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गया और उसके बाद उसने नेहरू को नीचा दिखाने का कोई अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दिया। उसने तुरंत प्रतिवाद करते हुए कहा- 'मैं कांग्रेस का साथ देने से इंकार करता हूँ, देश में एक तीसरा पक्ष भी है और वह है मुसलमानों का पक्ष।' ई.1937 के प्रांतीय धारा सभाओं के चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला। बंगाल, आसाम तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को बहुत कम मत मिले। ग्यारह प्रान्तों में मुसलमानों के लिए सुरक्षित 482 सीटों में से कांग्रेस को 26 सीटें, मुस्लिम लीग को 108 सीटें तथा निर्दलीय मुसलमानों को 128 सीटें मिलीं। पंजाब में अधिकांश सीटें यूनियनिस्ट पार्टी को मिलीं। बंगाल में फजलुल हक की प्रजा-पार्टी को 38 सीटें मिलीं।

    चुनावों में कांग्रेस को मिली भारी विजय से जिन्ना तिलमिला गया। उसने सोचा कि भारत के समस्त मुस्लिम राजनीतिक दलों को लीग के अन्तर्गत संगठित करके ही हिन्दुओं की पार्टी अर्थात् कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। इसके बाद जिन्ना, मुसमलानों के लिए अलग देश अर्थात् पाकिस्तान बनाने की राह पर चल पड़ा। उसने द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुसलमानों की कमजोरी बनाने तथा उस कमजोरी को अपने पक्ष में भुनाने का निर्णय लिया। जिन्ना ने भारतीय राजनीति की पूरी दिशा बदल दी। उसने कांग्रेस को धमकी दी- 'मुसमलानों को अकेला छोड़ दें।' उसके साथियों ने मुसलमानों पर हिन्दुओं द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के झूठे आंकड़े और मनगढ़ंत घटनाएं प्रचारित करके इस्लाम खतरे में, जैसे भड़काऊ नारे दिए और मुसलमानों में कृत्रिम भय पैदा करके साम्प्रदायिकता की समस्या को चरम पर पहुंचा दिया।

    इसी बीच जवाहरलाल नेहरू ने अपने समाजवादी कार्यक्रम में मुसलमानों से सहयोग करने की अपील की किन्तु डॉ. इकबाल ने इसे मुसलमानों की सांस्कृतिक एकता को नष्ट करने की योजना बताया। इकबाल ने जिन्ना को भरपूर सहयोग दिया। इकबाल की मध्यस्थता से जिन्ना-सिकन्दर समझौता हुआ तथा पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के मुस्लिम सदस्य, मुस्लिम लीग के भी सदस्य बन गए। इसके तुरन्त बाद बंगाल में फजलुल हक के नेतृत्व में और सिन्ध में सादुल्लाखाँ ने नेतृत्व में विधान सभाओं के मुस्लिम सदस्यों ने मुस्लिम लीग की सदस्यता स्वीकार कर ली। इससे मुस्लिम लीग शक्तिशाली पार्टी हो गई। इसी दौरान संयुक्त प्रान्त में मन्त्रिमण्डल निर्माण सम्बन्धी विवाद ने मुस्लिम लीग की लोकप्रियता बढ़ाने में योगदान दिया। कांग्रेस और लीग के बीच अविश्वास की वृद्धि के कारण ऊपरी तौर पर गौण लगने वाले मसले, जैसे कि कांग्रेस के झण्डे को फहराना, वन्देमातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाना, उर्दू के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग की मांग उठाना आदि भी अब साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुए। जिन्ना ने इसका लाभ उठाया और मुसलमानों पर अपने नेतृत्व और मुस्लिम लीग का प्रभाव मजबूती से आरोपित कर दिया। फलस्वरूप ई.1927 में मुस्लिम लीग की सदस्य संख्या जो मात्र 1330 थी, ई.1938 में एक लाख हो गई और ई.1944 में 20 लाख के आसपास पहुँच गई।

    जिन्ना मुस्लिम लीग को भारत के समस्त मुसलमानों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था कहता था जबकि कांग्रेस उसके इस दावे को अस्वीकार करती थी क्योंकि जिन्ना के दावे को स्वीकार करने का अर्थ था कि कांग्रेस न तो एकमात्र अखिल भारतीय पार्टी है और न हिन्दू और मुसलमान, दोनों की पार्टी है। इस कारण जिन्ना, कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं, विशेषतः महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू से चिढ़ा हुआ रहता था।

    जिन्ना, गांधीजी को महात्मा मानने से मना करता था तथा उन्हें चालाक लोमड़ी और साँप कहता था। गांधीजी के लिए उसका कहना था- 'इस आदमी को किसी एक बात तक लाना असम्भव है। वह साँप की तरह चालाक है।' जवाहरलाल नेहरू के लिए जिन्ना का कहना था- 'उद्दण्ड ब्राह्मण जो अपनी चालबाजी को पश्चिमी शिक्षा के आवरण से ढंककर रखता है। जब वह वादा करता है, कोई न कोई रास्ता छोड़ देता है और जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो सफेद झूठ बोलता है।' कांग्रेस के नेताओं के लिए जिन्ना का व्यवहार असह्य था। फिर भी गांधीजी जिन्ना को कांग्रेस के आंदोलन के साथ रखना चाहते थे। इस प्रकार कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग, दोनों पार्टियों के शर्षस्थ नेताओं के व्यक्तिगत मतभेदों ने देश में साम्प्रदायकिता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया।

    पाकिस्तान की अवधारणा

    ब्रिटिश सरकार की ओर से लगातार दिए जा रहे प्रोत्साहनों ने मुसलमानों के मन में अपने लिए एक अलग देश की कल्पना ने जन्म लिया। ई.1933 में चौधरी रहमत अली नामक एक मुस्लिम विद्यार्थी ने लंदन में एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें कहा गया कि भारतीय मुसलमानों को अपना राज्य हिन्दुओं से अलग कर लेना चाहिए। भारत को अखण्ड रखने की बात अत्यंत हास्यास्पद और फूहड़ है। भारत के जिन उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों- पंजाब, काश्मीर, सिंध, सीमांत प्रदेश तथा ब्लूचिस्तान में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें अलग करके पाकिस्तान नामक देश बनाया जाना चाहिए। रहमत अली ने पाकिस्तान शब्द के दो अर्थ बताये- पहले अर्थ के अनुसार पाकिस्तान माने पवित्र भूमि। दूसरे अर्थ के अनुसार पाकिस्तान शब्द का निर्माण उन प्रांतों के नामों की अँग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षरों से हुआ था जो इसमें शामिल होने चाहिए- पंजाब, अफगानिया (उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत), काश्मीर तथा सिंध। शेष शब्द बलूचिस्तान शब्द के अंतिम भाग में से लिए गए। बाद में देश के पूर्वी भाग में स्थित असम तथा बंगाल और दक्षिण में स्थित हैदराबाद तथा मलाबार को भी पाकिस्तान में शामिल करने की योजना बनायी गई। इस योजना के अनुसार संपूर्ण गैर मुस्लिम राष्ट्र को मुस्लिम देश द्वारा घेरा जाना था तथा गैर मुस्लिम राष्ट्र के बीच बीच में मुस्लिम पॉकेट भी पाकिस्तान का हिस्सा होना था। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इस नाम का विरोध करते हुए 15 अप्रेल 1946 को एक वक्तव्य प्रकाशित करवाया कि यह नाम मेरी तबियत के खिलाफ है। इसका आशय है कि दुनिया का कुछ हिस्सा पाक है और बाकी नापाक। प्रस्ताव के अंत में कहा गया था- 'हिन्दू राष्ट्रीयता की सलीब पर हम खुदकुशी नहीं करेंगे।'

    कैंब्रिज विश्वविद्यालय के भारतीय मुस्लिम विद्यार्थियों ने रहमत अली का साथ दिया। उन्होंने एक इश्तहार प्रकाशित किया जिसमें पाकिस्तान की मांग के बारे में 'नाउ ऑर नेवर' का उल्लेख करते हुए कहा गया- 'भारत किसी एक अकेले राष्ट्र का नाम नहीं है। न ही एक अकेले राष्ट्र का घर है। वास्तव में यह इतिहास में पहली बार ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित एक राष्ट्र की उपाधि है..... मुसलमानों की जीवन शैली भारत के अन्य लोगों से भिन्न है। इसलिए उनका अपना राष्ट्र होना चाहिए। हमारे राष्ट्रीय रिवाज और कैलेंडर अलग हैं। यहाँ तक कि हमारा खान-पान तथा परिधान भी भिन्न है।'

    द्वितीय विश्व युद्ध में कांग्रेस का असहयोग एवं मुस्लिम लीग का सहयोग

    3 सितम्बर 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। ब्रिटिश सरकार ने प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर भारतीयों से अपील की कि वे साम्राज्य की रक्षा करें। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को विश्वास में लिए बिना ही भारत को युद्ध में सम्मिलित करने की घोषणा कर दी। कांग्रेस ने इसकी तीव्र आलोचना की और कहा कि जब तक भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक उसे युद्ध में नहीं झौंका जा सकता। इसके विपरीत, मुस्लिम लीग ने युद्ध में अँग्रेजों की सहायता का आश्वासन दिया तथा बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक मोर्चों पर लड़ने गए। 11 सितम्बर 1939 को वायसराय ने दोनों सदनों में घोषणा की कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण भारत संघ के निर्माण की योजना स्थगित की जा रही है। मुस्लिम लीग ने इस घोषणा का स्वागत किया क्योंकि उसे प्रस्तावित संघ में हिन्दू प्रभुत्व स्थापित होने की आशंका थी। इस प्रकार युद्ध नीति और भारत के संवैधानिक भविष्य को लेकर कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच खाई बहुत चौड़ी हो गई किंतु मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार एक दूसरे के और निकट आ गए। मुस्लिम लीग ने अवसर का लाभ उठाते हुए, ब्रिटिश सरकार से मांग की कि ई.1935 के सम्पूर्ण संविधान पर पुनर्विचार किया जाए क्योंकि प्रान्तीय स्वायत्तता ने हिन्दू आधिपत्य की आशंका को सत्य सिद्ध कर दिया है।

    मुक्ति दिवस का आयोजन

    17 अक्टूबर 1939 को वायसराय ने एक वक्तव्य दिया जिसमें युद्ध के बाद भारत को उपनिवेश का दर्जा (डोमिनियन स्टेटस) देने का आश्वासन दिया। कांग्रेस ने इस घोषणा को अपर्याप्त बताया क्योंकि कांग्रेस 1930 से पूर्ण स्वराज्य की मांग कर रही थी। सरकार की नीति के विरोध में प्रान्तों के कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्यागपत्र दे दिए। मुस्लिम लीग ने कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों के त्यागपत्र का स्वागत करने के लिए 22 दिसम्बर 1939 को मुक्ति दिवस मनाया। वायसराय ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं से केन्द्रीय और प्रान्तीय प्रशासन में सहयोग देने के सम्बन्ध में बातचीत जारी रखी परन्तु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। वस्तुतः ब्रिटिश सरकार भारत के संवैधानिक भविष्य के बारे में ऐसे किसी प्रस्ताव को प्रोत्साहन देने के पक्ष में नहीं थी जिससे कांग्रेस और लीग की दूरी घटती हो। वह, दोनों के मध्य साम्प्रदायिक विद्वेष को बढ़ाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती थी।

    इस्लाम की मिल्लत और भारतीयता का खतरा

    ई.1940 में रहमत अली ने 'इस्लाम की मिल्लत और भारतीयता का खतरा' शीर्षक से एक इश्तहार प्रकाशित किया जिसमें उसने कहा कि मुसलमानों को भारतीयता से बचना चाहिए और अलग राष्ट्र के निर्माण का प्रयास करना चाहिए। रहमत अली ने इण्डिया शब्द के अँग्रेजी अक्षरों में हेरफेर करके दीनिया शब्द का निर्माण किया जिसका अर्थ होता था- 'एक ऐसा उपमहाद्वीप जो इस्लाम में धर्मांतरित होने की प्रतीक्षा कर रहा था।' रहमत अली ने बंगाल एवं आसाम का पुनः नामकरण करते हुए उसे बंग ए इस्लाम कहा जिसका अर्थ था 'इस्लाम का बंगुश।' बंगुश, बंगाल का एक मुगल सामंत था। उसने बिहार का नाम फरूखिस्तान, उत्तर प्रदेश का नाम हैदरिस्तान, राजपूताना का नाम मोइनिस्तान तथा हैदराबाद का नाम ओसमानिस्तान रखा। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के नाम पर मोइनिस्तान की कल्पना की गई। रहमत अली की परिकल्पना इतनी सफल हुई कि दिसम्बर 1940 में अपने लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने अलग देश बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया। इस प्रस्ताव में स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना की घोषणा की गई तथा पाकिस्तान शब्द का कहीं प्रयोग नहीं किया गया किंतु इसे पाकिस्तान प्रस्ताव ही कहा जाता है।

    मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन एवं पाकिस्तान प्रस्ताव

    24 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग द्वारा लाहौर में आयोजित अधिवेशन में स्वतन्त्र मुस्लिम राज्य की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि-

    (1.) मुस्लिम लीग का यह अधिवेशन अखिल भारतीय कार्यकारिणी समिति द्वारा पारित पूर्व प्रस्तावों- 27 अगस्त, 12 सितम्बर तथा 22 अक्टूबर 1939 और 3 फरवरी 1940 का संकेत करते हुए, भारत सरकार 1935 के एक्ट की संघ योजना को अस्वीकार करता है।

    (2.) अलिख भारतीय मुस्लिम लीग ने इस इस अधिवेशन में यह विचार किया है कि मुसलमानों को तब तक कोई संवैधानिक योजना स्वीकार नहीं होगी जब तक उसे इन मूल सिद्धांतों पर तैयार न किया गया हो- जिन क्षेत्रों में मुसलमान बहुमत में हैं, जैसे भारत के उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी अंचलों में, उन्हें संगठित करके आठ स्वतंत्र देशों के रूप में संगठित किया जाना चाहिए जिसमें घटक इकाइयाँ स्वतंत्र और प्रभुत्व संपन्न होंगी।

    (3.) प्रस्तावित नए देश में मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों को उनके हितों की सुरक्षा के लिए प्रभावशाली संवैधानिक सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था जिनसे उनके धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं प्रशासनिक अधिकार सुरक्षित रहें।

    माना जाता है कि इस प्रस्ताव को पारित करवाने में ब्रिटिश अधिकारियों का हाथ था। 2 सितम्बर 1940 को मुस्लिम लीग की कार्यकारिणी समिति ने पुनः एक प्रस्ताव पारित किया गया- 'समिति यह विश्वास करती है कि भारत के भावी संविधान की जटिल समस्या का हल केवल भारत विभाजन है।'

    हिन्दू-मुस्लिम एकता की कर्बला

    गणेशप्रसाद बरनवाल ने लिखा है- 'लाहौर का पाकिस्तान प्रस्ताव, गांधीजी की हिन्दू मुस्लिम एकता मिशन की कर्बला है। 15 जून 1940 के हरिजन में गांधीजी की एकता संकल्पना का ग्लेशियर पिघलता दिखाई पड़ता है जिसमें उन्होंने लिखा है- .....द मुस्लिम लीग इज फ्रैंकली कम्यूनल एंड वांट्स टू डिवाइड इण्डिया इन टू पार्टस्।'

    मुसलमानों की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि

    ई.1881 में भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या 75.1 प्रतिशत, मुसलमानों की 19.97 प्रतिशत तथा ईसाइयों की 0.79 प्रतिशत थी। ई.1881 से ई.1941 के बीच हुई जनगणनाओं में हिन्दुओं की संख्या लगातार गिरती गई तथा मुसलमानों और ईसाइयों की जनसंख्या में वृद्धि हुई। जनसंख्या की बुनावट में यह परिवर्तन मुसलामनों द्वारा भारत को दारुल हरब से दारुल इस्लाम बनाने की जेहादी मुहिम का परिणाम था जिसके तीन हिस्से थे-

    (1.) मोपला, बंगाल, हैदराबाद तथा अन्य हिस्सों में हिन्दुओं का बड़ी संख्या में संहार।

    (2.) मुसलमानों द्वारा अधिक बच्चे पैदा किया जाना।

    (3.) मुस्लिम बहुल इलाकों एवं मुस्लिम शासित देशी राज्यों में हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनने के लिए बाध्य करना।

    (4.) ईसाइयों द्वारा भी देश में हिन्दुओं को ईसाई बनाने की मुहिम चल रही थी जिससे ईसाइयों के प्रतिशत में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी। गरीब एवं दलित हिन्दू तथा आदिवासी समुदाय ईसाई मिशनरियों द्वारा दिए जा रहे धन के लालच में धर्म परिवर्तन कर रहे थे।

    ई.1881 से 1941 के बीच हुई जनगणनाओं के परिणामों का सारांश इस प्रकार है-

    क्र. सं.    वर्ष         हिन्दू                  मुसलमान              ईसाई

    1.         1881      75.1 प्रतिशत      19.97 प्रतिशत       0.79 प्रतिशत

    2.         1891      74.2 प्रतिशत      20.41 प्रतिशत       0.77 प्रतिशत

    3.         1901      72.2 प्रतिशत      22.39 प्रतिशत       1.29 प्रतिशत

    4.         1921      70.06 प्रतिशत    23.21 प्रतिशत       1.77 प्रतिशत

    5.         1941      69.50 प्रतिशत    24.28 प्रतिशत       2.01 प्रतिशत

    मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव का विरोध

    मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पारित पाकिस्तान प्रस्ताव का देश के समस्त राष्ट्रवादी संगठनों ने विरोध किया। इनमें लिबरल फेडरेशन, हिन्दू महासभा, क्रिश्चियन एसोसिएशन, कांग्रेस एवं खुदाई खिदमतगार आदि संगठन प्रमुख थे। हिन्दू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर ने 4 अप्रेल 1940 को हिन्दू आउटलुक में वक्तव्य दिया कि कांग्रेस की 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' का विगत बीस वर्षों का प्रयास व्यर्थ निकला और लीग द्वारा भारत विभाजन की मांग करके अब एकता की संभावनाओं को दूसरे दरवाजे पर ले जाकर खड़ा कर दिया है।

    हिन्दू लीग का गठन

    जिस प्रकार ई.1933 में ब्रिटिश सरकार के साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने के लिए मदनमोहन मालवीय ने कांग्रेस नेशनलिस्ट दल नामक नई पार्टी का गठन किया, उसी प्रकार ई.1940 में मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्रस्ताव का विरोध करने के लिए बापू एम. एस. अणे तथा उनके साथियों ने हिन्दू लीग का गठन किया। इस संगठन को हिन्दू महासभा ने पूरा सहयोग एवं समर्थन दिया। वीर सावरकर ने इस नए संगठन को आशीर्वाद दिया। कोई भी व्यक्ति इन दोनों संगठनों की सदस्यता ले सकता था। हिन्दू लीग का पहला अधिवेशन 27 जुलाई 1940 को लखनऊ में सम्पन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता बापू एम. एस. अणे ने की। बी. सी. चटर्जी ने इस अधिवेशन में पाकिस्तान प्रस्ताव के विरोध का प्रस्ताव किया। हिन्दू लीग द्वारा सर्वमत से इसे राष्ट्र विरोधी योजना बताया। हिन्दू लीग लोगों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल सकी। इसलिए वह हिन्दू महासभा की सहयोगी पार्टी बनकर रह गई। आगे चलकर इसका नाम नेशनल लीग कर दिया गया।

    हिन्दू महासभा द्वारा सेनाओं में समानुपातिक हिन्दू प्रतिनिधित्व की मांग

    28 से 30 दिसम्बर 1940 को हिन्दू महासभा का 22वां अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता वीर सावरकर ने की। इस अधिवेशन में मुख्यतः निम्नलिखित बातें कहीं गईं-

    (1.) हिन्दू महासभा उस निर्णय को अमान्य ठहराती है जिसके अनुसार कोई भी संवैधानिक निर्णय मुस्लिम अल्पसंख्यक सहमति के बिना नहीं लिया जाएगा।

    (2.) सरकार द्वारा थल सेना, जल सेना एवं वायु सेना में हिन्दुओं को जनसंख्या के अनुसार अधिक संख्या में नियुक्त किया जाए।

    (3.) भारतीय युवकों के लिए सैनिक शिक्षा अनिवार्य की जाए। स्कूलों, कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में ही उन्हें यह शिक्षा दी जाए। उन्हें आवश्यक शस्त्र भी प्रदान किए जाएं।

    (4.) मुस्लिम लीग द्वारा पारित पास्तिान प्रस्ताव पर ब्रिटिश सरकार द्वारा चुप्पी साध लिए जाने की प्रवृत्ति पर हिन्दू महासभा द्वारा निंदा की गई।

    हिन्दुओं का हिन्दू महासभा की तरफ आकर्षण

    इस अधिवेशन में यह स्पष्ट किया गया कि लगभग पांच साल पहले हिन्दू महासभा के सदस्यों की संख्या हजारों में थी किंतु अब लाखों में है। इससे स्पष्ट है कि देश में बढ़ रही मुस्लिम साम्प्रदायिक समस्या से भारत का आम हिन्दू चिंतित होकर हिन्दू महासभा की तरफ आकर्षित हो रहा था। हिन्दू महासभा के सदस्यों की संख्या बंगाल एवं महाराष्ट्र में अधिक तेजी से बढ़ रही थी। कलकत्ता नगर निगम के चुनावों में हिन्दू महासभा ने कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी। इस कारण कांग्रेस पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी। देश के कई हिन्दू राजा-महाराजा भी हिन्दू महासभा के कार्यक्रमों से सहाुनभूति रखने लगे थे। इनमें बड़ौदा, त्रावणकोर, मैसूर और ग्वालियर के शासक प्रमुख थे।

    क्रिप्स प्रस्ताव से कांग्रेस और मुस्लिम लीग आमने-सामने

    द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भिक दो वर्षों में जब जापान के विरुद्ध मित्र राष्ट्रों की स्थिति कमजोर होती गई तो मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए सर स्टैफर्ड क्रिप्स को कुछ प्रस्तावों के साथ भारत भेजा। क्रिप्स प्रस्ताव के दो भाग थे-

    (1.) दूरगामी प्रस्ताव, जो युद्ध के बाद लागू किए जाने थे

    (2.) तात्कालिक प्रस्ताव, जो तुरन्त लागू किए जाने थे।

    दूरगामी प्रस्ताव में एक संविधान निर्मात्री सभा का गठन करने तथा उसके द्वारा भारतीय संघ का संविधान बनाने का प्रावधान था। मुस्लिम लीग को सन्तुष्ट करने के लिए इन प्रस्तावों में कहा गया कि यदि कोई प्रान्त भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं होना चाहेगा तो ऐसे प्रान्तों को अपना पृथक् संघ और संविधान बनाने का अधिकार होगा। तात्कालिक प्रस्ताव में वायसराय की कार्यकारिणी में युद्धमन्त्री के अधिकारों से सम्बन्धित विषय थे। कांग्रेस ने क्रिप्स प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनमें उत्तरदायी शासन स्थापित करने वाली कोई बात नहीं थी। यद्यपि क्रिप्स प्रस्ताव में अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की मांग स्वीकार कर ली गई थी तथापि लीग ने क्रिप्स प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया क्योंकि इसमें पाकिस्तान के निर्माण के सम्बन्ध में स्पष्ट घोषणा नहीं थी। यद्यपि कांग्रेस का एक वर्ग राजगोपालाचारी के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग की वास्तविकता को स्वीकार करने लगा था, तथापि 29 अप्रैल 1942 को भारतीय कांग्रेस कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित करके कहा कि किसी भी भारतीय भौगोलिक क्षेत्र को भारतीय संघ से अलग हो जाने की स्वतंत्रता देना, देश के लिए अहितकर होगा। इस प्रकार कांग्रेस द्वारा मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग को खुली चुनौती दी गई।

    भारत छोड़ो आन्दोलन पर मुस्लिम लीग की अलगाववादी राजनीति

    क्रिप्स प्रस्तावों की असफलता के बाद 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव पारित किया। इस पर सरकार ने कांग्रेसी नेताओं को बंदी बना लिया। कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी ने आन्दोलन को विद्रोह में बदल दिया। जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरम्भ किया तो जिन्ना ने कांग्रेस के खिलाफ असभ्य भाषा में भाषण दिए और मुसलमानों को इस आंदोलन का विरोध करने का आह्वान किया। मुस्लिम लीग प्रेस ने इस पूरे आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन से लड़ रहे कांग्रेसियों को गुण्डे शब्द से संबोधित किया। कांग्रेस नेताओं के विरुद्ध उतनी कठोर बातें ब्रिटिश प्रेस ने भी नहीं कीं जितनी मुस्लिम लीग प्रेस ने कहीं। 20 अगस्त को लीग की कार्यकारिणी द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया- 'कांग्रेस के इस आन्दोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को परेशान करना है जिससे वह हिन्दू कुलीनतन्त्र को शासन-भार सौंप दे और इस प्रकार वह मुसलमानों तथा अन्य भारतीय अल्पसंख्यक समुदाय को समय-समय पर दिए गए वचनों तथा नैतिक उत्तरदायित्वों को पूरा न कर सके। साथ ही मुसलमानों को भी कांग्रेस की शर्तों पर तथा आज्ञाओं के आगे झुकने के लिए विवश कर दे।'

    इस प्रस्ताव की आड़ में जिन्ना ने मुस्लिम लीग को और अधिक सशक्त बनाने का प्रयास किया। हर प्रान्तीय लीग को संगठित किया गया। केन्द्रीय और प्रान्तीय स्तर के लीगी नेताओं को छोटे शहरों एवं कस्बों में पाकिस्तान का संदेश पहुँचाने के लिए नियमित दौरे करने को कहा गया तथा साम्प्रदायिक समस्या को उसके चरम पर पहुंचा दिया।

    6 मई 1944 को वायसराय लॉर्ड वेवल ने गांधीजी को बीमारी के कारण जेल से छोड़ दिया। जेल से मुक्त होने के बाद गांधीजी ने साम्प्रदायिक समस्या के समाधान हेतु जिन्ना से मिलने का निश्चय किया। गांधीजी की योजना की मुख्य बात यह थी कि युद्ध के बाद उत्तर-पूर्व तथा उत्तर-पश्चिम में मुस्लिम बहुमत वाले प्रदेशों की सीमा निर्धारित करने के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाए। इन प्रदेशों में किसी व्यावहारिक मताधिकार के आधार पर यह तय करने के लिए जनमत लिया जाए कि ये प्रदेश भारत से अलग होना चाहते हैं या नहीं। यदि मुस्लिम बहुमत वाले क्षेत्र भारत से अलग होने का निर्णय करते हैं तो उनका राज्य अलग बन जाएगा। जिन्ना ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया। उसने अस्वीकृति के तीन कारण बताये-

    (1.) इस फार्मूले से मुसलमानों को अपूर्ण, अंगहीन तथा दीमक युक्त पाकिस्तान दिया गया है। जिन्ना सम्पूर्ण बंगाल, आसाम, सिन्ध, पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त और ब्लूचिस्तान को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था।

    (2.) प्रस्तावित जनमत-संग्रह में गैर-मुसलमानों को भी भाग लेने की अनुमति दी गई थी।

    (3.) प्रतिरक्षा, संचार और परिवहन के सम्बन्ध में संयुक्त व्यवस्था का प्रस्ताव था जिसे लीग मानने को तैयार नहीं थी।

    शिमला सम्मेलन की असफलता

    द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जून 1945 में लॉर्ड वेवल ने भारत के भावी प्रशासनिक पुनर्गठन की योजना पर वार्त्ता करने के लिए साम्प्रदायिक हितों से जुड़े प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन शिमाला में बुलाया। इसे शिमला सम्मेलन कहते हैं। जिन्ना और गांधीजी का मतभेद केवल मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के विषय में रहता था। देश में 10 करोड़ मुसमलान थे एवं 25 करोड़ हिन्दू व अन्य मतों के अनुयाई। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी थी जिसे विश्वास था कि वह 100 प्रतिशत हिन्दू, सिख एवं अन्य मतों के अनुयाइयों का तथा 90 प्रतिशत मुस्लिम मतानुयाइयों को नेतृत्व करती है और मुस्लिम लीग को देश के लगभग 10 प्रतिशत मुसलामनों का समर्थन प्राप्त है। जबकि मुस्लिम लीग मानती थी कि उसे देश के 90 प्रतिशत मुसलामनों का समर्थन प्राप्त था। जिन्ना कहता था कि मुस्लिम लीग ही एक मात्र संस्था है जो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है जबकि गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस हिन्दू और मुसलमान दोनों का प्रतिनिधित्व करती है। गांधीजी ने शिमला सम्मेलन में कांग्रेस की ओर से मौलाना अबुल कलाम आजाद को भी सम्मिलित करने का प्रयास किया। इस पर जिन्ना नाराज हो गया। उसने कहा कि सरकार में केवल चार मुस्लिम प्रतिनिधि होंगे और वे चारों प्रतिनिधि मुस्लिम लीग की ओर से होंगे। कांग्रेस को केवल हिन्दुओं को ही अपना प्रतिनिधि बनाने का अधिकार है। इस बिंदु पर इतनी टसल चली कि शिमला सम्मेलन विफल हो गया। इसके बाद वायसराय लॉर्ड वैवेल को भारतीय राजनीति में विफल माना जाने लगा। जिस जिन्ना को अपना मोहरा बनाकर लॉर्ड वैवेल भारत की राजनीति में साम्प्रदायिक रंग घोलता रहा था, वही जिन्ना, वैवेल की असफलता का सबसे बड़ा कारण बना।

    मुसलमानों पर कांग्रेस का प्रभाव समाप्त

    दिसम्बर 1945 में प्रान्तीय विधान सभाओं के चुनाव हुए जिनके परिणामों से स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस का मुसलमानों में कोई विशेष प्रभाव नहीं है और मुसलमानों का वास्तविक प्रतिनिधित्व मुस्लिम लीग करती है। ब्रिटिश भारत के 11 प्रान्तों में से 7 प्रान्तों में कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल बने, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में खुदाई खिदमतगारों की सरकार बनी जिनके नेता सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान थे। पंजाब में कांग्रेस तथा अकाली दल की मिली-जुली सरकार बनी। दो प्रांतों- बंगाल एवं सिन्ध में मुस्लिम लीग की सरकारें बनीं।

    कैबिनेट मिशन योजना

    15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की तथा 24 मार्च 1946 को भारतीय नेताओं से वार्ता करने के लिए कैबिनेट मिशन भारत आया। मिशन ने तीन महीने तक भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श किया। 16 मई 1946 को मिशन ने एक योजना घोषित की जिसके अनुसार भारत में संघीय शासन व्यवस्था लागू की जानी थी जिसमें ब्रिटिश भारत के समस्त प्रान्त तथा देशी रियासतें सम्मिलित होनी थीं। मिशन ने भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का गठन करने का प्रस्ताव किया जिसके कुल 389 सदस्यों में से 210 गैर-मुस्लिम और 78 मुस्लिम सदस्य रखे गए। शेष 101 स्थान देशी रियासतों के लिए सुरक्षित रखे गए। केबिनेट योजना का दूसरा महत्त्वपूर्ण अंश अन्तरिम सरकार की स्थापना का था। इसमें 14 सदस्य रखे गए जिनमें 5 कांग्रेस के सवर्ण हिन्दू सदस्य, 5 मुस्लिम लीग के सदस्य, 1 दलित वर्ग का सदस्य और 3 अन्य अल्प संख्यकों के सदस्य सम्मिलित होने थे। जुलाई 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान सभा के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस को भारी सफलता मिली। इस पर 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया। अगस्त 1946 में पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में देश में अंतरिम सरकार का गठन हुआ जिसमें बाद में मुस्लिम लीग भी 
    शामिल हो गई।


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