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  • अध्याय - 32 : राम जन्मभूमि के लिए हिन्दू संघर्ष

     07.09.2018
    अध्याय - 32 : राम जन्मभूमि के लिए हिन्दू संघर्ष

    अध्याय - 32


    राम जन्मभूमि के लिए हिन्दू संघर्ष

    अत्यंत प्राचीन काल से सूर्यवंशियों का सुप्रतिष्ठित राजवंश, ईक्ष्वाकु वंश के नाम से, भारत भूमि पर शासन तथा प्रजापालन करता आया था। महाराजा मनु ने अयोध्या नामक नगरी की स्थापना की जो सहस्रों वर्षों तक ईक्ष्वाकु राजाओं की सुप्रसिद्ध राजधानी रही। इसे अवध , कौशलपुर तथा साकेत भी कहा जाता था। ईक्ष्वाकु राजा, देवासुर संग्राम में देवताओं की ओर से लड़ने जाते थे। प्राचीन आर्य परम्परा के अनुसार एक बार इस वंश के राजा अनरण्य ने अपना राज्यपाट अपने पुत्र को देकर वानप्रस्थ ग्रहण किया। लंका के राजा रावण ने वानप्रस्थी राजा अनरण्य की हत्या करके इस वंश को समाप्त करने की कुचेष्टा की किंतु धर्मनिष्ठ एवं प्रजापालक ईक्ष्वाकु राजवंश वृद्धि को प्राप्त होता रहा। इसी वंश में दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए जिन्होंने गंगा को पृथ्वीलोक पर उतारा। भगीरथ के पौत्र रघु प्रतापी एवं यशस्वी राजा हुए जिनके नाम से यह वंश, रघुवंश कहलाया। रघुवंशी राजा, सत्य-संभाषण एवं वचन-पालन के लिए प्रसिद्ध हुए।

    इसी रघुवंश में ईक्ष्वाकु वंश के 64वें राजा भगवान श्रीराम का अवतार हुआ। उन्होंने अपने पूर्वज अनरण्य के हत्यारे एवं पापी रावण का वध करके धरती को पाप के बोझ से मुक्त करवाया। संघर्षमय जीवन, आजीवन लोकहित तथा दिव्य चरित्र के कारण उन्हें भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना गया। उनका यश सम्पूर्ण दक्षिण एशिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रसारित हो गया। इस पूरे क्षेत्र में श्रीराम-सीता-लक्ष्मण तथा उनके भक्त हनुमानजी के मंदिर बन गए। दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न द्वीपों में हजारों की संख्या में ये मंदिर आज भी पाए जाते हैं। यहाँ तक कि थाईलैण्ड में अयोध्या के नाम के नगर मिलते हैं।

    ब्रुनेई की राजधानी का नाम 'बंदर श्री भगवान' है, जहाँ लाल रंग के मुँह वाले देवता का मंदिर है तथा इसके बाहर उड़ने वाले बंदर का चित्र बना हुआ है। इण्डोनेशिया आदि देशों में चौराहों पर भी भगवान राम-सीता एवं हनुमानजी की विशालाकाय प्रतिमाएं स्थापित हैं। सुमात्रा एवं बाली आदि द्वीपों तथा वियतनाम एवं मलेशिया आदि देशों में सैंकड़ों हिन्दू मंदिर आज भी देखे जा सकते हैं।

    राम जन्मभूमि मंदिर

    यह स्वाभाविक ही था कि जब सम्पूर्ण दक्षिण-एशिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में भगवान राम के मंदिरों का निर्माण हुआ तो उनकी जन्मभूमि पर भी उनके भव्य मन्दिरों का निर्माण होता। अयोध्या में श्री राम के जीवन से जुड़े स्थलों पर तीन मंदिर बनाए गए। पहला मंदिर जन्मभूमि पर था जिसे 'जन्मस्थानम्' कहा जाता था। दूसरा मंदिर 'त्रेता के ठाकुर' कहलाता था जहाँ भगवान ने अपनी लौकिक देह का त्याग किया। तीसरा मंदिर 'स्वर्गद्वारम्' कहलाता था जहाँ भगवान की लौकिक देह का अंतिम संस्कार किया गया। निश्चय ही ये मंदिर श्री राम के लौकिक देहत्याग के तत्काल बाद बने होंगे। स्वाभाविक है कि समय के साथ ये मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गए होंगे। अब तक प्राप्त प्राचीनतम उल्लेख के अनुसार प्रथम शताब्दी ईस्वी में उज्जैन के राजा शाकारि विक्रमादित्य ने अयोध्या की यात्रा की तथा रामायण में वर्णित स्थान पर पहले से ही स्थित मंदिर का भव्य नवनिर्माण करवाया। जब पांचवी शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में चीनी यात्री फाह्यान अयोध्या आया तो उसने यहाँ कुछ बड़े बौद्ध मंदिरों को देखा। उसने किसी हिन्दू मंदिर का उल्लेख नहीं किया है। इससे प्रतीत होता है कि या तो इस काल तक बौद्धों ने हिन्दुओं के प्राचीन मंदिरों को तोड़ डाला था या फिर फाह्यान की दृष्टि में राम जन्मभूमि मंदिर उल्लेखनीय नहीं था।

    सातवीं शताब्दी ईस्वी में जब ह्वेसांग अयोध्या आया, तब तक अयोध्या में बड़ी संख्या में बौद्ध एवं जैन मंदिर बन चुके थे। ऑस्ट्रिया के एक पादरी फादर टाइफैन्थेलर ने सत्रहवीं शताब्दी में अयोध्या की यात्रा की तथा लगभग 50 पृष्ठों में अयोध्या यात्रा का वर्णन किया। इस वर्णन का फ्रैंच अनुवाद ई.1786 में बर्लिन से प्रकाशित हुआ। उसने लिखा- 'अयोध्या के रामकोट मौहल्ले में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है जिसमें काले रंग की कसौटी के 14 स्तम्भ लगे हुए हैं। इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों सहित जन्म लिया। जन्मभूमि पर बने मंदिर को बाबर ने तुड़वाया। आज भी हिन्दू इस स्थान की परिक्रमा करते हैं और साष्टांग दण्डवत करते हैं।' ई.1889-91 में अलोइज अंटोन नामक इंग्लिश पुरातत्वविद् की देख-रेख में अयोध्या का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया गया जिसमें उसने अयोध्या के निकट तीन टीले देखे जिन्हें मणिपर्वत, कुबेर पर्वत तथा सग्रीव पर्वत कहा जाता था। ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने माना है कि इन टीलों के नीचे उन्हीं बड़े बौद्ध मठों के अवशेष हैं जिनका उल्लेख ह्वेसांग ने किया था। स्वतंत्रता के पश्चात् अयोध्या नगर में हुई खुदाइयों में अयोध्या में मानव सभ्यता को ईसा से 1,700 वर्ष अर्थात् आज से 3,700 वर्ष पूर्व पुरानी माना गया। इसके पूर्व की सभ्यता नष्ट हो गई होगी।

    राम जन्मभूमि मंदिरों का विध्वंस

    खुरासान से आए मुगल आक्रांता बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने ई.1528 में अयोध्या का श्रीराम-जन्मभूमि मंदिर तोड़ने के उद्देश्य से अयोध्या पर आक्रमण किया। जब भाटी नरेश महताबसिंह तथा हँसवर नरेश रणविजयसिंह को मीरबाकी के निश्चय का पता चला तो वे मीरबाकी का मार्ग रोकने के लिए उससे पहले अयोध्या पहुंच गए। उनका नेतृत्व हँसवर के राजगुरु देवीनाथ पांडे ने किया। सर्वप्रथम राजगुरु ने ही अपनी सेना के साथ मीर बाकी पर आक्रमण किया। वह स्वयं भी तलवार हाथ में लेकर मीरबाकी के सैनिकों पर टूट पड़ा। मीरबाकी ने छिपकर राजगुरु को गोली मारी। प्राणों की बलि देने से पहले राजगुरु मीर बाकी के 700 सैनिकों को मौत के घाट उतार चुका था। इस प्रकार अयोध्या के लिए पहला प्राणोत्सर्ग एक ब्राह्मण ने किया। राजगुरु के बलिदान के बाद महाराजा महताबसिंह तथा महाराणा रणविजयसिंह ने मीर बाकी की सेना को गाजर-मूली की तरह काटना आरम्भ किया। हिन्दू सैनिक तलवार लेकर लड़ रहे थे जबकि मीर बाकी ने तोपों को सहारा लिया।

    इस युद्ध में 1,74,000 हिन्दू सैनिकों ने प्राणों की आहुति दी। युद्ध में विजय प्राप्त करके मीर बाकी ने राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़ डाला तथा उसके स्थान पर एक मस्जिदनुमा ढांचा बना दिया जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा। इस मस्जिद में राम जन्मभूमि मंदिर के भग्नावशेषों को काम में लिया गया जिसमें काले रंग के कसौटी पत्थर के चौदह स्तम्भ भी सम्मिलित थे जिन पर हिन्दुओं के धार्मिक चिह्न उत्कीर्ण थे। मीर बाकी ने इस ढांचे के सामने एक शिलालेख अंकित करवाया जिसमें इस स्थल का 'फरिश्ते का जन्म स्थान' के रूप में उल्लेख किया। कुछ इतिहासकारों ने सिद्ध करने की चेष्टा की है कि बाबर ने या मीर बाकी ने इस स्थान पर कोई मस्जिद नहीं बनवाई। उनके अनुसार यह मस्जिद औरंगजेब के समय में बनी तथा इसे बाबरी मस्जिद कहा गया किंतु औरंगजेब के समकालीन इतिहासकारों ने अयोध्या का राम जन्मभूमि मंदिर तोड़े जाने और उसके स्थान पर मस्जिद बनवाने का उल्लेख नहीं किया है। अतः मीर बाकी द्वारा मंदिर तोड़े जाने एवं मस्जिद जैसा ढांचा बनाए जाने पर ही अधिक विश्वास किया जाता है।

    बाबर से पहले भी मुस्लिम आक्रांताओं ने सोमनाथ के शिव मंदिर, नगरकोट के बज्रेश्वरी शक्तिपीठ, काशी विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर की भी यही स्थिति की थी। वहाँ भी मस्जिदें बनीं तथा उनके निकट हिन्दुओं ने अपने छोटे मंदिर बना लिए। अवसर पाकर हिन्दुओं ने उनमें से कुछ मस्जिदें हटाकर पुनः मंदिर बनवाए। 17वीं शताब्दी ईस्वी में औरंगजेब ने अयोध्या में श्रीराम के जीवन प्रसंगों से जुड़े शेष दो मंदिरों- 'स्वर्गद्वारम्' तथा 'त्रेता के ठाकुर' को तोड़कर मस्जिदें बनवाईं। कन्नौज के राजा जयचंद्र ने ई.1191 में अयोध्या में विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया। उसका भग्न शिलालेख आज भी फैजाबाद संग्रहालय में रखा है। औरंगजेब ने इस मंदिर को भी तोड़ डाला।


    राम जन्मभूमि प्राप्ति के लिए संघर्ष

    हिन्दुओं द्वारा मांगा जा रहा 'राम जन्मभूमि परिसर' 130 फुट लम्बा तथा 90 फुट चौड़ा है। मीर बाकी ने इस परिसर में जो मस्जिद बनवाई उसमें किसी तरह की मीनार तथा नमाज पढ़ने से पहले की जाने वाली वजू के लिए कोई जलाशय नहीं बनवाए। यह एक आधा-अधूरा सा ढांचा था जिसमें तीन गुम्बद ही प्रमुख रचना थे। जब मीर बाकी अयोध्या से चला गया तो हिन्दुओं ने इस परिसर के भीतर ही मस्जिद के निकट एक नया किंतु बहुत छोटा मंदिर बना लिया। अकबर के शासन काल में राम जन्मभूमि मंदिर में हिन्दू पूजा करते थे। राम जन्मभूमि पर अधिकार को लेकर ई.1528 से ई.1949 तक हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अनगिनत बार रक्त-रंजित संघर्ष हुए जिनमें से 76 संघर्षों के उल्लेख उपलब्ध हैं। हिन्दू पक्ष श्री राम जन्मभूमि को प्राप्त करके भव्य मंदिर बनाना चाहता है किंतु मुस्लिम पक्ष राम जन्मभूमि हिन्दुओं को सौंपने के लिए तैयार नहीं हुआ।

    अंग्रेजों के शासन काल में मंदिर के लिए संघर्ष

    ई.1853 में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच राम जन्मभूमि को लेकर बड़ा संघर्ष हुआ। ई.1859 में अंग्रेजों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी तथा मुसलमानों को नमाज पढ़ने के लिए परिसर का भीतरी भाग एवं हिन्दुओं को पूजा के लिए बाहरी भाग उपयोग में लाने की छूट प्रदान की। ई.1934 में अयोध्या की प्रजा ने एक बार पुनः बड़ा प्रयास किया तथा बाबरी ढांचे को काफी क्षति पहुंचाई तथा मामला कोर्ट में पहुंचा। 30 मार्च 1946 को फैजाबाद ट्रायल कोर्ट ने निर्णय दिया कि यह मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति है।

    स्वतंत्र भारत में मंदिरों को पुनः प्राप्त करने के लिए हिन्दू प्रयास

    भारत की आजादी के पश्चात् हिन्दुओं ने अयोध्या, काशी, सोमनाथ तथा मथुरा के प्रसिद्ध एवं प्रमुख मंदिरों को पुनः प्राप्त करने एवं उनका पुनर्निर्माण करने के प्रयास आरम्भ किए। स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल, के. एम. मुंशी एवं काका साहेब गाडगिल के प्रयासों से सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण कर लिया गया। चूंकि जवाहरलाल नेहरू स्वयं को दुर्घटनावश हिन्दू मानते थे इसलिए उन्होंने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का प्रबल विरोध किया किंतु पटेल तथा मुंशी की दृढ़ता के कारण सोमनाथ मंदिर बन ही गया। जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के लिए सरकारी खजाने से राशि देने से मना कर दिया इसलिए मंदिर का निर्माण प्रजा के धन से किया गया। हिन्दू चाहते थे कि सोमनाथ की ही तरह अयोध्या, काशी विश्वनाथ एवं मथुरा के मंदिरों का भी पुनर्निर्माण हो तथा वहाँ से मस्जिदें हटें किंतु 15 दिसम्बर 1950 को सरदार पटेल की मृत्यु हो जाने के कारण जवाहरलाल नेहरू का पक्ष प्रबल हो गया और इन मंदिरों का मामला उलझ गया।

    जब भारत का संविधान लागू हुआ था तो संविधान की मूल प्रति में तीसरे नम्बर पर प्रभु श्रीराम, जगज्जननी जानकी तथा शेषावतार लक्ष्मण के लंका विजय के पश्चात् पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या लौटने के प्रसंग का चित्र भी छापा गया था। भारतीय देवी-देवताओं के अन्य चित्र भी छापे गए थे। आगे चलकर जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी ने इन चित्रों को संविधान से हटवा दिया तथा भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित कर दिया। समाजवादियों तथा वामपंथियों ने संविधान की इस स्थिति का लाभ उठाकर देश को बहुत नुक्सान पहुंचाया है।

    राम लला का पुनः प्राकट्य

    22 दिसम्बर 1949 की रात्रि में लगभग तीन बजे अचानक बाबरी ढांचे में भगवान का प्राकट्य हुआ और प्रातःकाल विद्युत गति से यह समाचार देश भर में फैल गया। राम जन्मभूमि में राम लला की प्रतिमा स्थापित करने के बाद सैंकड़ों हिन्दू जन्मस्थली के समक्ष अखण्ड कीर्तन करने बैठ गए जो 6 दिसम्बर 1992 तक उसी स्थान पर होता रहा। हिन्दुओं का मानना है कि यह दैवीय चमत्कार था जबकि मुसलमानों का मानना है कि मस्जिद को मंदिर में बदलने की यह योजना स्थानीय प्रशासकों की सहायता से कार्यान्वित की गई थी। अगली प्रातः अयोध्या पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी ने एक 'पुलिस-प्राथमिकी' लिखी जिसमें अभिराम दास, राम शकल दास और सुदर्शन दास नामक तीन व्यक्तियों को नामजद करते हुए 50-60 अज्ञात लोगों के विरुद्ध दंगा भड़काने, अतिक्रमण करने और एक धर्मस्थल को अपवित्र करने का मामला दर्ज किया। 'पुलिस-प्राथमिकी' में लिखा गया कि- '50-60 लोगों का एक समूह बाबरी मस्जिद परिसर के ताले को तोड़कर, दीवारों और सीढ़ियों को फांदकर अंदर घुस आया और श्रीभगवान की प्रतिमा वहाँ स्थापित कर दी। उन्होंने मस्जिद की भीतरी और बाहरी दीवारों पर पीले और केसरिया रंग से सीताजी और रामजी आदि के चित्र बना दिए ...... मस्जिद में घुसपैठ करने वालों ने मस्जिद को 'नापाक' किया है।'

    मस्जिद में राम लला की मूर्ति विराजमान करने के पीछे फैजाबाद के तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह का हाथ माना जाता है जो 'दृढ़ हिंदूवादी' माने जाते थे। वे शाकाहारी होने के साथ-साथ अपने कॉलेज के समय से ही रामभक्त के रूप में प्रसिद्ध थे। गुरुदत्तसिंह के वंशजों के अनुसार फैजाबाद के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट के. के. नायर, पुलिस अधीक्षक कृपाल सिंह और जिला जज ठाकुर बीरसिंह भी प्रच्छन्न रूप से इस कार्य में सम्मिलित थे। उन पर आरोप लगाया जाता है कि जिस दिन यह घटना हुई उस दिन के. के. नायर अवकाश पर होते हुए भी घटना स्थल पर प्रातः चार बजे पहुंच गए जबकि उन्होंने अपने उच्चस्थ अधिकारियों को इस घटना की सूचना प्रातः साढ़े दस बजे दी। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को सूचित किया कि- 'बाबरी मस्जिद में हिंदू धर्म के कुछ लोग रात के अंधेरे में घुस आए और वहाँ भगवान की स्थापना की। जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक और पुलिस के जवान मौके पर पहुंच चुके हैं और स्थिति नियंत्रण में है। पुलिस पिकेट के 15 जवान रात को ड्यूटी पर थे, उन्होंने भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।'

    जिला मजिस्ट्रेट के. के. नायर ने घटना स्थल पर पहुंचने के पांच घण्टे बाद प्रातः साढ़े दस बजे संयुक्त प्रांत (यू. पी., अब उत्तर प्रदेश) के मुख्यमंत्री गोबिंद बल्लभ पंत को रेडियो संदेश पर इस घटना की सूचना दी। उन्होंने न तो मस्जिद खाली कराने का प्रयास किया और न राम लला की मूर्ति को हटाया। सेवानिवृत्ति के बाद में के. के. नायर जनसंघ में सम्मिलित हो गए और चुनाव जीतकर सांसद भी बने। 26 दिसंबर 1949 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यू. पी. के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को टेलिग्राम भेजकर नाराजगी व्यक्त करते हुए लिखा- 'वहाँ एक बुरा उदाहरण स्थापित किया जा रहा है जिसके भयानक परिणाम होंगे।' 5 फरवरी 1950 को नेहरू ने पंत को एक और चिट्ठी लिखी तथा उनसे पूछा कि क्या उन्हें (नेहरू को) अयोध्या आना चाहिए? पंत ने इस पत्र का क्या प्रत्युत्तर दिया, इसके सम्बन्ध में तथ्य प्राप्त नहीं हैं किंतु इतिहास गवाह है कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस घटना के बाद कभी भी अयोध्या नहीं गए।

    बाबरी मस्जिद में राम लला के प्राकट्य के पश्चात् अयोध्या के एक तुनक-मिजाज साधु अभिराम दास, 'उद्धारक बाबा' के नाम से प्रसिद्ध हो गए। इससे अनुमान लगाया जाता है कि साधु अभिराम दास ने ही इस घटनाक्रम में मुख्य भूमिका का निर्वहन किया। स्थानीय प्रशासन और मीडिया द्वारा इसे एक स्थानीय सांप्रदायिक घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस घटना के बाद से, अंग्रेजों द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया जिसके अंतर्गत मस्जिद के अंदर मुस्लिमों के लिए नमाज पढ़ने और मस्जिद के बाहर हिंदुओं के लिए पूजा की व्यवस्था की गई थी। सरकार ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस स्थल को ताला लगा दिया। अब पुजारी प्रति दिन प्रातः एवं सायं काल में भगवान राम लला की पूजा करने, भोग लगाने, शयन एवं जागरण आरती करने के लिए भीतर जाता था। शेष जनता के लिए रामजन्मभूमि परिसर को धारा 145 के अंतर्गत बंद कर दिया गया। बाबरी मस्जिद से बाहर कर दिए जाने के कारण मुसलमान इस मामले को न्यायलय में ले गए किंतु सिविल मामलों की सुनवाई में आदालत ने राम लला सहित अन्य मूर्तियां हटाए जाने या पूजापाठ में किसी तरह की रुकावट उत्पन्न करने से मना कर दिया। पुजारी परिसर के भीतर जाकर एवं हिन्दू प्रजा ताले के बाहर रहकर राम लला की पूजा करती रही।

    भाईजी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार के प्रयास

    जब हनुमान प्रसाद पोद्दारजी ने राम लला के प्राकट्य का समाचार सुना तो वे गोरखपुर से अयोध्या आए। उन्होंने मंदिर में होने वाली पूजा-अर्चना, अखण्ड कीर्तन तथा न्यायालय सम्बन्धी व्यय उपलब्ध कराने का कार्य अपने ऊपर ले लिया। उन्होंने मुस्लिम पक्ष के लोगों से बात करके राम जन्मभूमि पर अपना हठ छोड़ने का भी आग्रह किया किंतु मुस्लिम पक्ष ने उनका आग्रह स्वीकार नहीं किया। इस पर पोद्दारजी ने देश भर के सेठों को चिट्ठियां लिखकर उनसे अनुरोध किया कि भविष्य में राम जन्मभूमि पर बनने वाले भव्य मंदिर के लिए धन उपलब्ध कराएं। इसके बाद से राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए धन की कोई कमी नहीं रह गई।

    भक्त और भगवान दोनों न्यायालय में

    जनवरी 1950 में गोपालसिंह विशारद नामक एक व्यक्ति ने सिविल जज फैजाबाद के समक्ष वाद प्रस्तुत किया कि वादी का भगवान के दर्शन एवं पूजन का अधिकार सुरक्षित रखा जाए, इसमें कोई बाधा अथवा विवाद उत्पन्न न करे। साथ ही ऐसी निषेधाज्ञा जारी की जाए जिससे भगवान को कोई उनके वर्तमान स्थान से हटा न सके। उसी वर्ष परमहंस रामचंद्र दास ने भी इसी भावना का वाद प्रस्तुत किया जिसे बाद में वापस ले लिया गया। फैजाबाद की निचली अदालत ने गोपालसिंह के पक्ष में एक अंतरिम ओदश दिया तथा इस व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए एक रिसीवर नियुक्त कर दिया। अप्रेल 1955 में इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने इस आदेश की पुष्टि कर दी। ई.1959 में रामानंद सम्प्रदाय के निर्मोही अखाड़ा द्वारा वाद प्रस्तुत करके मांग की गई कि रिसीवर को हटाकर जन्म स्थान मंदिर की पूजा व्यवस्था का अधिकार निर्मोही अखाड़ा को दिया जाए। दिसम्बर 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने वाद दायर किया कि भगवान के प्राकट्य स्थल को मस्जिद घोषित किया जाए, पूजन सामग्री हटाई जाए, परिसर का कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाए तथा राम जन्मभूमि के चारों ओर की भूमि को कब्रिस्तान घोषित किया जाए।

    ई.1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवकीनन्दन अग्रवाल ने न्यायालय में स्वयं रामलला विराजमान तथा राम जन्मभूमि को वादी बनाते हुए एक और वाद प्रस्तुत किया जिसे न्यायालय द्वारा स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार भक्तों के साथ-साथ भगवान भी न्यायालय में पक्षकार बन गए। ये समस्त मामले एक ही विषय से सम्बद्ध थे इसलिए न्यायालय ने सभी को एक साथ जोड़ने तथा एक साथ सुनवाई करने के निर्देश जारी किए और सभी वाद जिला आदालत से उठाकर उच्च न्यायालय की पीठ को दे दिए। इन वादों की सुनवाई के लिए दो हिन्दू और एक मुस्लिम न्यायाधीश की पूर्ण पीठ बनाई गई।

    विश्व हिन्दू परिषद का रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन

    ई.1984 में विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को मुक्त कराने और वहाँ राम मंदिर का निर्माण कराने के लिए एक समिति का गठन किया गया। ई.1986 में फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं द्वारा पूजा करने के लिए खोलने का आदेश दिया। मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की। विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान और तेज कर दिया। विहिप के अनुरोध पर अहमदाबाद के प्रसिद्ध मंदिर निर्माण विशेषज्ञ सी. बी. सोमपुरा ने भावी मंदिर का प्रारूप तैयार किया। ई.1989 में प्रयाग के कुम्भ मेले में देवराहा बाबा की उपस्थिति में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण हेतु गांव-गांव में शिलापूजन कराने का निर्णय लिया गया। पहला शिलापूजन बद्रीनाथ में जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी शांतानन्द की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। पूरे देश से पौने तीन लाख शिलाएं पूजित होकर अयोध्या पहुंचीं। विदेशों में निवास करने वाले हिन्दुओं ने भी मंदिर निर्माण के लिए शिलाएं पूजित करके भेजीं। 9 नवम्बर 1989 को बिहार निवासी कामेश्वर चौपाल के हाथों विवादित स्थल के निकट राम मंदिर की नींव रखी गई। ई.1990 में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने विवादित बाबरी ढांचे को कुछ नुकसान पहुँचाया। विश्व हिन्दू परिषद के दबाव को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के माध्यम से विवाद सुलझाने के प्रयास किए किंतु वे असफल रहे।

    अयोध्या में प्रथम कार सेवा का आह्वान

    24 मई 1990 को हरिद्वार में हिन्दू सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें संतों ने घोषणा की कि 30 अक्टूबर 1990 को देवोत्थान एकादशी के दिन से मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा आरम्भ की जाएगी। 1 सितम्बर 1990 को अयोध्या में अरणी मंथन के द्वारा रामज्योति प्रज्जवलित की गई जिसे देश के लाखों गांवों में घुमाया गया। 18 अक्टूबर 1990 को दीपावली से पूर्व ही यह रामज्योति देश के लाखों गांवों में पहुंची। अब कारसेवा आरम्भ होने में केवल 12 दिन शेष रह गए थे। आचार्य गिरिराज किशोर, अशोक सिंघल, साध्वी ऋतम्भरा, आचार्य धर्मेन्द्र, प्रवीण भाई तोगड़िया आदि साधु-संतों एवं नेताओं ने पूरे देश में लाखों लोगों को प्रवचनों एवं जनसभाओं के माध्यम से सम्बोधित करते हुए अयोध्या में होने वाली कार-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

    भाजपा की राम रथ यात्रा

    जब अयोध्या में होने वाली प्रथम कारसेवा के लिए देश भर में वातावरण तैयार किया जा रहा था, तब विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं अन्य हिन्दू संगठनों के राम मंदिर निर्माण आंदोलन को समर्थन देने के लिए 25 सितम्बर 1990 से भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम रथ यात्रा का आयोजन किया गया। यह रथ यात्रा गुजरात के सोमनाथ मंदिर से आरम्भ होकर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा बिहार प्रांतों में होती हुई दिल्ली पहुंची। आडवाणी को आशंका थी कि केन्द्र की तत्कालीन वी. पी. सिंह सरकार दिल्ली में उन्हें गिरफ्तार करेगी किंतु उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया। जब यह यात्रा बिहार पहुंची तो प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह के निर्देश पर बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने आडवाणी तथा विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल को गिरफ्तार कर लिया। इस पर भी कारसेवकों ने राम रथ यात्रा जारी रखी। अशोक सिंघल अगले ही दिन पुलिस को चकमा देकर अयोध्या के लिए निकलने में सफल रहे।

    उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायमसिंह ने घोषणा की कि कारसेवक तो क्या, अयोध्या में परिन्दा भी पर नहीं मार सकता। 22 अक्टूबर से अयोध्या को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। अयोध्या को आने वाली समस्त सड़कें बंद कर दी गईं तथा रेलगाड़यां रद्द कर दी गईं। अयोध्या के चारों ओर पुलिस का सात स्तरीय घेरा बनाया गया। जब कारसेवक उत्तर प्रदेश पहुंचे तो वहाँ के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने समस्त कारसेवकों को बंदी बनाने का आदेश दिया। डेड़ लाख से अधिक कारसेवकों को जेलों में ठूंस दिया गया। फिर भी राम रथ यात्रा में सम्मिलित 75 हजार कारसेवक अयोध्या पहुंचने में सफल हो गए। अयोध्या में 20 हजार पुलिस जवान कारसेवकों पर लाठी-डण्डे, पत्थर एवं आंसूगैस के गोले बरसाने के लिए तैयार खड़े थे।

    हिन्दुओं का आत्मोसर्ग

    लाखों रामभक्त जो कारसेवा में सम्मिलित नहीं थे, सीधे ही अयोध्या पहुंचे। इनमें से बहुत से कारसेवकों को मुगल सराय रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। फिर भी लाखों कारसेवकों ने अयोध्या को घेर लिया। 30 अक्टूबर की प्रातः एक वृद्ध साधु ने प्राणों पर खेलकर वहाँ खड़ी एक सरकारी बस के ड्राइवर को धक्का देकर नीचे गिरा दिया तथा स्वयं बस दौड़ाता हुआ हनुमानगढ़ी बैरियर को तोड़ते हुए राम जन्मभूमि की तरफ बढ़ने लगा। एक और वृद्ध साधु ने एक पुलिस कर्मी के पैर पकड़कर उसे नीचे गिरा दिया जिससे चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई और कारसेवकों को मार्ग मिल गया। इसके बाद पुलिस सम्भल नहीं सकी और लाखों कारसेवक राम जन्मभूमि तक पहुंच गए।

    बजरंग दल के कार्यकर्त्ता 23 वर्षीय राम कोठारी एवं 21 वर्षीय शरद कोठारी नामक दो भाई भी कोलकाता से अयोध्या पहुंचने में सफल रहे। उन्होंने अन्य कारसेवकों के साथ गुम्बदों पर चढ़कर सफलता पूर्वक रामध्वजा फहरा दी और एक घर में जा छिपे। 2 नवम्बर 1990 को राम कोठारी को एक घर से खींचकर गोली मार दी गई। जब उनके भाई शरद कोठारी बचाव के लिए आगे आए तो उन्हंे भी गोली मार दी गई।

    इसके साथ ही मुलायमसिंह सरकार ने भयानक नरसंहार आरम्भ कर दिया। सैंकड़ों रामसेवकों को मार डाला गया। अयोध्या नगर से लेकर सरयू के पुल तक शव ही शव दिखाई देने लगे। पुलिस ने असंख्य शव सरयू में बहा दिए तथा सरयू के किनारे खड्डे खोदकर उनमें गाढ़ दिए। इन शवों का कोई आधिकारिक आंकड़ा सरकार ने नहीं दिया तथा 20 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की। भयानक नरसंहार के उपरांत भी 40 दिन तक कारसेवक सत्याग्रह करते रहे। जब कारसेवकों के शव उनके गांवों तथा शहरों में पहुंचे तो करोड़ों हिन्दुओं ने उनकी शव यात्राओं में भाग लिया। कारसेवकों की अस्थियों का देश भर में पूजन किया गया। 14 जनवरी 1991 को माघ मेले के अवसर पर प्रयागराज के संगम पर कारसेवकों की अस्थियां प्रवाहित की गईं। हिन्दुओं का नर संहार करने के कारण भारत भर के हिन्दू, मुलायमसिंह को मुल्लाआयम कहने लगे।

    देशव्यापी साम्प्रदायिक दंगे

    कार-सेवकों पर गोली चलाए जाने के कारण जयपुर, जोधपुर, अहमदाबाद, बड़ौदा, हैदराबाद तथा अन्य शहरों में दंगे फैल गए जिनमें कई सौ लोग मारे गए। अकेले जयपुर शहर में 23-31 अक्टूबर की अवधि में 130 लोग मारे गए। के. एम. पनिक्कर का अनुमान है कि 1 सितम्बर से 20 नवम्बर की अवधि में 166 स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे हुए जिनमें 564 लोग मारे गए। मुसलमान संगठनों ने 26 जनवरी 1991 को गणतंत्र दिवस के बहिष्कार की घोषणा की जिससे हिन्दू और अधिक नाराज हो गए।

    वी. पी. सिंह तथा मुलायम सरकारों का पतन

    भारतीय जनता पार्टी ने रामरथ यात्रा में वी. पी. सिंह की सरकार द्वारा किए गए विरोध के कारण सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया जिससे 10 नवम्बर 1990 को वी. पी. सिंह की सरकार गिर गई तथा देश में नए सिरे से संसदीय चुनाव करवाए गए। वी. पी. सिंह सरकार के गिर जाने से मुलायमसिंह यादव की सरकार भी अल्पमत में आ गई किंतु मुलायम ने चन्द्रशेखर का जनता दल (समाजवादी) की सदस्यता ले ली और कांग्रेस के सहयोग से मुख्यमंत्री की गद्दी बचा ली। 24 जनवरी 1991 को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की मुलायमसिंह सरकार को गिरा दिया।

    दिल्ली की ऐतिहासिक रैली

    4 अप्रेल 1991 को दिल्ली के वोटक्लब पर विशाल रैली हुई जिसमें देश भर से 25 लाख रामभक्त पहुंचे। यह भारत के इतिहास की आज तक की सबसे विशाल रैली थी।

    मंदिर के अवशेषों की प्राप्ति

    जून 1991 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए जिनमें भारतीय जनता पार्टी को विजय मिली तथा कल्याणसिंह के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। कल्याणसिंह सरकार ने उसी वर्ष 2.77 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया तथा उसके समतलीकरण का कार्य कराया। इस दौरान ढांचे के दक्षिणी-पूर्वी कोने से धरती के भीतर से अनेक पत्थर प्राप्त हुए जिनमें शिव-पार्वती की खण्डित मूर्ति, सूर्य के समान अर्द्धकमल, मंदिर के शिखर का आमलक, उत्कृष्ट नक्काशी वाले अनेक पत्थर एवं विविध देवी-देवताओं की प्रतिमाएं थीं। पूरे देश से श्रद्धालु, इतिहासकार एवं पुरातत्वविद् इस पुरा सामग्री को देखने अयोध्या पहुंचे। रामजन्मभूमि का मूल मंदिर निःसंदेह एक विशाल परिसर में विस्तृत था। यह केवल वर्तमान विवादित परिसर तक सीमित नहीं था।

    सर्वदेव अनुष्ठान, नींव ढलाई एवं पादुका पूजन

    9 जुलाई 1992 से 60 दिवसीय सर्वदेव अनुष्ठान प्रारम्भ किया गया। इस दौरान राम जन्मभूमि के समक्ष किए गए शिलान्यास स्थल से भावी मंदिर की नींव के चबूतरे की ढलाई आरम्भ की गई। यह नींव 290 फुट लम्बी, 155 फुट चौड़ी और 2-2 फुट मोटी एक के ऊपर एक तीन परत ढलाई करके कुल 6 फुट मोटी बननी थी। 15 दिन तक नींव ढलाई का काम चलता रहा। मुसलमानों के विरोध के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हाराव ने साधु-संतों से अनुरोध किया कि वे इस कार्य को चार महीने तक स्थगित कर दें। संतों ने यह बात मान ली और जन्मभूमि के नैऋत्य कोण में कुछ दूरी पर बनने वाले शेषावतार मंदिर की नींव भरने के काम में लग गए। 26 सितम्बर 1992 को नंदीग्राम में रामजी की पादुकाओं का पूजन कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसी स्थान पर भरतजी, रामजी के 14 वर्ष के वनवास के समय रामजी की चरण पादुकाओं को लेकर रहे थे। अक्टूबर माह में देश के लाखों गांवों में चरण पादुका पूजन कार्यक्रम आयोजित किए गए।

    बाबरी ढांचे का उन्मूलन

    30 अक्टूबर 1992 को दिल्ली में पांचवी धर्म-संसद का आयोजन किया गया जिसमें देश भर के साधु-संत एकत्रित हुए। इसमें घोषणा की गई कि 6 दिसम्बर 1992 से अयोध्या में फिर से कारसेवा आयोजित की जाएगी। इस बार भी भारतीय जनता पार्टी; विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ खुलकर सामने आ गई। 6 दिसम्बर 1992 को देश के समस्त हिन्दूवादी संगठनों ने राम जन्मभूमि परिसर पर कार-सेवा का आयोजन किया। विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित बाबरी ढांचा गिरा दिया। इस प्रकार राम जन्मभूमि पर रामलला की पुर्नस्थापना के 43 वर्ष पश्चात् बाबरी ढांचे को तोड़ दिया गया। बाबरी ढांचा गिराने के दौरान ई.1154 का 20 पंक्तियों का संस्कृत भाषा में एक शिलालेख प्राप्त हुआ जिसमें विष्णु हरि के स्वर्ण कलश युक्त मंदिर तथा अयोध्या के सौंदर्य का वर्णन किया गया है। श्री राम लला का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया। कार सेवा करने वालों में 1990 में आत्मोसर्ग करने वाले राम कोठारी और शरद कोठारी की माता सुमित्रा कोठारी तथा पिता हीरालाल भी सम्मिलित थे। उसी दिन उत्तर प्रदेश की कल्याणसिंह सरकार ने ढांचा गिरने की जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र दे दिया।

    भाजपा के नेताओं पर आरोप एवं मुकदमे

    बाबरी ढांचा गिराए जाने के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं में से लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशाी, विनय कटियार तथा उमा भारती सहित अनेक नेता मौजूद थे। लालकृष्ण आडवाणी एवं मुरली मनोहर जोशी पर आरोप हैं कि उन्होंने कारसेवकों को यह कहकर उकसाया कि न्यायालय ने मंदिर निर्माण पर रोक लगाई है न कि बाबरी ढांचा तोड़ने पर। उमा भारती पर आरोप है कि उन्होंने- 'एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो'; मस्जिद गिराओ, मंदिर बनाओ, बाबर की औलाद को पाकिस्तान भगाओ; जिन्ना बोले जयश्रीराम; एक ईंट परसाद के तौर पर ले जाओ; आदि नारे लगाकर कारसेवकों को बाबरी ढांचा तोड़ने के लिए उकसाया। बजरंग दल के अध्यक्ष एवं भाजपा सांसद विनय कटियार पर आरोप हैं कि कारसेवा से एक दिन पहले उनके घर पर एक गुप्त बैठक हुई जिसमें उन्होंने सुझाव दिया कि कोर्ट ने पक्का निर्माण करने पर रोक लगाई है इसलिए कपड़े का तम्बू लगाकर उसमें रामलला की प्रतिमा स्थापित की जाए। इस प्रकार ढांचा तोड़ने एवं मंदिर बनाने में इन नेताओं की बड़ी भूमिका थी। शिवसेना एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पदाधिकारियों ने अनेक अवसरों पर इस बात को कहा कि हमें गर्व है कि बाबरी ढांचा हटाने में हमारे कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका थी। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याणसिंह ने ढांचा टूटने की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।

    राममंदिर का निर्माण

    बाबरी ढांचा गिराने के बाद कारसेवक 36 घण्टे तक राम जन्मभूमि पर डटे रहे और कारसेवा करते रहे। उन्होंने बिना कोई औजार प्रयोग किए केवल हाथों से काम करते हुए राम लला के चारों ओर ईंटों से एक दीवार खड़ी की तथा उसके सहारे चार कोनों पर चार बल्लियां खड़ी करके कपड़े लगा दिए। इस प्रकार राममंदिर बन गया। करोड़ों हिन्दुओं की आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला यह राममंदिर आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है। कपड़े के इस मंदिर को केवल भव्य मंदिर में परिवर्तित किया जाना शेष रह गया है।

    केन्द्रीय सुरक्षा बलों के अधिकार में राम जन्मभूमि

    8 दिसम्बर 1992 की भोर में सम्पूर्ण अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया गया। जन्मभूमि परिसर से कारसेवकों को बल पूर्वक हटा दिया गया तथा केन्द्रीय सुरक्षा बलों ने परिसर पर अधिकार कर लिया। इस दौरान सुरक्षा बलों के जवान रामलला की पूजा करने लगे।

    विश्व भर में हिन्दुओं के विरुद्ध विष-वमन एवं हिंसा

    बाबरी ढांचा गिरने के बाद 7 दिसम्बर 1992 को पाकिस्तान में सरकार द्वारा स्कूल एवं कॉलेज बंद कर दिए गए। पूरा पाकिस्तान बंद रहा तथा वहाँ की इस्लामिक ताकतों ने हिन्दुओं के विरुद्ध जेहाद छेड़ने की धमकी दी। पाकिस्तान स्थित एयर इण्डया के कार्यालयों में तोड़-फोड़ एवं आगजनी की गई। पाकिस्तन ने यूएनओ तथा इस्लामिक इण्टरनेरशन फोरम में भारत के विरुद्ध शिकायत की। बांगलादेश में हिन्दुओं के सैंकड़ों मंदिरों, दुकानों एवं घरों को जला दिया गया। बहुत से हिन्दुओं को गलियों में जान से मार दिया गया। ईरान के शासक आयतुल्ला अली खुमेनी ने बाबरी ढांचा टूटने की निंदा की तथा भारत सरकार से प्रार्थना की कि वह मुसलमानों की जान की रक्षा करे। मध्य-एशिया में आबू धाबी में आयोजित गल्फ कॉपरेशन कौंसिल में बाबरी ढांचा टूटने की भर्त्सना की गई। इसे मुसलमानों के विरुद्ध अपराध माना गया। सऊदी अरेबिया ने इस कृत्य की कटु निंदा की। संयुक्त अरब अमीरात सरकार की प्रतिक्रिया कुछ हलकी थी। उसने गल्फ कॉपरेशन कौंसिल द्वारा पारित प्रस्ताव को भारत के भीतरी मामले में हस्तक्षेप बताया किंतु संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे भारतीय एवं पकिस्तानी मुसलमानों ने भारत के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया की। वहाँ हिन्दू मंदिरों एवं दुबई के भारतीय दूतावास पर पत्थर बाजी की गई। आबू धाबी से 250 किलोमीटर दूर अल-इन में एक भारतीय स्कूल की लड़कियों की शाखा को जला दिया गया। जब पुलिस ने इस घटना के अपराधियों को पकड़ा तो उनकी पहचान पाकिस्तान तथा भारत के मुसलमानों के रूप में हुई। उन्हें संयुक्त अरब अमीरात से निष्कासित कर दिय गया।

    लिब्रहान आयोग का गठन

    बाबरी ढांचे के टूटते ही देश भर में साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गए जिनमें लगभग दो हजार लोगों ने प्राणा गंवाए। बाबरी ढांचे को तोड़े जाने की घटना की जांच करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 19 दिसम्बर 1992 को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश एम. एस. लिब्रहान की अध्यक्षता में लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

    भगवान को भोग की अनुमति

    इसी दौरान एक अधिवक्ता हरिशंकर जैन ने उच्च न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया कि रामलला भूखे हैं। राग-भोग-पूजन की अनुमति दी जाए। 1 जनवरी 1993 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हरिनाथ तिलहरी ने रामलला के दर्शन-पूजन की अनुमति प्रदान कर दी। तब से हिन्दू भक्त, कपड़े के मंदिर के भीतर विराजमान रामलला की प्रतिमा के दर्शन करते हैं।

    राम जन्मभूमि का अधिग्रहण

    7 जनवरी 1993 को कल्याणसिंह सरकार ने राम जन्मभूमि परिसर को सम्मिलित करते हुए उसके चारों ओर की 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया तथा इसे चारों ओर लोहे के पाइपों की ऊंची बाड़ से घेर दिया। भगवान तक पहुंचने के लिए बहुत संकरा गलियारा बनाया गया तथा दर्शनाभिलाषियों की सघन तलाशी ली जाने लगी जिससे भक्तों को बहुत कठिनाई होने लगी। भक्तों को रामलला के समक्ष जूते पहनकर ही जाना पड़ता है।

    दस करोड़ राम भक्तों द्वारा राष्ट्रपति को संकल्प पत्र

    वर्ष 1993 में हिन्दुओं ने पूरे देश में दस करोड़ नागरिकों के हस्ताक्षरों से युक्त एक ज्ञापन तत्कालीन राष्ट्रपति को दिया जिसमें संकल्प व्यक्त किया गया कि आज जिस स्थान पर रामलला विराजमान हैं, वह स्थान ही जन्मभूमि है, हमारी आस्था का प्रतीक है ओर वहाँ एक भव्य मंदिर का निर्माण करेंगे।

    राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से पूछताछ

    रामजन्मभूमि एवं उसके आसपास की 67 एकड़ भूमि का सरकार द्वारा अधिग्रहण किए जाने के बाद मुस्लिम पक्ष ने अधिग्रहण के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में वाद दायर किया। इसी के साथ भारत के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को संविधान की धारा 143 के अंतर्गत एक प्रश्न भेजकर उसका उत्तर चाहा गया कि- 'क्या ढांचे वाले स्थान पर ई.1528 से पहले कोई हिन्दू मंदिर था?' सरकार के सॉलिसिटर जनरल दीपांकर गुप्ता ने सर्वोच्च न्यायालय को स्पष्ट किया कि यदि ई.1528 से पहले मंदिर था तो सरकार हिन्दुओं की भावना को स्वीकार कर लेगी। अक्टूबर 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति को उनका प्रश्न अनावश्यक बताते हुए वापस लौटा दिया। न्यायालय ने विवादित 12 हजार वर्गफुट भूमि का अधिग्रहण निरस्त कर दिया तथा शेष भूमि के अधिग्रहण की कार्यवाही को स्वीकार कर लिया।

    केन्द्र में भाजपा की सरकारें

    ई.1996, 1998 तथा 1999 के संसदीय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि यदि भाजपा की सरकार बनी तो राम जन्मभूमि पर राममंदिर का निर्माण किया जाएगा। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 1996 में 13 दिन के लिए, 1998 में 13 माह के लिए तथा 1999 में पांच साल के लिए गठबंधन सरकारें बनाईं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार राममंदिर के मुद्दे को ठण्डे बस्ते में डालकर सर्वदलीय सहमति के आधार पर चलने लगी। इस कारण वर्ष 2001 में बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर तनाव बढ़ गया और विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि पर भव्य राममंदिर निर्माण करने का अपना संकल्प दोहराया। जनवरी 2002 में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए अयोध्या समिति का गठन किया। सरकार द्वारा वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत करने के लिए नियुक्त किया गया किंतु वास्तविक धरातल पर कुछ भी नहीं किया गया। 13 मार्च 2002 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अयोध्या में यथा-स्थिति बनाए रखी जाए और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत भूमि पर शिलापूजन की अनुमति नहीं दी जाए। केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फैसले का पालन किया जाएगा।

    गोधरा काण्ड

    अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में 27 फरवरी 2002 की प्रातःकाल में मुस्लिम दंगाइयों ने हमला किया तथा रेल के डिब्बे को बाहर से ताला लगाकर, पैट्रोलियम छिड़ककर उसे जला दिया। इससे 58 रामभक्त कार-सेवक डिब्बे में जल कर मर गए। इसकी प्रतिक्रिया में गुजरात में दंगे फूट पड़े जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पहुंची।

    सरकार को रामशिलाएं प्रदान

    विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च 2002 से राम मंदिर निर्माण कार्य आरम्भ करने की घोषणा कर दी। सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में एकत्रित हो गए। विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे। राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी शत्रुघ्नसिंह को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं। शत्रुघ्नसिंह ने ये शिलाएं इस आदेश के साथ अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को सौंप दीं कि जब कभी भी मंदिर का निर्माण हो तो इन शिलाओं को सबसे पहले काम में लिया जाए।

    रेडियो तरंगों से मंदिर के अवशेषों की खोज

    जनवरी 2003 में उच्च न्यायालय के निर्देश पर सरकार ने रेडियो तरंगों के माध्यम से राम जन्मभूमि के नीचे की फोटोग्राफी करवाकर यह पता लगाने का प्रयास किया कि क्या राम जन्मभूमि परिसर के नीचे किसी प्राचीन मंदिर के अवशेष दबे हुए हैं! इस कार्य के लिए कनाडा से विशेषज्ञ बुलाए गए। इस फोटोग्राफी से इस तथ्य की पुष्टि हुई कि किसी भवन के अवशेष दूर-दूर तक दिखाई देते हैं। इस पर कोर्ट ने इस स्थल की खुदाई करवाने के निर्देश दिए।

    पुरातत्व अवशेषों की जांच

    मई-जून 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खण्डपीठ के निर्देश पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया ने राम जन्मभूमि की खुदाई की जिनमें 131 श्रमिकों की सेवाओं का उपयोग किया गया जिनमें से 52 मुसलमान थे। पुरातत्वविदों की टीम में भी एक प्रमुख मुस्लिम सदस्य को रखा गया। अगस्त 2003 में एएसआई ने लखनऊ खण्डपीठ के समक्ष 574 पृष्ठों की रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें 22 मई से 6 जून 2003 के बीच हुई खुदाई में प्राप्त तथ्यों का उल्लेख है। इसमें कहा गया कि खुदाई में पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण दिशा में बनी हुई ईंटों की दीवारें प्राप्त हुई हैं। साथ ही अलंकृत रंगीन फर्श मिले हैं। कई स्तम्भों के आधार भी प्राप्त हुए हैं। 1.64 मीटर ऊंचा, काले रंग का अलंकृत एवं खण्डित स्तम्भ मिला है। इसके चारों कोनों पर यक्ष मूर्तियां हैं। इस पर संस्कृत भाषा में एक धार्मिक प्रार्थना भी उत्कीर्ण है। अन्य स्तम्भ पर कमल पुष्प एवं नृत्यलीन मयूर उत्कीर्ण हैं। जहाँ बाबरी ढांचा स्थित था, उसके नीचे से विशाल मंदिर के भग्नवाशेष मिले हैं। दीवारों के सुंदर पत्थरों पर कमल, कौस्तुभ, आभूषण, मकर आदि भी प्राप्त हुए हैं। धरती से 20 फुट नीचे प्राप्त अवशेष कम से कम 1,500 वर्ष पुराने हैं। तीस फुट नीचे लगभग 2,500 वर्ष पुराने मंदिर की रचना के प्रमाण मिले हैं। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने एएसआई की विश्वसनीयता पर संदेह व्यक्त करते हुए इस रिपोर्ट को अस्पष्ट बताया। उसका कहना था कि बाबरी मस्जिद के नीचे से जो निर्माण प्राप्त हुए हैं वे किसी अन्य प्राचीन मस्जिद के हैं।

    उत्तर प्रदेश में भाजपा पंद्रह साल के लिए सत्ता से बाहर

    वर्ष 2002 में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राममंदिर निर्माण के मुद्दे को सम्मिलित करने से मना कर दिया। जनता द्वारा इसे वचनभंग समझा गया और भाजपा को हार का सामन करना पड़ा। मायावती ने सरकार बनाई तथा भाजपा ने उसे सहयोग दिया। भाजपा और मायावती अधिक समय तक साथ नहीं चल सके, इस कारण अगस्त 2003 में मायावती सरकार गिर गई तथा मुलायमसिंह फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। मुलायम सरकार 2007 तक कार्य करती रही। 2007 से 2012 तक मायावती एवं 2012 से 2017 तक अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। भाजपा द्वारा किए गए वचनभंग से रुष्ट जनता ने 15 साल तक भाजपा को सत्ता से बाहर रखा। 2017 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने फिर से राम जन्मभूमि निर्माण को अपने घोषणापत्र में सम्मिलित किया। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी प्रबल बहुमत से उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी कर सकी।

    केन्द्र में भाजपा दस वर्ष के लिए सत्ता से बाहर

    अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने जनता को दिया गया वचन यह कहकर तोड़ दिया कि यदि भाजपा के बहुमत वाली सरकार बनती तो हम मंदिर बनाते किंतु चूंकि संसद में भाजपा का बहुमत नहीं है इसलिए मंदिर का निर्माण नहीं किया जाएगा। देश की जनता भाजपा द्वारा वचन भंग किए जाने से रुष्ट हो गई तथा भाजपा के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त किया जाने लगा। ई.2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा बुरी तरह हारी। अटल बिहारी सरकार के बहुत से मंत्रियों को भी हार का मुख देखना पड़ा तथा 5-5 साल करके 10 साल के लिए सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए ने डॉ. मनमोहनसिंह के प्रधानमंत्रित्व में सरकार बनाई। इस दौरान राम जन्मभूमि मंदिर का मुद्दा हाशिए पर चला गया।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा

    अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दर्ज किया जिसमें मुरली मनोहर जोशी एवं उमा भारती सहित भाजपा के कई बड़े नेताओं को आरोपी बनाया गया। मई 2003 में सीबीआई ने उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के विरुद्ध पूरक आरोप पत्र दाखिल किए। अगस्त 2003 में भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए। अप्रैल 2004 में आडवाणी ने अयोध्या में अस्थाई राम मंदिर में पूजा की और कहा कि मंदिर का निर्माण अवश्य किया जाएगा। जनवरी 2005 में लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उनकी कथित भूमिका के प्रकरण में अदालत में बुलाया गया।

    जुलाई 2005 में पाँच आतंकवादियों ने राम जन्मभूमि परिसर पर हमला किया जिसमें 5 आतंकवादियों सहित छः लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नजदीक ही मार डाले गए। 6 जुलाई 2005 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ढांचा गिराए जाने के दौरान भड़काऊ भाषण देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया। इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था। 28 जुलाई 2005 को लालकृष्ण आडवाणी रायबरेली की एक अदालत में उपस्थित हुए। न्यायलय ने लालकृष्ण आडवाणी के विरुद्ध आरोप निर्धारित किए। 4 अगस्त 2005 को फैजाबाद की अदालत ने राम जन्मभूमि परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा।

    20 अप्रैल 2006 को कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र था जिसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना की मिली-भगत थी। जुलाई 2006 में सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ काँच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव का मुस्लिम समुदाय ने विरोध किया और कहा कि यह अदालत के उस आदेश के विरुद्ध है जिसमें यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे। 19 मार्च 2007 को कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि- 'अगर नेहरू-गाँधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती।' उनके इस वक्तव्य पर देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई।

    लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट

    लिब्रहान आयोग को 16 मार्च 1993 को अर्थात् तीन माह में रिपोर्ट देने को कहा गया था, किंतु आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया। आयोग ने रिपोर्ट देने में 17 साल लगाए जिसे तैयार करने में 8 करोड़ रुपए खर्च हुए। 30 जून 2009 को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में 700 पन्नों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम को सौंपी। आयोग से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता अनुपम गुप्ता के अनुसार इस रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का उल्लेख 400 पन्नों में है, जबकि भाजपा नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की चर्चा 200 पन्नों पर की गई है। हालांकि आयोग के अध्यक्ष से मतभेद के कारण अनुपम गुप्ता इस जांच से अलग हो गए थे।

    नरसिंहराव को क्लीन चिट

    24 नवंबर 2009 को लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत की गई। आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव को क्लीन चिट दी।

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय

    इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में राम जन्मभूमि को लेकर चल रहे मुकदमे की 399 बार सुनवाई हुई। ई.2010 के अंत में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को राम जन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे राम जन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाए। न्यायालय ने यह भी पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्जा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्मेाही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायधीधों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान नमाज पढ़ते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को मानने से अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

    उच्चतम न्यायालय में कार्यवाही

    उच्चतम न्यायालय ने 7 वर्ष बाद निर्णय दिया कि 11 अगस्त 2017 से तीन न्यायाधीशों की पीठ इस विवाद की सुनवाई प्रतिदिन करेगी। सुनवाई से ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड ने न्यायालय में याचिका लगाकर विवाद में पक्षकार होने का दावा किया और 70 वर्ष बाद 30 मार्च 1946 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जिसमें मस्जिद को सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति घोषित किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 दिसंबर 2017 से इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू करने की बात कही किंतु सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलील दी कि चूंकि 2019 में भारत में आम चुनाव होने हैं इसलिए इस मामले की सुनवाई 2019 के बाद की जाए। अब सर्वोच्च न्यायालय ने 8 फरवरी 2018 से इस मामले की नियमित सुनवाई के निर्देश दिए हैं।


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