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  • अध्याय - 27 : हैदराबाद की साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध हिन्दुओं का सत्याग्रह

     09.03.2018
    अध्याय - 27 : हैदराबाद की साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध हिन्दुओं का सत्याग्रह

    अध्याय - 27


    हैदराबाद की साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध हिन्दुओं का सत्याग्रह

    हैदराबाद निजाम के राज्य में हिन्दू विरोधी अभियान कई वर्षों से चल रहा था। वहाँ हिन्दुओं तथा आर्य समाजियों पर दिन-रात अत्याचार किया जाता था। उनके यज्ञोपवीत तोड़ दिए जाते थे। उन्हें मंदिर तथा हवन-कुण्ड तक बनाने की अनुमति नहीं दी जाती थी। हिन्दुओं का कोई भी उत्सव बिना पूर्व-स्वीकृति के नहीं हो सकता था। यदि कोई हिन्दू नेता बाहर से आता था तो उसकी उसकी बहुत जांच-पड़ताल की जाती थी। मुसलमान गुण्डे सरासर हिन्दुओं को दिन दहाड़े लूटते, डाका डालते ओर उनका खून तक कर डालते तो कोई दण्ड नहीं दिया जाता था। अक्टूबर 1938 के प्रथम सप्ताह में वीर सावरकर दिल्ली आए। उन्होंने सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के अधिकारियों से हैदराबाद के सम्बन्ध में बात की और एक सार्वजनिक सभा में भाषण दिया।

    जनवरी 1938 से एक बड़े पैमाने पर हैदराबाद दंगों के विरोध में जन-आंदोलन पनपने लगा। लोगों ने सरकार पर यह आरोप लगाना आरम्भ कर दिया कि वह दंगों में मुस्लिम गुण्डों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दे रही है। निजाम सरकार इन आरोपों पर चुप्पी साधे हुए थी। हैदराबाद के बहुत से हिन्दू शरणार्थी अखिल भारत हिन्दू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर के पास पहुंचे और उनसे सलाह एवं सहायता मांगी। सावरकर ने शरणार्थियों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहायता देने का वचन दिया। उन्होंने हिन्दू जनता के नाम वक्तव्य प्रकाशित करवाया- 'समस्त हिन्दू जनता, हिन्दूवादी संगठन, आर्य समाजी तथा भारतीय जनता की सेवा में निवेदन है कि रविवार 22 जनवरी 1939 को भारतवर्ष में निजाम विरोध दिवस मनाया जाए। आम हड़ताल, जलसे एवं जुलूस निकाले जाएं और धार्मिक हिन्दू अधिकार संघर्ष क लिए प्रत्येक सभा से मिलकर एक सी आवाज लगाई जाए।'

    हिन्दू महासभा के नागपुर अधिवेशन में निजाम हैदराबाद के सम्बन्ध में एक प्रस्ताव स्वीकार किया गया जिसमें कहा गया कि- 'चूंकि हैदराबाद राज्य में हिन्दुओं को धार्मिक पूजा आदि करने की न स्वतंत्रता है और न वे अपने नागरिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक अधिकारों का उपयोग कर सकते हैं। प्रार्थना करने पर भी निजाम सरकार ने हिन्दुओं की उचित और युक्तिसंगत मांगों पर ध्यान नहीं दिया है। यही नहीं अपितु हिन्दुओं को उनके दिल दुखाकर यहाँ तक विवश किया है कि वे वहाँ की सरकार की संकुचित नीति के प्रतिकूल सत्याग्रह आरम्भ करें। यह सभा निश्चय करती है कि उनके इस सत्याग्रह में, जो कि निजाम सरकार के प्रतिकूल अपने अधिकारों की अवहेलना होने पर आरम्भ किया है, उनकी पूरी सहायता करें।'

    उस्मानिया विश्वविद्यालय के हिन्दू छात्र वन्देमातरम् गीत को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाया करते थे परंतु मुसलमान छात्र इस गीत में हिन्दू छात्रों के साथ भाग नहीं लेते थे। मुसलमान युवकों के विरोध करने पर मुस्लिम अधिकारियों द्वारा इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस गीत को प्रार्थना के रूप में निजाम राज्य की हैदराबाद जेल में भी गाया जाता था। यद्यपि अखिल भारत हिन्दू महासभा ने लिखित रूप से निजाम के विरोध में प्रतिरोध की कोई घोषणा नहीं की तथापि महाराष्ट्र हिन्दू महासभा की तरफ से एक हिन्दू प्रतिकार मण्डल का गठन किया गया। महाराष्ट्र हिन्दू महासभा के नेतृत्व में पूरे महाराष्ट्र में सैंकड़ों सभाएं आयोजित की गईं। महासभा के नागपुर अधिवेशन में स्वीकृत प्रस्ताव तथा आर्य कांग्रेस शोलापुर द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव को सावरकर ने हैदाराबाद स्टेट के प्रधानमंत्री अकबर हैदरी के पास भिजवाया-

    'मैं नागरिक सुरक्षा की मांग करता हुआ आपके माध्यम से माननीय निजाम साहब को यह विश्वास दिलाता हूँ कि हिन्दू महासभा के इस आंदोलन का उद्देश्य न तो निजाम विरोधी है, न निजाम स्टेट अथवा न ही मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध है। हिन्दू महासभा यदि विरोधी है तो वह निजाम स्टेट में हो रहे हिन्दू विरोधी अभियान के जिसके कारण हिन्दू इस राज्य में गौण रूप में समझे जाते हैं। हिन्दू महासभा का उद्देश्य है कि इस राज्य में हिन्दुओं को भी मुसलमानों की भांति समान रूप से अधिकारों का उपभोग करने की स्वतंत्रता प्राप्त हो, जैसे भाषण देने की पूर्ण स्वतंत्रता, पूजा करने की स्वतंत्रता, सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए निष्पक्षता-पूर्ण व्यवहार, स्टेट की नौकरियों में नियुक्ति के समय योग्यता का ध्यान दिया जाए न कि धर्म अथवा समुदाय का। हिन्दू महासभा इसके अतिरिक्त और कुछ भी मांग नहीं करती है। हिन्दू महासभा इसके साथ प्रबल रूप से यह आशा करती है कि इस प्रश्न का हल शांतिपूर्ण ढंग से होगा। इसलिए मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि उन सभी धार्मिक एवं नागरिक मांगों की स्वीकृति देने की कृपा करें जिसका विवरण आर्य समाज कांग्रेस शोलापुर मंग पारित प्रस्ताव की प्रतिलिपि के साथ संलग्न है।'

    सावरकर के इस पत्र का जवाब सर अकबर हैदरी ने 15 मार्च 1939 को भेजा जिसमें हिन्दू महासभा के अध्यक्ष द्वारा दी गई सद्भावना पूर्ण आश्वासन को उसने पसंद किया। उसके प्रत्युत्तर में निजाम सरकार की नीति स्पष्ट दिखाई देती है-

    'मैं आपके पत्र के उस अंश को पसन्द करता हूँ जिसमें आपने यह आश्वासन दिया है कि हिन्दू महासभा का उद्देश्य न तो माननीय निजाम विरोधी है और न ही उनके राज्य के अथवा किसी अन्य समुदाय के ही विरोध में है और साथ ही आपने इच्छा व्यक्त की है कि सरकारी नौकरियों में किसी व्यक्ति की नियुक्ति उसकी योग्यता के अनुसार ही हो न कि धर्म अथवा सम्प्रदाय के आधार पर। इसमें जहाँ तक मैं समझता हूँ कि तथ्य समझने की बजाय आपको गलत फहमी हो गई है। मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि ऐसी नियुक्तियों का आधार वर्तमान में भी है। मैं उन प्रस्तावों की गहराई में नहीं जाना चाहूंगा जिन्हें हिन्दू महासभा एवं आर्य कांग्रेस शोलापुर ने पारित किया था। मुझे खेद है कि यह मेरे लिए संभव नहीं है कि आपके द्वारा संचालित नागरिक सुरक्षा आंदोलन को मैं सहयोग दे सकूं। फिर भी जो भी सुधार मुझसे सम्भव हो सकेगा, उसके लिए या इस सुधार के लिए सरकार अन्तिम निर्णय देने जा रही है। ऐसी आशा की जाती है कि उसे कुछ महीने में पारित किया जाएगा जिसमें किसी भी समुदाय के साथ कोई अन्याय नहीं होगा जिसमें हिन्दु अथवा मुसलमान कोई अन्य समुदाय के किसी नियम या कानून का विशेषाधिकारी नहीं होगा अपितु पूरे राज्य में किसी धर्म या समुदाय को महत्व दिए बिना सबको समान रूप से ध्यान में रखा जाएगा।'

    इस प्रकार आर्य समाज एवं हिन्दू महासभा के सम्मिलित सत्याग्रह आंदोलन के आगे निजाम सरकार को झुकना पड़ा तथा अंत में विवश होकर आर्य समाज के साथ निजाम सरकार ने समझौता कर लिया और इसलिए सत्याग्रह आंदोलन समाप्त कर दिया गया।


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