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     09.03.2018
    उपसंहार : भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास

    उपसंहार

    भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास

    इस्लाम के भारत में प्रवेश करने से पहले भारत में साम्प्रदायिक समस्या का स्वरूप अलग प्रकार का था, इसमें सामूहिक नरसंहार जैसी घटनाएं नहीं होती थीं किंतु जब सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब में इस्लाम का उदय हुआ तथा खलीफा की सेनाएं भारत भूमि पर आक्रमण करने लगीं तो हिन्दू राजाओं ने मुस्लिम आक्रांताओं को रोकने के लिए तलवार का सहारा लिया और वे अदम्य साहस एवं शौर्य का प्रदर्शन करते हुए अनवरत लड़ने लगे। ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी का प्रारम्भ भारत भूमि पर महमूद गजनवी के आक्रमणों से हुआ। पूरे 25 साल तक वह भारत पर आक्रमण करता रहा और तब तक शांत नहीं हुआ जब तक उसने नगरकोट के शक्तिपीठ से लेकर सोमनाथ के महान शिवालय तक को नष्ट-भ्रष्ट करके लूट नहीं लिया। बारहवीं शताब्दी का अंत होने तक भारत के राजाओं की तलवारें थकने लगी थीं, वे स्थान-स्थान पर मुस्लिम आक्रांताओं से हारने लगे थे।

    जिस देश के शासक निजी स्वार्थों और घमण्ड के कारण हजारों साल से परस्पर संघर्ष करके एक दूसरे को नष्ट करते रहे हों, उस देश के शासकों तथा नागरिकों का मुस्लिम आक्रांताओं ने जी भर कर दमन किया। उनके क्रूर कारनामों, हिंसा और रक्तपात के किस्सों को सुनकर मानवता कांप उठती है किंतु भारत के लोगों ने शायद ही कभी इतिहास से कोई सबक लिया हो। यही कारण है कि भारत के पराभव, उत्पीड़न और शोषण का जो सिलसिला मुहम्मद-बिन-कासिम ने आरंभ किया वह महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, तैमूर लंग, बाबर, अहमदशाह अब्दाली तथा ब्रिटिश शासकों से होता हुआ आज भी निरंतर जारी है। इस देश के लोग कभी एक नहीं हुए। आजादी के बाद भी नहीं। आज की प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में तलवार लेकर परस्पर लड़ने वाले शासक मौजूद नहीं हैं किंतु राजनीतिक दल जिस भौण्डे तरीके से एक दूसरे के शत्रु बने हुए हैं, वे उन भारतीय शासकों की ही याद दिलाते हैं जिन्होंने विदेशियों के हाथों नष्ट हो जाना तो पसंद किया किंतु कभी निजी स्वार्थ तथा अपने घमण्ड को छोड़कर एक दूसरे का साथ नहीं दिया।

    अंग्रेजों ने भारत की फूट का पूरा लाभ उठाया तथा परस्पर वैमनस्य की आग में जल रहे देश को अपना गुलाम बना लिया। जब देश में आजादी की लड़ाई लड़ी गई, तब भी अंग्रेजों ने देश की साम्प्रदायिक समस्या को भारत के विरुद्ध सबसे शक्तिशाली हथियार के रूप में काम में लिया जिसका परिणाम देश में करोड़ों लोगों की मृत्यु, बलात्कार एवं पलायन के रूप में सामने आया। आज देश आजाद है किंतु साम्प्रदायिकता की समस्या आज भी विद्यमान है जिसके कारण निरीह जनता हिंसा की आग में झुलसती है। वास्तविकता तो यह है कि भारत ही नहीं, पूरा विश्व साम्प्रदायिक हिंसा से त्रस्त है। अमरीका, फ्रांस, इंग्लैण्ड जैसे ईसाई बहुल देशों में ईसाई-मुसलमान दंगे तथा योजनाबद्ध आतंकवादी घटनाएं होती हैं। यहाँ तक कि पाकिस्तान के मुस्लिम राष्ट्र होते हुए भी वहाँ मुस्लिम आतंकवादी संगठन सामूहिक नरसंहार को अंजाम देते हैं। पाकिस्तान में सैंकड़ों शिया एवं सूफी मत के आस्था स्थल हैं जहाँ कट्टर मुस्लिम संगठनों ने सामूहिक नर संहार किए हैं। यही कारण है कि भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का ग्राफ आज भी विश्व भर में सबसे नीचे है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के अनुसार भारत में वर्ष 2005 से 2009 की अवधि में साम्प्रदायिक हिंसा के कारण प्रतिवर्ष औसतन 130 व्यक्तियों की मृत्यु हुई। अर्थात् प्रति 10 हजार लोगों पर 0.01 व्यक्तियों की मृत्यु हुई। जबकि विश्व में यह औसत 7.9 व्यक्ति है। वर्ष 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता संभालने एवं देश के अधिकतर हिस्सों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनने के बाद से देश में दंगाइयों पर कड़ाई से अंकुश लगाया गया है जिसके कारण साम्प्रदायिक दंगों में उल्लेखनीय गिरावट आई है तथा साम्प्रदायिक हिंसाओं का वर्तमान औसत अपने न्यूनतम स्तर को प्राप्त कर चुका है।

    भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में जनवरी से नवम्बर माह तक देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 296 घटनाएं घटीं जिनमें 44 लोगों की मृत्यु हुई। जबकि वर्ष 2016 में देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 703 एवं वर्ष 2015 में 751 घटनाएं हुईं जिनमें क्रमशः 86 एवं 97 लोगों को प्राणों से हाथ धोना पड़ा। वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 60 हिंसक घटनाएं हुईं जिनमें 16 लोग मारे गए तथा 150 घायल हुए। वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश में 162 साम्प्रदायिक हिंसाएं हुईं जिनमें 29 लोग मारे गए। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा पश्चिमी बंगाल में हिंसक घटनाएं हुईं। बंगाल में वर्ष 2017 में 26 घटनाएं हुईं जिनमें 3 लोग मारे गए, जबकि वर्ष 2016 में 32 घटनाएं हुईं जिनमें 4 मौतें हुईं।

    विगत कुछ वर्षों से देश में गौ-रक्षा के नाम पर भी हिंसक झड़पें हुई हैं तथा कई स्थानों पर गौ-तस्करों को जन-समुदाय द्वारा मारा गया है। कुछ स्थानों पर निर्दोष लोगों को मारे जाने की भी सूचनाएं हैं। इन हिंसक घटनाओं के पीछे भी हिन्दू एवं मुस्लिम जनता के बीच व्याप्त अविश्वास का माहौल है। ये घटनाएं न हों इसके लिए जिम्मेदार वास्तविक कारणों को ढूंढकर समाप्त करना होगा, केवल धर्म-निरपेक्षता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव के गीत अलापने से कुछ नहीं होगा।


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