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  • अध्याय - 31 : स्वतंत्र भारत में साम्प्रदायिक हिंसा

     23.01.2018
    अध्याय - 31 : स्वतंत्र भारत में साम्प्रदायिक हिंसा

    अध्याय - 31


    स्वतंत्र भारत में साम्प्रदायिक हिंसा

    मुहम्मद अली जिन्ना ने मुसलानों के लिए भारत का विभाजन करवाकर पाकिस्तान का निर्माण करवाया था। इस कारण मुसलमानों को लगता था कि जब पाकिस्तान बनेगा, तब भारत के सारे मुसलमान अपने अलग देश में सुख से रहेंगे किंतु जब पाकिस्तान बना तो 7 अगस्त 1947 को जिन्ना अकेला ही वायसराय के डकोटा हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान चला गया और भारतीय क्षेत्रों में रह गए करोड़ों मुसलमान संतोष करके बैठ गए और लाखों मुसलमान अपने परिवारों को लेकर नव-निर्मित पाकिस्तान की ओर भागने लगे। ठीक इसी तरह पाकिस्तानी क्षेत्रों से लाखों हिन्दू भी अपना सबकुछ गंवाकर भारत की ओर भागे। एक अनुमान के अनुसार 1 करोड़ 14 लाख लोगों ने अपने देश बदले तथा 5 से 10 लाख मनुष्य साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए। इसके बावजूद करोड़ों मुसलमान भारत में ही रह गए जो कि भारत की बची हुई जनसंख्या का लगभग 12 से 15 प्रतिशत थे। इनमें निर्धन एवं अशिक्षित मुसलमानों की संख्या अधिक थी।

    विभाजन एवं हिंसा से संत्रस्त हिन्दुओं को लगता था कि चूंकि मुसलानों ने हिन्दुओं का रक्त बहाकर, भारत भूमि का बंटावारा कर लिया है और अपने लिए अलग देश ले लिया है इसलिए उन्हें भारत में बने रहने का अधिकार नहीं है जबकि भारत में रह गए मुसलमान न तो पाकिस्तान जाने की स्थिति में थे और न वे अपनी साम्प्रदायिक कट्टरता को छोड़ने को तैयार थे। इस कारण आजाद भारत में भी साम्प्रदायिक समस्या ज्यों की त्यों बनी रही तथा देश भर में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दंगे होते रहे जो आज भी जारी हैं। स्वतंत्र भारत की कुछ बड़ी साम्प्रदायिक हिंसाओं का संक्षिप्त उल्लेख यहाँ किया जा रहा है।

    अलवर-भरतपुर में मेवों द्वारा हिंसा

    राजपूताने की अलवर एवं भरतपुर रियासतों में मेव जाति ने लम्बे समय से आतंक फैला रखा था जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं ने भी मेवों पर आक्रमण किए। इन दंगों में भरतपुर रियासत में मुसलमानों के 209 गाँव पूर्णतः नष्ट हो गए। मेवों के नेता, भरतपुर रियासत के उत्तरी भाग, गुड़गांव और अलवर रियासत के दक्षिणी क्षेत्रों को मिलाकर मेवस्तान बनाने का स्वप्न देख रहे थे किंतु अलवर राज्य के प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे ने मेवों को सख्ती से कुचला।

    खरे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे थे, इसलिए कांग्रेसी नेताओं ने खरे पर कट्टर हिन्दूवादी होने के आरोप लगाए। कांग्रेसियों का कहना था कि खरे ने हिन्दुओं को मेवों के विरुद्ध भड़का कर दंगा करवाया। अक्टूबर 1947 में सरदार पटेल ने दिल्ली में रियासती प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई। इस सभा में सरदार पटेल ने अलवर के राजा तेजसिंह तथा प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे को चेतावनी देते हुए कहा कि जो लोग सांप्रदायिकता फैलाने का काम कर रहे हैं, वे देश के शत्रु हैं। नारायण भास्कर खरे का कहना था कि सरदार पटेल, अलवर राज्य के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं जिसका उन्हें कोई अधिकार नहीं है। 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हो गई जिसमें अलवर नरेश तेजसिंह और उसके प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे का हाथ होने का संदेह किया गया। भारत सरकार ने 7 फरवरी 1948 को तेजसिंह को दिल्ली बुलाकर कनाट प्लेस पर स्थित मरीना होटल में नरजबंद कर दिया तथा अलवर राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। राज्य के दीवान खरे को पदच्युत करके दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया।

    रियासती विभाग भरतपुर राज्य की गतिविधियों से भी बड़ा खिन्न था। इसलिए रियासती विभाग ने भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह के विरुद्ध एक आरोप सूची तैयार की जिसमें राजा पर साम्प्रदायिकता फैलाने के आरोप लगाए गए- महाराजा ने 1 लाख मुसलमानों को राज्य से भगा दिया। महाराजा को प्रसन्नता थी कि उनके राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा था। भरतपुर राज्य में से जाने वाली बांदीकुई-आगरा रेलवे लाइन की सुरक्षा के लिए महाराजा ने कारगर कदम नहीं उठाये। भरतपुर राज्य में शस्त्र व गोला-बारूद तैयार करने के लिए अवैध कारखाना खोला गया तथा जाटों एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र बांटे। महाराजा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में रुचि लेता था। पं. नेहरू ने भी अपने पत्र दिनांक 28 जनवरी 1948 के द्वारा पटेल को अवगत करवाया था कि भरतपुर राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

    भारत सरकार ने 10 फरवरी 1948 को भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह को दिल्ली बुलाया और उनके विरुद्ध एकत्र किए गए आरोपों से अवगत करवा कर उन्हें निर्देश दिए कि वे राज्य प्रशासन का दायित्व भारत सरकार को सौंप दें। अलवर महाराजा तथा प्रधानमंत्री दिल्ली में नजरबंद किए जा चुके थे। इसलिए भरतपुर महाराजा ने अत्यंत अनिच्छा से सहमति प्रदान कर दी। महाराजा के भाई गिरिराजशरण सिंह, जिसके विरुद्ध नेहरू ने सरदार पटेल को लिखा था, को इंगलैण्ड भेज दिया गया। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, महाराजा भरतपुर को सांप्रदायिक आधार पर हत्याएं करने तथा खराब प्रशासन के आरोप में अपदस्थ करके दक्षिण में भेजना चाहते थे जहाँ उन्हें नजरबंद किया जाना था किंतु सरदार पटेल ने महाराजा के भाग्य की रक्षा की। मत्स्य संघ बनने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने अलवर तथा भरतपुर राज्यों के शासकों के विरुद्ध जांच करने हेतु बड़ौदा, ग्वालियर, नवानगर तथा बीकानेर के शासकों की एक समिति नियुक्त की किंतु इन शासकों ने अपने भ्रातृ महाराजाओं की जांच करने से मना कर दिया। इस पर भारत सरकार के प्रतिनिधियों को इस कार्य के लिए नियुक्त किया गया। जांच में न केवल महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर निर्दोष पाये गए अपितु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे के विरुद्ध भी किसी तरह का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ। भारत सरकार ने इन सबको दोषमुक्त घोषित कर दिया तथा इनके विरुद्ध किसी तरह की कानूनी कार्यवाही नहीं की।

    अजमेर में साम्प्रदायिक हिंसा

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अजमेर में साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हो गए। 27 अगस्त 1947 को कुछ मुस्लिम एक मस्जिद के समक्ष नमाज पढ़ने के लिए एकत्रित हुए। उनका निश्चय अजमेर में साम्प्रदायिक दंगा फैलाने का था। इन लोगों के कुछ समूहों ने अजमेर के लगभग आधा दर्जन मौहल्लों पर हमले किए। उन्होंने हिन्दू महाबीर दल शोभायात्रा पर भी हमला किया। उस समय अजमेर में निकटर्वी रियासतों से लगभग 10 हजार शरणार्थी शरण लिए हुए थे। वे इन हमलों से तनाव में आ गए। उस समय अजमेर में मुस्लिम लीग सक्रिय थी। उसने मुसलमानों को अजमेर से निकालकर पाकिस्तान भेजने की योजना तैयार की। इससे अजमेर में तनाव चरम पर पहुँच गया फिर भी स्थिति नियंतत्रण में रही। 5 दिसम्बर 1947 को दरगाह बाजार में एक मुस्लिम लड़के और एक सिंधी लड़के के बीच एक ग्रामोफोन का बेचान हुआ। इस बेचान के मामले में दोनों युवक झगड़ पड़े। इस झगड़े में तीन सिंधी युवकों को चोट आई। यह झगड़ा पूरे बाजार में फैल गया। उसके बाद अन्य बाजारों में भी दोनों समुदायों ने एक दूसरे की दुकानों पर आक्रमण किए। इस कारण 41 व्यक्ति घायल हो गए। इनमें से तीन मुस्लिम लड़कों एवं एक सिंधी लड़के की मृत्यु हो गई।

    6 दिसम्बर को एक मुस्लिम मौहल्ले में ड्यूटी पर तैनात हिन्दू कांस्टेबल गायब हो गया। इस कांस्टेबल को ढूंढने के लिए कुछ हिन्दू एवं मुस्लिम मौहल्लों की तलाशी हुई जिसमें कांस्टेबल तो नहीं मिला किंतु दो तोपें, एक मजल लोडिंग गन, एक ब्रीच लोडिंग गन, दस तलवारें, चार खंजर, गन पाउडरों से भरी शीशियां तथा 300 कारतूस बरामद हुए। इस बरामदगी के बाद हिन्दुओं पर 75 हजार रुपये तथा मुसलमानों पर 3 हजार रुपये का अर्थदण्ड लगाया गया। हिन्दुओं ने स्वयं पर लगाए गए अर्थदण्ड की मात्रा पर भारी विरोध किया। 13 दिसम्बर को गुमशुदा कांस्टेबल का शव प्राप्त कर लिया गया। जब इस कांस्टेबल की शवयात्रा नया बाजार के पास से निकली तो कुछ लोगों ने दुकानों में लूट मचा दी। जब लूटमार पूरे अजमेर में फैलने लगी तो पुलिस तथा सेना को कुछ स्थानों पर फायरिंग करनी पड़ी। मध्याह्न पश्चात् 2.30 बजे अजमेर में कर्फ्यू लगा दिया गया। चीफ कमिश्नर को एक अनियंत्रित भीड़ पर लाठी चार्ज करने तथा गोली चलाने के निर्देश देने पड़े। 16 दिसम्बर को सेना ने फिर से एक भीड़ पर गोली चलाई जो शहर में लूटपाट कर रही थी। इस प्रकार 5 दिसम्बर से 16 दिसम्बर तक अजमेर में दंगाइयों की कार्यवाही तथा पुलिस एवं सेना की गोली से 47 लोगों की मृत्यु हो गई।

    दिल्ली से सेना बुलानी पड़ी जिसने शहर में सख्त पैट्रोलिंग आरंभ की। दिल्ली क्षेत्र के कमाण्डिंग अधिकारी जनरल राजेन्द्रसिंह ने अजमेर का दो दिवसीय भ्रमण किया। पं. नेहरू ने इण्टर डोमिनियन माइनोरिटीज के अध्यक्ष एन. आर. मलकानी को एक तार देकर सूचित किया कि उन्हें अजमेर में हुए दंगों पर गहरा खेद है किंतु दरगाह को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। नेहरू ने मलकानी को यह भी सूचित किया कि वे शीघ्र ही अजमेर का दौरा करेंगे। पाकिस्तान सरकार के शरणार्थी एवं पुनर्वास मंत्री गजनफर अली खाँ ने भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल को अजमेर की स्थिति के सम्बन्ध में टेलिग्राम किया। 17 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने उसे जवाब में टेलिग्राम भिजवाकर सूचित किया कि अजमेर में स्थिति नियंत्रण में है तथा एक सैनिक टुकड़ी दरगाह की रक्षा कर रही है।

    जवाहरलाल नेहरू अजमेर के दंगों पर बहुत चिंतित थे तथा वे अजमेर के अधिकारियों एवं पुलिस के रवैये से प्रसन्न नहीं थे। नेहरू ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में दो महत्त्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाया। पहला बिंदु यह था कि यदि इस घटना की बड़े स्तर पर पुनरावृत्ति हुई तो उसके भयानक परिणाम होंगे। दूसरा यह कि दरगाह के कारण अजमेर पूरे भारत में तथा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यदि दरगाह को कुछ हुआ तो उसका प्रचार पूरे भारत में एवं पूरे विश्व में होगा। इससे भारत सरकार की छवि को धक्का पहुँचेगा।

    नेहरू का पत्र मिलने के बाद सरदार पटेल ने अजमेर प्रकरण पर एक वक्तव्य जारी किया- '15 दिसम्बर 1947 से लेकर अब तक हुए दंगों में 5 हिन्दू तथा 1 मुसलमान मरा है। साथ ही पुलिस फायरिंग में 21 हिन्दू तथा 62 मुसलमान घायल हुए हैं। मिलिट्री की फायरिंग में 8 हिन्दू तथा 7 मुसलमान मारे गए हैं और 2 हिन्दू एवं 2 मुसलमान घायल हुए हैं। सम्पत्ति का भयानक नुक्सान हुआ है। अधिक नुक्सान स्टेशन रोड तथा इम्पीरियल रोड पर स्थित मुसलमानों की आठ बड़ी दुकानों में हुआ है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य दुकानों यथा स्टेशनरी, चूड़ी, आलू, कोयला, किताबों आदि की दुकानों में भी नुक्सान हुआ है। कुल 41 दुकानें लूटी गई हैं तथा 16 दुकानें जलाई गई हैं। इनमें से तीन दुकानें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। सम्पत्ति को नष्ट होने से बचाने तथा दंगाइयों को बंदी बनाने के लिए सघन प्रयास किए गए हैं। दरगाह इस सबसे पूरी तरह सुरक्षित रही है।'

    सरदार पटेल ने दरगाह से जुड़े धार्मिक लोगों से अपील की कि वे इसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखें। उन्होंने सरकार की ओर से आशा व्यक्त की कि इस ऐतिहासिक नगरी में शीघ्र ही फिर से शांति स्थापित होगी।

    नेहरू ने अजमेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया किंतु अचानक ही पं. नेहरू के भतीजे की मृत्यु हो गई। इससे यात्रा को निरस्त करना पड़ा। यह यात्रा पूरे देश को यह दिखाने के लिए की जा रही थी कि सरकार इस प्रकार की स्थिति से बहुत चिंतित है तथा इससे निबटने में नेता व्यक्तिगत रूप से रुचि ले रहे हैं। नेहरू का मानना था कि दिल्ली के बाद देश में अजमेर ही दूसरा महत्वपूर्ण नगर है जहाँ हो रही घटनाओं का पूरे देश की नीतियों पर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए नेहरू ने अपने प्रमुख निजी सचिव एच. आर. वी. आर. आयंगर से कहा कि वे अजमेर जाकर अजमेर की जनता से नेहरू के न आने के लिए नेहरू की ओर से क्षमा मांगें। आयंगर ने 20 दिसम्बर 1947 को अजमेर का दौरा किया। 
    उसने अजमेर में हुए नुक्सान वाले स्थलों का निरीक्षण किया तथा एडवाइजरी कौंसिल के सदस्यों तथा मुकुट बिहारी लाल एवं बालकृष्ण कौल से भी विचार-विमर्श किया। अगले दिन उसने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डलों, खादिमों, आर्य समाज के सदस्यों, महासभा के सदस्यों एवं प्रेस प्रतिनिधियों से बात की।

    आयंगर के इस यात्रा से अजमेर का चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद बुरी तरह घबरा गया। उसे लगा कि इस यात्रा से यह छवि बनी है कि चीफ कमिश्नर न केवल स्थिति को संभालने में बुरी तरह विफल रहा अपितु उसने सरकार को पूरे तथ्य बताने में भी बेईमानी बरती है। इसलिए शंकर प्रसाद ने गृहमंत्री सरदार पटेल के निजी सचिव वी. शंकर को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि चीफ कमिश्नर को कम से कम यह ज्ञात होने का अधिकार होना चाहिये था कि उसने ऐसा क्या किया है जो उस पर विश्वास नहीं किया जा रहा है तथा जनता से उसके सम्बन्ध में प्रश्न किए जा रहे हैं। सरदार पटेल ने आयंगर की अजमेर यात्रा को पसंद नहीं किया।

    23 दिसम्बर 1947 को पटेल ने आयंगर को पत्र लिखकर फटकारा कि इतने वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते उसे यह सोचना चाहिये था कि उसकी इस यात्रा के क्या गंभीर प्रभाव होंगे? उसकी इस यात्रा से अजमेर के चीफ कमिश्नर जैसे वरिष्ठ अधिकारी की कैसी विचित्र स्थिति हुई है जो कि एक प्रांत का मुखिया है? ऐसी स्थिति में चीफ कमिश्नर को पूरा अधिकार है कि वह मंत्रियों अथवा अपने विभाग के सचिव के अतिरिक्त हर अधिकारी का विरोध करे। पटेल ने आयंगर की इस बात के लिए भी भर्त्सना की कि उसने अजमेर-मेरवाड़ा को लेकर प्रेस में वक्तव्य जारी किया। इन परिस्थितियों में दिए गए इस वक्तव्य से ऐसा लगा है कि चीफ कमिश्नर द्वारा अजमेर में परिस्थति को संभालने के कार्य को लेकर प्रधानमंत्री में असंतोष है। यदि प्रधानमंत्री स्वयं नहीं जा सकते थे तो वे सरदार पटेल को अथवा गोपालस्वामी को अथवा किसी अन्य मंत्री को जाने के लिए कह सकते थे।

    23 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने नेहरू को सीधे ही एक पत्र लिखकर कहा कि आयंगर की अजमेर यात्रा आश्चर्य में डालने वाली एवं धक्का पहुँचाने वाली थी। इस यात्रा के दो ही अर्थ निकलते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री द्वारा अजमेर को लेकर दिए गए वक्तव्य से असंतुष्ट थे। दूसरा यह कि वे अजमेर के स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई कार्यवाही से असंतुष्ट थे। इसलिए प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र अभिमत जानने के लिए अपने प्रमुख निजी सचिव को अजमेर यात्रा पर भेजा। चीफ कमिश्नर या तो मंत्री के अधीन होता है या फिर सम्बन्धित विभाग के सचिव के अधीन होता है। पटेल ने चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद की प्रशंसा करते हुए लिखा कि वह यू पी का सबसे योग्यतम अधिकारी है जिसकी दक्षता, ईमानदारी एवं निष्पक्षता को चुनौती नहीं दी जा सकती। आयंगर की इस यात्रा ने शंकर प्रसाद को दुखी किया है तथा उसकी छवि को कमजोर किया है। कौल तथा भार्गव द्वारा चीफ कमिश्नर के विरुद्ध एक अभियान चलाया गया था। इस यात्रा से आयंगर को कौल तथा भार्गव के बारे में सही जानकारी हो गई होगी। अतः आशा की जानी चाहिये कि अजमेर की यह यात्रा, इस प्रकार की अंतिम यात्रा होगी।

    जवाहरलाल नेहरू ने उसी दिन पटेल को जवाब भिजवाया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह यात्रा इन परिस्थितियों में व्यक्तिगत प्रकार की थी। इस यात्रा का उद्देश्य किसी अधिकारी अथवा उसके द्वारा किए गए कार्य पर कोई निर्णय देना नहीं था। यह जनता से सम्पर्क करने के लिए, विशेषतः पीड़ितों से सम्पर्क करने के लिए की गई ताकि उनका विश्वास जीता जा सके तथा उनके हृदय से भय को निकाला जा सके। नेहरू ने सहमति व्यक्त की कि शंकर प्रसाद एक अच्छे और निष्पक्ष अधिकारी हैं किंतु यह समझ से परे है कि प्रधानमंत्री द्वारा किसी व्यक्ति को अजमेर भेज देने से उसकी प्रतिष्ठा अथवा छवि को धक्का कैसे पहुँच गया! किसी भी परिस्थिति में जनता पर पड़ने वाला प्रभाव महत्वपूर्ण है न कि एक अधिकारी की प्रतिक्रिया। नेहरू ने लिखा कि जब लोगों के दिलों में घबराहट हो तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तब केवल विशुद्ध प्रशासन कैसे काम कर सकता है! इससे तो कोई बड़ा हादसा घटित हो सकता है। किसी अधिकारी की प्रतिष्ठा अथवा हमारी स्वयं की प्रतिष्ठा एक द्वितीय मुद्दा है यदि अन्य बड़े मुद्दे दांव पर लगे हुए हों। यदि हम प्रजा के साथ सही आचरण करेंगे तो हमारी प्रतिष्ठा स्वयं ही बन जायेगी। अधिकारियों के मामले में भी ऐसा ही है।

    नेहरू ने सरदार को लिखा कि आपके और मेेरे बीच में इस प्रकार की घटनाओं की प्रवृत्ति तथा कठिनाइयां उत्पन्न होने से मैं स्वयं बहुत अप्रसन्न हूँ। इससे ऐसा लगता है कि आपकी और मेरी कार्य करने की प्रवृत्ति अलग-अलग प्रकार की है। यद्यपि आप और मैं एक दूसरे का बहुत आदर करते हैं तथापि हम दोनों के बीच जो विषय खड़ा हो गया है, इसे हम सबके द्वारा बहुत सावधानीपूर्वक लिया जाना चाहिये। यदि मुझे प्रधानमंत्री रहना है तो मुझ पर इस तरह के प्रतिबंध से मुक्ति होनी चाहिये। अन्यथा मेरे लिए यही उचित है कि मैं कुर्सी छोड़ दूं। मैं जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता और न यह चाहता हूँ कि आप ऐसा करें। इसलिए हम दोनों को इस परिस्थिति पर गहरा विचार करना चाहिये ताकि हमारे निर्णय राष्ट्र के लिए हितकारी हो सकें। हमने और आपने देश की लम्बी सेवा की है। यदि दुर्भाग्य से आपको अथवा मुझे सरकार से हटना पड़े तो इसे प्रतिष्ठापूर्ण एवं गरिमापूर्ण विधि से होने देना चाहिये। मैं प्रसन्नता पूर्वक त्यागपत्र देने और सत्ता आपको सौंपेने के लिए तैयार हूँ।

    सरदार पटेल ने नेहरू के इस पत्र का प्रत्युत्तर दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह सही है कि विभिन्न विषयों एवं मुद्दों पर आपके और मेरे काम करने के ढंग में अंतर है किंतु निष्कर्षतः अथवा अंतिम निर्णय के रूप में यह कहा जा सकता है कि आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं है। हम दोनों देश के भले के लिए एक समान उद्देश्य से काम कर रहे हैं। पटेल ने लिखा कि आयंगर का अजमेर भेजा जाना गलत था। मैं आपकी स्वतंत्रता को सीमित नहीं करना चाहता और न ही मैंने पहले कभी ऐसा किया है। न मेरा उद्देश्य आपके लिए किसी प्रकार की कोई समस्या खड़ी करना है किंतु जब यह हम दोनों को ही अपने उत्तरदायित्वों के क्षेत्र के आधारभूत प्रश्न, अधिकार तथा कार्यों में विरोधाभास स्पष्ट हों तब यह हमारे उन उद्देश्यों के लिए हितकारी नहीं होगा जो कि हम दोनों ही करना चाहते हैं।

    इस पत्र के मिलने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल को गांधीजी के निवास पर मिलने का सुझाव दिया ताकि इस विषय पर आगे विचार-विमर्श किया जा सके। 6 जनवरी 1948 को नेहरू ने गांधीजी को एक नोट भिजवाया तथा उसकी एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। सरदार ने नेहरू के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें संदेश भिजवाया कि जो भी समय उन्हें उचित लगता हो, वे गांधीजी से तय कर लें। सरदार ने भी एक नोट गांधीजी को भिजवाया तथा उसकी प्रति नेहरू को दी।

    नेहरू ने अपने नोट में गांधीजी को अजमेर प्रकरण के सम्बन्ध में घटी घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी दी तथा कुछ प्रश्न उठाये। क्या प्रधानमंत्री इस प्रकार का कदम उठाने के लिए अधिकृत थे। इस बात का निर्णय किसे लेना था? यदि प्रधानमंत्री को इस प्रकार का कदम उठाने का अधिकार नहीं था, और न ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार था तो वे इस पद पर ढंग से काम नहीं कर सकेंगे और न ही अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकेंगे। नेहरू ने इस नोट में गांधी को लिखा कि यह तो पृष्ठभूमि है। 
    किंतु निरंतर उठ रही व्यावहारिक कठिनाईयों के सम्बन्ध में सिद्धांत क्या रहेगा? यदि सीधे शब्दों में कहें तो कैबीनेट में कुछ व्यवस्थाएं करने की आवश्यकता है जो एक व्यक्ति पर उत्तरदायित्व का निर्माण कर सकें। वर्तमान परिस्थितियों में या तो मैं जाऊँ या सरदार जाएं। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं जाने को तैयार हूँ। मेरा या हम दोनों में से किसी एक का सरकार से बाहर जाने का अर्थ यह नहीं है कि हम आगे से एक दूसरे का विरोध करेंगे। हम सरकार के भीतर रहें अथवा बाहर, हम विश्वसनीय कांग्रेसी रहेंगे, विश्वसनीय साथी रहेंगे तथा हम अपने कार्यक्षेत्र में फिर से एक साथ आने के लिए कार्य करेंगे।

    सरदार पटेल ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री के दायित्वों के सम्बन्ध में नेहरू की धारणा से असहमति व्यक्त की। यदि प्रधानमंत्री इसी प्रकार कार्य करेगा तो वह एक निरंकुश शासक बन जायेगा। प्रधानमंत्री, सरकार में, बराबर के मंत्रियों में सबसे पहला है। वह अपने साथियों पर कोई बाध्यकारी शक्तियां नहीं रखता। पटेल ने गांधी को लिखा कि प्रधानमंत्री ने अपने नोट में लिखा है कि यदि प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के बीच सामंजस्य नहीं बनता है तो एक को जाना होगा। यदि ऐसा ही होना है तो मुझे जाना चाहिये। मैंने सक्रिय सेवा का दीर्घ काल व्यतीत किया है। प्रधानमंत्री देश के जाने-माने नेता हैं तथा अपेक्षाकृत युवा हैं। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय छवि स्थापित की है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि मेरे और उनके बीच में निर्णय उनके पक्ष में होगा। इसलिए उनके कार्यालय छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं है। इन दोनों नेताओं के मध्य, गांधीजी के समक्ष होने वाला विचार-विमर्श गांधीजी के उपवास के कारण स्थगित कर देना पड़ा। इसके अन्य कारण भी थे। कश्मीर समस्या अपने चरम पर पहुँच गई थी तथा देश में साम्प्रदायिक तनाव भी अपने उच्चतम स्तर पर था। भारत सरकार इस समय संक्रांति काल में थी। एक छोटा सा धक्का भी बहुत बड़ा नुक्सान पहुँचा सकता था। अंत में गांधी की हत्या ने नेहरू और पटेल को एक किया। इसी के साथ पटेल और नेहरू के बीच रहने वाला स्थाई विरोध और मतभेद काल के गर्त में समा गए।

    साम्प्रदायिकता के प्रश्न पर गांधी वध

    जिस समय भारत स्वतंत्र हुआ, उस समय दोनों देशों के सैनिक, आर्थिक एवं वित्तीय संसाधनों का भी बंटवारा गया। अखण्ड भारत के जो प्रांत पाकिस्तान में मिलने वाले थे, उन प्रांतों पर भारत सरकार का कुछ वित्तीय कर्ज था जो उन प्रांतों द्वारा भारत सरकार को लौटाया जाना था। यह तय किया गया कि पाकिस्तान इस कर्ज को चार साल में चुकाएगा। भारत सरकार की तरफ से पाकिस्तान को 75 लाख रुपए दिए जाने थे। भारत सरकार ने 20 लाख रुपए तुरंत ही पाकिस्तान सरकार को दे दिए तथा शेष 55 लाख रुपए तब दिए जाने थे जब कि पाकिस्तान में जा रहे प्रांत अपना कर्ज भारत सरकार को चुका देंगे। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा भारत सरकार से 55 करोड़ रुपए की मांग की। इस पर सरदार पटेल ने कहा कि पाकिस्तान को यह राशि काश्मीर समस्या का समाधान होने के बाद दी जाएगी। पटेल का कहना था कि पाकिस्तान इस राशि का उपयोग भारत के विरुद्ध हथियार खरीदने में करेगा। नेहरू मंत्रिमण्डल ने पटेल के इस निर्णय पर स्वीकृति दे दी। जिन्ना ने इस राशि के लिए माउंटबेटन पर दबाव डाला। माउंटबेटन ने गांधीजी से कहा कि वे नेहरू और पटेल से बात करके पास्तिान को 55 लाख रुपए दिलवाएं। पटेल ने गांधीजी को साफ इन्कार कर दिया तो गांधीजी 13 जनवरी 1948 को पटेल के विरुद्ध दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ गए। पटेल नाराज होकर बम्बई चले गए। नेहरू ने 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दे दिए।

    विचित्र स्थिति थी, जिस देश से हिन्दुओं की कटी हुई लाशों की ट्रेनें आ रही थीं और जो देश भारत के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा था, भारत उसी देश को 55 करोड़ रुपए दे रहा था जबकि अभी तक पाकिस्तान के प्रांतों का कर्जा वापिस लौटना बाकी था। उन्हीं दिनों गांधीजी ने घोषणा की कि वे जिन्ना को मनाने के लिए एक डेलिगेशन के साथ भारत-पाकिस्तान की सीमा पर करके पाकिस्तान जाएंगे ताकि पाकिस्तान को पुनः भारत में मिलाया जा सके। जब देश की जनता को गांधीजी के इस हठ की जानकारी मिली तो देश में गांधीजी के विरुद्ध आक्रोश फैल गया।

    उन्हीं दिनों एक और घटना हुई। पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिन्दू शरणार्थी अपना सर्वस्व गांवाकर भारत आ रहे थे, उनमें से बहुत से हिन्दू दिल्ली भी आए और उन्होंने हिन्दू मंदिरों, गुरुद्वारों तथा स्कूलों में शरण ली। जब दिल्ली के समस्त सार्वजनिक स्थल शरणार्थियों से भर गए तो पाकिस्तान से आए कुछ हिन्दू शरणार्थी दिल्ली की एक मस्जिद में घुस गए। जब गांधीजी को यह ज्ञात हुआ तो वे मस्जिद के सामने धरने पर बैठ गए और शरणार्थियों से मस्जिद खाने करवाने के लिए सरकार पर दवाब बनाने लगे। सरकार को हिन्दू शरणार्थियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करनी पड़ी। जिस समय हिन्दू शराणार्थियों को मस्जिद से उठाकर फैंका जा रहा था, उस समय दिल्ली में तेज बारिश हो रही थी जिसके कारण औरतें और बच्चे ठण्ड से ठिठुरने तथा रोने लगे। कहा जाता है कि नाथूराम गोडसे नामक एक युवक ने यह दृश्य अपनी आंखों से देखा। हिन्दू बच्चों को अपने ही देश में पिटते, रोते और ठण्ड तथा भूख से कांपते देखकर गोडसे का मन रोने लगा। उसने गांधीजी का वध करने का प्रण लिया। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने अपना प्रण पूरा किया और दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधीजी को गोली मार दी। गोडसे ने अपने कृत्य को गांधी वध बताते हुए, इसका निर्णय इतिहास पर छोड़ दिया कि अगर भविष्य में तटस्थ इतिहास लिखा जाएगा तो वह अवश्य ही गोडसे के साथ न्याय करेगा।

    गुजरात साम्प्रदायिक हिंसा ई.1969

    18 सितम्बर 1969 को अहमदाबाद में मुसलमानों की एक भीड़ ने एक हिन्दू मंदिर पर आक्रमण किया जिसकी प्रतिक्रिया में दलित कहे जाने वाले हिन्दुओं ने मुसलमानों की चालों (बस्तियों) पर आक्रमण किए। शीघ्र ही ये दंगे गुजरात के वड़ोदरा, मेहसाना, नाडियाड एवं गोडाल आदि कई शहरों एवं कस्बों में फैल गए। हिन्दू और मुसलमानों की भीड़ एक दूसरे की बस्तियों एवं दुकानों पर आक्रमण करने लगी। सरकार द्वारा इन दंगों को रोकने की भरसक कार्यवाही किए जाने के बावजूद ये दंगे एक सप्ताह तक जारी रहे। सितम्बर 1969 में हुए गुजरात के दंगे, ई.1947 के विभाजन के पश्चात् हुए तब तक के सबसे बड़े हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे थे। इन दंगों में 660 लोग मारे गए जिनमें से 430 मुसलमान एवं 230 हिन्दू थे। कुल 1,074 लोग घायल हुए तथा 48 हजार लोगों को अपनी सम्पत्तियों से हाथ धोना पड़ा। गैर आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इन दंगों में 2,000 लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। गुजरात की हितेन्द्र देसाई कांग्रेस सरकार ने जस्टिस रेड्डी आयोग का गठन किया जिसने कतिपय हिंदू संगठनों को इन दंगों को फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया।

    खालिस्तान आंदोलन

    देश की आजादी के बाद सिक्खों ने अकाली दल के नेतृत्व में सिक्ख बहुल प्रांत के निर्माण हेतु आंदोलन चलाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1 नवम्बर 1966 को पंजाब के पूर्वी क्षेत्रों में स्थित पहाड़ी क्षेत्रों को पंजाब से अलग करके हिमाचल प्रदेश का निर्माण किया। दिल्ली से लगते हुए मैदानी क्षेत्रों को हरियाणा प्रांत के रूप में अलग किया गया तथा चण्डीगढ़ नामक केन्द्र प्रशासित क्षेत्र का निर्माण करके उसे हरियाणा एवं पंजाब की राजधानी बनाया गया। इस प्रकार सिक्खों को सिक्ख बहुल पंजाब मिल गया। ई.1970 में सिक्खों ने पंजाब प्रांत के लिए स्वायत्तता की मांग की ताकि उन्हें दिल्ली की गैर-सिक्ख बहुल सरकार के प्रभाव से मुक्ति मिल सके। ई.1971 में जब देश में आपात काल लगाया तथा देश का संविधान स्थगित किया तब लगभग 1 लाख 40 हजार लोगों को जेलों में ठूंसा गया जिनमें से 40 हजार सिक्ख थे। इसलिए सिक्ख समुदाय इंदिरा गांधी से नाराज हो गया। आपाकाल के हटाने के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी ने अकाली दल को परास्त करने के लिए सिक्ख नेता जरनैलसिंह भिण्डरावाला का समर्थन किया।

    ई.1980 के दशक में सिखों के लिए अलग खालिस्तान की मांग उठी और जरनैल सिंह भिंडरांवाला के नेतृत्व में खालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया। उसने स्वर्ण मंदिर के भीतर दरबार साहिब को अपना केन्द्र बनाया तथा सिक्खों के लिए अलग देश की मांग करने लगा। बहुत से सिक्ख युवकों ने आतंकवाद का मार्ग पकड़ लिया और वे पंजाब में हिन्दुओं की हत्या करने लगे। उन सार्वजनिक स्थलों पर बम फैंके जाने लगे जहाँ हिन्दू बड़ी संख्या में उपस्थित होते थे। हिन्दू परिवारों को बसों तथा ट्रेनों से खींचकर मारा जाने लगा। पंजाब के कई बड़े हिन्दू नेताओं की उनके घरों में घुसकर हत्या कर दी गई। सिक्खों द्वारा किए जा रहे कत्लेआम को सिक्ख आतंकवादी घल्लूघारा कहते थे। खालिस्तान आंदोलन को विदेशों में रहने वाले सिक्ख वित्तीय और राजनैतिक समर्थन दे रहे थे। कुछ सिक्ख आतंकवादियों ने कनाडा में एक यात्री विमान को हाईजैक करके बम से नष्ट कर दिया। इस समय भिंडरावाले को पाकिस्तान से समर्थन मिलने लगा था।

    प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 3 से 6 जून 1984 को स्वर्णमंदिर परिसर में सेना भेजकर हरिमंदिर साहिब को जनरैल सिंह भिंडरावाला तथा उसके समर्थकों से मुक्त कराने के लिए आपरेशन ब्लू स्टार किया। भिण्डरावाला तथा उसके सैंकड़ों साथियों को सेना द्वारा मार गिराया गया। मार्क टुली एवं सतीश जैकब के अनुसार इस दौरान सिक्खों के जत्थे अमृतसर के लिए चल पड़े जिन पर सेना ने टैंकों से बम बरसाए। बहुत से गुरुद्वारों में भी उत्तेजना फैल गई इसलिए वहाँ भी सैनिक एवं पुलिस कार्यवाहियां करनी पड़ीं। भारतीय सेना के अनुसार इस ऑपरेशन में 500 सिक्ख मारे गए जबकि सेना के 83 जवान शहीद हुए और 236 जवान घायल हुए। गैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस ऑपरेशन में 20 हजार लोग और 5,000 सैनिक मारे गए। ब्लू स्टार ऑपरेश के कुछ वर्ष बाद एक भाषण में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्वीकार किया कि इस ऑपरेशन में सेना के 700 जवान शहीद हुए थे।

    सिक्खों के संहार के लिए कुछ सिक्ख संगठनों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बदला लेने का प्रण किया। तथा 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद उत्तर भारत में सिक्खों के विरुद्ध व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा का विस्फोट हुआ। कांग्रेस पर आरोप है कि उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पुलिस एवं अर्द्धसैनिक सुरक्षा बलों के साथ मिलकर सिक्खों का योजनाबद्ध ढंग से नरसंहार किया। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन के अनुसार इस साम्प्रदायिक हिंसा में 10 से 17 हजार सिक्खों को जीवित जलाया गया। उनके घरों, दुकानों, कारखानों एवं अन्य सम्पत्तियों का विनाश किया गया तथा दिल्ली आदि बड़े शहरों से 50 हजार सिक्खों को अपने घर छोड़कर, सिक्ख बहुल क्षेत्रों में भाग जाना पड़ा तथा गुरुद्वारों में शरण लेनी पड़ी।

    सिक्ख आतंकवादी, इंदिरा गांधी की हत्या करके ही शांत नहीं हुए। उन्होंने ब्लू स्टार ऑपरेशन के समय के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल ए. एस. बैद्य की भी 10 अगस्त 1986 को हत्या कर दी। सिक्ख आतंकियों ने पंजाब पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक जे. एफ. रिबेरो पर भी घातक हमला किया किंतु वे बच गए। ई.1992 में कांग्रेस पार्टी के नेता सरदार बेअंतसिंह पंजाब के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर सिक्ख आतंकवाद का सफाया किया। पंजाब पुलिस के महानिदेशक के. पी. एस. गिल की इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका रही। 31 अगस्त 1995 को बब्बर खालसा इण्टरनेशनल के सदस्य दिलावरसिंह बब्बर ने चण्डीगढ़ में आत्मघाती बम-विस्फोट करके मुख्यमंत्री बेअंतसिंह की हत्या कर दी। इस कार्य में बलवंतसिंह नामक एक और युवक भी सम्मिलित था जिसे बाद में कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। सरदार बेअंतसिंह के बलिदान के बाद पंजाब में शांति हो गई तथा खालिस्तान आंदोलन शांत हो गया।

    शाहबानो प्रकरण में साम्प्रदायिक तुष्टिकरण

    ई.1984 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रहे थे। इस प्रयास में वे भारतीय राजनीति में घुसी सांप्रदायिक दलदल में भी फंसते जा रहे थे। 23 अप्रैल 1985 को सुप्रीम कोर्ट ने 62 साल की एक मुस्लिम महिला शाहबानो को तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का आदेश सुनाया। राजीव गांधी ने इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया किंतु देश के मुसलमानों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का विरोध करना आरम्भ किया तो राजीव गांधी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। मई 1986 में राजीव गांधी को मुसलमान समुदायों के दबाव में पूरी तरह झुकना पड़ा। मुसलमान चाहते थे कि उनके मजहब से छेड़छाड़ न की जाए। राजीव गांधी ने उनकी यह इच्छा पूरी की। उनकी सरकार ने भारत की संसद में मुस्लिम महिला एक्ट 1986 पारित कराया जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्क्रिय करने के लिए था। बीजेपी और अन्य हिंदू संगठनों ने राजीव गांधी की 'तुष्टिकरण की राजनीति' की कड़ी आलोचना की।

    भागलपुर साम्प्रदायिक हिंसा

    अगस्त 1989 में जिस दिन हिन्दुओं का बिशेरी पूजा का उत्सव था, विश्व हिन्दू परिषद ने राम जन्मभूमि मंदिर हेतु भागलपुर में रामशिला पूजन का कार्यक्रम रखा था। दुर्योग वश उसी दिन मुसलमानों का मुहर्रम भी था। इस कारण एक ओर हिन्दुओं के जुलूस निकल रहे थे तो दूसरी ओर मुसलमानों के भी जुलूस निकल रहे थे। उस दिन दोनों समुदायों में कुछ तनाव हुआ। 22 अक्टूबर को जब भागलपुर के निकट फतेहपुर गांव में राम मंदिर शिला पूजन का जुलूस निकल रहा था तब मुसलमानों ने जुलूस पर पत्थर फैंके। इसके बाद अफवाहें फैलने लगीं कि मुसलमानों ने विश्विद्यालय के 200 हिन्दुओं को मार डाला है। एक और अफवाह फैली कि मुसलमानों ने 31 हिन्दू लड़कों को मारकर उनके शव संस्कृत कॉलेज के कुएं में फैंक दिए हैं। 24 अक्टूबर को भागलपुर जिले के विभिन्न गांवों एवं कस्बों से रामशिला जुलूस भागलपुर के गौशाला मैदान की तरफ बढ़ने लगे जहाँ से उन्हें सामूहिक रूप में अयोध्या की तरफ बढ़ना था। पारबती नामक स्थान से आने वाला एक जुलूस मुस्लिम बहुल तातारपुर क्षेत्र से शांतिपूर्वक निकल रहा था। उनका नेतृत्व महादेव प्रसाद सिंह कर रहे थे जिन्होंने हिन्दुओं को इस क्षेत्र में किसी तरह के नारे लगाने से मना कर दिया था। कुछ समय बाद नाथानगर से एक और विशाल जुलूस तातारपुर से होकर गुजरा जिसके सदस्य कुछ नारे लगा रहे थे। इस जुलूस के साथ पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में पुलिस टुकड़ियां भी चल रही थीं। मुसलमानों ने मुस्लिम हाईस्कूल की छतों पर खड़े होकर हिन्दुओं के जुलूस पर देशी बमों से हमला कर दिया। इस बमबारी में 11 पुलिस वाले बुरी तरह से जख्मी हो गए।

    इसके बाद भागलपुर शहर में हिन्दुओं एवं मुसलमानों में साम्प्रदायिक हिंसा आरम्भ हो गई जो निकटवर्ती 250 गांवों में फैल गई। प्रारम्भ में तो मुसलमानों ने हिन्दुओं पर जानलेवा हमले किए जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुओं के गांव के गांव एकत्रित होकर मुसलमानों पर संगठित हमले करने लगे। भागलपुर के ये दंगे गुजरात में हुए 1969 के दंगों से कहीं अधिक भयावह सिद्ध हुए। पूरे दो माह तक हिंसक घटनाएं होती रहीं जिनमें 1000 लोग मारे गए। मरने वालों में लगभग 900 मुसलमान होने का अनुमान है। इन दंगों में दोनों तरफ के लगभग 50 हजार लोग बेघर हो गए जिनमें से अधिकतर मुसलमान थे।

    काश्मीर घाटी से पाँच लाख हिन्दुओं का पलायन

    आजादी के बाद मुस्लिम बहुल काश्मीर, हिन्दू बहुल जम्मू तथा हिन्दू बहुल लद्दाख को मिलकार जम्मू-काश्मीर प्रांत का गठन किया गया। ई.1948 में पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से काश्मीर पर हमला करवाया तथा काश्मीर का बहुत बड़ा क्षेत्र दबा लिया। यूएनओ की एक समिति द्वारा निश्चित किया गया कि काश्मीर में जनमत के माध्यम से तय किया जाए कि इसे भारत में रखा जाए अथवा पाकिस्तान में जाने दिया जाए। ऐसा तभी किया जाना था जब पाकिस्तान अपनी सेनाएं नियंत्रण रेखा से दूर ले जाता किंतु पाकिस्तान ने इन शर्तों का पालन नहीं किया जिनके कारण जनमत नहीं करवाया जा सका। इसक बाद पाकिस्तान ने काश्मीर घाटी से हिन्दुओं को निकालने के लिए आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जिनके चलते काश्मीर घाटी से लगभग 5 लाख हिन्दू, जम्मू क्षेत्र में पलायन कर गए। इस पर भी पाकिस्तान की गतिविधियां रुकने की बजाए बढ़ती रहीं।

    काश्मीरी पण्डितों का नर-संहार

    काश्मीर घाटी में सितम्बर 1989 से 1990 के आरम्भ में हुई अलग-अलग घटनाओं में लगभग 300 काश्मीरी पण्डितों की हत्या कर दी गई। ई.1990 के आरम्भ में काश्मीर से छपने वाले उर्दू अखबारों- आफताब तथा अलसफा ने काश्मीर में जिहाद करने तथा समस्त हिन्दुओं को काश्मीर से बाहर निकालने का आह्वान किया। मस्जिदों पर लगे लाउड स्पीकरों से एलान किया गया कि सभी हिन्दू अपना सर्वस्व छोड़कर तत्काल काश्मीर घाटी से चले जाएं। हिन्दुओं के घरों के बाहर नोटिस चिपकाए गए कि या तो 24 घण्टे में घाटी छोड़कर चले जाएं या मरने के लिए तैयार हो जाएं। इस पर भी जब बहुत से पण्डित वहाँ से नहीं गए तो आतंकवादी एक-47 लेकर गलियों में दौड़ने लगे और पण्डितों के घरों में घुसकर उन्हें गोलियां मारने लगे। इसके बाद मार्च 1990 में 30 से 50 हजार पण्डित काश्मीर छोड़कर चले गए। भारत की आजादी के बाद यह सबसे बड़ा मानव पलायन था।

    मुम्बई साम्प्रदायिक हिंसा ई.1992

    अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद दिसंबर 1992 से जनवरी 1993 के बीच बम्बई में बड़े स्तर पर साम्प्रदायिक दंगे हुए। इन दंगों में पूरे देश में लगभग 2000 लोगों की जानें गईं। अकेले मुम्बई महानगर में मरने वालों का आंकड़ा 900 था। हिंसा की अधिकतम घटनाएं मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हुईं जिनमें हिन्दुओं को छुरेबाजी से मारा गया। इस दौरान मुस्लिमों की भारी भीड़ सड़कों पर उतर आई और उसने भयंकर हिंसा एवं उत्पात मचाया। यह सशस्त्र भीड़ थी और हिंसक हमलों की पूर्व तैयारी के साथ उतरी थी। श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट में इसे उग्र भीड़ की मानसिकता बताया गया। इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू संगठनों ने भी मुसलमानों पर हमले किए। श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट में इस प्रतिक्रिया के लिए शिवसेना, बाल ठाकरे, मधुकर सरपोतदार और मनोहर जोशी पर उन्माद भड़काने का आरोप लगाया गया।

    बम्बई नर-संहार ई.1993

    बाबरी मस्जिद विध्वंस का प्रतिशोध लेने के लिए 12 मार्च 1993 को माफिया सरगना दाऊद इब्राहीम के गुर्गों ने मुंबई में अलग-अलग स्थानों पर 13 बम धमाके किए जिनमें 257 लोग मारे गए तथा 700 से अधिक घायल हुए। अदालत ने इस मामले में 100 अभियुक्तों को दोषी ठहराया जबकि 23 लोगों को बरी कर दिया। इन अभियुक्तों में फिल्म अभिनेता संजय दत्त भी शामिल था। टाडा अदालत ने उसे आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया किंतु आतंकवाद के आरोपों से बरी कर दिया। स्वतंत्र भारत में मुंबई में पर यह पहला सबसे बड़ा आतंकवादी हमला था।

    नदी मार्ग सामूहिक नर संहार

    ई.1990 में 50 हजार काश्मीरी पण्डितों द्वारा घाटी छोड़कर चले जाने के बाद भी पुलमावा जिले के नदीमार्ग गांव में चार हिन्दू परिवारों के 52 सदस्यों ने अपने गांव में ही रहने का निश्चय किया। 23 मार्च 2003 की मध्य रात्रि में पाकिस्तान समर्थित लश्करे तैयबा के मुस्लिम आतंकियों ने इन परिवारों के 24 सदस्यों को एक पंक्ति में खड़ा करके गोली मार दी। मृतकों में 11 पुरुष, 11 स्त्री तथा 2 बच्चे शामिल थे। 65 से लेकर 2 वर्ष तक की आयु के इन हिन्दुओं की हत्या करने के बाद आतंकियों ने मृतकों के शरीरों से आभूषण उतार लिए तथा उनके घर लूट लिए। उनके शरीरों को भी विकृत कर दिया।

    वान्धमा सामूहिक नरसंहार

    नदी मार्ग गांव की तरह गंदेरबल के निकट वान्धमा गांव के पण्डितों ने भी ई.1990 के पलायन के दौरान घाटी छोड़कर जाने से मना कर दिया था और वे अपने वंशानुगत गांव में निवास करते रहे। 25 जनवरी 1998 को वंधामा गांव में 23 काश्मीरी पण्डितों का सामूहिक नरसंहार किया गया। मृतकों में 10 पुरुष, 9 स्त्री एवं 4 बच्चे थे। इस हत्याकाण्ड को भी पाकिस्तान समर्थित लश्करे तैयबा के मुस्लिम आतंकियों ने कारित किया। इस हमले के दौरान आतंकियों ने हिन्दू मंदिर एवं घरों पर भी हमला किया।

    चम्बा सामूहिक नरसंहार

    3 अगस्त 1998 को पाकिस्तान में प्रशिक्षित मुस्लिम आतंकियों ने हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले के कालाबन एवं सत्रुण्डी गांवों में 35 हिन्दुओं का सामूहिक नरसंहार किया। इस दौरान 11 हिन्दू बुरी तरह घायल हुए। इसके बाद काश्मीर के मुस्लिम गुर्जरों एवं हिन्दू गद्दियों में वैमनस्य बढ़ गया।

    अमरनाथ हिन्दू यात्रियों पर हमले

    1 एवं 2 अगस्त 2000 को काश्मीर घाटी में स्थित अनंतनाग एवं डोडा जिलों में मुस्लिम आतंकियों ने अलग-अलग योजनाबद्ध आक्रमण करके अमरनाथ तीर्थ यात्रा पर जा रहे 105 हिन्दुओं को मार डाला तथा 62 हिन्दुओं को घायल कर दिया। ये हमले पहलगाम बेस कैम्प, मीर बाजार काजिगुण्ड, सनूद अच्चबल, डोडा, कूपवाड़ा तथा कयार में किए गए। इसके बाद भी कई बार अमरनाथ यात्रा के हिन्दू यात्रियों पर आतंकी हमले होते रहे हैं जिनमें बहुत सी जानें गई हैं।

    हिन्दू-ईसाई साम्प्रदायिक हिंसा

    भारत में ईसाई धर्म का प्रचार पंद्रहवीं शताब्दी में आरम्भ हुआ जो आज तक अनवरत जारी है। ईसाई मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मान्तरण से भारत की जनांकिकीय बुनावट में अंतर आ रहा है। इस कारण हिन्दुओं एवं ईसाइयों में प्रायः साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं होती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार ई.1964 से 1996 की अवधि में हिन्दू-ईसाई साम्प्रदायिक हिंसा के 38 प्रकरण प्रकाश में आए। ई.1997 में हिन्दुओं एवं ईसाइयों में हिंसा की 24 घटनाएं हुईं। ई.1997 में गुजरात में 2000 हिन्दू आदिवासियों का धर्मान्तरण करके उन्हें ईसाई बनाया गया। इसकी प्रतिक्रिया में गुजरात में 22 चर्च जलाए गए एवं 16 चर्चों में तोड़-फोड़ की गई। हिन्दू संगठनों द्वारा इन आदिवासियों को पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित किया गया। ई.1998 में हिन्दू-ईसाई साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं की संख्या बढ़कर 90 हो गई। जनवरी 1999 में उड़ीसा में विदेशी ईसाई धर्म प्रचारकों का विरोध हुआ तथा एक ऑस्ट्रेलियन मिशनरी ग्राहम स्टैन्स की उसके दो बच्चों टिमोथी तथा फिलिप के साथ जलाकर हत्या कर दी गई जब वह उड़ीया के क्योंझार जिले के मनोहरपुर गांव में अपनी स्टेशन वैगन में सो रहा था। ई.1999 में ह्यूमन राइट्स वाच रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में हिन्दू संगठनों द्वारा ईसाइयों के विरुद्ध की जा रही हिंसा में वृद्धि हो रही है। वर्ष 2000 में ह्यूमन राइट्स वाच द्वारा कहा गया कि भारत में उन ईसाइयों को बलपूर्वक हिन्दू बनाया जा रहा है जिन्हें हाल ही में हिन्दू से ईसाई बनाया गया था। हिन्दू संगठनों द्वारा ईसाइयों के बीच धमकी देने वाला साहित्य वितरित किया जा रहा है और उनके कब्रिस्तानों को तोड़ा जा रहा है।

    उत्तर-पूर्व राज्यों में ईसाई संगठनों द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा

    भारत के उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी धर्म के आधार पर हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं। ईसाइयों के आतंकी संगठन नेशनल लिब्रेशन फ्रंट (एनएलएफटी) ने हिन्दुओं को पूजा करने से प्रतिबंधित कर रखा है। इस समूह के आतंकियों ने त्रिपुरा प्रांत में अनेक बार रींग्स तथा जमातिया हिन्दू आदिवासियों पर हमले किए हैं। इन हमलों के दौरान अनेक आदिवासी हिन्दू नेताओं की हत्या की गई है तथा उनकी औरतों के साथ बलात्कार हुए हैं। त्रिपुरा सरकार के अनुसार त्रिपुरा का बैपटिस्ट चर्च ऑफ इण्डिया इन घटनाओं में एनएलएफटी को समर्थन देता है। वर्ष 2000 में त्रिपुरा सरकार ने इस चर्च के दो पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया। इनमें से एक के पास विस्फोटक सामग्री पाई गई। वर्ष 2004 में एनएलएफटी ने हिन्दुओं को दुर्गा पूजा एवं सरस्वती पूजा करने से प्रतिबंधित कर दिया। अगस्त 2010 में त्रिपुरा में एनएलएफटी के 10 सदस्यों ने शांति काली नामक एक लोकप्रिय हिन्दू संत की उसके आश्रम में घुसकर हत्या कर दी। 4 दिसम्बर 2010 को इसी संगठन ने शांति काली द्वारा चाचू बाजार में स्थापित आश्रम, स्कूल एवं अनाथालय पर हमला किया। ईसाई आतंकियों ने शांति काली द्वारा राज्य भर में स्थापित सभी संस्थाओं को हमेशा के लिए बंद करा दिया।

    रघुनाथ मंदिर पर आतंकी हमले

    वर्ष 2002 में जम्मू के प्रसिद्ध रघुनाथ मंदिर पर आतंकियों ने फिदायीन हमले किए। भगवान राम को समर्पित इस मंदिर का निर्माण ई.1860 में महाराजा रनबीरसिंह ने करवाया था। पहला हमला 30 मार्च 2002 को दो आत्मघाती बॉम्बर्स द्वारा किया गया जिसमें 3 व्यक्ति मारे गए तथा 20 व्यक्ति घायल हो गए। आतंकियों ने मंदिर पर हैण्डग्रेनेड फैंके तथा मंदिर में आग लगा दी। एक आतंकवादी ने मंदिर के भीतर घुसकर अपने शरीर पर बंधे बम से स्वयं को उड़ा दिया। 24 नवम्बर 2002 को इस मंदिर पर दो आत्मघाती बॉम्बर्स ने एक और हमला किया जिसमें 14 हिन्दू श्रद्धालु मारे गए तथा 45 घायल हुए।

    गोधरा नरसंहार

    मार्च 2002 में अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों की साबरमती एक्सप्रेस की बोगियों पर गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर मुसमान दंगाइयों ने हमला किया तथा रेल के डिब्बे को बाहर से ताला लगाकर, पैट्रोलियम छिड़ककर उसे जला दिया। इससे 58 रामभक्त कार-सेवक डिब्बे में जल कर मर गए। इसकी प्रतिक्रिया में गुजरात में दंगे फूट पड़े जिनमें लगभग 2000 लोगों की जान गई तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पहुंची।

    गुजरात साम्प्रदायिक हिंसा 2002

    गोधरा काण्ड की प्रतिक्रिया में ई.2002 में गुजरात के अहमदाबाद नगर में बहुत से भवनों को आग लगा दी गई। 11 मार्च 2005 को यूपीए सरकार ने संसद में जो आंकड़े प्रस्तुत किए, उनके अनुसार गुजरात के 2002 के दंगों में कुल 790 मुसलमान एवं 254 हिन्दू मारे गए, कुल 2,548 लोग घायल हुए तथा 223 लोग गुम हो गए। इस रिपोर्ट में दंगों में पीड़ित 919 महिलाओं को विधवा एवं 606 बच्चों को अनाथ घोषित किया गया। होन एडवोकेसी ग्रुप तथा कांग्रेशियल रिसर्च सर्विस ने अपनी अलग-अलग रिपोर्ट में मृतकों की संख्या 2000 बताई। इस हिंसा में 10 हजार से अधिक लोगों को अपने घरों से वंचित होना पड़ा। न्यूयार्क टाइम्स ने इस दंगों के लिए गुजरात सरकार तथा स्थानीय पुलिस की उदासीनता को दोषी बताया जिसने मुसलमानों पर हो रहे हमलों की अनदेखी की। यह आश्चर्य की ही बात थी कि किसी भी अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट में तथा भारत की यूपीए सरकार की किसी भी रिपोर्ट में गोधरा काण्ड में मुसलमानों द्वारा जलाकर मारे गए 58 हिंदुओं के प्रति संवेदना व्यक्त नहीं की गई जिसकी प्रतिक्रिया में ये दंगे हुए। इन दंगों के बाद गुजरात में साम्प्रदायिक शांति हो गई तथा तब से लेकर पुस्तक लिखे जाने तक गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा नहीं देखी गई है।

    अक्षरधाम मंदिर पर हमला

    24 सितम्बर 2002 को दो मुस्लिम आतंकियों ने गुजरात की राजधानी गांधीनगर में अक्षरधाम मंदिर पर हमला किया। उन्होंने स्वचालित शस्त्रों एवं हथगोलों से मंदिर में उपस्थित 30 श्रद्धालुओं को मार दिया तथा 80 लोगों को घायल कर दिया।

    सच्चर समिति

    यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मुसलमानों के घावों पर मलहम लगाने के लिए वर्ष 2005 में मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए राजेन्द्र सच्चर कमेटी का गठन किया जिसने मुसलमानों के उत्थान के लिए अनेक उपाय सुझाए। डॉ. मनमोहनसिंह ने इन समस्त सिफारिशों का क्रियान्वयन करके मुसलमानों को राहत पहुंचाई। विकास योजनाओं में 15 प्रतिशत राशि अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए आरक्षित की गई। इतना ही नहीं, डॉ. मनमोहनसिंह ने हिन्दुओं की नाराजगी की परवाह नहीं करते हुए सार्वजनिक वक्तव्य देकर मुसलमानों को रिझाने का प्रयास किया कि देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है।

    बनारस में सीरियल बम ब्लास्ट

    7 मार्च 2006 को लश्करे तैयबा के मुस्लिम आतंकियों द्वारा हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थ बनारस के संकट मोचन हनुमान मंदिर, बनारस छावनी रेलवे स्टेशन तथा शिवगंगा एक्सप्रेस में शृंखला बद्ध बम धमाके किए गए जिनमें 28 लोग मारे गए तथा 101 व्यक्ति बुरी तरह से घायल हो गए। नगर में छः बमों को समय रहते डिफ्यूज कर दिया गया। 7 दिसम्बर 2010 को बनारस के शीतला घाट में गंगाजी की आरती के समय बम धमाका किया गया जिसमें 2 व्यक्तियों की जान गई एवं 38 से अधिक लोग घायल हुए।

    जयपुर में सीरियल बम ब्लास्ट

    13 मई 2008 को इण्डियन मुजाहिदीन तथा हरकल उल जिहाद अल इस्लामी क आतंकियों ने भारत के सुप्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक स्थल एवं राजस्थान की राजधानी जयपुर में 15 मिनट की अवधि में 9 शृंखला बद्ध बम विस्फोट हुए जिनमें 80 लोग मारे गए और 216 लोग घायल हो गए।

    उड़ीसा एवं कर्नाटक में हिन्दू-ईसाई दंगे

    अगस्त 2008 में माओवादी संगठनों ने उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती नामक सुप्रसिद्ध हिन्दू संत तथा उनके चार शिष्यों की हत्या कर दी। पुलिस जांच में तीन ईसाइयों को इस हत्याकाण्ड का दोषी पाया गया। कांग्रेस के सांसद राधाकांत नायखास पर भी इस हत्याकाण्ड में संदेह किया गया। इसकी प्रतिक्रिया में उड़ीसा के कंधमाल तथा अन्य जिलों में हिंदुओं एवं ईसाइयों के बीच साम्प्रदायिक हिंसा हुई जिनमें 2 हिन्दू एवं 1 ईसाई मारे गए। इस दौरान दोनों ही समुदायों के घरों एवं पूजा स्थलों को भी तोड़ा गया। 14 सितम्बर 2008 को कर्नाटक में भी हिन्दुओं एवं ईसाइयों के बीच साम्प्रयदायिक हिंसा हुई।

    नन से बलात्कार

    मार्च 2015 में पंश्चिम बंगाल में एक स्कूल में स्थित चैपल पर हमला हुआ तथा एक 71 वर्षीय नन के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। पुलिस जांच में इस घटना में बंगलादेशी मुसलमानों को दोषी पाया गया जिनके साथ कुछ भारतीय मुसलमान भी सम्मिलित थे।

    मुम्बई में पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा नरसंहार

    26 नवंबर 2008 की शाम को हथियारों से लैस 10 पाकिस्तानी आतंकी कोलाबा के समुद्री तट पर एक नौका से बम्बई की मच्छीमार कॉलोनी पहुंचे। वहाँ से ये आतंकी दो-दो की पांच टोलियों में बंट गए। दो आतंकी प्रसिद्ध यहूदी गेस्ट-हाउस नरीमन हाउस की तरफ, दो आतंकी सीएसटी की तरफ, दो-दो आतंकियों की टीम होटल ताजमहल की तरफ और बाकी बचे दो आतंकी होटल ट्राईडेंट ओबेराम्य की तरफ बढ़ गए। आतंकियों की पहली टीम में इमरान बाबर और अबू उमर नामक आतंकवादी थे। ये दोनों लियोपोल्ड कैफे पहुंचे और रात करीब साढ़े नौ बजे जोरदार धमाका किया। आतंकियों की दूसरी टीम में अजमल आमिर कसाब और अबू इस्माइल खान शामिल थे। दोनों सीएसटी पहुंचे और अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे। इन दोनों आतंकियों ने यहां 58 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। तीसरी टीम (अब्दुल रहमान बड़ा और जावेद उर्फ अबू अली) होलट ताजमहल में घुसी। होटल के बहादुर कर्मचारियों की सूझबूझ से सभी मेहमानों को होटल के पिछले गेट से बाहर निकाल दिया गया। होटल ट्राईडेंट ओबरॉय में आतंकियों की एक टीम रिसेप्शन पर पहुंची और अचानक अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में होटल के 32 अतिथियों की जान चली गई। महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे, पुलिस अधिकारी विजय सालस्कर, अशोक कामटे और कॉन्स्टेबल संतोष जाधव आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए। राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स (एनएसजी) और आतंकियों के बीच हुई लंबी मुठभेड़ में 9 आतंकी मारे गए और अजमल आमिर कसाब को जीवित पकड़ कर अदालत में प्रस्तुत किया गया। अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई। इस घटना में बम्बई शहर में कम से कम 164 व्यक्तियों की मौत हो गई और 308 व्यक्ति घायल हो गए।

    शिमोंग साम्प्रदायिक हिंसा

    ई.2010 में भारत के अखबारों में बंगलादेश की लेखिका तस्नीमा नसरीन का एक लेख प्रकाशित हुआ जिसके बाद कर्नाटक के शिमोंग क्षेत्र में धार्मिक दंगे भड़क गए। इस दौरान उपद्रवियों द्वारा हिन्दुओं के घरों में भारी लूटपाट की गई। इन दंगों में 2 लोगों की जान गई तथा 100 से अधिक लोग घायल हुए।

    मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा

    उत्तरप्रदेश में अलीगढ़ एवं मुजफ्फरनगर सहित कई मुस्लिम बहुल जिले हैं जिनमें आजादी से पहले एवं बाद में साम्प्रदायिक हिंसा का लम्बा इतिहास रहा है। ई.2013 में मुजफ्फरनगर में हिंदू और मुसलमान समुदाय के बीच भयानक दंगा हुआ जिसमें 48 लोगों की जानें गईं और 93 लोग घायल हुए।

    आरएसएस एवं भाजपा कार्यकताओं की हत्याएं

    केरल के कुन्नूर एवं अन्य जिलों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी के कार्यकताओं की हत्याओं के अनेक मामले सामने आए हैं जिन्हें लेकर भाजपा ने अक्टूबर 2017 में जनरक्षा यात्रा निकाली। हिन्दू संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं की हत्याओं के प्रकरण ई.1669 से हो रहे हैं किंतु विगत एक दशक में इन घटनाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अनुसार केरल में 120 हिन्दू कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं जबकि योगी आदित्यनाथ ने यह आंकड़ा 283 बताया है। केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने इस सम्बन्ध में कोई सरकारी आंकड़े प्रकाशित नहीं किए हैं।

    गौ-तस्करी के संदेह में हत्याएं

    भारत के पूर्वी राज्यों एवं बांग्लादेश आदि देशों को उत्तर भारत से बड़ी संख्या में गौएं, वध हेतु तस्करी करके ले जाई जाती रही हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से हिन्दुओं की मांग है कि देश में गौ-वध का पूर्णतः निषेध हो तथा गौ-तस्करी को रोका जाए किंतु ये दोनों कार्य अनवरत जारी हैं। इसलिए कुछ स्थानों पर हिन्दुओं ने गौ-रक्षक दलों का गठन कर लिया है जो गौ-तस्करों से संघर्ष करके गायों को छुड़ाते हैं। इन संघर्षों में कुछ स्थानों पर हत्याओं की घटनाएं हुई हैं जिनमें हिन्दू एवं मुसलमान दोनों धर्मों के लोग मारे गए हैं। मरने वालों में कुछ निर्दोष भी पाए गए हैं।

    स्वतंत्र भारत में साम्प्रदायिक हिंसा की हजारों घटनाएं हुई हैं, इस पुस्तक में उन समस्त हिंसाओं का विवरण लिखा जाना संभव नहीं है। इसलिए उनमें से कुछ प्रमुख घटनाओं को यहाँ लिखा गया है।


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