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  • अजमेर का इतिहास - 92

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 92

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (4)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    विजयसिंह पथिक


    विजयसिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था। उनका जन्म 24 मार्च 1882 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुलावठी गाँव में एक गुर्जर परिवार में हुआ था। वे क्रांतिकारी, कवि, लेखक, पत्रकार तथा राजनेता थे। उनका पूरा परिवार क्रांतिकारी था। ई.1914 में देश के बड़े क्रांतिकारियों- योगीराज अरविंद, श्यामजी कृष्ण वर्मा, शचीन्द्र सान्याल आदि ने सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत भूमि को स्वतंत्र करवाने की योजना बनायी। यह निश्चय किया गया था कि लाहौर, रावलपिण्डी और फिरोजपुर में विद्रोह करके वहाँ के शस्त्रागारों पर अधिकार कर लिया जाये।

    इस सफलता के बाद अन्य स्थानों पर भी विद्रोह करके अंग्रेज अधिकारियों को बंदी बना लिया जाये। राजपूताने में इस क्रांति का जिम्मा खरवा के राव गोपालसिंह तथा दामोदर दास राठी को सौंपा गया था। इन लोगों के सहयोग के लिये भूपसिंह को राजपूताने में भेजा गया। वे अपने बहनोई के साथ राजस्थान के किशन गढ़ आये। गोपालसिंह खरवा तथा विजयसिंह ने 2000 लोगों की सशस्त्र सेना खड़ी कर ली। क्रांति आरंभ करने की तिथि 21 फरवरी 1915 रखी गयी किंतु इस योजना की सूचना अंग्रेजों को मिल गयी। इसलिये राजपूताने में दो दिन पहले ही सशस्त्र क्रांति करने का निर्णय लिया गया।

    क्रांति आरंभ होने की सूचना देने के लिये खरवा रेलवे स्टेशन के पास बम विस्फोट करने की योजना बनायी गयी। अंग्रेजों ने बहुत से लोगों को पकड़ लिया जिससे बम विस्फोट नहीं हो सका और क्रांति आरंभ नहीं हो सकी। इसलिये क्रांतिकारियों ने अस्त्र-शस्त्र छिपा दिये और दो हजार लोगों को इधर उधर बिखेर दिया। अंग्रेजों ने जंगल में भाग रहे गोपालसिंह और भूपसिंह को पकड़ कर टॉडगढ़ में नजरबंद कर दिया। कुछ दिन बाद दोनों ही व्यक्ति जेल से भाग निकले। गोपालसिंह तो कुछ दिन बाद फिर से पकड़ लिये गये किंतु भूपसिंह अपना नाम बदल कर विजयसिंह पथिक के नाम से मेवाड़ के ठिकानों में घूमते रहे।

    विजयसिंह पथिक ने मेवाड़ के गाँवों में सामाजिक उत्थान के कार्य किये तथा विद्या प्रचारणी सभा की स्थापना करके उसके माध्यम से गाँवों में शिक्षा का प्रचार करने लगे। वे शीघ्र ही मेवाड़ के ग्रामीण अंचल में लोकप्रिय हो गये। मेवाड़ रियासत के बिजौलिया ठिकाने में जागीरदार के अत्याचारों के विरोध में ई. 1897 से लेकर 1947 तक 50 वर्ष लम्बा किसान आंदोलन चला। बिजौलिया के किसानों ने विजयसिंह को इस आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण करने के लिये आमंत्रित किया।

    1916 के अंतिम दिनों में विजयसिंह बिजौलिया पहुँचे तथा वहाँ उन्होंने सेवा समिति स्कूल, पुस्तकालय और अखाड़े की स्थापना की। विजयसिंह के अनुरोध पर माणिक्यलाल वर्मा ने ठिकाने की नौकरी को त्याग दिया और किसानों के लिये काम करना आरंभ किया। पथिक जी ने पत्रकारिता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उन्होंने 1921 में वर्धा से राजस्थान संघ के माध्यम से 'राजस्थान केसरी' और 1922 में अजमेर से राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से 'राजस्थान' निकालना आरंभ किया।

    1928 में जेल से छूटने के बाद पथिकजी ने 'राजस्थान संदेश' निकाला। 1939-40 में पथिकजी ने आगरा से 'नव संदेश' निकाला। राजपूताना, गुजरात तथा मध्य भारत की देशी रियासतों में इन समाचार पत्रों का ग्राहक बनने वालों को एक साल की सजा दी जाती थी। पथिकजी द्वारा लिखित लगभग 30 पुस्तकें अब तक प्रकाश में आ चुकी हैं। आजादी के साथ ही पथिकजी का कांग्रेस से मोह भंग हो गया। 1952 में पथिकजी ने माण्डलगढ़ विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। बिजौलिया क्षेत्र इसी विधानसभा क्षेत्र में आता था जहाँ पथिकजी ने अपना अधिकांश जीवन व्यतीत किया था।

    कांग्रेस ने माणिक्यलाल वर्मा के साले गणपति लाल वर्मा को खड़ा किया। इन दोनों के सामने जागीरदारों ने भी अपना प्रत्याशी खड़ा किया। किसानों के वोट वर्माजी के साले एवं पथिकजी में विभक्त हो गये और जागीरदारों का प्रत्याशी जीत गया। 28 मई 1954 को लू लगने से पथिकजी का निधन हो गया। उन्होंने 1930 के आसपास एक विधवा शिक्षिका जानकी देवी से विवाह किया था जो 10 फरवरी 1994 को मथुरा में स्वर्गवासी हुई। विजयसिंह पथिक अच्छे कवि और गीतकार थे। तिरंगे झण्डे के बारे में लिखा गया उनका एक गीत इस प्रकार से है- झण्डा यह हर किले पर चढ़ेगा, इसका बल रोज दूना बढ़ेगा। तोप तलवार बेकार होंगे, सोने वाले भी बेदार होंगे। सब कहेंगे कि सर है कटाना, पर न झण्डा यह नीचे झुकाना। शांत हथियार होंगे हमारे, पर ये तोड़ेंगे आरे दुधारे।

    हरविलास शारदा (राय बहादुर)

    हर बिलास शारदा का जन्म 8 जून 1867 को अजमेर में हुआ। उनके पिता हरनारायण शारदा गर्वनमेंट कॉलेज अजमेर में पुस्तकालय अध्यक्ष थे। ई.1875 में जब स्वामी दयानंद सरस्वती अजमेर आये तब हरविलास अपने पिता के साथ स्वामीजी से मिला। पिता के प्रभाव से ही हर बिलास में पुस्तकों तथा आर्यसमाज के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ। इस लगाव के कारण वे अपने जीवनकाल में अजमेर के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के गणमान्य व्यक्तियों में स्थान पा गये।

    हरविलास ने अजमेर में डीएवी स्कूल की स्थापना की। ई.1921 में जब अजमेर-मेरवाड़ा में प्रशासनिक सुधार के लिये अश्वर्थ समिति का गठन हुआ तो हरविलास शारदा ने अजमेर के प्रशासनिक ढांचे में सुधार लाने के लिये इस समिति को एक ज्ञापन प्रस्तुत किया तथा उन्होंने अजमेर को फिर से यूनाइटेड प्रोविंस में सम्मिलित करने की मांग की। ई.1924 में जब अजमेर-मेरवाड़ा का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय विधान सभा का सदस्य बनाया गया। इस पद के लिये पहले प्रतिनिधि के रूप में हर बिलास शारदा को चुना गया।

    ई.1924 से 1930 के मध्य वे तीन बार अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में कुल ग्यारह वर्ष तक केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य रहे। ई.1925 में उन्होंने केन्द्रीय विधान सभा में भाषण देकर मांग की कि अजमेर-मेरवाड़ा के लिये विधान परिषद गठित की जाये। ई.1925 में उन्होंने बरेली में आयोजित अखिल भारतीय वैश्य सम्मेलन की अध्यक्षता की। ई.1927 में उन्होंने केन्द्रीय विधान सभा में बालविवाह निरोधक बिल प्रस्तुत किया।

    इस विधेयक के समर्थन में शारदा ने 15 सितम्ब्र 1927 को भावोत्पादक तथ्यांे सहित एक ओजपूर्ण भाषण दिया। इस एक्ट ने पूरे देश के स्त्री समाज में हलचल पैदा कर दी थी। देश के लगभग हर कौने में इस एक्ट के समर्थन में स्त्रियों ने प्रदर्शन किये। 28 सितम्बर 1929 को यह विधेयक पारित हुआ। इस विधेयक को आज तक शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है। महादेव गोविंद रानाडे ने द्वारा स्थापित राष्ट्रीय समाज सुधार समिति के ई.1929 के लाहौर सम्मेलन की अध्यक्षता हरविलास शारदा ने की।

    ई.1930 में भारत सरकार ने शारदा को प्राथमिक शिक्षा समिति का सदस्य मनोनीत किया। ई.1930 में जब साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो हर बिलास बहुत खिन्न हुए। इस आयोग द्वारा सिफारिश की गई थी कि अब तक अजमेर-मेरवाड़ा से केन्द्रीय विधान सभा में जो प्रतिनिधि चुनकर जाता था, आगे से वह चीफ कमिश्नर द्वारा मनोनीत किया जायेगा। शारदा ने साइमन आयोग की सिफारिशों की तीव्र भर्त्सना की। वे राष्ट्रवादी दल के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। ई.1932 में वे उसके उपनेता बन गये। हर बिलास शारदा केन्द्र सरकार तथा अजमेर सरकार द्वारा समय-समय पर गठित की गई बहुत सी समितियों के सदस्य रहे। वे आजीवन अजमेर-मेरवाड़ा में प्रशासनिक सुधारों के लिये काम करते रहे।

    ई.1932 में भारत सरकार के सचिव लतीफ के अनुरोध पर हर बिलास शारदा ने एक नोट तैया किया तथा 12 मई 1932 को वह नोट भारत सरकार की सलाहकार समिति के सम्मुख रखा। जमनालाल बजाज, हर विलास शारदा के अच्छे मित्रों में थे। बजाज जब भी अजमेर आते तो शारदा के घर ही भोजन करते थे। शारदा से उनका नियमित पत्राचार भी था। शारदा ने इतिहास पर कई पुस्तकें लिखीं जिनमें हिन्दू सुपीरियोरिटी, अजमेर हिस्टॉरिकल एण्ड डिस्क्रिप्टिव, महाराणा सांगा, हमीर ऑफ रणथंभौर, वर्क्स ऑफ महर्षि दयानंद सरस्वती एण्ड परोपकारिणी सभा, महाराणा कुंभा, शंकराचार्य एण्ड दयानंद, लाइफ ऑफ विरजानंद सरस्वती आदि अधिक प्रसिद्ध है। 20 जून 1955 को अजमेर में अनका निधन हुआ।

    हरिभाऊ उपाध्याय (पद्मविभूषण)

    हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म 9 मार्च 1892 को ग्वालियर राज्य के भौंरासा गाँव में हुआ था। उनके पिता पटवारी थे। हरिभाऊ ने वाराणसी के कामाख्या हिन्दू कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। ई.1911-12 में वे पत्रकारिता से जुडे। ई.1923 में वे गांधीजी के सचिव बने। गांधीजी के बंदी बनाये जाने पर हरिभाऊ ने नवजीवन का सम्पादन किया। ई.1926 में हरिभाऊ अजमेर आ गये। अजमेर में गांधी युग का सूत्रपात करने का श्रेय हरिभाऊ को ही प्राप्त है।

    1 अप्रेल 1927 को हरिभाऊ ने हटूण्डी में गांधी आश्रम की स्थापना की। हरिभाऊ ने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल का काम आरम्भ किया। इस संस्था की स्थापना घनश्यामदास बिड़ला एवं जमनालाल बजाज के सहयोग से हुई थी। इस संस्था के माध्यम से हिन्दी भाषा में अनके श्रेष्ठ ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। मण्डल की ओर से त्यागभूमि नामक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया गया। अजमेर में आने के बाद उपाध्यायजी का कार्यक्षेत्र साहित्य सृजन एवं पत्रकारिता से हटकर राजनीति अधिक हो गया।

    ई.1930 में नमक आंदोलन में भाग लेने के कारण वे पहली बार जेल गये। इसके बाद उन्हें जेल जाना पड़ा। जेल में निवास करने के दौरान आपका साहित्य सृजन चलता रहा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ई.1952 में हरिभाऊ उपाध्याय अजमेर राज्य के मुख्यमंत्री बने। जब अजमेर का राजस्थान में विलय हो गया तब भी वे ई.1956 से लगभग 10 वर्ष तक मंत्रिमण्डल के सदस्य बने रहे। वे राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के कुलपति भी रहे। उन्होंने महिला शिक्षा सदन हटूण्डी, गांधी आश्रम हटूंडी तथा गांधी सेवा संघ की स्थापना की।

    हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा 21 पुस्तकों की रचना और लगभग 24 ग्रंथों का अनुवाद किया गया। साहित्य सेवा के लिये उन्हें अनेक साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हुए। केन्द्र सरकार ने हरिभाऊ को पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 25 अगस्त 1972 को अजमेर में उनका निधन हुआ।

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