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  • अजमेर का इतिहास - 90

     02.06.2020
     अजमेर का इतिहास - 90

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (2) 


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    चंद्रगुप्त वार्ष्णेय


    चंद्रगुप्त वार्ष्णेय का जन्म 21 जुलाई 1904 को हुआ। बाबा नृसिंहदास की प्रेरणा से वे राजनीति में आये तथा यूथ लीग की स्थापना की। वे राजपूताना, मध्य भारत व प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय मंत्री रहे। नवम्बर 1930 में वे जेल गये। ई.1939 में अजमेर नगर पालिका का चुनाव जीते। ई.1940-41 में वे सेवाग्राम के सह सम्पादक रहे। ई.1942 में वे पुनः जेल गये। ई.1951 में वे देश के प्रथम दैनिक राष्ट्रदूत के सम्पादक बने। उन्होंने राजस्थान विकास का भी सम्पादन किया। ई.1952 में वे अजमेर राज्य के जनसम्पर्क विभाग के संचालक बने। ई.1956 में वे राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में उपनिदेशक बनाये गये। ई.1959 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राजस्थान पत्रिका से जुड़े रहकर उन्होंने सुभाषित प्रदीप तथा शब्द निरुक्ति जैसे गंभीर स्तम्भ लेख लिखे। उन्होंने चाणक्य सूत्र प्रदीप आदि कई उत्कृष्ट रचनाओं का प्रणयन किया।

    जियालाल आर्य (पं.)

    पण्डित जियालाल आर्य का जन्म ई.1889 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ। ई.1908 में वे अजमेर आये। ई.1915 में वे आर्यसमाज से जुड़े। ई.1917 में अजमेर में फैले प्लेग में उन्होंने लोगों की बहुत सेवा की। ई.1926 में वे आर्यसमाज अजमेर के मंत्री बनाये गये। ई.1930 में उन्होंने अंग्रेजी वेषभूषा त्यागकर खादी के वस्त्र पहनने आरंभ कर दिये। दयानंद महाविद्यालय अजमेर की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान रहा। ई.1952 से 1955 तक वे आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान के प्रधान रहे। 19 दिसम्बर 1961 को उनका निधन हुआ।

    जीतमल लूणिया

    जीतमल लूणिया का जन्म 15 नवम्बर 1905 को अजमेर में हुआ। आपने एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की। ई.1914 में उन्होंने इंदौर में हरिभाऊ उपाध्याय के साथ मिलकर मालवा मयूर नामक पत्रिका निकाली। ई.1916 में हिन्दी साहित्य मंदिर की स्थापना की। ई.1925 में उन्होंने अजमेर से सस्ता साहित्य मण्डल का प्रकाशन कार्य आरम्भ किया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया तथा कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गये।

    सरकार ने कांग्रेस कमेटी को असंवैधानिक घोषित करके जीतमल लूणिया को एक साल तक जेल में रखा। अपनी पत्नी सरदार बाई के साथ उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और छः माह का कारावास भोगा। ई.1933 में लूणिया ने अजमेर सेवा भवन की स्थापना की तथा अछूतोद्धार एवं राष्ट्रोत्थान के काम में लग गये। ई.1942 में वे एक बार फिर जेल गये। ई.1947 में वे शहर कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। 15 अगस्त 1947 को उन्होंने मैगजीन पर तिरंगा फहराकर अजमेर की स्वतंत्रता की घोषणा की। ई.1948 में वे अजमेर नगर परिषद के अध्यक्ष चुने गये। ई.1973 में उन्होंने शराबबंदी सत्याग्रह में भाग लिया तथा जेल गये।

    ज्वाला प्रसाद शर्मा

    ज्वाला प्रसाद शर्मा ई.1930 में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपना अड्डा अजमेर में जमाया। आपने हटूण्डी में बाबा नृसिंहदास को बंदूक चलाना सिखाया। ज्वाला प्रसाद तथा उनके साथियों ने अजमेर के कमिश्नर की हत्या का कार्यक्रम बनाया। रामचंद्र बापट को यह कार्य सौंपा गया किंतु वह सफल नहीं हो सका तथा पकड़ा गया। क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन के लिये धन प्राप्त करने हेतु ज्वाला प्रसाद तथा उनके साथियों ने राजकीय कॉलेज के कर्मचारियों के लिये बैंक से लाये जा रहे धन को लूटने का प्रयास किया किंतु वे भी असफल रहे।

    सन् 1934 में वायसराय की अजमेर में हत्या करने की योजना बनी किंतु वह भी असफल रही। पुलिस अधिकारी डोगरा की हत्या का भी प्रयास किया गया किंतु वह भी सफल नहीं हो सका। इन सब कारणों से ज्वाला प्रसाद को बंदी बना लिया गया। ई.1938 के अंतिम दिनों में वे जेल से मुक्त हुए। भारत छोड़ों आंदोलन में भी वे जेल में थे। वहां से वे भाग निकले तथा अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। वे विधानसभा एवं लोकसभा के सदस्य तथा राजस्थान रोडवेज के अध्यक्ष रहे। 20 मई 1974 को दूदू के निकट सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

    डिक्सन (कर्नल)

    कर्नल डिक्सन स्कॉटलैण्ड का रहने वाला था। ई.1812 में वह बंगाल आर्टीलरी में अधिकारी के पद नियुक्त हुआ। उसने मेरवाड़ा पर अधिकार लेने के लिये किये गये अभियान में भाग लिया था। उसे अजमेर मैगजीन में आयुधागार के डिप्टी कमिश्नर के पद पर नियुक्त किया गया। वह इस पद पर ई.1836 तक कार्य करता रहा। यहाँ से उसे मेरवाड़ा का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनाया गया। ई.1842 में वह अजमेर तथा मेरवाड़ा दोनों जिलों का सुपरिण्टेण्डेण्ट बनाया गया। ई.1857 तक वह इन दोनों जिलों का प्रशासन करता रहा। उसने भारत में 45 वर्ष सेवा की तथा सेवा के दौरान ही 25 जून 1857 को ब्यावर में उसकी मृत्यु हुई। ब्यावर के कब्रिस्तान में उसे दफनाया गया। वह गर्मी और बरसात में भी ब्यावर में रहता था। दूसरे अधिकारियों की तहर माउण्ट आबू पर जाकर नहीं रहता था।

    मेरवाड़ा के सुपरिण्टेण्डेण्ट के पद पर कार्य करते हुए कर्नल डिक्सन मेरवाड़ा के लिये भी वरदान साबित हुआ था। उसने मेरवाड़ा क्षेत्र में अनेक कुएं खुदवाये जिससे वहॉं खेती संभव हो सकी और वह लाभकारी भी सिद्ध हुई। उसकी बहुमूल्य सेवाओं का आज अनुमान लगाना संभव नहीं है। लोगों को उद्योग, कृषि और व्यापार की गतिविधियों में रोजगार प्राप्त हो सके इसके लिये उसने नया नगर के नाम से एक विशाल परकोटे युक्त नगर की स्थापना की और महाजनों को लाकर वहॉं बसाया।

    आज वह नगर ब्यावर के नाम से जाना जाता है जो बाद में मेरवाड़ा जिले का प्रशासनिक केन्द्र भी बना। वहाँ बहुत सारे उद्योग धन्धे, व्यापार और बाजार विकसित हो गये। डिक्सन एक मात्र अंग्रेज था जिसने परकोटे युक्त किसी नगर की स्थापना की तथा ब्यावर भारत का वह अन्तिम नगर था जिसकी सुरक्षा के लिये परकोटा खिचंवाया गया।

    जिस दिन से डिक्सन ने अजमेर के सुपरिण्टेण्डेण्ट पद का कार्यभार ग्रहण किया उस दिन से अजमेर में एक नया युग आरंभ हुआ। उसके समय में पुराने तालाबों की मरम्मत की गई तथा नये तालाब बनाये गये। इन कार्यो पर उसने 4,52,707 रुपये व्यय किये। अजमेर का कमिश्नर सदरलैण्ड तथा अजमेर का सुपरिण्टेण्डेण्ट कर्नल डिक्सन, दोनों यह चाहते थे कि किसानों का लगान घटाकर एक तिहाई कर दिया जाये किंतु सरकार ने लगान घटाने से मना कर दिया। फिर भी इसे एक बटा दो से घटाकर दो बटा पांच कर दिया गया। ई.1842 में जब उसने तालाबों का निर्माण आरंभ किया तब उसने एक बड़ी जागीर के प्रबंधक की तरह कार्य किया। उसने तालाबों के किनारों पर झौंपड़ियों की स्थापना की।

    जो लोग कुंआ खोदना चाहते थे, उन लोगों को उसने जमीनें बहुत ही कम दरों पर किराये पर दीं। उसने नये तालाबों के आस पास की बंजर जमीनें उन लोगों को वितरित कर दीं जो वहाँ बनाई गई झौंपड़ियों में रहकर खेती करना चाहते थे। कर्नल डिक्सन की पत्नी भारतीय थी जिससे उसे एक पुत्र भी हुआ था। जब यह पुत्र 6 साल का था तो पढ़ने के लिये लंदन भेजा गया। वह वहीं रहा और वहीं उसकी मृत्यु हुई। डिक्सन के पुत्र के चार पुत्र हुए। ई.1875 तक डिक्सन की पत्नी ब्यावर में रही तथा डिक्सन द्वारा छोड़ी गई सम्पत्ति से पेंशन प्राप्त करती रही।

    कर्नल डिक्सन की छतरी ब्यावर के मुख्य बाजार में बनाई गई। मेर लोग इस छतरी में डिक्सन की पूजा करते थे और उसे डिक्सन बाबा कहते थे। आजादी के बाद इस स्मारक की दुर्दशा हुई। आज से लगभग 20 साल पहले, मेरी बहिन के श्वसुर श्री प्रकाशचंद सिंघल ने मुझे इस छतरी के टूटे हुए टुकड़े अजमेर की नगर पालिका के परिसर में पड़े हुए दिखाये थे। उन्होंने मुझे डिक्सन की मेम का मकबरा भी दिखाया था जो सारी रौनक खोकर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा था। सच यही है कि हम भारतीयों ने अंग्रेजों की सारी बुराइयाँ तो अपना लीं किंतु अच्छाई नहीं। अच्छे अंग्रेजों को याद भी नहीं रखा।

    दामोदर दास राठी (सेठ)

    सेठ दामोदर दास राठी का जन्म 8 फरवरी 1884 को मारवाड़ राज्य के पोकरण गाँव में हुआ था। इनके पिता खींवराजजी राठी व्यापार करने के लिये पोकरण से ब्यावर आ गये तथा 1889 में उन्होंने ब्यावर में श्रीकृष्णा मिल की स्थापना की। अतः बालक दामोदर की शिक्षा ब्यावर के मिशन स्कूल में हुई। वे मेधावी छात्र थे। जिस समय पिता खींवराज का निधन हुआ, उस समय दामोदर दास मात्र 16 वर्ष के थे।

    शीघ्र ही वे आर्यसमाज से जुड़ गये। वैचारिक उग्रता के कारण वे कांग्रेस के गरम दल के समर्थ बन गये और उन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा को श्रीकृष्णा मिल का मैनेजर नियुक्त किया। उन्हीं दिनों राठीजी का सम्पर्क बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष, लाला लाजपतराय आदि महान नेताओं से हुआ। राव गोपालसिंह खरवा से भी राठीजी की अच्छी मित्रता हो गयी। जब 21 फरवरी 1915 को राजस्थान में सशस्त्र क्रांतिकी योजना क्रियान्वयन की तिथि घोषित की गयी। तब श्यामजी कृष्ण वर्मा राठीजी के घर ठहरे हुए थे।

    तब राठीजी ने तीन हजार सशस्त्र क्रांतिकारी तैयार करने के लिये आर्थिक सहयोग प्रदान किया। दुर्भाग्य से क्रांतिकी योजना विफल हो गयी और हथियार टॉडगढ़ की पहाड़ियों में छुपा दिये गये। बाद में यह भारी असला अंग्रेज सरकार के हाथ लग गया जिससे राठीजी को गहरा सदमा लगा। वे ब्यावर छोड़कर हरिद्वार चले गये। कुछ दिन बाद जब लौट कर ब्यावर आये तो वे पूरी तरह ऊर्जावान थे।

    ई.1916 में ब्यावर में होमरूल लीग की स्थापना की गयी। उसी वर्ष एकता सम्मेलन भी हुआ जिसमें राठीजी ने राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया। ई.1917 में योजना बनायी गयी कि हिन्द गोवा का एक हिस्सा पुर्तगालियों से खरीद लिया जाये और उस पर देश की स्वतंत्रत सरकार की घोषणा कर दी जाये। योजना के अनुसार रूस इस स्वतंत्र सरकार को तुरंत मान्यता प्रदान कर देगा जिससे ब्रिटेन पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। इससे पहले कि यह योजना अमल में आती, 2 जनवरी 1918 को इस क्रांतिकारी एवं महादानी पुण्यात्मा का निधन हो गया।

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