Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 89
  • अजमेर का इतिहास - 89

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 89

    आधुनिक काल में अजमेर के ऐतिहासिक व्यक्ति (1)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अर्जुन लाल सेठी


    अर्जुनलाल सेठी का जन्म 9 सितम्बर 1880 को जयपुर के जैन परिवार में हुआ। उन्होंने ई. 1905 में जैन शिक्षा प्रचारक समिति तथा उसके उसके अधीन विद्यालय, छात्रावास एवं पुस्कालय का संचालन किया। इन संस्थाओं में सेठीजी ने क्रांतिकारियों को प्रशिक्षित करने का काम किया। उनका सम्बन्ध रास बिहारी बोस, शचीन्द्र सान्याल एवं मास्टर अमीचंद जैसे क्रांतिकारियों से हो गया। इन क्रांतिकारियों द्वारा भारत भर में सशस्त्र क्रांति की योजनाएँ बनायी जाती थीं।

    राजस्थान में इस क्रांति का जिम्मा केसरीसिंह बारहठ, खरवा ठाकुर गोपालसिंह खरवा, ब्यावर के सेठ दामोदर दास राठी और जयपुर के अर्जुनलाल सेठी को सौंपा गया। सेठी का यह कार्य था कि वे अपने विद्यालय में नवयुवकों को क्रांतिके लिये तैयार करें। प्रतापसिंह बारहठ, माणकचंद (शोलापुर) और विष्णुदत्त (मिर्जापुर) ने वर्द्धमान विद्यालय में ही क्रांति का प्रशिक्षण प्राप्त किया। देश भर में सशस्त्र क्रांति के आयोजन के लिये धन की पूर्ति करने हेतु वर्द्धमान विद्यालय के चार छात्रों ने विष्णुदत्त के नेतृत्व में बिहार के आरा जिले में निमेज के एक जैन महंत पर डाका डाला।

    महंत मारा गया किंतु धन की प्राप्ति नहीं हुई। इस काण्ड के साथ सेठी का नाम भी जुड़ गया। उन्हें जयपुर में ही नजर बंद रखा गया। उसके बाद उन्हें मद्रास प्रेसीडेन्सी की वैलूर जेल भेज दिया गया। सात वर्ष बाद ई. 1920 में उन्हें छोड़ा गया। जब सेठीजी जेल से छूटकर राजस्थान लौट रहे थे तब बालगंगाधर तिलक ने दो हजार लोगों के साथ पूना रेल्वे स्टेशन पर उनका भव्य स्वागत किया।

    छात्रों ने बग्घी के घोड़े खोलकर उनकी बग्घी को हाथों से खींचा। वैलूर से आने के बाद सेठीजी ने अजमेर को अपनी कर्मभूमि बनाया। ई.1920-21 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें सागर जेल भेज दिया गया। डेढ़ वर्ष बाद जेल से रिहाई होने पर वे पुनः अजमेर आ गये। इस बार गांधीजी से उनका गहरा मतभेद हो गया। ई.1934 में गांधीजी अजमेर आये तथा सेठी से गले मिलकर रो पड़े।

    गांधीजी की प्रेरणा से अब उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता का काम आरंभ किया। वे स्वयं मुसलमान हो गये और उन्होंने अपना नाम 27 अक्टूबर 2032 को अर्जुनलाल सेठी ने अपना नाम गाजी अब्दुल रहमान रख लिया। गाजी उसे कहते हैं जो काफिरों अर्थात् हिन्दुओं पर गाज अर्थात् बिजली बनकर गिरे। 23 दिसम्बर 1945 को उनका निधन हो गया। उनका देहांत हो जाने पर उनकी इच्छानुसार उन्हें दफनाया गया।

    कृष्णगोपाल गर्ग

    कृष्णगोपाल गर्ग का जन्म ई.1904 में हुआ। वे छात्र जीवन के दौरान ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। ई.1921 में उन्होंने शराब की दुकानें के समक्ष धरने दिये। 17 वर्ष की आयु में वे अहमदाबास कांग्रेस के लिये अजमेर के प्रतिनिधि चुने गये। ई.1923 में उन्होंने रेलवे के कारखाने में नौकरी की तथा अस्पश्यता निवारण, बाल विवाह निषेध एवं विधवा विवाह के पक्ष में काम करने लगे। इस कारण अग्रवाल समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया।

    ई.1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें नौकरी छोड़कर जेल जाना पड़ा। वे दो साल तक जेल में रहे। कई वर्षों तक हरिजन सेवक संघ के मंत्री रहे। 8 से 16 अप्रेल 1940 तक अजमेर कांग्रेस के राष्ट्रीय सप्ताह में झण्डा फहराने पर कृष्ण गोपाल गर्ग व बालकृष्ण गर्ग को चार-चार माह की कठोर जेल दी गई। कृष्णगोपाल कई वर्ष तक अजमेर नगर परिषद के अध्यक्ष रहे।

    गोपालसिंह खरवा

    गोपालसिंह खरवा का जन्म 19 अक्टूबर 1873 को मेवाड़ रियासत के खरवा ठिकाणे में जागीरदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम माधोसिंह तथा माता का नाम गुलाबकंवर था। गोपालसिंह ने बचपन में ही घुड़सवारी तथा बंदूक चलाने का अच्छा अभ्यास किया। उन्होंने अजमेर के मेयो कॉलेज में छः साल तक शिक्षा ग्रहण की। ई.1903 में जब उदयपुर के महाराणा फतहसिंह दिल्ली दरबार में भाग लेने के लिये जा रहे थे तब प्रसिद्ध क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ ने 13 सोरठों की एक मार्मिक रचना 'चेतावणी के चूंगटिये' शीर्षक से की।

    इस कविता में महाराणा को दिल्ली न जाने के लिये प्रेरित किया गया था। गोपालसिंह खरवा ने यह कविता नसीराबाद रेलवे स्टेशन से पहले सरेरी रेल्वे स्टेशन पर महाराणा को सौंप दी। महाराणा उस कविता को पढ़कर इतने उत्तेजित हुए कि वे दिल्ली पहुँच कर दरबार में भाग लिये बिना ही मेवाड़ लौट आये। गोपालसिंह की मित्रता ब्यावर की श्रीकृष्णा मिल के मालिक दामोदरदास राठी से हो गयी। राठीजी के माध्यम से गोपालसिंह, श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा अरविंद घोष से मिले।

    इसके बाद गोपालसिंह का सम्पर्क बंगाल के क्रांतिकारियों से हो गया। जब ई.1915 में देशव्यापी सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी जा रही थी तब खरवा के ठाकुर राव गोपालसिंह और विजयसिंह पथिक को क्रांति का कार्य सौंपा गया। इन दोनों क्रांतिकारियों ने राजस्थान से अस्त्र-शस्त्र खरीदकर बंगाल, बिहार, पंजाब तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों में कार्यरत क्रांतिकारियों को भेजना आरंभ किया।

    क्रांति के लिये बम तथा बंदूक आदि अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिये इन क्रांतिकारियों ने नसीराबाद, नीमच तथा देवली की छावनियों से सम्पर्क स्थापित किया। इन दोनों क्रांतिकारियों ने देशी राजाओं को भी इस कार्य के लिये तैयार करने का प्रयास किया तथा वीर भारत सभा नामक एक क्रांतिकारी संगठन भी स्थापित किया। केसरीसिंह बारहठ, गोपालसिंह खरवा तथा दामोदरदास राठी को नसीराबाद एवं ब्यावर पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गयी।

    इन्होंने योजना बनायी कि वे जंगल में छिपे सहयोगियों की मदद से ब्यावर रेलवे लाइन उड़ा देंगे जिससे यातायात ठप्प हो जायेगा और स्थिति का लाभ उठाकर क्रांतिकारी नसीराबाद एवं ब्यावर की पुलिस चौकियों एवं शस्त्रागारों पर कब्जा कर लेंगे। गोपालसिंह दो हजार क्रांतिकारियों के साथ खरवा रेलवे स्टेशन के पास जंगल में जा छिपे। सरकारी गुप्तचर तंत्र को इस योजना का पता लग गया जिससे योजना ध्वस्त हो गयी। इस पर गोपालसिंह ने खरवा पहुँच कर कुछ दिनों की रसद सामग्री ली और असला लेकर शिकार बुर्ज पर जा चढ़े।

    अजमेर कमिश्नर सेना लेकर खरवा पहुँचा किंतु इतनी भारी सैन्य तैयारी को देखकर उसने क्रांतिकारियों पर हमला करने के स्थान पर उनसे समझौता कर लिया। इस समझौते के अनुरूप गोपालसिंह तथा उनके साथी टॉडगढ़ में नजरबंद रखा गया। कुछ दिनों बाद गोपालसिंह खरवा तथा विजयसिंह पथिक वहाँ से भाग निकले। कुछ दिन पश्चात ही गोपालसिंह सलेमाबाद में पकड़े गये। उन्हें उत्तर प्रदेश में शाहजहाँपुर के पास तिलहर में नजरबंद किया गया। राहुल सांकृत्यायन ने इसी जेल में राव गोपालसिंह से भेंट की।

    इस भेंट के दौरान गोपालसिंह ने राहुल सांकृत्यायन को कई स्वरचित कविताएँ सुनाईं जिनमें से एक कविता इस प्रकार से थी- गौरांग गण के रक्त से निज पितृ गण तरपण करूंगा। तिलहर में दो वर्ष की नजरबंदी के बाद मार्च 1920 में सार्वजनिक क्षमा का आदेश प्रसारित होने पर उन्हें नजरबंदी से रिहा किया गया। गोपालसिंह ने अपना शेष जीवन रचनात्मक कार्यों में लगाया। ई.1931 में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने कश्मीर का बादशाह बनने का अभियान चलाया। उसने मुसलमानों में धार्मिक उन्माद भड़काकर कश्मीर के राजा के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा उठा लिया।

    देश के अन्य भागों से भी मजहबी जोश में उन्मत्त मुसलमान जिहाद के नाम पर कश्मीर पहुँचने लगे। इस धार्मिक उन्माद की प्रतिक्रिया पूरे देश में हुई। हिन्दुओं के जत्थे भी महाराजा के समर्थन में कश्मीर पहुँचने लगे। हिन्दू राष्ट्रीयता के समर्थक राव गोपालसिंह खरवा भी केशरिया बाना पहनकर और शस्त्रों से सज्जित होकर कश्मीर के लिये रवाना हुए। उस समय वे 60 वर्ष के थे किंतु एक हिन्दू राजा की सहायता के लिये अपने प्राण न्यौछावर करने का उनका निश्चय अटल था।

    खरवा तथा अजमेर से 32 साथी भी गोपालसिंह के साथ गये। जब राव गोपालसिंह लाहौर पहुँचे तो पंजाब के गवर्नर ने उनके कश्मीर जाने पर रोक लगा दी तथा पंजाब की देशी रियासतों के पोलिटिकल एजेंट फिट्ज पैट्रिक जो पहले अजमेर का पोलिटिकल एजेंट रह चुका था, ने राव गोपालसिंह को सूचित किया कि कश्मीर का आंदोलन दबा दिया गया है अतः अब आप वहाँ न जायें। कांग्रेस के बड़े नेता मौलाना शौकत अली ने लाहौर में आयोजित एक आम सभा में गोपालसिंह पर एक फिकरा कसा कि राव साहब गोपालसिंह राठौड़, राणा प्रताप की जंगभरी तलवार अब भी दिखलाते हैं।

    इस पर राव गोपालसिंह ने अपने भाषण में कहा कि मेरा यह शरीर उसी खून का बना हुआ है जिससे महाराणा प्रताप का बना था। मैं उनकी तलवार दिखाऊँ तो नई बात क्या है? किंतु भाई साहब आप तो बगदाद की तलवार और लंकाशायर के कारखानों का प्रभाव हिन्दुस्तान में दिखाना चाहते हैं। मैं हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता का हामी रहा हूँ परन्तु आप लोगों के जुनून की प्रतिक्रिया तो होगी ही। किसी समय शौकत अली और गोपालसिंह पगड़ी बदल भाई बने थे किंतु दोनों की राजनीतिक दिशाएँ अलग होने के कारण ही दोनों में मन मुटाव हो गया था और गोपालसिंह का मोह कांग्रेस से भंग हो गया था।

    मार्च 1939 में इस महान क्रांतिकारी का निधन हो गया। ठाकुर केसरीसिंह ने राव गोपालसिंह के बारे में लिखा है-


    रह्यो लाल पाँचाल में, महाराष्ट्र में बाल।

    राजत राजस्थान में गौरवमय गोपाल।

    गौरीशंकर हीराचंद ओझा (रायबहादुर)

    महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा का जन्म ई.1863 में सिरोही जिले के रोहिड़ा गाँव में हुआ। ओझाजी ने हिंदी में पहली बार 'भारतीय प्राचीन लिपि माला' ग्रंथ का शास्त्रीय लेखन कर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम लिखवाया। इस ग्रंथ में 84 लिपियों का विवेचन है। ओझाजी ने कर्नल टॉड की पुस्तक 'एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान' का हिंदी में अनुवाद किया। 13 वर्ष तक उन्होंने नागरी प्रचारणी पत्रिका का सम्पादन किया। उन्होंने उदयपुर, जोधपुर प्रतापगढ़, सिरोही, बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा बीकानेर रियासतों का इतिहास लिखा तथा मुहता नैणसी की ख्यात का संपादन किया।

    ओझाजी ने सोलंकियों का इतिहास तथा कर्नल जेम्स टॉड का जीवन चरित्र भी लिखा। ई.1908 में ओझाजी को अजमेर में स्थापित राजपूताना म्यूजियम का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। उदयपुर के महाराणा ने उन्हें कड़क्का चौक में एक बहुत बड़ी हवेली रहने के लिये दी। वे इसी हवेली में पूरी शान के साथ रहते थे। इसे ओझा भवन के नाम से जाना जाता था। आज भी यह हवेली अजमेर में देखी जा सकती है।

    ई.1914 में उन्हें रायबहादुर की पदवी मिली। इन्हें काशी विश्वविद्यालय ने डी लिट. की मानद उपाधि दी। उनका निधन 27 अप्रेल 1947 को रोहिड़ा गांव में हुआ।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×