Blogs Home / Blogs / अजमेर नगर का इतिहास - पुस्तक / अजमेर का इतिहास - 84
  • अजमेर का इतिहास - 84

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 84

    स्वतंत्र भारत में केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    26 जनवरी 1950 को पांठ-पीपलोदा का जिला मध्य भारत प्रान्त में स्थानान्तरित कर दिया गया। पार्ट सी स्टेट बिल 1951 के पारित होने परे यह क्षेत्र अजमेर के पार्ट सी में सम्मिलित कर दिया गया और एक विधान सभा बनाई गई।

    राजस्थान की 19 रियासतों एवं 4 ठिकाणों का राजस्थान में एकीककरण होने के बाद भी इन रियासतों के केन्द्र में स्थित अजमेर को केन्द्र शासित प्रदेश बना रहने दिया गया। इससे अजमेर की स्थिति एक लघु टापू जैसी हो गई, जिसके चारों तरफ राजस्थान प्रदेश था और बीच में 2,417 वर्ग मील क्षेत्र और 7 लाख की आबादी वाला केन्द्र शासित प्रदेश अजमेर था।

    चीफ कमिश्नर की सलाहकार परिषद

    अजमेर राज्य के प्रशासनिक संचालन के लिये चीफ कमिश्नर को सलाह देने के लिये ई.1946 से एक सलाहकार परिषद् बनी हुई थी। यह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी काम करती रही। इस सलाहकार परिषद में बालकृष्ण कौल, किशनलाल लामरोर, मिर्जा अब्दुल कादिर बेग, मुकुट बिहारी लाल भार्गव, कृष्णगोपाल गर्ग, मास्टर वजीरसिंह, पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में सूर्यमल मौर्य जिला बोर्ड एवं अजमेर राज्य की नगरपालिकाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि,को मनोनीत किया गया था।

    भारत विभाजन के कारण कादिर बेग पाकिस्तान चला गया। उसके स्थान पर सैयद अब्बास अली को नियुक्त किया गया। 1946 से 1952 तक की अवधि में अजमेर के चीफ कमिश्नर पद पर शंकर प्रसाद, सी. बी. नागरकर, के. एल. मेहता, ए. डी. पण्डित एवं एम. के. कृपलानी ने कार्य किया। 1952 में अजमेर विधान सभा के गठन के साथ ही यह परिषद समाप्त हो गई।

    अजमेर धारासभा

    अजमेर विधानसभा को धारासभा कहा जाता था। ई.1952 में अजमेर धारासभा की 30 सीटों के लिये प्रथम आम चुनाव हुए। 20 सीटों पर कांग्रेस, 3 सीटों पर भारतीय जनसंघ, 3 सीटों पर पुरुषार्थी पंचायत तथा 4 सीटों पर निर्दलीय सदस्य चुने गये। हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृत्व में अजमेर में पहली और अन्तिम सरकार बनी जिसमें बालकृष्ण कौल गृह एवं वित्त मंत्री तथा ब्यावर निवासी बृजमोहन शर्मा राजस्व एवं शिक्षा मंत्री बनाये गये। 24 मार्च 1952 को उपाध्याय मंत्रिमण्डल ने शपथ ली। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे हटूण्डी के गांधी आश्रम में ही रहे।

    22 मई 1952 को केन्द्रीय गृहमंत्री डॉ. कैलास नाथ काटजू ने अजमेर धारा सभा का उद्घाटन किया। भागीरथ सिंह को इस धारासभा का अध्यक्ष चुना गया तथा रमेशचंद्र भार्गव को इसका उपाध्यक्ष चुना गया। बाद में भार्गव को अध्यक्ष एवं अब्बास अली को उपाध्यक्ष बनाया गया। प्रतिपक्षी दल के नेता डॉ. अम्बालाल थे। धारासभा को चलाने के लिये 19 कानून बनाये गये।

    सरकार के कार्य में सहायता के लिये विकास समिति, विकास सलाहकार मण्डल, औद्योगिक सलाहकार मण्डल, आर्थिक जांच मण्डल, हथकरघा सलाहकार मण्डल, खादी एवं ग्रामोद्योग मण्डल, पाठ्यपुस्तक राष्ट्रीयकरण सलाहकार मण्डल, पिछड़ी जाति कल्याण मण्डल, बेकारी समिति, खान सलाहकार समिति, विक्टोरिया चिकित्सालय समिति, स्वतंत्रता आंदोलन इतिहास समिति, नव सुरक्षित जन जांच समिति का कठन किया गया। इनमें सरकारी एवं गैर सरकारी सदस्यों को सम्मिलित किया गया।

    लोकसभा एवं राज्य सभा में प्रतिनिधित्व

    अजमेर राज्य से भारत की लोकसभा के लिये दो एवं राज्यसभा के लिये एक सदस्य चुने जाने की व्यवस्था की गई। ई.1952 में हुए लोकसभा चुनावों में अजमेर-नसीराबाद क्षेत्र से ज्वाला प्रसाद शर्मा तथा केकड़ी-ब्यावर क्षेत्र से मुकुट बिहारीलाल भार्गव चुने गये। राज्यसभा के लिये अब्दुल शकूर चुने गये। ई.1954 में करुम्बया को राज्य सभा सदस्य चुना गया।

    अजमेर से सामंतशाही का अंत

    अजमेर राज्य का क्षेत्रफल 2,417 वर्गमील था। 1951 की जनगणना के अनुसार अजमेर राज्य की जनसंख्या 6,93,372 थी। इस राज्य का दो तिहाई भाग जागीरदारों व इस्तमुरारदारों (ठिकाणेदारों) के अधीन था जबकि केकड़ी का पूरा क्षेत्र इस्तमुरारदारों के अधिकार में था। पूर्व में ये ठिकाणे जागीरों के रूप में थे और इन्हें सैनिक सेवाओं के बदले दिया गया था। इन ठिकानों के 277 गांवों में से 198 गांवों से सैनिक व्यय वसूल किया जाता था।

    ब्रिटिशकाल से पहले सामन्तशाही के दौरान यहाँ सत्तर बड़े इस्तमुरारदार और चार छोटे इस्तमुरारदार थे। इनमें से 64 ठिकाणे राठौड़ों के, 4 चीतों के, 1 सिसोदियों का तथा एक ठिकाणा गौड़ राजपूतों का था। ई.1872 में भारत सरकार ने इन्हें सनद प्रदान की थी। ई.1877 में अजमेर भू राजस्व भूमि विनियम के अंतर्गत इनका नियमन किया गया था। इस्तमुरारदारों की तीन श्रेणियां थीं- जब कभी किसी ठिाणे के इस श्रेणी के निर्धारण सम्बन्धी विवाद होते थे तो चीफ कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर वायसरॉय उसका समाधान निकालता था। ब्रिटिश काल में जब कभी कोई इस्तमुरारदार दरबार में भाग लेता था तो चीफ कमिश्नर की ओर से उसका सम्मान किया जाता था। यद्यपि इस्तमुरारदार राजाओं की श्रेणी में नहीं आते थे किंतु इन्हें भी विशेष अधिकार प्राप्त थे।

    अजमेर राज्य में नौ बड़े ठिकाणे थे- शाहपुरा, खरवा, पीसांगन, मसूदा, सावर, गोविंदगढ़, भिनाय, देवगढ़ एवं केकड़ी। केकड़ी जूनिया का हिस्सा था। जूनिया, भिनाय, सावर, मसूदा एवं पीसांगन के इस्तमुरारदार मुगल शासकों के मनसबदार थे। भिनाय ठिकाणे की सर्वाधिक प्रतिष्ठा थी तथा इसके ठाकुर, राव जोधा के वंशज थे। प्रतिष्ठा की दृष्टि से दूसरे नम्बर पर सावर का ठिकाणदार था जो सिसोदिया वंशी शक्तावत राजपूत था। जूनिया का ठिकाणेदार राठौड़ था। पीसांगन का ठिकाणेदार जोधावत राठौड़ था। मसूदा का ठिकाणेदार मेड़तिया राठौड़ था।

    अजमेर जिले में माफी की जमीनें भौम कहलाती थीं। भौम चार तरह की होती थीं। पहली वे जिनकी सम्पत्ति वंश परम्परा के स्वामित्व अधिकार सहित दी जाती थीं। दूसरी वे जिनकी सम्पत्ति अपराध के कारण, राज्य दण्ड स्वरूप राज्य जब्त कर लेता था। तीसरी वे जिनकी सम्पत्ति जब्त करने के अतिरिक्त, राजस्व के अधिकार छीन लिये जाते थे और चौथी वे जिन पर दण्ड स्वरूप जुर्माना किया जाता था।

    इस्तमुरारदार ब्रिटिश सरकार को भूराजस्व की निश्चित राशि वार्षिक लगान के रूप में देते थे। जागीरदार अपने क्षेत्र का भूराजस्व सरकार को नहीं देते थे। 11 अगस्त 1955 को अजमेर एबोलिशन ऑफ इण्टरमीडियरी एक्ट के द्वारा इस्तमुरारदार समाप्त कर दिये गये। इसी प्रकार 10 अक्टूबर 1955 को जागीरदार एवं छोटे ठिकाणेदारों को समाप्त किया गया। 1958 में भौम एवं माफीदारी व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया गया।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×