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  • अजमेर का इतिहास - 82

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 82

    अजमेर के साम्प्रदायिक दंगों पर नेहरू एवं पटेल में विवाद (2)


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    सरदार पटेल ने आयंगर की अजमेर यात्रा को पसंद नहीं किया। 23 दिसम्बर 1947 को पटेल ने आयंगर को पत्र लिखकर फटकारा कि इतने वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते उसे यह सोचना चाहिये था कि उसकी इस यात्रा के क्या गंभीर प्रभाव होंगे ? उसकी इस यात्रा से अजमेर के चीफ कमिश्नर जैसे वरिष्ठ अधिकारी की कैसी विचित्र स्थिति हुई है जो कि एक प्रांत का मुखिया है ? ऐसी स्थिति में चीफ कमिश्नर को पूरा अधिकार है कि वह मंत्रियों अथवा अपने विभाग के सचिव के अतिरिक्त हर अधिकारी का विरोध करे।

    पटेल ने आयंगर की इस बात के लिये भी भर्त्सना की कि उसने अजमेर-मेरवाड़ा को लेकर प्रेस में वक्तव्य जारी किया। इन परिस्थितियों में दिये गये इस वक्तव्य से ऐसा लगा है कि चीफ कमिश्नर द्वारा अजमेर में परिस्थति को संभालने के कार्य को लेकर प्रधानमंत्री में असंतोष है। यदि प्रधानमंत्री स्वयं नहीं जा सकते थे तो वे सरदार पटेल को अथवा गोपालस्वामी को अथवा किसी अन्य मंत्री को जाने के लिये कह सकते थे। गोपालस्वामी प्राइम मिनिस्टर ऑफ कश्मीर (ई.1937-43), संविधान सभा के सदस्य; भारत सरकार में बिना विभाग के मंत्री (ई.1947-48); यूनाईटेड नेशन सुरक्षा परिषद में भारतीय प्रतिनिधि मण्डल के नेता रहे।

    23 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने नेहरू को सीधे ही एक पत्र लिखकर कहा कि आयंगर की अजमेर यात्रा आश्चर्य में डालने वाली एवं धक्का पहुँचाने वाली थी। इस यात्रा के दो ही अर्थ निकलते हैं। पहला यह कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री द्वारा अजमेर को लेकर दिये गये वक्तव्य से असंतुष्ट थे। दूसरा यह कि वे अजमेर के स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई कार्यवाही से असंतुष्ट थे।

    इसलिये प्रधानमंत्री ने स्वतंत्र अभिमत जानने के लिये अपने प्रमुख निजी सचिव को अजमेर यात्रा पर भेजा। चीफ कमिश्नर या तो मंत्री के अधीन होता है या फिर सम्बन्धित विभाग के सचिव के अधीन होता है। पटेल ने चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद की प्रशंसा करते हुए लिखा कि वह यू पी का सबसे योग्यतम अधिकारी है जिसकी दक्षता, ईमानदारी एवं निष्पक्षता को चुनौती नहीं दी जा सकती। आयंगर की इस यात्रा ने शंकर प्रसाद को दुखी किया है तथा उसकी छवि को कमजोर किया है। कौल तथा भार्गव द्वारा चीफ कमिश्नर के विरुद्ध एक अभियान चलाया गया था। इस यात्रा से आयंगर को कौल तथा भार्गव के बारे में सही जानकारी हो गई होगी। अतः आशा की जानी चाहिये कि अजमेर की यह यात्रा, इस प्रकार की अंतिम यात्रा होगी।

    जवाहरलाल नेहरू ने उसी दिन पटेल को जवाब भिजवाया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह यात्रा इन परिस्थितियों में व्यक्तिगत प्रकार की थी। इस यात्रा का उद्देश्य किसी अधिकारी अथवा उसके द्वारा किये गये कार्य पर कोई निर्णय देना नहीं था। यह जनता से सम्पर्क करने के लिये, विशेषतः पीड़ितों से सम्पर्क करने के लिये की गई ताकि उनका विश्वास जीता जा सके तथा उनके हृदय से भय को निकाला जा सके। नेहरू ने सहमति व्यक्त की कि शंकर प्रसाद एक अच्छे और निष्पक्ष अधिकारी हैं किंतु यह समझ से परे है कि प्रधानमंत्री द्वारा किसी व्यक्ति को अजमेर भेज देने से उसकी प्रतिष्ठा अथवा छवि को धक्का कैसे पहुँच गया!

    किसी भी परिस्थिति में जनता पर पड़ने वाला प्रभाव महत्वपूर्ण है न कि एक अधिकारी की प्रतिक्रिया। नेहरू ने लिखा कि जब लोगों के दिलों में घबराहट हो तथा मनोवैज्ञानिक परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तब केवल विशुद्ध प्रशासन कैसे काम कर सकता है! इससे तो कोई बड़ा हादसा घटित हो सकता है। किसी अधिकारी की प्रतिष्ठा अथवा हमारी स्वयं की प्रतिष्ठा एक द्वितीय मुद्दा है यदि अन्य बड़े मुद्दे दांव पर लगे हुए हों। यदि हम प्रजा के साथ सही आचरण करेंगे तो हमारी प्रतिष्ठा स्वयं ही बन जायेगी। अधिकारियों के मामले में भी ऐसा ही है।

    नेहरू ने सरदार को लिखा कि आपके और मेरे बीच में इस प्रकार की घटनाओं की प्रवृत्ति तथा कठिनाइयां उत्पन्न होने से मैं स्वयं बहुत अप्रसन्न हूँ। इससे ऐसा लगता है कि आपकी और मेरी कार्य करने की प्रवृत्ति अलग-अलग प्रकार की है। य़द्यपि आप और मैं एक दूसरे का बहुत आदर करते हैं तथापि हम दोनों के बीच जो विषय खड़ा हो गया है, इसे हम सबके द्वारा बहुत सावधानीपूर्वक लिया जाना चाहिये। यदि मुझे प्रधानमंत्री रहना है तो मुझ पर इस तरह के प्रतिबंध से मुक्ति होनी चाहिये। अन्यथा मेरे लिये यही उचित है कि मैं कुर्सी छोड़ दूं। मैं जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता और न यह चाहता हूँ कि आप ऐसा करें।

    इसलिये हम दोनों को इस परिस्थिति पर गहरा विचार करना चाहिये ताकि हमारे निर्णय राष्ट्र के लिये हितकारी हो सकें। हमने और आपने देश की लम्बी सेवा की है। यदि दुर्भाग्य से आपको अथवा मुझे सरकार से हटना पड़े तो इसे प्रतिष्ठापूर्ण एवं गरिमापूर्ण विधि से होने देना चाहिये। मैं प्रसन्नता पूर्वक त्यागपत्र देने और सत्ता आपको सौंपेने के लिये तैयार हूँ।

    सरदार पटेल ने नेहरू के इस पत्र का प्रत्युत्तर दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि यह सही है कि विभिन्न विषयों एवं मुद्दों पर आपके और मेरे काम करने के ढंग में अंतर है किंतु निष्कर्षतः अथवा अंतिम निर्णय के रूप में यह कहा जा सकता है कि आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं है। हम दोनों देश के भले के लिये एक समान उद्देश्य से काम कर रहे हैं। पटेल ने लिखा कि आयंगर का अजमेर भेजा जाना गलत था। मैं आपकी स्वतंत्रता को सीमित नहीं करना चाहता और न ही मैंने पहले कभी ऐसा किया है। न मेरा उद्देश्य आपके लिये किसी प्रकार की कोई समस्या खड़ी करना है किंतु जब यह हम दोनों को ही अपने उत्तरदायित्वों के क्षेत्र के आधारभूत प्रश्न, अधिकार तथा कार्यों में विरोधाभास स्पष्ट हों तब यह हमारे उन उद्देश्यों के लिये हितकारी नहीं होगा जो कि हम दोनों ही करना चाहते हैं।

    इस पत्र के मिलने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल को गांधीजी के निवास पर मिलने का सुझाव दिया ताकि इस विषय पर आगे विचार-विमर्श किया जा सके। 6 जनवरी 1948 को नेहरू ने गांधीजी को एक नोट भिजवाया तथा उसकी एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। सरदार ने नेहरू के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें संदेश भिजवाया कि जो भी समय उन्हें उचित लगता हो, वे गांधीजी से तय कर लें। सरदार ने भी एक नोट गांधीजी को भिजवाया तथा उसकी प्रति नेहरू को दी।

    नेहरू ने अपने नोट में गांधीजी को अजमेर प्रकरण के सम्बन्ध में घटी घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी दी तथा कुछ प्रश्न उठाये। क्या प्रधानमंत्री इस प्रकार का कदम उठाने के लिये अधिकृत थे। इस बात का निर्णय किसे लेना था ? यदि प्रधानमंत्री को इस प्रकार का कदम उठाने का अधिकार नहीं था, और न ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार था तो वे इस पद पर ढंग से काम नहीं कर सकेंगे और न ही अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकेंगे। नेहरू ने इस नोट में गांधी को लिखा कि यह तो पृष्ठभूमि है। किंतु निरंतर उठ रही व्यावहारिक कठिनाईयों के सम्बन्ध में सिद्धांत क्या रहेगा ?

    यदि सीधे शब्दों में कहें तो कैबीनेट में कुछ व्यवस्थायें करने की आवश्यकता है जो एक व्यक्ति पर उत्तरदायित्व का निर्माण कर सके। वर्तमान परिस्थितियों में या तो मैं जाऊँ या सरदार जायें। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं जाने को तैयार हूँ। मेरा या हम दोनों में से किसी एक का सरकार से बाहर जाने का अर्थ यह नहीं है कि हम आगे से एक दूसरे का विरोध करेंगे।

    हम सरकार के भीतर रहें अथवा बाहर, हम विश्वसनीय कांग्रेसी रहेंगे, विश्वसनीय साथी रहेंगे तथा हम अपने कार्यक्षेत्र में फिर से एक साथ आने के लिये कार्य करेंगे। सरदार पटेल ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री के दायित्वों के सम्बन्ध में नेहरू की धारणा से असहमति व्यक्त की। यदि प्रधानमंत्री इसी प्रकार कार्य करेगा तो वह एक निरंकुश शासक बन जायेगा। प्रधानमंत्री, सरकार में, बराबर के मंत्रियों में सबसे पहला है।

    वह अपने साथियों पर कोई बाध्यकारी शक्तियां नहीं रखता। पटेल ने गांधी को लिखा कि प्रधानमंत्री ने अपने नोट में लिखा है कि यदि प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के बीच सामंजस्य नहीं बनता है तो एक को जाना होगा। यदि ऐसा ही होना है तो मुझे जाना चाहिये। मैंने सक्रिय सेवा का दीर्घ काल व्यतीत किया है। प्रधानमंत्री देश के जाने-माने नेता हैं तथा अपेक्षाकृत युवा हैं। उन्होंने अपने लिये अंतर्राष्ट्रीय छवि स्थापित की है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि मेरे और उनके बीच में निर्णय उनके पक्ष में होगा।

    इसलिये उनके कार्यालय छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं है। इन दोनों नेताओं के मध्य, गांधीजी के समक्ष होने वाला विचार-विमर्श गांधीजी के उपवास के कारण स्थगित कर देना पड़ा। इसके अन्य कारण भी थे। कश्मीर समस्या अपने चरम पर पहुँच गई थी तथा देश में साम्प्रदायिक तनाव भी अपने उच्चतम स्तर पर था। भारत सरकार इस समय संक्रांति काल में थी। एक छोटा सा धक्का भी बहुत बड़ा नुक्सान पहुँचा सकता था। अंत में गांधी की हत्या ने नेहरू और पटेल को एक किया। इसी के साथ पटेल और नेहरू के बीच रहने वाला स्थाई विरोध और मतभेद काल के गर्त में समा गये।

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