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  • अजमेर का इतिहास - 81

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 81

    अजमेर के साम्प्रदायिक दंगों पर नेहरू एवं पटेल में विवाद (1)


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    स्वतंत्र भारत में प्रवेश


    राजपूताना ऐजेन्सी भंग कर दी गई। अजमेर को भारत सरकार के 'सी' श्रेणी के राज्यों की सूचि में सम्मिलित किया गया। उन दिनों में कुछ साम्प्रदायिक दंगे भी हुए जिन पर नियंत्रण पा लिया गया। उसी वर्ष पांठ-पीपलोदा का जिला अजमेर-मेरवाड़ा के चीफ कमिश्नर के अधीन कर दिया गया तथा अजमेर-मेरवाड़ा के डिप्टी-कमिश्नर को पांठ-पीपलोदा का कलक्टर बनाया गया।

    27 अगस्त 1947 को कुछ मुस्लिम एक मस्जिद के समक्ष नमाज पढ़ने के लिये एकत्रित हुए। उनका निश्चय अजमेर में साम्प्रदायिक दंगा फैलाने का था। इन लोगों के कुछ समूहों ने अजमेर के लगभग आधा दर्जन मौहल्लों पर हमले किये। उन्होंने हिन्दू महाबीर दल शोभायात्रा पर भी हमला किया। उस समय अजमेर में निकटर्वी रियासतों से लगभग 10 हजार शरणार्थी शरण लिये हुए थे। वे शरणार्थी लोग, इन हमलों से तनाव में आ गये।

    इस कार्यवाही के बाद मुसलमानों में यह भय व्याप्त हो गया कि अब दूसरे पक्ष की ओर से बदले की कार्यवाही की जायेगी। उस समय अजमेर में मुस्लिम लीग सक्रिय थी। उसने मुसलमानों को अजमेर से निकालकर पाकिस्तान भेजने की योजना तैयार की। इससे अजमेर में तनाव चरम पर पहुँच गया। ठीक इसी समय प्रशासन ने कड़े कदम उठाये और समस्त प्रकार की गतिविधियां थम गईं। इसके बाद 5 दिसम्बर 1947 तक कुछ नहीं हुआ।

    5 दिसम्बर 1947 को दरगाह बाजार में एक मुस्लिम लडके और एक सिंधी लड़के के बीच एक ग्रामोफोन का बेचान हुआ। इस बेचान के मामले में दोनों युवक झगड़ पड़े। इस झगड़े में तीन सिंधी युवकों को चोट आई। यह झगड़ा पूरे बाजार में फैल गया। उसके बाद अन्य बाजारों में भी दोनों समुदायों ने एक दूसरे की दुकानों पर आक्रमण किये। अगले एक घण्टे में 41 व्यक्ति घायल हो गये। इनमें से तीन मुस्लिम लड़कों एवं एक सिंधी लड़के की मृत्यु हो गई।

    6 दिसम्बर को एक मुस्लिम मौहल्ले में ड्यूटी पर तैनात हिन्दू कॉंस्टेबल गायब हो गया। इस कांस्टेबल की तलाशी में मुस्लिम मौहल्ले की तलाशी ली गई। साथ ही कुछ अन्य मौहल्लों की भी तलाशी ली गई। इस तलाशी में कांस्टेबल को तो बरामद नहीं किया जा सका किंतु दो तोपें, एक मजल लोडिंग गन, एक ब्रीच लोडिंग गन, दस तलवारें, चार खंजर, गन पाउडरों से भरी शीशियां, 300 कारतूस बरामद किये गये। इस बरामदगी के बाद दोनों हिन्दुओं पर 75 हजार रुपये तथा मुसलमानों पर 3 हजार रुपये का अर्थदण्ड लगाया गया। इस राशि को वसूलने के लिये कठोर प्रयास किये गये।

    हिन्दुओं ने स्वयं पर लगाये गये अर्थदण्ड की मात्रा पर भारी विरोध किया। 13 दिसम्बर को गुमशुदा कांस्टेबल का शव प्राप्त कर लिया गया। पूरे पुलिस सम्मान के साथ शव का अंतिम संस्कार किया गया। जब इस कांस्टेबल की शवयात्रा नया बाजार के पास से निकली तो कुछ लोगों ने दुकानों में लूट मचा दी। जब लूटमार पूरे अजमेर में फैलने लगी तो पुलिस तथा सेना को कुछ स्थानों पर फायरिंग करनी पड़ी। मध्याह्न पश्चात् 2.30 बजे अजमेर में कर्फ्यू लगा दिया गया। चीफ कमिश्नर को एक अनियंत्रित भीड़ पर लाठी चार्ज करने तथा गोली चलाने के निर्देश देने पड़े। 16 दिसम्बर को सेना ने फिर से एक भीड़ पर गोली चलाई जो शहर में लूटपाट कर रही थी। इस प्रकार 5 दिसम्बर से 16 दिसम्बर की अवधि में अजमेर में दंगाइयों की कार्यवाही तथा पुलिस एवं सेना की गोली से 47 लोगों की मृत्यु हो गई।

    इसी समय दिल्ली से सेना बुला ली गई। इस टुकड़ी ने सख्त पैट्रोलिंग आरंभ की। दिल्ली क्षेत्र के कमाण्डिंग अधिकारी जनरल राजेन्द्रसिंह ने अजमेर का दो दिवसीय भ्रमण किया। पं. नेहरू ने इण्टर डोमिनियन मायनोरिटीज के अध्यक्ष एन. आर. मलकानी को एक तार देकर सूचित किया कि उन्हें अजमेर में हुए दंगों पर गहरा खेद है किंतु दरगाह को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। नेहरू ने मलकानी को यह भी सूचित किया कि वे शीघ्र ही अजमेर का दौरा करेंगे।

    पाकिस्तान सरकार के शरणार्थी एवं पुनर्वास मंत्री गजनफर अली खां ने भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल को अजमेर की स्थिति के सम्बन्ध में टेलिग्राम किया। गजनफर अली खां मुस्लिम लीग नेता थे जो जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे। विभाजन के समय जिन्ना के साथ पाकिस्तान चले गये। 17 दिसम्बर 1947 को सरदार पटेल ने उसे जवाब में टेलिग्राम भिजवाकर सूचित किया कि अजमेर में स्थिति नियंत्रण में है तथा एक सैनिक टुकड़ी दरगाह की रक्षा कर रही है।

    जवाहरलाल नेहरू अजमेर के दंगों पर बहुत चिंतित थे। बालकृष्ण कौल एवं मुकुट बिहारी लाल ने नेहरू को अजमेर की स्थिति के बारे में सूचित किया। नेहरू अजमेर के अधिकारियों एवं पुलिस के रवैये से प्रसन्न नहीं थे। नेहरू ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में दो महत्त्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान दिलाया। पहला बिंदु यह था कि यदि इस घटना की बड़े स्तर पर पुनरावृत्ति हुई तो उसके भयानक परिणाम होंगे। दूसरा यह कि दरगाह के कारण अजमेर पूरे भारत में तथा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यदि दरगाह को कुछ हुआ तो उसका प्रचार पूरे भारत में एवं पूरे विश्व में होगा। इससे भारत सरकार की छवि को धक्का पहुँचेगा।

    जवाहरलाल नेहरू का पत्र मिलने के बाद सरदार पटेल ने अजमेर प्रकरण पर एक वक्तव्य जारी किया। उन्होंने अजमेर में हुई मौतों की संख्या बताते हुए यह कहा कि 15 दिसम्बर 1947 से लेकर अब तक हुए दंगों में 5 हिन्दू तथा 1 मुसलमान मरा है। साथ ही पुलिस फायरिंग में 21 हिन्दू तथा 62 मुसलमान घायल हुए हैं। मिलिट्री की फायरिंग में 8 हिन्दू तथा 7 मुसलमान मारे गये हैं और 2 हिन्दू एवं 2 मुसलमान घायल हुए हैं। सम्पत्ति का भयानक नुक्सान हुआ है। अधिक नुक्सान स्टेशन रोड तथा इम्पीरियल रोड पर स्थित मुसलमानों की आठ बड़ी दुकानों में हुआ है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य दुकानों यथा स्टेशनरी, चूड़ी, आलू, कोयला, किताबों आदि की दुकानों में भी नुक्सान हुआ है। कुल 41 दुकानें लूटी गई हैं तथा 16 दुकानें जलाई गई हैं। इनमें से तीन दुकानें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। सम्पत्ति को नष्ट होने से बचाने तथा दंगाइयों को बंदी बनाने के लिये सघन प्रयास किये गये हैं। दरगाह इस सबसे पूरी तरह सुरक्षित रही है। सरदार पटेल ने दरगाह से जुड़े धार्मिक लोगों से अपील की कि वे इसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखेंगे। उन्होंने सरकार की ओर से आशा व्यक्त की कि इस ऐतिहासिक नगरी में शीघ्र की फिर से शांति स्थापित होगी।

    नेहरू ने अजमेर भ्रमण का कार्यक्रम बनाया किंतु अचानक ही पं. नेहरू के भतीजे की मृत्यु हो गई। इससे इस यात्रा को निरस्त करना पड़ा। उन्होंने सोचा कि इससे अजमेर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा क्योंकि अजमेर में उनकी बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा हो रही थी। यह यात्रा पूरे देश को यह दिखाने के लिये की जा रही थी कि सरकार इस प्रकार की स्थिति से बहुत चिंतित है तथा इससे निबटने में नेता व्यक्तिगत रूप से रुचि ले रहे हैं। नेहरू का मानना था कि दिल्ली के बाद देश में अजमेर ही दूसरा महत्वपूर्ण नगर है जहाँ हो रही घटनाओं का पूरे देश की नीतियों पर प्रभाव पड़ रहा है।

    इसलिये नेहरू ने अपने प्रमुख निजी सचिव एच. आर. वी. आर. आयंगर से कहा कि वे अजमेर जाकर अजमेर की जनता से नेहरू के न आने के लिये नेहरू की ओर से क्षमा मांगें। आयंगर ने 20 दिसम्बर 1947 को शनिवार के दिन अजमेर का दौरा किया। उन्होंने अजमेर में हुए नुक्सान वाले स्थलों का निरीक्षण किया तथा एडवाइजरी कौंसिल के सदस्यों से विचार-विमर्श किया। उन्होंने मुकुट बिहारी लाल एवं बालकृष्ण कौल से भी विचार-विमर्श किया। अगले दिन उसने मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डलों, खादिमों, आर्यसमाज के सदस्यों, महासभा के सदस्यों एवं प्रेस प्रतिनिधियों से बात की।

    आयंगर के इस प्रकार विजिट करने से अजमेर का चीफ कमिश्नर शंकर प्रसाद बुरी तरह घबरा गया। उसे लगा कि इस यात्रा से यह छवि बनी है कि चीफ कमिश्नर न केवल स्थिति को संभालने में बुरी तरह विफल रहा अपितु उसने सरकार को पूरे तथ्य बताने में भी बेईमानी बरती है। इसलिये शंकर प्रसाद ने गृहमंत्री सरदार पटेल के निजी सचिव वी. शंकर को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि चीफ कमिश्नर को कम से कम यह ज्ञात होने का अधिकार होना चाहिये था कि उसने ऐसा क्या किया है जो उस पर विश्वास नहीं किया जा रहा है तथा जनता से उसके सम्बन्ध में प्रश्न किये जा रहे हैं।

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