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  • अजमेर का इतिहास - 80

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 80

    अजमेर में स्वतंत्रता आंदोलन (2)


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    नमक सत्याग्रह


    अप्रेल 1930 में देशव्यापी नमक सत्याग्रह चला। इसमें अजमेर ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 20 अप्रेल 1930 को हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृतव में अजमेर में नमक कानून तोड़ा गया। हरिभाऊ उपाध्याय, विजयसिंह पथिक, गोकुललाल असावा तथा रामनारायण चौधरी आदि नेता बंदी बनाये गये।

    राजपूताना और मध्य भारत सभा का प्रान्तीय सम्मेलन

    23 नवम्बर 1931 को अजमेर में कस्तूरबा गांधी की अध्यक्षता में राजपूताना और मध्य भारत सभा का प्रान्तीय राजनैतिक परिषद् का सम्मेलन हुआ।

    सस्ता साहित्य मण्डल पर ताला

    ई.1932 में सरकार ने सस्ता साहित्य मण्डल के प्रेस कार्यालय पर ताला डाल दिया।

    राजपूताने में प्रजामण्डलों की स्थापना

    ई.1938 की हरिपुरा कांग्रेस के पश्चात् राजपूताना रियासतों में प्रजामण्डल स्थापित हुए जिससे इन रियासतों में रियासती आंदोलन का सूत्रपात हुआ। इन रियासती आंदोलनों का अजमेर पुनः केन्द्र बना। जहां-तहां प्रजा मण्डलों की स्थापना की गई। इस आंदोलन का उद्देश्य रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था। यह आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का ही एक भाग था। रियासती आंदोलनों को अजमेर का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

    अजमेर प्रजा मण्डल की स्थापना

    ई.1938 में मेवाड़ से निष्कासन के बाद माणिक्यलाल वर्मा ने अजमेर में प्रजा मण्डल की स्थापना की। 14 दिसम्बर 1938 को मेवाड़ प्रजा मण्डल के प्रमुख कार्यकर्त्ता मथुरा प्रसाद वैद्य को अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत के ब्रिटिश क्षेत्र से बंदी बनाया गया। ई.1939 में मेवाड़ पुलिस द्वारा अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत की सीमा में घुसकर माणिक्यलाल वर्मा को बंदी बनाया गया तथा उन्हें निर्ममता से पीटा गया।

    कृष्ण गोपाल गर्ग व बालकृष्ण गर्ग को जेल

    8 से 16 अप्रेल 1940 तक अजमेर कांग्रेस के राष्ट्रीय सप्ताह में झण्डा फहराने पर कृष्ण गोपाल गर्ग व बालकृष्ण गर्ग को चार-चार माह की कठोर जेल दी गई।

    रेल कर्मचारियों की हड़ताल

    15 अगस्त 1941 को अजमेर में रेलवे के दस हजार कर्मचारियों ने हड़ताल की। इस सिलसिले में 19 अगस्त को ज्वाला प्रसाद शर्मा को बंदी बनाया गया। 12 नवम्बर 1941 को उन्होंने जेल से भागने का असफल प्रयास किया। भारत सुरक्षा नियम के तहत उन्हें सवा साल की सजा सुनाई गई। फरवरी 1942 में उनकी सजा समाप्त कर दी गई। इसी माह उनके विरुद्ध एक और अभियोग दर्ज हुआ जिसमें उन्हें 6 माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। 29 फरवरी 1942 को वे एक अन्य बंदी के साथ जेल से फरार हो गये।

    भारत छोड़ो आंदोलन

    ई.1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का अजमेर की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। अजमेर मेरवाड़ा के क्रांतिकारी तत्व प्रबल हुए। चूंकि यह आंदोलन काफी उग्र था इसलिये पहली बार कांग्रेस और क्रांतिकारियों में कुछ समन्वय दिखाई दिया। इस कारण सरकारी दमन चक्र भी तीव्र हुआ। अनेक नेता बंदी बनाये गये। कइयों को नजरबंद किया गया। इस आन्दोलन के दौरान अजमेर, ब्यावर, केकड़ी आदि से 37 व्यक्ति गिरफ्तार किये गये। समस्त कांग्रेस समितियॉं, हटूण्डी का गांधी आश्रम, अजमेर का ग्राम उद्योग संघ, हरमाड़ा का खादी विद्यालय एवं पुस्तकालय, अजमेर और ब्यावर के खादी भण्डार आदि को अवैध घोषित कर, उन पर छापे मारे गये और उनकी सम्पत्तियां नीलाम कर दी गईं।

    इस नीलामी से 15 हजार रुपये प्राप्त हुए। अनेक विद्यार्थी जो अपनी शिक्षण संस्थाओं में हड़ताल करके स्वतन्त्रता आंदोलन में कूद पड़े थे, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1 अप्रेल 1943 तक अजमेर में 61 लोगों को बंदी बनाया गया। इनमें बालकृष्ण कौल, हरिभाऊ उपाध्याय, रामनारायण चौधरी, गोकुल लाल असावा, ऋषिदत्त मेहता, मुकुट बिहारी लाल भार्गव, लादूराम जोशी, श्रीमती गोमती देवी भार्गव, अम्बालाल माथुर, शोभालाल गुप्त भी सम्मिलित थे।

    बालकृष्ण कौल एवं गोकुल लाल असावा को जेल अधिकारियों की आज्ञा न मानने पर चार माह का कठोर कारावास दिया गया। इसके विरोध में कौल ने जेल में ही भूख हड़ताल आरंभ कर दी। ब्रिटिश सरकार ने श्रीमती कौल को मिलने की अनुमति नहीं दी। बाद में महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें मिलने दिया गया। इसके बाद कौल ने भूख हड़ताल समाप्त कर दी। इन कैदियों के साथ सभी तरह का बुरा एवं पाशविक व्यवहार किया गया। रमेश व्यास, लेखराज आर्य, शंकरलाल वर्मा, मूलचन्द असावा और बालकृष्ण कौल आदि अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों पर बड़े जुल्म ढहाये गये।

    गोविंद सहाय ने अपने 42 रिबेलियन में लिखा है कि 1943 के बाद सरकार ने अपनी कूटनीति में मामूली सा परिवर्तन किया। उन्होंने बिना किसी शर्त पर बंदियों को रिहा करना आरंभ किया परंतु मुक्त करने के साथ ही उन पर कड़ी पाबंदियां लगा दीं। सरकार ने स्वतन्त्रता सेनानियों से जेल में जबर्दस्ती अंगूठे व हस्ताक्षर करवाकर क्षमा याचना करने को कहा किन्तु कैदियों ने अंग्रेज सरकार के सामने घुटने नहीं टेके और वे सारे कागज फाड़ कर फैंक दिये। इस पर सरकार ने एक-एक करके कैदियों को छोड़ना शुरू कर दिया।

    उनमें से कइयों को 48 घन्टे के भीतर अजमेर-मेरवाड़ा प्रान्त छोड़कर जाने को कहा गया। रेडियो तथा मोटर का उपयोग करने और जुलूसों तथा सभाओं में भाग लेना प्रतिबन्धित कर दिया गया। जिन्होंने ये प्रतिबन्ध स्वीकार नहीं किये उन्हें कठोर दण्ड दिये गये। मूलचंद असावा तथा गोकुललाल असावा को चार माह का कठोर कारावास दिया गया तथा उन पर 200-200 रुपये का जुर्माना किया गया। उन्हें अजमेर के म्युन्सिपल क्षेत्र के अंदर रहने के लिये कहा गया।

    29 फरवरी 1944 को ज्वाला प्रसाद शर्मा तथा रघुराजसिंह जेल अधिकारियों की आंखों में धूल झौंककर भाग निकले और फिर हाथ नहीं आये। ई.1946 में कैबीनेट मिशन के भारत आने के बाद स्वतंत्रता निकट आती हुई दिखाई देने लगी। इस कारण अजमेर का वातावरण शांत होने लगा।

    आधी रात को आजादी

    14 अगस्त 1947 को हजारों लोग नया बाजार में एकत्र हो गये। उस दिन मैगजीन का विशाल भवन अंधेरी रात में भी प्रकाश में नहाया हुआ था। जैसे ही रात के 12 बजकर 1 मिनट हुआ और कैलेण्डर में 15 अगस्त की तिथि आरंभ हुई अजमेर कांग्रेस अध्यक्ष जीतमल लूणिया ने मैगजीन से यूनयिन जैक उतारकर तिरंगा फहराया तथा अजमेर के स्वंतत्र होने की घोषणा की। हजारों लोगों ने भारत माता का गगनभेदी जयनाद किया।

    राष्ट्रीय ध्वज को 21 तोपों की सलामी दी गई। सब लोगों ने सामूहिक रूप से वंदेमातरम् गीत गाया। बालकृष्ण कौल, हरिभाऊ उपाध्याय, बालकृष्ण गर्ग, रामनारायण चौधरी आदि प्रमुख नेताओं ने जनसमुदाय को सम्बोधित किया। रात भर स्वतंत्रता का समारोह चला। मिठाइयां बँटीं तथा भारत माता की जय के गगनभेदी नारे गूंजते रहे। इस प्रकार जो काम ई.1724 में महाराजा अजीतसिंह राठौड़ को अधूरा छोड़ देना पड़ा था, वह काम 1947 में पूरा किया जा सका।

    प्रातः होने पर हजारों बच्चे, जवान और बूढ़े स्त्री एवं पुरुष तिरंगे झण्डे लेकर सड़कों एवं गलियों में निकल आये। पटाखे छोड़े गये, विद्यालयों में मिठाइयां बाँटी गईं। एक कसक भी उस दिन अजमेर में बनी रही। आज के दिन भी बहुत से वे लोग जेलों में बंद थे जो भारत की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करते रहे थे। यहाँ तक कि ज्वाला प्रसाद शर्मा भी इस अवसर पर अजमेर में नहीं थे, वे अब भी फरार चल रहे थे।

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