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  • अजमेर का इतिहास - 8

     03.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 8

    अजमेर के चौहान शासक (5)


    बारहवीं शताब्दी में अजमेर

    पृथ्वीराज (प्रथम)

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    वीसलदेव का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज (प्रथम) हुआ। उसके समय में चौलुक्यों की सेना पुष्कर को लूटने आई। इस पर पृथ्वीराज (प्रथम) ने चौलुक्यों पर आक्रमण करके 500 चौलुक्यों को मार डाला। उसने सोमनाथ के मार्ग में एक भिक्षागृह बनाया। शेखावटी क्षेत्र में स्थित जीणमाता मंदिर में लगे वि.सं.1162 (ई.1105) के अभिलेख में अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान (प्रथम) का उल्लेख है।

    अजयदेव (अजयराज अथवा अजयपाल)

    पृथ्वीराज (प्रथम) के बाद अजयदेव अजमेर का राजा हुआ। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार ई.1113 के लगभग चौहान अजयपाल (अजयराज) ने अजमेर को अपनी राजधानी बनाया। (हमारी मान्यता है कि अजमेर की स्थापना सातवीं शताब्दी में अजयपाल ने की जो शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों के क्रम में तीसरा था। वह चौहान वासुदेव का पौत्र तथा चौहान सामंतदेव का पुत्र था। जिस पहाड़ी पर तारागढ़ बना हुआ है वह पहाड़ी इसी राजा के नाम से अजगंध कहलाती थी। हो सकता है कि कुछ समय के लिये अजमेर चौहानों की राजधानी न रही हो तथा ई.1113 में अजयराज ने पुनः अजमेर को अपनी राजधानी बनाया। इसलिये अधिकांश इतिहासकार इस अजयराज को अजमेर का संस्थापक मानते हैं। अजयपाल को अजयराज तथा अजयराज को अजयपाल कहकर भाटों ने इतिहास को और जटिल बनाने का काम किया है।)

    उसके बाद ही अजमेर का विश्वसनीय इतिहास प्राप्त होना आरंभ होता है। अजयराज ने चांदी तथा ताम्बे के सिक्के चलाये। उसके कुछ सिक्कों पर उसकी रानी सोमलवती का नाम भी अंकित है। अजयराज शैव होते हुए भी धर्म सहिष्णु था। उसने जैन और वैष्णव धर्मावलम्बियों को सम्मान की दृष्टि से देखा। उसने जैनों को अजमेर में मंदिर बनाने की अनुमति प्रदान की और पार्श्वनाथ के मंदिर के लिये सुवर्ण कलश प्रदान किया। उसके समय में होने वाले दिगम्बर और श्वेताम्बरों के शास्त्रार्थ की अध्यक्षता उसके स्वयं के द्वारा किया जाना यह बताता है कि वह दोनों मतावलम्बियों का विश्वासभाजन था और उनके शास्त्रों का मर्मज्ञ था। पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजयदेव ने संसार को सिक्कों से भर दिया। उसकी रानी सोमलदेवी नये सिक्कों की डिजाइन बनाने की शौकीन थी। ई.1123 में अजयदेव ने मालवा के मुख्य सेनापति साल्हण को पकड़ लिया। उसने अजमेर पर चढ़कर आये मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर उनका बड़ी संख्या में संहार किया।

    अजयराज ने चाचिक, सिंधुल तथा यशोराज पर विजय प्राप्त की तथा उन्हें मार डाला। वह मालवा के प्रधान सेनापति सल्हण को पकड़ कर अजमेर ले आया तथा एक मजबूत दुर्ग में बंद कर दिया। उसने मुसलमानों को परास्त करके बड़ी संख्या में उनका वध किया। उसने उज्जैन तक का क्षेत्र जीत लिया। अजयराज को अजयराज चक्री भी कहते थे क्योंकि उसने चक्र की तरह दूर-दूर तक बिखरे हुए शत्रुदल को युद्ध में जीता था। अर्थात् वह चक्रवर्ती विजेता था। ई.1130 से पहले किसी समय अजयराज अपने पुत्र अर्णोराज को राज्य का भार देकर पुष्करारण्य में जा रहा। अजयराज ई.1140 तक जीवित रहा।

    दो अजयदेवों में उलझा इतिहास

    अब तक अजमेर के चौहानों के इतिहास के सम्बन्ध में जितने भी प्राचीनतम उल्लेख मिलते हैं, उनसे अनुमान होता है कि अजमेर के चौहानों में दो राजाओं के नाम अजयदेव, अजयपाल, अजयराज अथवा अज थे। इनमें से पहला ईसा की छठी अथवा सातवीं शताब्दी में हुआ। वह चौहान शासक वासुदेव से वंशक्रम में तीसरा था। जबकि दूसरा अजयदेव बारहवीं शताब्दी में हुआ। वह वासुदेव से वंशक्रम में पच्चीसवां था। इन दोनों अजयदेवों के इतिहास आपस में इतने उलझ गये हैं कि उन्हें बिना किसी और ठोस प्रमाण के, अलग नहीं किया जा सका। डॉ. दशरथ शर्मा और डॉ. गोपीनाथ शर्मा जैसे मूर्धन्य इतिहासकारों ने इस उलझन में फंसकर, अजमेर नगर की स्थापना अजयदेव (प्रथम) के द्वारा छठी शताब्दी में की जानी न मानकर, दूसरे अजयदेव द्वारा बारहवीं शताब्दी में की जानी मान ली है। हमारा स्पष्ट मत है कि छठी-सातवीं शताब्दी के अजयदेव ने ही अजमेर नगर की स्थापना की।

    अर्णोराज

    अजयदेव का पुत्र अर्णोराज, अजयदेव का उत्तराधिकारी हुआ। अर्णोराज को आनाजी भी कहते हैं। अर्णोराज ई.1133 के आसपास अजमेर की गद्दी पर बैठा तथा ई.1155 तक शासन करता रहा। वह भी अपने पूर्वजों की भांति शक्तिशाली शासक हुआ। अजमेर संग्रहालय की खण्ड प्रशस्ति से विदित होता है कि उसने उन तुर्कों को पराजित किया जो मरुस्थल को पार करके अजमेर तक आ पहुँचे थे। इस आक्रमण की तिथि ई.1135 होनी चाहिये। मुसलमानों की सेना पुष्कर को नष्ट करके अजमेर की तरफ बढ़ी और पुष्कर की घाटी का उल्लंघन करके अजमेर नगर के बाहर तक आ पहुँची।

    अर्णोराज ने उनका संहार कर उन पर विजय प्राप्त की। जिस स्थल पर यवनों का रक्त गिरा था उस स्थल को शुद्ध करने के लिये वहाँ उसने एक हवन किया तथा उस स्थान पर आनासागर झील बनाई। उसने मालवा के नरवर्मन को परास्त किया। उसने अपनी विजय पताका को सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों तक ले जाकर अपने वंश की परम्परा के महत्त्व को बढ़ाया। हरितानक देश तक अभियान का नेतृत्व कर उसने अपनी पैतृक विजय भावनाओं के प्रति कटिबद्धता प्रकट की। इन विजयों से उसने पंजाब के कुछ पूर्वी भाग और संयुक्त प्रांत के पश्चिमी भाग को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया।

    अर्णोराज ने हरियाणा, दिल्ली तथा वर्तमान उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले (तब वराणा राज्य अथवा वरण नगर) पर भी अधिकार कर लिया। उसने खतरगच्छ के अनुयायियों के लिये भूमिदान दिया तथा पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया। देवबोध तथा धर्मघोष उसके समय के प्रकाण्ड विद्वान थे जिनको उसने सम्मानित किया। चौलुक्यों तथा चौहानों के बीच राज्य विस्तार को लेकर लम्बे समय से संघर्ष चला आ रहा था। अर्णोराज के समय में यह संघर्ष अपने चरम को पहुँच गया। अर्णोराज अपने राज्य का विस्तार मालवा की तरफ करना चाहता था जबकि चौलुक्य शासक सिद्धराज जयसिंह अपने राज्य का विस्तार राजस्थान की ओर बढ़ाना चाहता था।

    ई.1134 में सिद्धराज जयसिंह ने अजमेर पर आक्रमण किया किंतु अर्णोराज ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद हुई संधि के अनुसार सिद्धराज जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से कर दिया। ई.1142 में चौलुक्य कुमारपाल, चौलुक्यों की गद्दी पर बैठा तो चाहमान-चौलुक्य संघर्ष फिर से तीव्र हो गया। (कुमारपाल सिद्धराज जयसिंह का पुत्र नहीं था। वह दहिथली के राजा त्रिभुवनपाल का पुत्र था तथा चौलुक्य राजवंश की ही एक शाखा से था। सिद्धराज जयसिंह के अपना कोई पुत्र नहीं था इसलिये उसने बाहड़ को गोद लिया था।

    सिद्धराज बाहड़ को राजा बनाना चाहता था किंतु ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि कुमारपाल ही गुजरात का अगला राजा होगा और आगे चलकर ऐसा ही हुआ।) हेमचंद्र ने लिखा है कि अर्णोराज ने कुछ राजाओं को एकत्रित करके गुजरात पर धावा बोल दिया। अर्णोराज आक्रामक था और उसने चाहड से मिलकर गुजरात के सामंतों में फूट डालकर कुमारपाल की स्थिति को गंभीर बना दिया था। हर बिलास शारदा के अनुसार अर्णोराज, अपने श्वसुर सिद्धराज जयसिंह के दत्तक पुत्र बाहड़ को गुजरात का राजा बनाना चाहता था इसलिये उसने ई.1145 में कुमारपाल पर आक्रमण कर दिया।

    इस युद्ध में कुमारपाल हार गया तथा उसने अपनी बहिन देवलदेवी का विवाह अर्णोराज के साथ कर दिया। अर्णोराज तथा कुमारपाल के बीच दूसरा युद्ध ई.1150 के आसपास हुआ। जयसिंह सूरी, जिनमण्डन, चरित्र सुंदर तथा प्रबंध कोष के अनुसार एक समय अर्णोराज और उसकी स्त्री देवलदेवी जो कि कुमारपाल की बहिन थी, चौपड़ खेलते समय हास्य विनोद में एक दूसरे के वंश की निंदा करने लगे। हास्य-विनोद, वैमनस्य में बदल गया जिसके फलस्वरूप देवलदेवी ने कुमारपाल को अर्णोराज पर आक्रमण करने के लिये उकसाया। कुमारपाल ने अर्णोराज पर आक्रमण कर दिया।

    डॉ. गोपीनाथ शर्मा उपरोक्त कथन को सत्य नहीं मानते क्योंकि कुमारपाल की किसी भी बहिन का विवाह अर्णोराज से नहीं हुआ था। जब अर्णोराज को यह ज्ञात हुआ कि कुमारपाल अपनी सेना लेकर अजमेर की ओर आ रहा है तो अर्णोराज भी अपनी सेना लेकर गुजरात की ओर चल पड़ा। आबू के निकट दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें कुमारपाल ने अर्णोराज को परास्त कर दिया। चौलुक्यों की विजयी सेना अजमेर तक आ पहुँची परंतु वह सुदृढ़ दीवारों को पार करके नगर में नहीं घुस सकी।

    कुमारपाल को हताश होकर अजमेर से लौट जाना पड़ा। कुछ समय बाद एक बार फिर अर्णोराज ने अपनी विफलता का बदला लेने की योजना बनाई। इस बार फिर चौलुक्य आगे बढ़ते हुए अजमेर तक आ पहुँचे तथा एक बार पुनः अर्णोराज की करारी पराजय हुई। इस प्रकार ई.1150 में चौलुक्य कुमारपाल ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। पराजित अर्णोराज को विजेता कुमारपाल के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना पड़ा तथा हाथी-घोड़े भी उपहार में देने पड़े। इस पराजय से अर्णोराज की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा फिर भी उसके राज्य की सीमाएं अपरिवर्तित बनी रहीं। इस विजय के बाद कुमारपाल चित्तौड़ दुर्ग में गया जहाँ उसने एक शिलालेख खुदवाकर लगवाया जिसमें अपनी अजमेर विजय का उल्लेख किया।

    रास माला के अनुसार अजमेर की सेना का नेतृत्व गोविंदराज ने किया इस कारण कुमारपाल की सेना में युद्ध के दौरान संशय बना रहा किंतु अर्णोराज लोहे की एक बर्छी लग जाने से गिर गया। इससे कुमारपाल की विजय हो गई। अर्णोराज के तीन पुत्र थे। उनमें से जगदेव तथा विग्रहराज (चतुर्थ) का जन्म मारवाड़ की राजकुमारी सुधवा के गर्भ से हुआ था जबकि सोमेश्वर का जन्म अन्हिलवाड़ा पाटन की राजकुमारी कंचनदेवी के गर्भ से हुआ था। सोमेश्वर का बचपन सिद्धराज जयसिंह की राजसभा में बीता था।

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