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  • अजमेर का इतिहास - 79

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 79

    अजमेर में स्वतंत्रता आंदोलन (1)


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    यद्यपि अजमेर में स्वाधीनता संग्राम का श्रीगणेश विप्लववादी राजनीति से हुआ था परंतु इसके साथ ही अजमेर में उदारवादी कांग्रेस की भी स्थापना हो चुकी थी। अजमेर में कांग्रेस के प्रमुख कार्यकर्ताओं में बेरिस्टर गौरीशंकर, श्यामसुंदर भार्गव, राव साहब विश्वंभरनाथ टण्डन थे। इनके नेतृत्व में अजमेर की उदारवादी कांग्रेस की गतिविधियों में शनैः शनैः प्रगति हुई। इसके तत्वावधान में अजमेर में दो राजनैतिक सम्मेलन हुए जिनका सभापतित्व डॉ. अन्सारी व पण्डित मोतीलाल नेहरू ने किया। इन सम्मेलनों में लोकमान्य तिलक एवं मौलाना शौकत अली उपस्थित थे।

    अजमेर की राजनीति इन तीन दलों में विभाजित थी। सेवासंघ प्रथम दल था जिसके प्रधान विजयसिंह पथिक थे। दूसरा दल कांग्रेस था, जिसके प्रधान अर्जुनलाल सेठी थे। इसकी शाखाएं अजमेर, ब्यावर, कोटा, करौली तथा जोधपुर में थीं। तीसरा दल गांधीवादियों का था जिसके प्रमुख सेठ जमनालाल बजाज थे। हरिभाऊ उपाध्याय उपाध्यक्ष थे। प्रांतीय स्तर पर कांग्रेसियों में गांधीवादियों की प्रधानता थी। अर्जुनलाल सेठी के विरुद्ध हरिभाऊ उपाध्याय उध्यक्ष निर्वाचित हुए थे अतः सेठी ने कांग्रेस से अपना हाथ खींच लिया था।

    उनके साथ मुसलमान भी कांग्रेस से उदासीन हो गये। गांधीजी ने इन दोनों दलों में समन्वय स्थापित करने का असफल प्रयास किया। प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व बिजोलिया सत्याग्रह की घटना ने गांधीवादी विचारधारा को बल प्रदान किया। यद्यपि इस आंदोलन के प्रमुख संचालक पथिक थे और वे गांधीवादी नहीं थे परन्तु जीवन के दूसरे हिस्से में उनके विचार गांधीवाद के लगभग समीप थे। बिजोलया आंदोलन ने कृषक आंदोलन एवं सत्याग्रह की पद्धति को जन्म दिया।

    बिजोलिया का कृषक आंदोलन प्रथम सत्याग्रह आंदोलन था जो ठिकाने के जागीरदारों के विरुद्ध कृषक जनता की अहिंसात्मक लड़ाई थी। पथिक इस दृष्टि से गांधी के भी पथप्रदर्शक थे। राजस्थान का सत्याग्रह आंदोलन ई.1919 में गांधी द्वारा आरंभ किये गये सत्याग्रह आंदोलन से काफी पहले हो चुका था। गांधी का चम्पारण कृषक सत्याग्रह, बिजोलिया के कृषक आंदोलन के बाद आरंभ हुआ। पथिक ने इस आंदोलन को दिशा दर्शन दिया जो बाद में भारतीय अहिंसावादी स्वातन्त्र्य योद्धाओं के शस्त्रागार का अचूक एवं अद्भुत शस्त्र सिद्ध हुआ।

    ई.1916 के होमरूल आंदोलन ने अजमेर की गतिविधियों पर अच्छा प्रभाव डाला। इस आंदोलन ने कांग्रेस को नया बल दिया। चांद करण शारदा, गौरी शंकर भार्गव कांग्रेस के उत्साही कार्यकर्ताओं में से थे। शनैःशनैः अजमेर की कांग्रेस में गांधीवादी विचार धारा का प्रसार होने लगा। बाबा नृसिंहदास अजमेर में गांधीवादी विचारधारा के मुख्य प्रेरणा स्रोत बने। उन्होंने हटूण्डी मंं गांधी आश्रम की स्थापना की।

    उनके बाद हरिभाऊ उपाध्याय ने इस आश्रम को संभाला। उनके मार्ग दर्शन में आश्रम ने चहुंमुखी प्रगति की। अब यह आश्रम राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर को सौंप दिया गया है। उपाध्याय ने गांधीवादी विचारधारा के प्रचार हेतु त्याग भूमि नामक पत्र का प्रकाशन किया।

    अजमेर में असहयोग आंदोलन

    खिलाफत आंदोलन एवं गांधीजी के असहयोग की आंधी से अजमेर अछूता नहीं रहा। 16 मार्च 1920 को अजमेर में खिलाफत आंदोलन समिति की स्थापना की गई। डॉ. अंसारी की अध्यक्षता में अजमेर में बड़ी धूमधाम से खिलाफत दिवस मनाया गया। इसमें चांद करण शारदा एवं मौलाना मुईउद्दीन की प्रमुख भूमिका रही। उन्होंने सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया। जहाँ-तहाँ हिन्दू मुस्लिम एकता को दृढ़ बनाने की शपथें ली गईं। इन सभाओं में जलियाँवाला बाग की दुर्घटना के निमित्त ब्रिटिश सरकार की भर्त्सना की गई। यहाँ का वातावरण बड़ा ही उत्तेजनापूर्ण बन गया। गांधीजी के असहयोग आंदोलन ने अजमेर की राजनैतिक गतिविधियों को अधिक तीव्र बना दिया। जगह-जगह धरने, हड़ताल एवं सभायें हुईं।

    विदेशों को भारत से खाद्यान्न निर्यात का विरोध किया गया। सरकारी संस्थाओं एवं नौकरियों का बहिष्कार किया गया। विदेशी वस्त्रों की होलियां जलाई गईं एवं स्वदेशी का प्रचार हुआ। स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु जनमत निर्माण किया गया। सेठ विट्ठलदास राठी ने स्वदेशी के प्रचारार्थ ब्यावर में कपड़ा मिल की स्थापना की। ई.1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांधीजी ने घोषणा की कि यदि मेरे द्वारा चलाये गये असहयोग आंदोलन को देश में पर्याप्त समर्थन प्राप्त होता है तो हमें स्वराज एक वर्ष में मिल जायेगा। उन्होंने कहा कि स्वराज का अर्थ है एक ऐसी सरकार जिसके अधीन हम अपना अलग अस्तित्व बना सकें जिसमें अंग्रेज उपस्थित नहीं हों। अपने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये गांधीजी ने पूरे देश का व्यापक दौरा किया।

    हिंसक आंदोलन की अपीलें

    मार्च 1922 के प्रथम सप्ताह में अनेक कांग्रेसी नेता प्रोविंशियल पोलिटिकल कान्फ्रेंस तथा खिलाफत मीटिंगों- 'जमीयत उल उलेमा' तथा 'जमीयत उल तुल्हा' में भाग लेने के लिये अजमेर आये। इन नेताओं ने जनसाधारण को असहयोग आंदोलन की मूल भावना तथा इसके अहिंसक स्वरूप के बारे में सफलतापूर्वक संदेश दिया। उन्होंने गांधीजी द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों- अस्पृश्यता उन्मूलन, मद्यनिषेध, चरखा चलाने, खादी बुनने तथा तिलक स्वराज फण्ड के लिये चंदा देने में सहयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने लोगों को चेतावनी दी कि वे गांधीजी के बारदोली प्रस्तावों से दिग्भ्रमित न हों।

    इन नेताओं ने दिल्ली प्रस्तावों का हवाला देते हुए आंदोलन के दौरान हर परिस्थिति में अहिंसक रहने की वकालात की किंतु लखनऊ से आये मौलवी अब्दुल बारी ने अजमेर में आयोजित एक सभा में जीभ पर नयंत्रण खोकर ऐसा भाषण दिया जिससे जनता में यह संदेश गया कि चूंकि अहिसंक आंदोलन विफल रहा है अतः हिंसा का सहारा लिया जायेगा। उनका भाषण काफी उग्र था। इससे अजमेर की जनता में बेचैनी फैल गई।

    इसके बाद अजमेर में स्थान-स्थान पर सभायें आयोजित करके बाहर से आये नेताओं ने बार-बार जनता से अपील की कि मौलवी अब्दुल ने बिल्कुल मूर्खता पूर्ण बातें की हैं, आंदोलन को हर हाल में अहिंसक रखा जाना है। स्वयं मौलवी अब्दुल ने भी वक्तव्य दिया कि उनके भाषण को गलत समझा गया है। उनके कहने का अर्थ ये नहीं था। कुछ दिनों बाद अजमेर केन्द्रीय कारगार से छूटकर आये मौलवी सलामत उल्लाह खान ने एक मंच से मौलवी अब्दुल बारी की ओर से एक पत्र पढ़ा जिसमें कहा गया कि मौलवी अब्दुल बारी ने तो यह कहा था कि यदि आगे चलकर अहिंसात्मक उपाय विफल हो जायें तो हिंसात्मक आंदोलन किया जा सकता है।

    गांधीजी अजमेर में

    नेताओं द्वारा दिये जा रहे इन वक्तव्यों में से कोई भी वक्तव्य महात्मा गांधी की भावना के अनुसार नहीं थे। जब गांधीजी को नेताओं के इस बदले रुख की जानकारी हुई तो 9 मार्च 1922 को अचानक गांधीजी अजमेर आये। किसी को भी इस यात्रा का पता नहीं था इसलिये गांधीजी का कोई स्वागत नहीं किया जा सका। गांधीजी सीधे पण्डित गौरी शंकर भार्गव के घर फूल निवास पहुँचे जहाँ सारे उलेमा गांधीजी से मिलने के लिय एकत्रित हुए। गांधीजी ने संदेह उत्पन्न करने वाला बयान देने के लिये मौलवी अब्दुल बारी की निंदा की।

    इस पर पहले से ही अप्रसन्न मुस्लिम नेता हसरत मोहानी ने मौलवी अब्दुल बारी का पक्ष लिया। गांधीजी के सामने ही भार्गव के निवास पर मौलवियों और उलेमाओं के बीच तीखी बहस हुई। हसरत मोहानी गांधीजी से इसलिये नाराज था क्योंकि उसने एक बार कांग्रेस के समक्ष पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव रखा था जिसे गांधीजी ने अस्वीकार कर दिया था। महात्मा गांधी के समक्ष पहली बार अहिंसात्मक और हिंसात्मक आंदोलन पर खुलकर बहस हुई जिसमें एक तरफ मौलवी अब्दुल बारी तथा हसरत मोहानी थे जबकि दूसरी तरफ गांधीजी और बाकी के सारे उलेमा थे।

    इस बहस में गांधीजी जीत गये। इसके बाद गांधीजी ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गये जहाँ गांधीजी का भारी स्वागत किया गया। मौलवी अब्दुल बारी को किसी ने पूछा तक नहीं। कुरान की आयतों का पाठ हुआ उसके बाद गांधीजी ने भाषण दिया कि किसी भी क्षण उनकी गिरफ्तारी हो सकती है। उसी रात गांधीजी वापस लौट गये। कुछ दिनों बाद जब गांधीजी की गिरफ्तारी का समाचार अजमेर आया तो अजमेर के वातावरण में काफी उत्तेजना फैल गई।

    नेहरू रिपोर्ट

    ई.1929 में नेहरू रिपोर्ट पर अपनी सहमति देने के लिये अजमेर के कार्यकर्त्ताओं को राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अजमेर से विजयसिंह पथिक, शोभालाल व रामनारायण चौधरी, कलकत्ता गये। दिसम्बर 1929 में बाबा नृसिंदास अग्रवाल के आदेश पर हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम हाथ में लिया। उन्हें अजमेर-मेरवाड़ा-राजपूताना-मध्यभारत कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया।

    सविनय अवज्ञा आंदोलन

    ई.1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन का अजमेर पर भी प्रभाव पड़ा। अजमेर में स्त्री वर्ग ने बड़ी संख्या में आंदोलन में भाग लेकर अपने उत्साह का परिचय दिया। गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का अजमेर की शिक्षण संस्थाओं तथा विद्यार्थियों पर गहरा प्रभाव हुआ। विद्यार्थियों द्वारा शराब की दुकानों पर पिकेटिंग की गई तथा कुछ शिक्षण संस्थाओं में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया गया। 26 जनवरी 1930 को बाबा नृसिंहदास अग्रवाल के नेतृत्व में अजमेर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

    अजमेर के एक निजी विद्यालय में हुई सविनय अवज्ञा की गतिविधियों के बाद सहायक अधीक्षक शिक्षा विभाग ने काट हाई स्कूल अजमेर के प्राचार्य को पत्र लिखा कि 26 जनवरी 1930 को स्कूल के अध्यापकों द्वारा स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, अध्यापक राजस्थान युवा संघ की बैठक में सम्मिलित हुए, गत कांग्रेस के चुनाव भी इसी स्कूल के परिसर में हुए हैं। इसी कारण काट हाई स्कूल की ग्राण्ट बंद की जाती है। यदि अनुदान पुनः चाहते हैं तो अध्यापकों की इस कार्यवाही को तुरन्त बंद किया जाये।

    विद्यार्थियों की गतिविधियों पर रोक

    अजमेर में स्कूल बालिकाओं द्वारा पिकेटिंग करने पर सहायक शिक्षा अधीक्षक ने प्राचार्य गर्ल्स प्राथमिक स्कूल को लिखा कि कुछ छात्राएं सरकार विरोधी गतिविधियों में संलग्न हैं, उनको तुरन्त स्कूल से निकाल दिया जाये। अजमेर तथा राजपूताना की विभिन्न रियासतों के वि़द्यालयों में हो रहे आंदोलनों को देखते हुए अजमेर के कमिश्नर द्वारा अजमेर-मेरवाड़ा में आने वाले विद्यालयों व महाविद्यालयों के प्राचार्यों के नाम एक आदेश निकाला गया जिसमें कहा गया कि इन आंदोलनकारी छात्रों पर तुरंत नियंत्रण स्थापित किया जाये।

    क्योंकि ये छात्र सरकार विरोधी आंदोलनों में भाग लेते हैं और आम लोगों को आंदोलनों में भाग लेने के लिये उकसाते हैं। इन परिपत्रों का बहुत कम प्रभाव देखने को मिला। ई.1931 में गांधी इरविन समझौते के विफल हो जाने के कारण अजमेर में सत्याग्रह ने पुनः उग्र रूप धारण कर लिया।

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