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  • अजमेर का इतिहास - 78

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 78

    अजमेर में क्रांतिकारी गतिविधियाँ


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के केन्द्र में स्थित होने के कारण, अजमेर चारों ओर से राजपूत रियासतों से घिरा हुआ था। अतः राजनीतिक एवं सामरिक दृष्टि से अजमेर का अत्यंत महत्त्व रहा। दिल्ली सल्तनत के बादशाहों ने अजमेर को अपने अधीन बनाये रखने के लिये हिन्दू नरेशों से सतत युद्ध किया। मुगल बादशाहों ने राजपूत नरेशों के विरुद्ध किये गये अभियानों के लिये अजमेर को अपना मुख्यालय बनाया। सिसोदियों, कच्छवाहों एवं राठौड़ों ने अजमेर पर अधिकार करने और बनाये रखने के लिये सैंकड़ों साल तक परस्पर संघर्ष किया। कितने ही राजाओं की हत्या हुई। मराठों ने इस पर अधिकार करके इसे उत्तर भारत में अपनी बड़ी राजधानी बनाया।

    अंग्रेजों ने अजमेर में अपना पोलिटिकल मुख्यालय स्थापित किया और अजमेर से 11 मील दूर नसीराबाद में अपनी छावनी स्थापित की। यदि ब्रिटिश शासन काल में अजमेर को राजस्थान में राजनैतिक चेतना का पथ प्रदर्शक कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। राजपूताने की रियासती जनता राजनैतिक चेतना के अभाव से ग्रस्त होने के कारण अपने विलासी व चरित्रहीन राजाओं को भी श्रद्धा एवं निष्ठा से देखती थी। उनके राजा अंग्रेजों के अधीन थे अतः रियासती जनता, दासों की दास थी। अंग्रेजों के प्रत्यक्ष अधीन होने से अजमेर की जनता रियासती जनता की अपेक्षा अधिक अच्छी स्थिति में थी और उसमें राजनैतिक चेतना का प्रादुर्भाव भी रियासती जनता की अपेक्षा पहले हुआ।

    राजनैतिक चेतना का आरम्भ

    अजमेर में राजनैतिक चेतना आरम्भ करने का श्रेय आर्यसमाज को है। स्वामी दयानंद सरस्वती प्रथम क्रांतिकारी सन्यासी थे जिन्होंने घोषित किया कि भारत भारतियों का है तथा हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। उन्होंने ही विदेशी शासन के विरुद्ध क्रांति की प्रथम चिन्गारी प्रज्ज्वलित की। अजमेर के शीर्षस्थ राजनैतिक कार्यकताओं के निर्माण का श्रेय आर्यसमाज को ही है। अधिकांश राजनैतिक कार्यकर्ताओं व क्रांतिकारियों की शिक्षा दीक्षा आर्यसमाज की संस्थाओं में हुई। केसरीसिंह बारहठ के पुत्र प्रतापसिंह बारहठ ने मैट्रिक तक शिक्षा अजमेर के डीएवी हाईस्कूल में प्राप्त की थी।

    डोगरा गोली काण्ड से सम्बन्धित रामसिंह का पालनपोषण अजमेर के आर्यसमाज के बाल सदन में हुआ था। खरवा के क्रांतिकारी राव गोपालसिंह आर्यसमाज के रंग में रंगे थे। देशभक्त राम नारायण चौधरी, आर्यसमाज की ही उपज थे। स्वामी दयानंद सरस्वती के व्यक्तित्व ने जहाँ राजनैतिक व क्रांतिकारी देशभक्तों को प्रेरणा दी वहीं उन्होंने उदयपुर, जोधपुर, शाहपुरा व मसूदा के राज परिवारों को भी सन्मार्ग दिखाया था। यही कारण था कि अजमेर देशभक्ति से प्रेरित गतिविधियों का पथ प्रदर्शक व प्रेरक केन्द्र बनने में सफल रहा।

    क्रांतिकारी गतिविधियाँ

    अजमेर की प्राकृतिक एवं भौगोलिक विशेषतायें क्रांतिकारी आंदोलन के उत्थान, शरण स्थली एवं प्रशिक्षण केन्द्र चलाने जैसी गतिविधियों के लिये वरदान सिद्ध हुई। अजमेर के चारों ओर की पहाड़ियों में गहन वन स्थित होने से विप्लववादी इनमें आकर छिप जाते थे और लम्बे समय तक अपनी गतिविधियाँ चलाते रहते थे। वर्धा के एक क्रांतिकारी जी. आर. पाण्डे ने इन्हीं वनों में एक व्यायामशाला की स्थापना कर अपनी विप्लववादी गतिविधियों का संचालन किया। इस स्थान पर अब साधु आश्रम चलता है।

    वर्तमान गौतम स्कूल के स्थान पर भी पहले व्यायामशाला थी जहाँ से रुद्रदत्त जगदीश व्यास तथा लक्ष्मीनारायण पहलवान ने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन किया था। अंतेड़ के पर्वतीय क्षेत्र में गोपालसिंह व उनके सहयोगियों द्वारा गौशाला के रूप में एक विप्लवकारी केन्द्र की स्थापना की गई। अजमेर पर्वतीय प्रकोष्ठ ने बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों की ब्रिटिश सरकार के गुप्तचरों के जाल से रक्षा की।

    ई.1912 के हार्डिंग्ज बम केस से सम्बन्धित क्रांतिकारियों को अजमेर के देशभक्तों ने शरण प्रदान की। भगवती चरण, चन्द्रशेखर आजाद तथा वासुदेव ने समय-समय पर अजमेर में शरण ली। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी आर्मी की अजमेर शाखा ने सरदार भगतसिंह को यहाँ शरण दी। बंगाल के स्वामी कुमारानंद ने अजमेर को अपना आधार स्थल बनाया। इस प्रकार अजमेर, भारत प्रसिद्ध क्रांतिकारियों की शरण स्थली बन गया। क्रांतिकारियों के लिये जिन शस्त्रों की आवश्यकता थी, अजमेर उनकी पूर्ति में सहायक सिद्ध हुआ क्योंकि रियासतों, जागीरों व ठिकानों से क्रांतिकारियों को सस्ते दामों में रिवॉल्वर, बन्दूक, पिस्तौल व कारतूस मिल जाते थे।

    इसका कारण यह था कि जागीरदारों में ब्रिटिश सरकार के प्रति आक्रोश था और वह अंग्रेजों को समाप्त करना चाहते थे। रियासतों में शस्त्र रखने की पाबंदी नहीं थी। बिटिश नौकरशाही व पुलिस के चंगुल से बचने के लिये क्रांतिकारी अजमेर से भागकर रियासतों में चले जाते थे क्योंकि दोनों से से अजमेर तथा रियासतों की सीमाओं में केवल 5 से 15 मील का ही अंतर था जिसे पार कर रियासतों में प्रवेश करना कठिन नहीं था।

    किसी अपराधी को रियासतों से पकड़ने के लिये ब्रिटिश सरकार को रियासती सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी, जब तक अनुमति प्राप्त होती, तब तक क्रांतिकारी भागकर दूसरी रियासत में जा चुके होते थे। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों को पकड़ने में असफल रहती थी। रियासतों के पुलिस अधिकारी भी क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति रखते थे। इसलिये क्रांतिकारियों ने अजमेर को अपना रक्षा कवच माना।

    अजमेर क्रांतिकारियों का मुख्य शिविर था। यहीं से क्रांतिकारी योजनाओं का निर्माण, निर्देशन तथा अधीक्षण किया जाता था। अजमेर राजस्थान के केन्द्र में स्थित होने के कारण यहीं से क्रांतिकारियों को प्रशिक्षित करके राजस्थान व देश के विभिन्न भागों में भेजा जाता था। अजमेर में इनके प्रमुख केन्द्र मदार गेट का हिन्दू होटल, हनुमानजी के पीछे वाली गली एवं पुष्कर में अगस्त्य मुनि की गुफा तथा लीला सेवड़ी थे।

    बंगाल तथा अन्य क्रांतिकारी स्थलों से प्रकाशित क्रांतिकारी साहित्य का प्रभाव अजमेर के क्रांतिकारियों पर पड़ा। इनमें 'युगांतर' एवं 'संध्या' समाचार पत्र सर्वप्रमुख थे। भवानी मंदिर, वर्तमान राजनीति व मुक्ति कॉनपाथे नामक पुस्तकों का भी यहाँ के क्रांतिकारियों पर प्रभाव पड़ा। इस साहित्य में क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की हत्या करना तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करना न्यायोचित बताया गया।

    अंग्रेजों की हत्या करने के लिये केवल मन का निश्चय व निशाने का पक्का होना आवश्यक माना जाता था। राजनैतिक डकैतियों को समाज एवं राष्ट्र के कल्याण के लिये पुण्य कार्य बताया गया। इन पुस्तकों मंद अस्त्र-शस्त्र निर्माण की तकनीक की विवेचना की जाती थी। गीता, स्वामी रामतीर्थ के व्याख्यान, सावरकर का वार ऑफ इण्डिपेण्डेंस, अरविंद का कर्मयोगी, डिग्बे की प्रोस्परस इण्डिया और बंकिमचंद्र का आनंद मठ आदि साहित्य अजमेर के क्रांतिकारियों में लोकप्रिय था।

    इन रचनाओं ने क्रांतिकारियों में अध्यात्म, स्वाभिमान एवं राष्ट्रीयता का विकास किया तथा अंग्रेजी राज्य के अन्यायों को उखाड़ फैंकने हेतु प्रेरित किया। माधव शुक्ल की कविताओं ने क्रांतिकारियों में देशभक्ति व क्रांति की भावना को जागृत किया। अर्जुनलाल सेठी एवं प्रतापसिंह बारहठ इसकी प्रेरणा के प्रमाण थे। अजमेर के क्रांतिकारियों पर बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों का गहरा प्रभाव पड़ा।

    इन क्रांतिकारियों में श्यामजी कृष्ण वर्मा, रासबिहारी बोस, शचीन्द्र सान्याल, अरविन्द घोष, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह व स्वामी कुमारानंद व विजयसिंह पथिक, जी आर. पाण्डे, रामचन्द्र बापट आदि मुख्य थे जिनका प्रभाव एवं सम्पर्क अजमेर के उल्लेखनीय क्रांतिकारियों से रहा। अजमेर के क्रांतिकारियों ने उपरोक्त क्रांतिकारियों से प्रेरणा प्राप्त की। अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह, प्रतापसिंह बारहठ, नारायणसिंह बारहठ, बाबा नृसिंहदास, स्वामी नृसिंह देव, नारायणसिंह, पण्डित रुद्रदत्त, सूरजसिंह, रामप्रसाद, बालमुकुंद, रामकरण, वासुदेव, रामजीलाल बंधु कन्हैयालाल आजाद, जगदीश दत्त व्यास, लक्ष्मीनारायण पहलवान, सोमदत्त लाहिड़ी, लक्ष्मीलाल लाहिड़ी, विष्णुदत्त, मणिलाल दामोदर, पण्डित ज्वाला प्रसाद, रामसिंह व भूपसिंह आदि क्रांतिकारी इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

    क्रांतिकारी दल का लक्ष्य भारत के लिये पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना था। वे स्वाधीनता प्राप्ति हेतु हिंसात्मक कार्यों को उचित मानते थे। वे कार्य करने की गुप्तता में विश्वास करते थे। उनका उद्देश्य भारत में विदेशी शासकों की हत्या करना एवं उन्हें स्वदेश लौट जाने को बाध्य करना था जिससे ब्रिटिश शासन का अंत हो सके। वे हिंसा को शक्ति के रूप में पूजते थे।

    उनका मेकियावली की विचारधारा में पूर्ण विश्वास था। अतः वे लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अनुचित साधनों का प्रयोग करना भी अनैतिक नहीं मानते थे। उनके साधनों में गोली, पिस्तौल, रिवॉल्वर, बंदूक एवं बम के प्रयोग को मुख्य स्थान प्राप्त था। ई.1907 से 1911 तक के चार वर्ष क्रांतिकारी संगठनों की स्थापना के काल रहे। इस काल में अनेक संगठनों की स्थापना हुई। अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ तथा विजयसिंह पथिक द्वारा वीर भारत सभा नामक गुप्त संगठन की स्थापना की गई। इसके अनन्तर अनेक गुप्त समितियों का निर्माण हुआ।

    इन गुप्त समितियों में से एक के संगठक राव गोपालसिंह थे जिन्हें फील्ड मार्शल कहा जाता था। विजयसिंह पथिक इनके दाहिने हाथ थे। ब्यावर निवासी दामोदर दास राठी इस समिति के कोषाध्यक्ष थे। इस गुप्त समिति ने बंगाल तथा उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों से सम्बन्ध बनाये रखा। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश के अनन्तर अजमेर में हिन्दुस्तान सोशियलिस्ट रिवोल्यूशनरी आर्मी नामक संगठन की शाखा स्थापित की गई जिसका सम्बन्ध उपरोक्त क्रांतिकारियों से था। रासबिहारी बोस तथा शचीन्द्र सान्याल द्वारा पंजाब एवं अजमेर की शाखाओं में डोंगरा काण्ड के सिलसिले में तालमेल स्थापित किया गया।

    अजमेर के क्रांतिकारी शिक्षण संस्थाओं की ओट में क्रांति का प्रचार करते थे। उन्होंने छात्रावासों एवं विद्यालयों को अपनी कार्यविधि का केन्द्र बनाया। इन संस्थाओं में क्रांति के प्रचार के लिये गुप्त प्रचार पद्धति की शिक्षा दी जाती थी। उन्हें इश्तिहार छापना व चिपकाना तथा वितरित करने की शिक्षा दी जाती थी। जनता में उत्तेजना प्रसार करने की विधि, शस्त्र संग्रह तथा उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने के तरीकों की शिक्षा दी जाती थी। ये शिक्षणालय शस्त्र छिपाने के केन्द्र थे।

    क्रांतिकारी विष्णु दत्त उत्तर प्रदेश से कई युवकों को अपने साथ लेकर अजमेर आये। इनके निर्देशन में अजमेर में अनेक गुप्त समितियों का निर्माण हुआ। इन समितियों ने नसीराबाद स्थित रायफल्स के सैनिक अधिकारियों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये भड़काया। इन क्रांतिकारियों का जोधपुर महंत हत्या काण्ड, कोटा षड़यन्त्र तथा निमाज हत्याकाण्ड से प्रत्यक्ष सम्बन्ध था। गिब्सन वडोगरा काण्डों में ज्वाला प्रसाद तथा रामसिंह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। अजमेर के क्रांतिकारियों का सम्बन्ध स्थानीय विद्रोहों, षड़यंत्रों एवं हत्याकाण्डों से ही नहीं था अपितु अखिल भारतीय क्रांतिकारी षड़यंत्रों एवं विद्रोहों से भी था।

    ई.1912 में हार्डिंग्ज बम षड़यन्त्र, बनारस षड़यन्त्र आदि में राव गोपालसिंह तथा प्रतापसिंह एवं उनके भाई को कारावास हुआ था। गोपालदास खरवा ने दामोदर दास राठी के साथ मिलकर, 21 फरवरी 1915 को सशस्त्र क्रांति की योजना बनायी किन्तु पकड़ लिये गये। 28 जून 1915 को गोपालसिंह खरवा को अंग्रेज सरकार द्वारा टॉडगढ़ में नजरबंद किया गया। 10 जुलाई 1915 को खरवा नजरबंदी से बाहर आकर फरार हो गये। बाद में उन्होंने स्वयं ही आत्मसमर्पण कर दिया। उन पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हो सका। ई.1920 में गोपालसिंह खरवा जेल से रिहा हुए।

    हैल्पोज की कार बम विस्फोट से उड़ाई

    ई.1930 में चंद्रशेखर आजाद अजमेर आये। उन्होंने अजमेर के कमिश्नर हैल्पोज को उड़ाने की योजना बनाई। वे साधु के वेश में बारादरी के पास रहने लगे और लोगों के हाथ देखकर उन्हें भविष्य बताने लगे। एक दिन उन्होंने बारादरी से सर्किट हाउस के बीच बारूदी सुरंगें बिछा दीं तथा जैसे ही हैल्पोज की कार सर्किट हाउस जाने के लिये उन तारों पर पहुँची, आजाद ने विस्फोट कर दिया। कार का पिछला हिस्सा विस्फोट से उड़ गया। संयोग से उस दिन हैल्पोज आगे वाली सीट पर ड्राइवर के पास बैठा था। इसलिये वह सुरक्षित बच गया।

    स्वतंत्रता सेनानी ज्वाला प्रसाद एवं विद्याराम कोटिया उन्हें लाल रंग की कार में बैठाकर कैसरगंज स्थित आर्यसमाज भवन के पिछवाड़े में बने एक तहखाने में ले गये। रात में आजाद को चांद बावड़ी स्थित अनाथालय में ले गये जहाँ वे स्वतंत्रता सेनानी पन्नालाल माहेश्वरी की कोठरी में ठहरे। तीन दिन तक वे उसी कोठरी में रहे और चौथे दिन पन्नालाल के स्वर्गीय भाई के कपड़े पहन कर अजमेर से बाहर निकल गये।

    क्रांतिकारियों को सजा

    ई.1932 में अजमेर-मेरवाड़ा कारावास महानिरीक्षक गिब्सन की हत्या के अभियोग में नरहरि बापट को 10 वर्ष का कारावास हुआ। ई.1932 में ज्वालाप्रसाद शर्मा ने चीफ कमिश्नर की हत्या करने, राजकीय महाविद्यालय का कोष लूटने तथा वायसरॉय की हत्या करने के प्रयास किये। ई.1935 में पुलिस उप अधीक्षक डोगरा की हत्या के अभियोग में ज्वाला प्रसाद शर्मा, रामसिंह एवं रमेशचंद्र को बंदी बनाया गया। ई.1939 में क्रांतिकारी गोपालसिंह खरवा का निधन हो गया।

    क्रांतिकारी आंदोलन की समाप्ति

    अजमेर का क्रांतिकारी आंदोलन कई कठिनाईयों के कारण अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सका। केसरीसिंह बारहठ अपना कार्यक्षेत्र राजपूतों तथा चारणों तक सीमित रखना चाहते थे। इनकी प्रारंभिक गतिविधियां शैक्षणिक एवं सामाजिक सीमाओं तक सीमित थीं। इस संकीर्णता के कारण क्रांतिकारी आंदोलन व्यापक न बन सका। सरकार ने इस आंदोलन को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

    राजपूत नरेशों ने भी ब्रिटिश सत्ता से भयभीत होकर क्रांतिकारियों को कठोर दण्ड एवं कारावास दिये। लम्बे कारावासों ने क्रांतिकारियों को निराश कर दिया। उनके परिवारों को आर्थिक हानि उठानी पड़ी। फलतः अजमेर में क्रांतिकारी आंदोलन ने दम तोड़ दिया। अजमेर के क्रांतिकारी आंदोलन के समाप्त होने का प्रमुख कारण, 20वीं सदी के द्वितीय दशक में कांग्रेस द्वारा चलाया गया असहयोग आंदोलन था। इस आंदोलन ने अजमेर के राजनैतिक जीवन को नया मोड़ दिया। पथिकजी जैसे क्रांतिकारी अब सत्याग्रही बन गये थे।

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