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  • अजमेर का इतिहास - 77

     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 77

    बीसवीं सदी में अजमेर (3)


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    नरहरि बापट गिरफ्तार


    ई.1932 में अजमेर-मेरवाड़ा कारावास महानिरीक्षक गिब्सन की हत्या के अभियोग में नरहरि बापट को 10 वर्ष का कारावास हुआ। इसी वर्ष अजमेर पी.डब्ल्यू.डी. को सेंट्रल पी.डब्ल्यू.डी के अधीन किया गया। अजमेर-मेरवाड़ा के लिये आयकर अधिकारी की नियुक्ति की गयी। इसी वर्ष सरकार ने सस्ता साहित्य मण्डल के प्रेस कार्यालय पर ताला डाल दिया। 4 दिसम्बर 1932 को वायसराय लॉर्ड विलिंगडन अजमेर आया।

    ज्वालाप्रसाद शर्मा गिरफ्तार

    ई.1932 में ज्वालाप्रसाद शर्मा ने चीफ कमिश्नर की हत्या करने, राजकीय महाविद्यालय का कोष लूटने तथा वायसरॉय की हत्या करने के प्रयास किये। अप्रेल 1935 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। ई.1933 में महर्षि दयानंद सरस्वती की मृत्यु की अर्द्ध शताब्दी मनायी गयी। इस अवसर पर अफ्रीका, बर्मा तथा समस्त भारत से आर्य समाजी अजमेर आये। ई.1934 में अजमेर म्युन्सिपल कमेटी को एक नामित कमेटी द्वारा समाप्त कर दिया गया। ई.1935 में दी गवर्नमेंट रेलवे पुलिस तथा अजमेर-मेरवाड़ा पुलिस को मिला दिया गया। बनास नदी पर देवली के निकट एक पुल बनाया गया।

    इसी वर्ष पुलिस उप अधीक्षक डोगरा की हत्या के अभियोग में ज्वाला प्रसाद शर्मा, रामसिंह एवं रमेशचंद्र को बंदी बनाया गया। इसी वर्ष सरकार ने मेयो कॉलेज का प्रबंधन राजपूताना के राजाओं द्वारा चुनी गयी मेयो कॉलेज कौंसिल को सौंप दिया।

    अजमेर नगर का विस्तार

    ई.1875 से अजमेर नगर की जनसंख्या में वृद्धि होनी आरंभ हुई थी जो अब तक लगातार होती जा रही थी। ई.1924 तक मेयो कॉलेज के पीछे सैंकड़ों एकड़ क्षेत्र में गुलाबों के खेत हुआ करते थे। इस क्षेत्र को गुलाबबाड़ी कहा जाता था। तब यहाँ कुछ झौंपड़ियां ही हुआ करती थीं। ई.1924 में यहाँ एक कॉलोनी की स्थापना की गई। इस कॉलोनी में अधिकतकर सार्वजनिक कार्यालयों में कार्य करने वाले लोग रहते थे। ई.1934-35 में नगर पालिका ने यहाँ की मुख्य सड़क का निर्माण करवाया। आनासागर के उत्तर में आनासागर तथा अंतेड़ की माता मंदिर के बीच में क्रिश्चियन गंज बसा। ई.1930 तक यहाँ कुछ छितरे हुए घर ही बने हुए थे। ई.1930-30 में अजमेर का नगर नियोजन की दृष्टि से सर्वेक्षण किया गया। नरसिंहपुरा के निकट रामनगर तथा फॉय सागर रोड एवं पुष्कर रोड पर भी 1925 से 1935 के बीच कॉलोनियां बस गईं। ई.1925 के आस पास अलवर गेट कॉलोनी बसनी आरंभ हुई। श्रीनगर चंवरी, नया बाजार, भोपों का बाड़ा, लोहकन डोंगरी गहलोतान आदि पुराने क्षेत्रों में भी छोटे-छोटे मौहल्ले विकसित हो गये।

    आदर्शनगर योजना

    अजमेर में जनसंख्या के ताबड़तोड़ प्रसार को देखते हुए ई.1931 में अजमेर के कुछ व्यवसायियों एवं गणमान्य व्यक्तियों ने आदर्शनगर गृह समिति की स्थापना की गई ताकि अजमेर के निकट एक मॉडल टाउन विकसित किया जा सके। भारत सरकार के आर्चीटैक्ट मि. रसेल की सलाह पर एक योजना तैयार की गई तथा उसे नगरपालिका से अनुमोदित करवाया गया। इसमें 100 फुट चौड़ी एक सड़क तथा 30 से 40 फुट चौड़ी कई सड़कें जो एक दूसरे से बिल्कुल मिलती जुलती थीं, बनाई गईं। कुछ छोटी सड़कें भी नियोजित की गईं। आदर्शनगर के लेआउट में स्कूल, खेल के मैदान, डिस्पेंसरी तथा दुकानों के लिये भी प्रावधान किया गया। आदर्श नगर योजना उच्च मध्यम वर्ग के लिये अच्छी आवासीय योजना सिद्ध हुई।

    भारत सरकार अधिनियम 1935

    ई.1935 में नया भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। इसका तृतीय भाग 1 अप्रेल 1937 से लागू किया गया। इसके बाद अजमेर के प्रशासनिक ढांचे में एक बार फिर परिवर्तन आया। अजमेर-मेरवाड़ा को भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग से हटाकर, गृह विभाग के अधीन कर दिया गया क्योंकि नये संविधान के अनुसार भारत सरकार के पोलिटिकल विभाग का प्रशासनिक नियंत्रण क्राउन प्रतिनिधि वायसराय के अधीन दे दिया गया था। नये अधिनियम के अनुसार क्राउन प्रतिनिधि (वायसरॉय) को ब्रिटिश भारत के मामलों में बोलने का अधिकार नहीं रह गया था।

    यह व्यवस्था भी की गई कि भविष्य में अजमेर के कमिश्नर एवं असिस्टेण्ट कमिश्नर यूनाइटेड प्रोविंस सिविल सेवा के अधिकारी होंगे। इनकी नियुक्ति तीन साल के लिये होगी तथा ये एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल फॉर राजपूताना के नीचे काम करेंगे। एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर रेजीडेण्ट इन राजपूताना तथा चीफ कमिश्नर अजमेर मेरवाड़ कर दिया गया। भारत सरकार अधिनियम 1935 में यह प्रावधान किया गया था कि जब संघीय संविधान का निर्माण होगा, तब अजमेर-मेरवाड़ा तथा पांठ-पीपलोदा के लिये संयुक्त रूप से, संघीय विधान सभा में एक सदस्य तथा संघीय विधान परिषद में एक सदस्य का प्रतिनिधित्व होगा।

    यह भी प्रावधान किया गया कि भविष्य में अजमेर प्रांत के लिये कानून का निर्माण गवर्नर जनरल की परिषद के स्थान पर संघीय विधान द्वारा किया जायेगा। इस समय अजमेर-मेरवाड़ा में जो भी कानून चल रहे थे उन्हें किसी सैंवधानिक संस्था द्वारा लागू नहीं किया गया था। 1 अप्रेल 1937 से अनुसूचित जिला अधिनियम (शिड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट्स एक्ट) अप्रभावी बना दिये गये। 1 अप्रेल 1937 से पहले अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र का पुलिस बल, राजपूताना की रेलवे भूमि तथा आबू में पट्टे की जमीनें एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल ऑफ राजपूताना के अधीन हुआ करती थीं। 1 अप्रेल 1937 से ये सारे विषय चीफ कमिश्नर ऑफ अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक नियंत्रण में दे दिये गये।

    गृह विभाग के अधीन

    1 अप्रैल 1937 को अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र को भारत सरकार के गृह विभाग के अधीन कर दिया गया। परिणामतः इस क्षेत्र से सम्बन्धित सभी विधेयक फेडरल लेजिस्लेचर (संघीय विधानसभा) द्वारा पास किये जाने लगे। यह भी व्यवस्था की गई कि इस क्षेत्र के लिये कमिश्नर तथा असिस्टेंट कमिश्नर यूनाइटेड प्रोविन्सेज सिविल सर्विस से प्रतिनियुक्ति पर आयेंगे। भारत के गवर्नर जनरल का एजेन्ट जो अब तक चीफ कमिश्नर कहलाता था, अब से चीफ कमिश्नर अजमेर-मेरवाड़ा तथा राजपूताना का रेजीडेन्ट कहलाने लगा। एक सदस्य फेडरल कौंसिल के लिये चुने जाने की व्यवस्था की गई। इन सदस्यों का चुनाव अजमेर मेरवाड़ा, पांठ-पिपलोदा क्षेत्र से किया जाना था।

    ई.1823 एवं ई.1830 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा मेवाड़ रियासत से 93 गांव तथा मारवाड़ रियासत से 22 गांव समुचित प्रबंधन के लिये मेरवाड़ा जिले में सम्मिलित किये गये थे। ई.1938 में उन्हें वापस उनकी मूल रियासतों को लौटा दिया गया। कुल 273 वर्गमील क्षेत्र मारवाड़ रियासत को तथा 223 वर्ग मील क्षेत्र मेवाड़ रियासत को लौटाया गया। इससे अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत का क्षेत्रफल 2,710 वर्गमील से घटकर 2,367.9 वर्ग मील रह गया तथा जनसंख्या 5,60,292 से घटकर 5,026,964 रह गई। ई.1938 में अजमेर म्युन्सिपलिटी के लिये नई कमेटी बनायी गयी।

    मेवाड़ से निष्कासन के बाद माणिक्यलाल वर्मा ने अजमेर में प्रजा मण्डल की स्थापना की। 14 दिसम्बर 1938 को मेवाड़ प्रजा मण्डल के मथुरा प्रसाद वैद्य को अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत के ब्रिटिश क्षेत्र से बंदी बनाया गया। ई.1939 में अजमेर-मेरवाड़ा में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। इसी वर्ष मेवाड़ पुलिस द्वारा अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत की सीमा में घुसकर माणिक्यलाल वर्मा को बंदी बनाया गया तथा उन्हें निर्ममता से पीटा गया। ई.1939 में क्रांतिकारी गोपालसिंह खरवा का निधन हो गया।

    लॉर्ड लिनलिथगो अजमेर में

    7 मार्च 1940 को भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो अजमेर आये। इसी वर्ष अजमेर में नया रेवेन्यू सैटलमेंट आरंभ किया गया। जुलाई-अगस्त 1940 में अच्छी वर्षा होने से अकाल समाप्त हो गया। इसी वर्ष अजमेर में जयपुर रोड पर नया मेटेरनिटी होम बनाया गया। इसी वर्ष सस्ता साहित्य मण्डल अजमेर से दिल्ली ले जाया गया तथा माणिक्यलाल वर्मा के अजमेर कारावास में अस्वस्थ हो जाने के कारण उन्हें रिहा किया गया।

    ई.1940 की जनगणना

    ई.1940 में अजमेर जिले का क्षेत्रफल 2,070 वर्ग मील था तथा जनसंख्या 4,23,918 थी। यह 80 मील लम्बा तथा 50 मील चौड़ा था। अजमेर की जनसंख्या 1,19,524 हो गई। इस समय नसीराबाद की जनसंख्या 21,397 तथा केकड़ी की जनसंख्या 7,179 थी। पुष्कर की जनसंख्या 3781 थी। इसमें 518 गांव थे जिनमें से 140 गांव खालसा के तथा 51 गांव जागीरी क्षेत्र में तथा 327 गांव जागीरी क्षेत्र के अधीन थी। मेरवाड़ा जिले की जनसंख्या 82,947 हो गई। इस जिले में एक नगर ब्यावर स्थित था जिसकी जनसंख्या 28,342 थी तथा इसमें 214 गांव थे जो सभी, खालसा के अंतर्गत थे।

    अजमेर में पुनः डिप्टी कमिश्नर व्यवस्था

    ई.1943 में पुनः अजमेर-मेरवाड़ा के लिये अलग-अलग डिप्टी कमिश्नरों की नियुक्ति की गई।

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