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     02.06.2020
    अजमेर का इतिहास - 76

    बीसवीं सदी में अजमेर (2)


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    रोमन कैथोलिक बिशप की नियुक्ति


    17 नवम्बर 1913 को डॉ. जे. एच. कूमॉन्ट को अजमेर का पहला रोमन कैथोलिक बिशप नियुक्त किया गया। ई.1913 में अजमेर में पहली बार को-ऑपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार की नियुक्ति हुई।

    प्रथम विश्व युद्ध

    ई.1914 में प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ। इस युद्ध में अजमेर मेरवाड़ा ने ब्रिटेन की बहुत सहायता की। मेरवाड़ा से बड़ी संख्या में सैनिकों की भर्ती की गई। मेरवाड़ा के प्रत्येक उस व्यक्ति को सेना में भर्ती किया गया जो हथियार उठा और चला सकता था। उन्हें मेसोपोटामिया एवं अफ्रीका के विभिन्न मोर्चों पर लड़ने के लिये भेजा गया। अजमेर तथा ब्यावर से युद्ध ऋण के रूप में बड़ी धनराशि भिजवाई गई। 2,12,810 रुपये 12 आने चार पाई युद्ध कोष के रूप में जुटाये गये। 20,45,349 रुपये युद्ध ऋण के रूप में भिजवाये गये। अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में युद्ध प्रचार के लिये एक समिति का गठन किया गया। मेयो कॉलेज अजमेर के प्रिंसीपल मि. लेसली जोन्स इस समिति के अध्यक्ष थे। हर बिलास शारदा को इस समिति का सचिव नियुक्त किया गया।

    ई.1916 में भारत का वायसराय लॉर्ड चैम्सफोर्ड अजमेर आया। स्कॉटलैण्ड वूमन्स मिशन हाँस्पिटल का चर्च खोला गया। अजमेर-मेरवाड़ा युद्ध बोर्ड की स्थापना की गयी।

    मलेरिया से 20 हजार लोगों की मृत्यु

    ई.1918 में मलेरिया की महामारी पूरे भारत में फैली। इस महामारी से अजमेर में 19,835 व्यक्ति मर गये। ई.1919 में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट लागू किया गया किंतु अजमेर को इससे अलग रखा गया। ई.1918 में अजमेर में मेटेरनिटी होम खोला गया। राष्ट्रव्यापी मलेरिया महामारी फैली जिसमें अजमेर के 29 हजार 830 व्यक्ति मर गये। ई.1919 में सर एडविन लुटियान्स द्वारा तैयार राजकीय हाई स्कूल भवन की डिजाइन के अनुसार भवन निर्माण कार्य आरंभ किया गया। इसी आर्चीटैक्ट ने नई दिल्ली नगर की भी योजना तैयार की थी।

    राजस्थान सेवा संघ

    ई.1919 में विजयसिंह पथिक तथा रामनारायण चौधरी ने वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की जिसे बाद में अजमेर स्थानान्तरित कर दिया गया तथा नवीन राजस्थान नामक अखबार शुरू किया गया। ये नीम का थाना में रहने वाले अग्रवाल वैश्य परिवार से थे तथा कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी के बड़े भाई थे। आरंभ में ये क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। बाद में नेहरू एवं गांधी के निकट सहायोगी रहे। इन्होंने बिजौलिया एवं बेगूं किसान आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण ये एक साल तक अजमेर की जेल में बंद रहे। इन्होंने राजस्थान के स्वाधीनता आंदोलन पर कई पुस्तकें लिखीं।

    अश्वर्थ समिति

    ई.1920 में भारत सरकार ने अजमेर-मेरवाड़ा की प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था पर रिपोर्ट तैयार करने के लिये मि.अश्वर्थ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया ताकि स्थानीय लोगों को भी प्रशासन में भागीदारी दी जा सके। हरबिलास शारदा ने इस समिति को एक ज्ञापन दिया। शारदा ने समिति को सुझाया कि अजमेर-मेरवाड़ा एक अत्यंत छोटी इकाई है। इसके आय के स्रोत अत्यंत सीमित हैं। यहां आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं शैक्षणिक विकास उस गति से होना संभव नहीं है जिस गति से अन्य धनी प्रांतों में हो रहा है।

    यहां की प्रशासनिक व्यवस्था उच्च स्तर की नहीं हो सकती। यहां की न्याय पालिका का स्तर युनाइटेड प्रोविंस या बम्बई प्रांत की न्याय पालिका के बराबर का नहीं हो सकता। यहां के नवयुवकों के लिये रोजगार और उद्योग के साधन बड़े प्रांतों की तुलना में बहुत कम उपलब्ध हैं। अतः अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत को किसी निकटवर्ती बड़े प्रांत में सम्मिलित कर दिया जाये। ऐसा करने पर इस क्षेत्र की भी समुचित उन्नति संभव हो सकेगी। उन्होंने सुझाव दिया कि अजमेर-मेरवाड़ा का विलय युनाइटेड प्रोविंस के साथ कर दिया जाये।

    युनाइटेड प्रोविंस एवं अजमेर-मेरवाड़ा के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक दृष्टि से बहुत समानता है। इससे पहले भी ई.1818 से लेकर लगभग 50 वर्षों तक अजमेर-मेरवाड़ा, युनाइटेड प्रोविंस का ही अंग रहा है। ऐसा पुनः करने में कोई कठिनाई नहीं आयेगी। शारदा ने यह भी मांग की कि अजमेर-मेरवाड़ा से केन्द्र के दोनों सदनों में अपना प्रतिनिधि भेजने का अधिकार प्राप्त हो।

    अश्वर्थ समिति शारदा के प्रस्तावों से प्रभावित हुई। उसने सरकार को दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा कि अजमेर-मेरवाड़ा में दक्ष प्रशासन लागू करने का एक ही तरीका है और वह है कि दूसरे प्रांतों में आरंभ किये गये सुधारों को अजमेर में भी लागू किया जा सके। इस समिति की रिपोर्ट का कोई परिणाम नहीं निकला। भारत सरकार ने इस रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं की।

    प्रिंस ऑफ वेल्स

    ई.1921 में दिल्ली, अजमेर तथा केन्द्रीय भारत के लिये अलग से एजूकेशन सुपरिण्टेण्डेण्ट नियुक्त किया गया। अजमेर-मेरवाड़ा की जनगणना की गयी। 28 नवम्बर 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स अजमेर आया। वह प्रातः साढ़े आठ बजे अजमेर पहुँचा तथा उसी रात्रि 11 बजे वापस चला गया। लॉर्ड क्रोमेर तथा एडमिरल हलेसी भी उसके साथ अजमेर आये। वह मेयो कॉलेज देखने गया। ई.1922 में अजमेर में इम्पीरियल बैंक ऑफ इण्डिया की शाखा खोली गयी। ई.1923 में वायसराय मारकीस ऑफ रीडिंग अजमेर आया। इसी वर्ष अजमेर-मेरवाड़ा के एजूकेशन सुपरिण्टेण्डेण्ट का पद समाप्त कर दिया गया।

    मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना

    ई.1924 में मॉण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार योजना के अंतर्गत भी अजमेर-मेरवाड़ा के प्रशासनिक ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। एक मात्र सुधार यह हुआ कि अजमेर-मेरवाड़ा का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय विधान सभा (सेन्ट्रल-लेजिस्लेटिव एसेम्बली) में भेजे जाने की स्वीकृति दी गई। हर बिलास शारदा को इस पद पर नियुक्त किया गया।

    अजमेर में ज्युडीशियल मेम्बर नियुक्त

    ई.1925 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये नवीन म्युन्सिपेलिटीज रेग्यूलेशन लागू किया गया। ई.1925 में हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल की स्थापना की। ई.1926 में उपाध्याय ने अजमेर की राजनीति में प्रवेश किया। ई.1926 में अजमेर-मेरवाड़ा के लिये एक ज्युडीशियल मेम्बर की नियुक्ति की गई तथा मुख्य आयुक्त की न्यायिक शक्तियां समाप्त कर दी गयीं। सीकर राज्य के भूरसिंह नामक डकैत ने कई वर्षों से जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, किशनगढ़, अलवर, नाभा, पटियाला आदि रियासतों और अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में उपद्रव मचा रखा था। मारवाड़ पुलिस ने इस डकैत को पकड़ लिया। 30 अक्टूबर 1926 को एजीजी द्वारा मारवाड़़ पुलिस के लिये 13,900 रुपये पुरस्कार के भेजे गए।

    साइमन कमीशन

    ई.1927 में भारत में साइमन कमीशन आया। इस कमीशन द्वारा दी गई रिपोर्ट में कहा गया कि अजमेर-मेरवाड़ा में किसी प्रकार के संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही आयोग ने भारत सरकार को सिफारिश की कि अजमेर-मेरवाड़ा से जो पहले निर्वाचित प्रतिनिधि केन्द्रीय विधानसभा में भेजा जाता था, अब वह चीफ कमिश्नर द्वारा मनोनीत किया जाये। इस रिपोर्ट की अजमेर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। हर बिलास शारदा ने इसकी सार्वजनिक आलोचलना करते हुए कहा कि अब अजमेर को भी एक लाल कुर्ती आंदोलन करने की आवश्यकता है।

    हटूण्डी में गांधी आश्रम की स्थापना

    ई.1927 में सरकार ने अजमेर में प्राथमिक शिक्षा का कार्य म्युन्सिपलिटी को सौंपा। इसी वर्ष सस्ता साहित्य मंडल ने त्यागभूमि मासिक पत्रिका आरंभ की जो ई.1930 में साप्ताहिक पत्र में बदल गयी। ई.1927 में बाबा नृसिंहदास तथा हरिभाऊ ने हटूण्डी में गांधी आश्रम की स्थापना की। ई.1928 में कैसर बाग में न्यू विक्टोरिया हॉस्पिटल खोला गया। ई.1929 में अजमेर में बोर्ड ऑफ हाई स्कूल एण्ड इण्टरमीडियेट एजयूकेशन फॉर राजपूताना, सेन्ट्रल इण्डिया एण्ड ग्वालियर खोला गया। दिसम्बर 1929 में बाबा नृसिंदास अग्रवाल के आदेश पर हरिभाऊ उपाध्याय ने अजमेर में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम हाथ में लिया। उन्हें अजमेर-मेरवाड़ा- राजपूताना-मध्यभारत कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। ई.1930 में अजमेर में किंग जॉर्ज रॉयल इण्डियन मिलिट्री स्कूल खोला गया। 7 मार्च 1930 को भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन अजमेर आये। अजमेर नगर में विद्युत आपूर्ति आरंभ की गयी।

    अजमेर में स्वतंत्रता दिवस

    ई.1930 में बाबा नृसिंहदास अग्रवाल के नेतृत्व में अजमेर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। अप्रेल 1930 में देशव्यापी नमक सत्याग्रह चला। इसमें अजमेर ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 20 अप्रेल 1930 को हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृतव में अजमेर में नमक कानून तोड़ा गया। हरिभाऊ उपाध्याय, विजयसिंह पथिक, गोकुललाल असावा तथा रामनारायण चौधरी आदि नेता बंदी बनाये गये।

    राजपूताना और मध्य भारत सभा का प्रान्तीय सम्मेलन

    23 नवम्बर 1931 को अजमेर में कस्तूरबा गांधी की अध्यक्षता में राजपूताना और मध्य भारत सभा का प्रान्तीय राजनैतिक परिषद् का सम्मेलन हुआ। इसी वर्ष अजमेर में आदर्शनगर एक्सेटेंशन का निर्माण आरंभ हुआ।

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